अरिन्दम मुख़र्जी के द्वारा चित्रण । दिप्रिंट.इन
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अब हमारे पास पर्याप्त सबूत हैं कि रफाल सौदे में एक भारी घोटाला है. हालाँकि यह बात अलग है कि यह ‘घोटाला’ कम और मूर्खता ज़्यादा है.

यदि आपको ‘मूर्खता’ बहुत कठोर लगे तो तो आप एक शिष्टोक्ति या यूफेमिज़्म का चयन कर सकते हैं यदि आपको लगता है कि वह इस भयंकर अहंकारी विचार का पर्याप्त रूप से वर्णन करता है कि आप दो लोकतांत्रिक सरकारों के बीच एक सीक्रेसी क्लॉज़ का दावा करके लगभग $10 बिलियन सौदे के मूल्य पर किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार कर सकते हैं. वह भी तब जब सारा खर्च संसदीय और लेखापरीक्षा जांच के अधीन है. या फिर ऐसे स्पष्टीकरण जो समय के साथ साथ और अविश्वसनीय होते जा रहे हैं.

आज के हथियार बाज़ार में प्लेटफॉर्म, हथियारों और सहायक उपकारों की कोई बात छुपी नहीं रही. यदि आप राफेल के साथ मीटियर मिसाइलें खरीद रहे हैं तो न सिर्फ पाकिस्तानी और चीनी वायु सेनाएं, बल्कि स्मार्टफोन रखने वाला कोई भी डिफेन्स ‘नर्ड ‘ किशोर आपको इस पर एक ट्यूटोरियल दे सकता है. जिसे आप गुप्त रख सकते हैं वह संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक्स और रणनीति है. पायलट के लिए इज़राइली 360 डिग्री हेलमेट हो या एक एक मीटियर मिसाइल की कीमत, हर विषय पर ओपन सोर्स सैन्य साहित्य में व्यापक रूप से चर्चा की जाती है. इसपर सार्वजनिक रूप से चर्चा करने से कोई नुकसान नहीं हुआ और इसे छिपाने का कोई कारण नहीं था. अहंकार के आलावा: रक्षा सौदे में कोई भी हमसे सवाल पूछने की हिम्मत कैसे कर सकता है? क्या हम बोफोर्स दशक वाली कांग्रेस के जैसे हैं?


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अब जाकर भाजपा को यह अहसास हुआ है कि कि बोफोर्स के बाद, कोई भी बड़ी रक्षा खरीद करने वाली सरकार को चोर घोषित किये जाने की सम्भावना सौ प्रतिशत है. समस्या से निपटने के तीन तरीके समझ आते हैं . सबसे पहला, ए.के. एंटनी रास्ता: बस कुछ खरीदो ही मत, और सभी निजी वैश्विक हथियार कंपनियों पर प्रतिबंध लगाओ. एकमात्र बड़ी खरीद रूस के साथ थी जो पूरी तरह से सरकार-से -सरकार वाली थी जहां मूल्य निर्धारण या प्रतिस्पर्धा की कोई पारदर्शिता नहीं है. उसके आलावा अमेरिका से कुछ गैर-घातक प्रणालियाँ भी थीं. दूसरा तरीका है कि आप एक पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करें, निडर होकर सौदा करें, लेकिन अनिवार्य रूप से उत्पन्न होने वाले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तैयार रहें. या तीसरा, आप एक राजा की तरह खरीदते हैं, सुरक्षा और अन्य औपचारिकताओं पर कैबिनेट कमेटी जैसी सभी ‘उबाऊ’ प्रक्रिया को बाईपास करते हैं, विदेशी यात्रा पर बड़ी सुर्खियां बनाते हैं, और फिर किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से तिरस्कारपूर्वक मना कर देते हैं. यह लगातार, घमंडी मूर्खता है और दिखाता है कि मोदी सरकार ने खुद के लिए एक गड्ढा खोदा है.

प्रत्येक गुज़रने वाले दिन के साथ, सरकार इस गड्ढ़े में और ज़्यादा गहरे घुसती जा रही है . 126 रफालों के पहले सौदे को आगे बढ़ाने का नवीनतम बहाना , जिनमें से 108 का निर्माण हमारे अलांछ्नीय पीएसयू मोनोपोली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा किया जाना था, यह है कि इसमें बैक-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है .

यह सच है कि दुनिया की कोई भी कंपनी एक विशिष्ट विदेशी लड़ाकू विमान के लिए असेंबली लाइनों के साथ तत्काल तैयार नहीं होगी. किसी भी समझदार व्यक्ति को पता लगेगा कि एचएएल अभी भी किसी भी अन्य कंपनी की तुलना में लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए बेहतर सुसज्जित होगा क्योंकि इसने अपने मोनोपोली के वर्षों में यही तो किया है. लेकिन कोई भी रक्षा पीएसयू को भला बुरा नहीं कहेगा. यह एक अलग कहानी है कि वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान भारत ने एक बहुत बड़ा अवसर खो दिया था जब आईएएफ पूरी मिराज -2000 असेंबली लाइन को भारत में स्थानांतरित करना चाहता था. वैसी हालत में राफेल के लिए एचएएल तैयार होता लेकिन उस समय तहलका के मारे जॉर्ज फर्नांडीस, ‘सिंगल-विक्रेता’ खरीद से सावधान थे.

किसी अज्ञात कारण की वजह से सरकार यह सरल सत्य नहीं बताएगी कि 126 रफाल जितनी बड़ी खरीद अनावश्यक थी, कि वह सेना और नौसेना के बजट को खाली कर देगी और वर्तमान समय के लिए लिए दो स्क्वाड्रन पर्याप्त मानी जाती थीं. कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि एचएएल की कीमत पर किसी और को फायदा पहुँचाया गया है लेकिन क्योंकि आपने आदेश को घटा दिया और सह-उत्पादन छोड़ दिया? क्यों, यह मेरी समझ से बाहर है. जब तक तर्क न हो, तो सच्चाई क्यों बोलें जब बकवास का एक जाल बुनना और स्वयं को जान बूझकर उसमें फंसाना कहीं ज़्यादा मज़ेदार है.

फिर, आती है यह दलील : एक आपातकालीन खरीद करनी पड़ी क्योंकि आईएएफ की ताकत खतरनाक स्तर तक गिर गयी थी. यह तथ्य 15 वर्षों से ज़ाहिर है. इस विमान की आवश्यकता को पहली बार 2001 में पहचाना गया था. यह रफाल सौदा एक ऐसे देश की अक्षमता पर एक शानदार टिप्पणी है जिसमें सुपरपावर बनने की सोचने वाला भारत अपनी वायुसेना के लिए दो लड़ाकू स्क्वाड्रन खरीदने में सक्षम नहीं है. यहां तक कि यह दो रफाल स्क्वाड्रन भी 2022 तक पूरी तरह से युद्ध योग्य नहीं होंगे. एक सरकार या एक “प्रणाली” , जोकि भारत जितनी अक्षम है, को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ी शक्तियों के पास आउटसोर्स करना चाहिए या देना चाहिए और कश्मीर को पाकिस्तान और अरुणाचल को चीन को सौंपकर, निरस्त्रीकरण से बचे पैसों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर खर्च करना चाहिए.

2014 में नरेंद्र मोदी की जीत को संचालित करने वाली शक्तियों में से एक था मज़बूत, निर्णायक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का वादा. उन्होंने यूपीए पर आरोप लगाया कि वे सशस्त्र सेनाओं के लिए हथियार न खरीदकर उन्हें दिन प्रति दिन कमज़ोर बना रहे हैं. लोग तब उन पर विश्वास करते थे, क्योंकि यह सच था. इसलिए, वही लोग, उससे पूछ सकते हैं कि उन्होंने इसे सुधारने के लिए क्या किया है, तब जब उनके कार्यकाल के केवल कुछ महीने बाकी हैं.

इसका उत्तर मेक इन इण्डिया तमाशे और वायु शो नहीं हैं. रक्षा निर्माण में एफडीआई की मात्रा इतनी हास्यास्पद रूप से कम है, यहां तक कि कुछ मिलियन भी नहीं, कि हम इसका उल्लेख करने में शर्मिंदा हैं. यह सरकार यूपीए जितनी ही डरपोक, अति सावधान और असफल रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि यूपीए ने कभी भी बेहतर का वादा नहीं किया था, लेकिन भाजपा ने किया था.

रफाल निश्चित रूप से अगले वर्ष तक भारतीय आसमान में उड़ रहा होगा. ये दो स्क्वाड्रन उचित समय पर तैयार हो जाएंगे. लेकिन भाजपा सरकार ने जिस तरह से इसे नुकसान पहुँचाया है, उसकी बदौलत वाले सालों में रक्षा अधिग्रहण पर छाया ज़रूर पड़ेगी. और डिफेन्स मेक इन इण्डिया? दुर्भाग्यवश, डेड ऑन अराइवल था क्योंकि आप दशकों में भारत के सबसे बड़े रक्षा सौदे से लाभार्थी के रूप में भारत के सबसे विवादास्पद कॉर्पोरेट घरों में से एक को फायदा पहुंचाते.

यह तब जब इस देश को अभी तक कोई निजी क्षेत्र की कंपनी नहीं मिल पायी है जो सेना के लिए कुछ बना सके . एक ऐसे देश में , जहाँ निजी एयरलाइन और फोन कंपनियों को स्वीकार करने में आधा दशक लग गया था, वहां इसमें भी समय लगेगा. अब, जब आप कहते हैं कि वह रफाल के लिए भी एक स्क्रू का निर्माण नहीं करेगा, या इन “ऑफसेट्स” के तहत दसाउ से प्राप्त आदेश 6,000-12,000 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होंगे और उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फाल्कन के लिए पंख बनाने में होगा तो आप वास्तव में सच बोल रहे हैं. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. लोग जो मानना चाहते हैं वही मानेंगे. वे इसकी तुलना पहली कंपनी के घमंड से करेंगे.


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सीरियल बेवकूफियों की इस सूची में आत्मघाती बेतुकेपन का अंतिम उदाहरण “सीज़ एंड डेज़िस्ट ” वकील की नोटिस है जो कॉर्पोरेट घरों और पत्रकारों (इस लेखक को शामिल) को भेजी गयी है, इस विश्वास में कि हर कोई सदमे में आकर चुप हो जाएगा. मुझे नहीं पता कि रफाल पर सरकार के मामले को अधिक नुकसान किसने पहुंचाया है, ऑफसेट लाभार्थी के अतिरंजित दावे, या यह अविश्वसनीय रूप से घमंडी नोटिस. सरकारें साथ मिल जाएंगी, लेकिन दुख की बात है कि दोनों कार्य आईएएफ को नुकसान पहुंचाते हैं, और रक्षा के मेक इन इण्डिया स्वप्न को भी.

रक्षा एजेंटों, फिक्सर्स, कॉर्पोरेट लॉबीस्ट और आत्मनिर्भर ‘सब जानने वालों’ से भरे इस शहर में इस अँधेरे शहर में किसी भी प्रमुख रक्षा सौदे को घोटाला कहा जाता है. बोफोर्स के दशकों के बाद हर सरकार ने इस तरह के एक विरोध से बचने के लिए प्रक्रियाओं की अधिक जटिल परतों को फैला दिया है. इस तरह की प्रतिरक्षा प्राप्त करने में कोई भी सफल नहीं हुआ है, और कोई हो भी नहीं सकता. मोदी सरकार को पारदर्शिता, प्रकटीकरण और बातचीत के साथ इसे बदलने का अवसर मिला था. उसने इसे गँवा दिया है.

Read in English : There’s a humongous scam in the Rafale deal. It is called stupidity


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