Tuesday, 5 July, 2022
होममत-विमतप्रधानमंत्री से सवाल पूछने के लिए संसद में तय हो समय

प्रधानमंत्री से सवाल पूछने के लिए संसद में तय हो समय

ब्रिटेन की संसद में यह व्यवस्था है और इसको ‘प्राइम मिनिस्टर्स क्वेश्चन’ यानि ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ कहा जाता है, जिसकी शुरुआत 1961 से की गई है.

Text Size:

क्या ब्रिटेन की तरह ही भारत में भी प्रधानमंत्री के लिए संसद में सप्ताह के किसी एक दिन कुछ समय निर्धारित किया जाए, जिसमें सिर्फ़ प्रधानमंत्री सांसदों के सवालों का जवाब दें? ब्रिटेन की संसद में बनायी गयी इस व्यवस्था को ‘प्राइम मिनिस्टर्स क्वेश्चन’ यानि ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ कहा जाता है, जिसकी शुरुआत 1961 से हुई. इस लेख में ब्रिटेन की संसद की कार्यप्रणाली में ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ के रूप में हुए महत्वपूर्ण बदलाव को समझने के साथ-साथ यह भी बताने की कोशिश की गयी है कि क्यों इस तरह का प्रावधान भारत में भी होना चाहिए.

ब्रिटेन में ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ का विशेष प्रावधान

ब्रिटेन की संसद में ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ की शुरुआत 24 अक्टूबर 1961 को हुई. इसमें हर एक सत्र के प्रत्येक बुधवार को दोपहर बाद 12 से 1.30 बजे तक का समय ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ के लिए निर्धारित होता है, जिसमें हाउस ऑफ़ कॉमंस (भारतीय लोक सभा का समकक्ष) के मेंबर प्रधानमंत्री से देश के प्रमुख मुद्दों के बारे में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछते हैं.

संसद का कोई भी एक सदस्य प्रधानमंत्री से सरकार के कामकाज की चर्चा की शुरुआत करता है, जिसके बाद अलग-अलग सदस्य देश के प्रमुख मुद्दों पर सरकार द्वारा उठाए जा रहे क़दमों पर सवाल पूछते हैं. प्रधानमंत्री को एक-एक करके उन सवालों का जवाब देना पड़ता है. इस बहस में प्रधानमंत्री को मुद्दों की जानकारी पहले से होती है, लेकिन क्या सवाल पूछा जाएगा, यह नहीं पता होता है? ब्रिटेन की संसद में होने वाली यह बहस बहुत संजीदगी से होती है, इसलिए यह काफ़ी प्रसिद्ध भी है. इस बहस में सदस्य केवल एक सवाल पूछ सकता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष कई सवाल पूछ सकता है.


यह भी पढ़ेंः क्या है ‘कांग्रेस सिस्टम’ जिसके टूटने के कारण हार रही है पार्टी


‘प्रधानमंत्री से सवाल’ के लिए विशेष समय क्यों?

‘प्रधानमंत्री से सवाल’ के विशेष समय निर्धारण की ज़रूरत को समझने के लिए हमें संसदीय प्रणाली के इतिहास पर नज़र डालने की ज़रूरत है. आधुनिक विश्व में ब्रिटेन को संसदीय प्रणाली का जन्मदाता कहा जाता है. उपनिवेशवाद के माध्यम से यह प्रणाली दुनिया के अन्य देशों में फैली. बीसवीं सदी के मध्य में जब दुनियाभर के देश ब्रिटेन के साम्राज्यवाद से आज़ाद हो रहे थे, तो उनमें से कुछ ने अमेरिका में विकसित हुई अध्यक्षीय/प्रेसिडेंशियल शासन प्रणाली को चुना, जबकि भारत समेत कई देशों ने संसदीय शासन प्रणाली को चुना.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षीय शासन प्रणाली की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, तो अपनी-अपनी कमियां भी. संसदीय प्रणाली देश के विभिन्न समूहों की सरकार में हिस्सेदारी सुनिश्चित करती है और शासन को जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी बनाती है. अध्यक्षीय प्रणाली सरकार को स्थायित्व प्रदान करती है, लेकिन इसमें व्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. भारत की संविधान सभा में 10 दिसंबर 1948 को संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षीय शासन प्रणाली में से किसी एक को अपनाने को लेकर बहस हुई थी, जिसका निष्कर्ष निकला था कि संसदीय शासन प्रणाली अपनायी जाए क्योंकि एक तो देश की जनता इससे काफ़ी हद तक परिचित थी, दूसरी इस व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति ज़्यादा उत्तरदायी होती है.

प्रधानमंत्री नहीं देते सवालों के जवाब

भारत के संविधान निर्माताओं ने संसदीय प्रणाली को इसलिए चुना था क्योंकि इस प्रणाली में बनने वाली सरकार और उसका मुखिया यानी प्रधानमंत्री, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों यानी लोकसभा सदस्यों के प्रति उत्तरदायी रहेगा. लेकिन ऐसा देखा जा रहा है कि सरकार का मुखिया अपनी सरकार के कामकाज का ब्योरा जनता के चुने प्रतिनिधियों से साझा करने से क़तराते रहे हैं. प्रश्नकाल में प्रधानमंत्री को सवालों का जवाब देते हुए नहीं देखा गया है. ब्रिटेन की संसद ने इससे बचने के लिए ‘प्रधानमंत्री से सवाल’ की परम्परा शुरू की. चूँकि भारत ने अपनी संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से ली है, इसलिए उसे भी ब्रिटेन की संसद में आए प्रमुख बदलावों को अपनाने पर विचार करना चाहिए.

इस परिपेक्ष्य में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात की जाए तो वो संसद के दोनों सदनों में सवाल-जवाब से कतराते हुए दिखते हैं. वे भाषण तो देते हैं, लेकिन सवाल-जवाब में नहीं पड़ते. ज़्यादातर मामलों में मंत्री ही जवाब दे रहा होता है. वे उन मंत्रालयों से जुड़े सवालों का जवाब भी नहीं देते, जो मंत्रालय उनके पास हैं. ये काम संबंधित विभाग के राज्य मंत्री करते हैं. ऐसा ही पिछली सरकार में भी हुआ, जब प्रधानन्त्री की जगह ज़्यादातर जवाब अरुण जेटली ही देते थे.


यह भी पढ़ेंः अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव, जिसके बाद दुनिया में बदल गया ओपिनियन पोल का तरीका


भारत की संसद की कार्यप्रणाली में आए बदलाव

भारत की संसद में सबसे बड़ा बदलाव 1962 में ‘शून्यकाल’ यानी जीरो आवर की शुरुआत के तौर पर हुआ जो कि आज भी सफलतापूर्वक चल रहा है. शून्यकाल, प्रश्नकाल के तुरंत बाद शुरू होने वाल समय है, जिसमें सदस्य तात्कालिक महत्व के सवाल सरकार से पूछते हैं, या किसी मामले को उठाते हैं. शून्यकाल में पूछे जाने वाले सवालों को सदस्यों को पहले ही लोकसभाध्यक्ष के संज्ञान में डाल देना पड़ता है.

शून्यकाल के बाद भारत की संसद में दूसरा जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ, वह है डिपार्टमेंट रिलेटेड स्टैंडिग कमेटी का गठन, जो कि 1993 से शुरू हुआ. आजकल कुल ऐसी 24 कमेटियां हैं, जिसमें 16 लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय के अधीन और 8 राज्यसभा अध्यक्ष के कार्यालय के अधीन कार्य करती हैं. ये कमेटियां अपने विभाग से जुड़े क़ानून एवं बजट तक के निर्धारण में भूमिका निभाती हैं. इन कमेटियों के गठन की वजह से संसद की कार्यप्रणाली में बहुत बदलाव आ गया है. इनको ‘मिनी संसद’ भी कहा जाता है. पूर्व सांसद बीएल शंकर और प्रो. वेलेरियन रोड्रिग्स ने अपनी किताब इंडियन पार्लियामेंट- डेमोक्रेसी ऐट वर्क में संसदीय कमेटियों की कार्यप्रणाली पर बहुत विस्तार से लिखा है. भारत ने डिपार्टमेंट रिलेटेड स्टैंडिंग कमेटी का आइडिया अमेरिका से लिया है, जबकि ‘शून्यकाल’ का प्रचलन देशी प्रयोग है. इसी क्रम में प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का संसदीय कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया जा सकता है.

(लेखक रॉयल हालवे, लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी स्क़ॉलर हैं .ये लेखक के निजी विचार हैं.)

share & View comments