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Friday, 1 March, 2024
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बजट पर बहस के लिए परिणामों के प्रमाण और आंकड़ों तक सबकी पहुंच ज़रूरी है

संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में भारत का दर्जा कई वर्षों से स्थिर है, यानी वह दूसरे देशों के मुक़ाबले न तो बहुत बेहतर काम कर रहा है और न बहुत बुरा, हालांकि ज़्यादातर देश भारत के मुक़ाबले धीमी गति से ही आर्थिक वृद्धि दर्ज कर रहे हैं

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हाल के वर्षों में सरकारी बजटों की आम तौर पर इसलिए यह आलोचना की जाती रही है कि उनमें सामाजिक सेक्टरों की उपेक्षा करके पूंजीगत निवेश पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता रहा है. इसका असर यह देखा गया है कि रोजगार गारंटी के कार्यक्रम के लिए बजट में किए जाने वाले प्रावधान में कटौती की जाती रही है, और शिक्षा का बजट जस का तस स्थिर रहा है. यह तब है जबकि प्रासंगिक उम्र के समूह का पांचवां हिस्सा माध्यमिक स्तर की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाता, प्राथमिक तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या कई वर्षों से स्थिर है, और ग्रामीण मजदूरी की दरें कुल मिलाकर कोविड महामारी से पहले वाले स्तर पर बनी हुई हैं.

इन आलोचनाओं का जवाब 2022-23 के आर्थिक सर्वे में पाया जा सकता है, जिसमें उपरोक्त बातों के अलावा यह भी दर्ज किया गया है कि तस्वीर केवल काले-सफ़ेद रंग में नहीं है बल्कि विविध रंगों में है. सामाजिक सेक्टर पर सरकारी (केंद्र तथा राज्यों की) खर्चे का अनुपात कुल सरकारी खर्च के हिसाब से और जीडीपी में प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रहे हैं.

2015-16 से 2022-23 के बीच (बजट अनुमानों के मुताबिक) जीडीपी में प्रतिशत के हिसाब से उनका हिस्सा 6.6 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी हो गया (सर्वे के मुताबिक 8.3 फीसदी हो गया क्योंकि उसके पास चालू कीमतों के हिसाब से नया जीडीपी आंकड़ा उपलब्ध नहीं था). उस वृद्धि में स्वास्थ्य सेक्टर का हिस्सा बढ़ा है जबकि शिक्षा का हिस्सा जस का तस है.

इसका परिणाम यह हुआ है कि स्वास्थ्य के आंकड़े सुधरे हैं और ज्यादा घरों को नल का पानी और बिजली उपलब्ध हुई है. दुर्भाग्य से आंकड़े हमेशा कुछ पुराने रहे हैं; कभी-कभी तो परस्पर विरोधी भी रहे हैं. उदाहरण के लिए, सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बताती है कि 2020 में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 में 28 थी, जबकि नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) बताता है कि 2091-21 में यह दर 38.4 थी. अब किस पर विश्वास किया जाए? होता यही रहा है कि विभाग ‘आउटपुट’ के जो दावे करते हैं वे स्वतंत्र सर्वे में मिले ‘आउटपुट’ से हमेशा मेल नहीं खाते.

उदाहरण के लिए, स्वच्छ भारत के मामले में दावा है किया जाता है कि स्वच्छता यह सार्वभौमिक हो चुकी है लेकिन एनएफएचएस का कहता है कि स्वच्छता में सुधार 65 फीसदी घरों में ही हुआ है. और रसोई गैस उपलब्ध कराने में उज्ज्वला स्कीम की भले काफी तारीफ की जाती हो, मगर स्वच्छ ईंधन केवल 43 फीसदी घरों को ही उपलब्ध है.

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संदर्भ बिंदुओं का भी मसला है. कितनी प्रगति हुई है यह पिछले आंकड़े से तुलना करके पता किया जाता है. या अंतरराष्ट्रीय मानकों का इस्तेमाल किया जाता है. यह कभी-कभी समस्या पैदा कर सकता है. ऐसा भारत सरकार के प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ में अपने लेख में ज़ोर देकर कहा है. वे बच्चों में अवरुद्ध विकास के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन, महिलाओं में श्रमिकों के बारे में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों का हवाला दिया है. पहले मामले में भारत का आंकड़ा असामान्य रूप से ऊंचा है और दूसरे मामले में असामान्य रूप से नीचा है.


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भारत का दर्जा कई वर्षों से स्थिर

बहरहाल,  गौर करने वाली बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक (एचडीआइ) में भारत का दर्जा कई वर्षों से स्थिर है, यानी वह दूसरे देशों के मुक़ाबले न तो बहुत बेहतर काम कर रहा है और न बहुत बुरा, हालांकि ज़्यादातर देश भारत के मुक़ाबले धीमी गति से आर्थिक वृद्धि दर्ज कर रहे हैं.

इसके अलावा, एचडीआइ में भारत की प्रगति दर इस सदी के दूसरे दशक में इससे पहले के दो दशकों की दरों के मुक़ाबले काफी धीमी हुई है. मानव विकास के मामले में भारत ‘मझोली’ श्रेणी में है. ‘उच्च’ श्रेणी में जाने के लिए सीमारेखा पार करने (वियतनाम पार कर चुका है) में वर्तमान प्रगति दर के हिसाब से दशक का बाकी समय लग जाएगा. कई सरकारी कार्यक्रमों ने काफी सफलता हासिल की है, फिर भी कुल प्रदर्शन से ऐसा लगता है कि कोई उल्लेखनीय छ्लांग नहीं लगाई गई है.

सर्वे में सूचीबद्ध कई तरह के डाटा प्लेटफॉर्म के गठन का जिक्र जरूरी है, जिन पर सरकार के कई कार्यक्रमों को आधारित किया जा सकता है. आधार (जिनकी जरूरत उन बैंक खातों के लिए पड़ती है जिनमें 1000 से ज्यादा केंद्रीय तथा प्रादेशिक कार्यक्रमों के तहत सीधा भुगतान किया जाता है) और यूपीआइ (काफी सफल) के अलावा कई ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जिन पर अनौपचारिक सेक्टर, छोटे कारोबारों, डिजिटल कॉमर्स, आदि के लिए कामगारों को रजिस्टर किया जाता है.

इनमें से कुछ डाटा (जैसे, जीएसटी के भुगतान के लिए रजिस्ट्रेशन में दोगुनी वृद्धि) का इस्तेमाल व्यवसाय के आकार और वृद्धि की दिशा को रेकॉर्ड करने जैसे मामले के लिए किया जाता है. लेकिन ऐसे परिणामों के और ज्यादा प्रमाणों की जरूरत होती है, और व्यापक विश्लेषण के लिए मेटा डाटा तक पहुंच की भी जरूरत होती है. मसलन यह जानना जरूरी है कि अनौपचारिक सेक्टर के 28.50 करोड़ कामगारों को ई-श्रम प्लेटफॉर्म पर खुद को रजिस्टर कराने पर क्या लाभ मिल सकते हैं.

(विचार निजी हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड से विशेष प्रबंध द्वारा)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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