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‘मेडागास्कर – एस्केप फ्रॉम दी अफ्रीका’ एनिमेशन फिल्म न्यूयॉर्क के सर्कस से भागे चार जानवरों की कहानी है. ये चारों जानवर – जिसमें शेर, जिराफ, ज़ेबरा और हिप्पो हैं – भागकर मेडागास्कर के जंगल पहुंचते हैं. फिल्म की कहानी उस वक्त मोड़ लेती है जब जंगल में सूखा पड़ जाता है. जंगल के जानवर एक-एक बूंद के लिए तरस रह होते हैं. पानी के लिए जानवर गड्ढा खोद रहे होते हैं. बहुत गहरे गड्ढे के ऊपर खड़ा हुआ एक जानवर ज़ोर से अंदर आवाज़ देकर पूछता है कि क्या कुछ मिला, थोड़ी देर में गड्ढे के अंदर घुसा हुआ जानवर अपने कंधों पर एक बहुत बड़ी तगाड़ी लेकर बाहर निकलता है जिसमें ढेर सारे कीमती पत्थर होते हैं. पानी की आस लिए खड़े जानवर एक ठंडी सांस लेते हैं और सोने से भरी हुई उस तगाड़ी को एक किनारे पर उलट देते है जहां पर पहले ही बेशकीमती पत्थरों का पहाड़ सा बन गया होता है. जब उन्हें पानी नहीं मिलता है तो जानवर पुराने राजा को हटा कर सत्ता संभालने वाले नए राजा से समाधान के लिए पूछते हैं. राजा बेफिक्री से जवाब देता है कि पानी कम है और अब तो जो लड़कर पानी को जीत ले पानी उसका. कमज़ोर जानवर इस घोषणा से सिहर जाते हैं.

मेडागास्कर का ये जंगल पानी की कमी की वजह से सूखे की कगार पर पहुंच गया है. दरअसल पास के इलाके से बहने वाली नदी के बहाव को शहर वालों ने बांध बनाकर रोक लिया है जिसकी वजह से सूखा और भयानक हो गया है.

इस कहानी को हम आज पूरे विश्व में पानी की लगातार होती हुई कमी के साथ जोड़ कर देख सकते हैं जहां कमज़ोर पानी के लिए तरस रहा है और ताकतवर उससे पानी छीन रहा है या उसका पानी रोक रहा है.

पानी संरक्षण और गुणवत्ता पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था वॉटरएड की एक रिपोर्ट एक भयावह स्थिति को सामने रखती है. यह रिपोर्ट विश्व भर में पानी की भयंकर कमी के पीछे की स्थितियों का जायज़ा लेती है, वहीं वॉटर फुटप्रिंट के ज़रिए बेहिसाब खर्च किए जा रहे वर्चुअल वॉटर का हिसाब भी देती है. ‘वर्चुअल वॉटर’ या आभासी पानी जिसका इस्तेमाल हर उस चीज़ को उगाने या बनाने में होता है जिसे हम खाते, पहनते या उपयोग करते हैं. अगर राष्ट्रों की पानी को लेकर संपन्नता और विपन्नता को नापने के लिए भौतिक तौर पर इस्तेमाल होने वाले पानी के साथ-साथ वर्चुअल वॉटर को भी लिया जाए तो इस अभाव का अंतर और विकराल हो जाता है. आर्थिक रूप से संपन्न देश, गरीब देशों से उस सामान का निर्यात करवा रहे हैं जिसके निर्माण में बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है. इससे कहने को विकासशील या गरीब देश उत्पादन करके आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं लेकिन साथ ही इन्हीं देशों में पानी की कमी का ये आलम हो गया है कि लोगों को पीने तक का पानी मुहैया होना मुश्किल होता जा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भौतिक स्तर पर पानी की कमी वाले इलाकों में रहने वालों की संख्या बढकर 500 करोड़ तक पहुंच जाएगी. इसका मतलब जो पानी हम सीधे तौर पर उपयोग में नहीं लेते हैं, वो पानी के अभाव को ज़्यादा प्रभावित कर रहा है.

लोगों को पीने, खाना बनाने, कपड़ा धोने और रोज़मर्रा की दूसरी ज़रूरतों के लिए कितना पानी हासिल होता है ये इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं और कहां रहते हैं.

हर नौ में से एक आदमी को अपने घर के पास साफ पानी उपलब्ध नहीं है, और विश्व की दो तिहाई जनसंख्या – करीब 400 करोड़ – ऐसे इलाकों में रह रही है जहां पानी की बेहद कमी है. जहां साल में कम से कम एक हिस्से में पानी की मांग, आपूर्ति से ज़्यादा हो जाती है.

पानी की उपलब्धता देशों को भीतर भी बहुत कुछ संपन्नता के आधार पर तय होती है, जिसकी वजह से हाशिए पर पड़े लोगों और गरीबों के लिए एक बुरी स्थिति पैदा हो गई है. संपन्न समुदायों के पास ज़्यादा भरोसेमंद पानी की आपूर्ति होती है और वह पानी के तनाव का बेहतर तरीके से सामना कर पाते हैं. पिछले साल सूखे की वजह से केप टाउन पहला ऐसा आधुनिक शहर बनने वाला था जहां पानी खत्म होने वाला है. वहां पर अमीर निवासियों ने उपनगर के बगीचों में लगे 30 हज़ार निजी बोरहोल में हाय टेक फिल्टर लगवा लिए और बोतल बंद पानी खऱीदा, वहीं गरीब पानी की लंबी कतारों में खड़े मिले.

ये तो उस पानी की बात है जो भौतिक तौर पर इस्तेमाल हो रहा है, अगर वर्चुअल वॉटर की बात की जाए तो उसमें भी कमोबेश यही हाल देखने को मिल रहा है. संपन्न देश गरीब देशों के निर्यात को बढ़ावा देने की बात करके पिछले दरवाजे से उनके स्रोतों में उपलब्ध सारा पानी सोख रहे है और अपने यहां का पानी बचाने में लगे हुए है. दरअसल वर्चुअल वॉटर के मामले में जो पानी के दोहन का खेल चल रहा है उसने एक भयानक असंतलुन की स्थिति पैदा कर दी है.

क्या है वॉटर फुटप्रिंट और वर्चुअल वॉटर का सच

हर वो चीज़ जिसे हम खाते हैं, खरीदते हैं और पहनते हैं उसके उत्पादन में पानी शामिल है. एक उत्पाद को तैयार करने में जितने पानी की ज़रूरत होती है उसे उसका वॉटर फुटप्रिंट कहा जाता है. सुबह आप जो एक कप कॉफी पीते हैं उसे बनाने में एक अंदाज़ से लगभग 125 मिलीलीटर पानी लगता है. वहीं कॉफी को उगाने में जो पानी इस्तेमाल होता है, कॉफी के पौधों की सिंचाई से लेकर बीन की प्रोसेसिंग तक जो पानी लगता है वो इससे 1,000 गुना ज़्यादा होता है. जो करीब 132 लीटर होता है.

हम रोज़मर्रा के काम जैसे नहाने-धोने और पीने में जितना पानी इस्तेमाल करते हैं, वो हमारे वर्चुअल वॉटर यानि आभासी जल के इस्तेमाल के आगे बौना है.

खिसकता पानी और भारत 

भारत में 2000 और 2010 के बीच में भूमिगत जल का दोहन 23 प्रतिशत तक बढ़ा है.

भारत भूमिगत जल के तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है, जो विश्व भर का करीब 12 प्रतिशत है.

भारत भूमिगत जल का उपयोग भी सबसे ज्यादा मात्रा में करता है, जो विश्व का कुल 24 प्रतिशत है.

100 करोड़ लोग पानी के अभाव वाले इलाकों में रहते हैं, जिनमें से 60 करोड़ पानी से बुरी तरह प्रभावित इलाकों में रह रहे हैं

88 प्रतिशत घरों के पास साफ पानी हैं लेकिन…

75 प्रतिशत घरों में पीने का पानी नहीं पहुंच पाया है

70 प्रतिशत पीने का पानी दूषित है

वर्चुअल वॉटर ने वैश्विक व्यापार को जो मज़बूती दी है, उसमें करीब 22 फीसद वैश्विक पानी निर्यात के लिए बनाए जाने वाले सामान के लिए उपयोग हो रहा है.

इसका ये भी मतलब निकलता है कि उपभोक्ता जो खाना खाता है या कपड़े पहनते हैं, वो उनके खुद के देश में नहीं बनेगा.

वैश्विक तौर पर हम अब जो पानी इस्तेमाल करते हैं वो आज से 100 साल पहले से छह गुना ज़्यादा है- और ये संख्या एक फीसदी प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ रही है. जनसंख्या वृद्धि और खाने में हो रहे बदलाव से खेती में पानी की मांग 2025 तक बढ़ कर 60 फीसदी के आस-पास पहुंचने का अनुमान है.

कैसे बनता है वॉटर फुटप्रिंट

किसी भी चीज़ का वॉटर फुटप्रिंट तीन अलग-अलग प्रकार के पानी से बनता है. ग्रीन, ब्लू और ग्रे. यहां ग्रीन वॉटर का मतलब मिट्टी की नमी है. ब्लू वॉटर वो जो सिंचाई में उपयोग किया जाता है और तालाब, नदी और भूमिगत जल स्रोतों से लिया जाता है. और ग्रे वॉटर वो प्रदूषित पानी है जो तमाम तरह के उत्पाद और सेवाओं के बनाए जाने से जुड़ा है.
बारिश पर निर्भर फसलें बड़े स्तर पर पानी के लिए घरेलू उपयोग या उद्योंगों से मुकाबला नहीं करती हैं, लेकिन इसके ज़्यादा कमज़ोर हो जाने से सूखे की नौबत आती है और कम पैदावार होती है, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है.

ब्लू वॉटर सिंचाई के लिए उसी स्रोत से आता है जिसे घरेलू इस्तेमाल में लिया जाता है. जब मांग बहुत होती है और भंडार सीमित होते हैं, तो बुनियादी उपयोग के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा को सुरक्षित रखते हुए मांग को संतुलित रख पाना मुश्किल हो जाता है. भूमिगत पानी एक छिपे हुए बचत खाते की तरह होता हैं जिसकी ब्याज दर बहुत कम होती है, जो भी बाहर निकाला जाता है वो अंत में ज़मीन के जरिए रिस कर वापस नीचे ही चला जाता है, लेकिन जितनी तेज़ी से इसका दोहन होता है उसके वापस जाने की दर काफी धीमी है. खास बात ये है कि भूमिगत जल के दोहन को लेकर भारत जैसे देश जो वर्चुअल पानी से पैसे कमाने के मामले में बड़े खिलाड़ी है वहां पर भूमिगत जल के दोहन को लेकर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है. जिसकी ज़मीन है वो वहां के पानी का भी हकदार है. कोई भी इंसान अपने हिस्से की ज़मीन से जितना चाहे उतना पानी खींच सकता है. इस खेल में किसान से लेकर घरों में रहने वाले और उद्योग सभी शामिल हैं.

आभासी जल आता कहां से है?

एक आदर्श बाज़ार वो है जहां वर्चुअल वॉटर के लेन-देन में पानी से संपन्न देश और पानी की आपूर्ति में कमी वाले देशों के बीच स्रोतों का संतुलन बना हुआ हो. हालांकि ऐसा होता नहीं है, मसलन यूके का करीब आधा वर्चुअल वॉटर उन देशों से आयात होता है जहां ब्लू या सींचित पानी के उपयोग को बचाए जाने का स्तर काफी कम है. इसमें पानी के अभाव वाले जो देश शामिल है वो हैं स्पेन (14 प्रतिशत), यूएसए (11 प्रतिशत), पाकिस्तान (10 प्रतिशत), भारत (7 प्रतिशत), इरान (6 प्रतिशत), साउथ अफ्रीका (6 प्रतिशत).

ज़्यादा प्यासी फसलें

एक वक्त था जब भारत में मोटा अनाज यानि ज्वार, मक्का, बाजरा, चना जैसी फसलें बहुतायत में उगाई जाती थी. इन फसलों की खास बात ये थी कि एक तरफ ये पानी कम पीती थीं, दूसरा कीड़े-मकौड़ों से ये अपनी रक्षा खुद कर लेती थी. इसके अलावा ये फसल ज़मीन की उर्वरा को भी सपन्न करती थी. फिर देश में हरित क्रांति आई जिसने देश को गेंहू और चावल दिया.

जब देश में मोटा अनाज उगाया और खाया जा रहा था उस वक्त गेंहू और चावल घरों में तीज त्यौहार पर ही बनता था. ऐसी मान्यता बना दी गई कि गेंहू और चावल जैसे अनाज तो अमीरों का खाना है. इसी के समांतर ये बात का भी खूब प्रसार हुआ कि मोटा अनाज गरीबों का खाना है. हरित क्रांति के साथ ये बात फैलाई गई या खुद ब खुद फैली ये एक अलग बहस का विषय हो सकता है. लेकिन खुद को अमीर बनने की चाहत रखने वाले देश लोगों ने चावल और गेंहू की फसलों को उगाने और उन्हें ही खाकर खुद को अमीर बताने का काम शुरू कर दिया. इस तरह से देश से मोटा अनाज गायब होता गया और गेंहू और चावल मुख्य फसल बन गए.

ज़मीन उस वक्त तंदरुस्त थी, जैविक खाद के इस्तेमाल की वजह से भी खेत बीमार भी नहीं थे, पानी भी काफी था. बस गेंहू और चावल ने उगना शुरू किया और पानी पीना शुरू किया. धीरे धीरे यूरिया की लत लगे हुए खेत किसी काम के नहीं रह गए, बाज़ार को भी गेंहू की आदत पड़ चुकी थी. बारिश घटने लगी तो ज़मीन का पानी खिंचना शुरू हुआ और इस कदर हुआ कि आज हम इतिहास के सबसे बड़े जलसंकट के मुहाने पर आकर खड़े हो गए हैं.

अगर वर्चुअल वॉटर के हिसाब से इन फसलों पर लगने वाले पानी का आकलन किया जाए तो इसकी भयावहता का अंदाज़ा खुद ब खुद लग जाएगा.

गेंहू– करीब 22 फीसदी भूमिगत जल की कमी इसके खाते में जाती है. इसका वैश्विक औसत वॉटर फुटप्रिंट 1,827 लीटर प्रति किलोग्राम है, हालांकि क्षेत्र के हिसाब से इसमें अंतर है.

धान– पूरी वैश्विक सिंचाई का 40 फीसद इसके खाते में आता है और 17 प्रतिशत वैश्विक भूमिगत जल इसमें लग जाता है, जिसका औसत वॉटर फुटप्रिंट 2,500 लीटर प्रति किलोग्राम है.

एसपेरागस ज़्यादा पानी लगने वाली सब्ज़ी है जिसका औसत वैश्विक वॉटर फुटप्रिंट 2,150 लीटर प्रति किलोग्राम आता है.

कपास भी बहुत पानी पीने वाली फसल है जिसमें भारी मात्रा मे ब्लू सिंचित जल लगता है जो सूखे वातावरण में लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकता है. कज़ाकिस्तान और उज़्बेक़िस्तान में फैला हुआ अरल समंदर, कपास की खेती के लिए बड़े स्तर पर होने वाली सिंचाई की वजह से 1960 से अब तक 80 फीसद तक सिकुड़ चुका है. भारत में उगाये और उत्पादन किये जाने वाले कॉटन के कपड़े का वॉटर फुटप्रिंट 22,500 लीटर प्रति किलोग्राम है. पाकिस्तान में यह औसत 9,800 लीटर है और यूएसए में करीब 8,100 लीटर.

हाल ही में हुई शोध बताती हैं कि किसी इलाके में कितनी पानी की कमी है उसके हिसाब से वॉटर फुटप्रिंट बदल सकता है. भेड़ के उत्पादन का उदाहरण लेते हैं. एक किलोग्राम भेड़ के गोश्त को बनाने पर औसतन 461 लीटर ब्लू वॉटर लगता है, लेकिन ये मात्रा बारिश के मौसम में घास खाकर बढ़ने वाले मवेशियों के झुंड पर कम होकर 88 लीटर हो सकती है. वहीं पानी के अभाव वाले इलाके में भेड़ को पोषित करने वाले चारे के उत्पादन में लगने वाले ब्लू वॉटर की मात्रा बढ़कर करीब 1,000 गुना यानि 7,826 लीटर हो जाती है. वॉटर फुटप्रिंट शोधकर्ता ब्लू वॉटर की कमी के दौरान उसके इस्तेमाल से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर पर ‘भार’ यानी ‘वेटिंग’ को लागू कर सकते हैं. इस भार के मुताबिक भेड़ से पैदा हुआ बच्चे को पानी की कमी वाले इलाके में पालने के दौरान करीब 5,95,278 लीटर बराबर पानी खर्च होता है.

निर्यात के लिए खाने और कपड़े के वॉटर फुटप्रिंट उन 400 करोड़ लोगों के लिए बहुत मायने रखते हैं जो भौतिक तौर पर पानी की कमी झेलते हैं. पानी के लिए इन लोगों का उन उद्योगों से आमना सामना है जो उस सामान को मुहैया करवाते हैं जिसे यूके में खऱीदा जाता है. भारत में 100 करोड़, 90 करोड़ चीन में और 14 करोड़ लोग बांग्लादेश में पूरे साल या कुछ वक्त के लिए भौतिक पानी का अभाव झेलते हैं. इससे प्रभावित होने वाली अन्य जनसंख्याओं में शामिल है यूएसए के 13 करोड़ लोग (ज्यादातर कैलिफोर्निया, टैक्साज़ और फ्लोरिडा में), 12 करोड़ लोग पाकिस्तान में जिनमें से ज्यादातर पानी का अभाव झेलने वाले सिंधु घाटी में रहने वाले हैं – 11 करोड़ नाइजीरिया में और 9 करोड़ मैक्सिको में है.

भौतिक पानी का अभाव दिन पर दिन बदतर होता जा रहा है, जनसंख्या और मौसम में हो रहे बदलाव और पानी के स्रोतों के दोहन हालात को और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक 2040 तक 33 देश भयानक पानी की कमी का सामना करेंगे. इनमें 15 मिडिल ईस्ट में से हैं, उत्तरी अफ्रीका, पाकिस्तान, टर्की, अफगानिस्तान और स्पेन का ज़्यादातर हिस्सा शामिल है. भारत, चीन, दक्षिणी अफ्रीका, यूएसए और ऑस्ट्रेलिया भी पानी की बड़ी कमी को झेलेंगे. 2050 तक पानी के अभाव वाले इलाके में रहने वालों की संख्या बढ़कर 500 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. यानि हर दो सेकंड में एक आदमी पानी की उपलब्धता को लेकर परेशान होगा. देशों के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्र चरमरा रहे हैं – लंदन, टोक्यो, और मॉस्को उन शहरों में से है जिन्हें आने वाले सालों में पानी की उपलब्धता को लेकर जूझना पड़ेगा, पानी के अभाव का असर वैश्विक होगा और इस पर वैश्विक प्रतिक्रिया की ही ज़रूरत हैं.

खाद्य पदार्थ और फसलों का निर्यात कई देशों के लिए कमाई का एक अहम जरिया है. और पैसों को लेकर देश के एक अहम नेता ने एक बार कहा था कि पैसा खुदा नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं, लेकिन जिस तरह से ताकतवर अपनी ताकत और संपन्नता का फायदा उठा रहे हैं और जिस तरह कमाई को ही जीने का आधार मानकर देश अपने लोगों के सूखते होंठो को गीला करने के बजाए दूसरे देशों को कपड़े पहनाने और दूसरे सामान मुहैया कराने में जुटा हुआ है – उससे लगता है कि पैसा खुदा बन चुका है. लेकिन ज़रूरी है कि ऐसे में हम मेडागास्कर के उन जानवरों को याद कर लें जिनके सूखते गलों के लिए बेशकीमती जवाहरात भी पानी के आगे महज़ पत्थर के समान है. बेहतर होगा कि यह बात हम जल्द से जल्द नहीं, इसी पल से समझ लें, वरना पैरों के तले से पानी ने खिसकना शुरू कर ही दिया है.

(पंकज रामेन्दु वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)


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