Sunday, 3 July, 2022
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आईएमएफ की रिपोर्ट पढ़ कर मोदी सरकार को अब खिल उठना चाहिए

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नोटबंदी और कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की वजह से वित्त का महत्व बढ़ जाता है, 7.75 प्रतिशत की विकास दर पाने की सोच कई बार कुछ ज्यादा ही हो जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक विभिन्न देशों पर जो वार्षिक रिपोर्ट तैयार करते हैं, उसको अधिकतर बहुत ही नरमी से लिपिबद्ध किया जाता है और पूरी कोशिश की जाती है इसमें होने वाली आलोचनों को मृदु बनाकर पेश किया जाए। विनम्रता के मुखौटे में छिपे संदेश को पढ़ने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन वाशिंगटन के राजनयिक मानकों की दृष्टि से देखा जाए तो फंड पर भारत को लेकर जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट उम्मीदों से भरी हुई है। रिपोर्ट में सरकार के वृहद आर्थिक प्रबंधन और सुधार संबंधी उपायों की सराहना की गई है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि आर्थिक वृद्धि में सुधार का यह सिलसिला अगले साल भी जारी रहेगा और मध्यम अवधि में (हालांकि कुछ नकारात्मक जोखिमों के साथ) यह दर 7.75 फीसदी के आसपास रहेगी और इस प्रकार यह बाकी दुनिया के लिए भी वृद्धि निर्धारण करता है। पिछले साल मुद्रास्फीति 17 वर्ष के निचले स्तर पर थी और मौद्रिक नीति के कदमों को भी सहमति प्रदान की गई। अर्थव्यवस्था का बाहरी खाते का घाटा दबाव में आ सकता है लेकिन परेशान होने की कोई बात नहीं है क्योंकि भुगतान संतुलन की स्थिति बेहतर है। राजकोषीय गिरावट के तेजी होने और मौद्रिक सख्ती जारी रहने को लेकर हल्की चेतावनी दी गई हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में व्यापार करना सरल हो गया है विदेशी निवेश के नियम उदार हो गए हैं, बुनियादी निवेश वृद्धि हो रही है, दिवालिया कानून प्रभावी रूप से काम कर रहा है तथा आगे चलकर वस्तु एवं सेवा कर का सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। हालांकि अभी पूरी तेजी की बात करना सही नहीं होगा क्योंकि आर्थिक वृद्धि दर बीते दशक के औसत से ज्यादा नहीं है, लेकिन मोदी सरकार को तो इस रिपोर्ट से खुश हो जाना चाहिए।


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रिपोर्ट में ऐसी बातों की तो एक पूरी फेहरिस्त प्रस्तुत की गई है जिन पर चुनाव के बाद सरकार को ध्यान देने की जरूरत है, श्रम सुधार, सरकारी बैंकों को मजबूत बनाना, बुनियादी ढांचे का विकास, कृषि में सुधार, मुद्रास्फीतिक दबाव पर नियंत्रण और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को मजबूत करना आदि इस फेहरिस्त में शामिल हैं। संक्षेप में बात की जाए तो यह मोदी सरकार का अधूरा काम है।

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कुछ प्रमुख कृषि जिंसों को लेकर सुधार अपनाने के बजाय उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि आदि को लेकर कुछ आलोचनाएं भी की गई हैं। नोटबंदी की आलोचना करते हुए कहा गया है कि इसने वृद्धि को प्रभावित किया है, यह गिरावट प्रारंभिक अनुमानों की तुलना में 1.8 फीसदी है। यह भी कहा गया है कि नोटबंदी से कर राजस्व में वृद्धि के अलावा और तो कोई फायदा देखने को नहीं मिला है। भुगतान के डिजिटलीकरण, जनधन खातों के बैलेंस और सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में नकदी आदि को लेकर कोई सफलता सामने नहीं आई है। संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के बारे में भी साफ संकेत दिए गए हैं। भूमि अधिग्रहण की दिक्कत के चलते परियोजनाओं को मंजूरी में बिलंब और पर्यावरण मंजूरी में देरी के बारे में बात की गई है। अगर रिपोर्ट हाल ही में बनाई होती तो इसमें सरकार द्वारा नवीनतम शुल्क वृद्धि की भी आलोचना की जा सकती थी।


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आलोचक श्रम सुधारों (अनुबंध श्रम के दायरे को विस्तारित करने के अलावा) और भूमि अधिग्रहण कानून में सुधार में असफलता के लिए सरकार पर निशाना साधना चाहेंगे। मुद्राकोष ने मौद्रिक नीति को जो समर्थन दिया है उस पर भी सवाल उठेंगे क्योंकि रुपया साफ तौर पर अधिमूल्यित है और निर्यात में बाधा डाल रहा है। आखिर में दोहरे तुलन पत्र (बैलेंस शीट) की समस्या को हल करने की बात करें तो सरकार मूल मुद्दे पर केंद्रित न रह सकी हैः वह है बैंकों की जोखिम के आकलन की आंतरिक क्षमता में सुधार और ऋण प्रबंधन में सुधार। इसीलिए ज्यादातर सरकारी बैंकों के प्रबंधन नए ऋण को लेकर बेहद सतर्क हैं, उन्होंने कंपनियों को नया ऋण देना लगभग बंद ही कर दिया है। मुद्राकोष ने सरकारी बैंकों के विनिवेश के बारे में भी कोई बात शायद ही की है।

मध्यम अवधि में 7.75 फीसदी की वृद्धि दर का आकलन करना बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यह दर पिछले दशक की 7.3 फीसदी की औसत से तेज है। लेकिन जब लंबे समय के वृद्धि चक्र के लिए अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है तो पूर्वी एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तरह इसे भी 8 से 9 फीसदी की वृद्धि दर हासिल कर लेनी चाहिए। 2003 से 2011 भारत ने 8 फीसदी की औसतन वृद्धि दर हासिल की है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था इसमें से अधिकांश समय स्टेरॉयड पर ही थी। दोहरे तुलन पत्र की समस्या भी उसी समय उत्पन्न हुई थी। 8 फीसदी की सतत विकास दर अभी भी काफी दूर है।

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