ज़रा सोचिए, आप किसी बूढ़े आदमी को देखते हैं जिन्हें कोई परेशान कर रहा है और धमका रहा है. आप क्या करेंगे? क्या आप बीच में पड़कर बुज़ुर्ग के लिए आवाज़ उठाएंगे, या नज़र फेरकर अपने काम से काम रखेंगे?
अगर आदमी को परेशान करने वाले दस से ज़्यादा लोग हों—एक भीड़? तब भी क्या आप बोलेंगे? और अगर उस पर उसकी पहचान की वजह से हमला हो रहा हो, जो आपकी पहचान से अलग है, तब क्या करेंगे?
बचपन में हमने स्क्रीन पर हीरो देखे हैं, जो सही के लिए खड़े होते हैं, कई खलनायकों से लड़ते हैं और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ जाते हैं. हम उनके लिए तालियां बजाते थे. यह सोचकर अच्छा लगता था कि हम भी ऐसा ही करेंगे, लेकिन बड़े होकर हमने डर के कारण नज़रें फेरना सीख लिया. हमें लगने लगा कि ऐसी बहादुरी सिर्फ फिल्मों में ही होती है. फिर भी, कभी-कभी कोई ऐसा इंसान सामने आ जाता है जो साबित कर देता है कि ऐसा नहीं है.
कुछ दिन पहले, उत्तराखंड में दीपक कुमार नाम के एक हिंदू व्यक्ति ने एक बुज़ुर्ग मुस्लिम दुकानदार के समर्थन में आवाज़ उठाई. उस दुकानदार को खुद को बजरंग दल बताने वाली एक भीड़ परेशान कर रही थी. उनकी आपत्ति बेबुनियाद थी और उनका तरीका बेहद क्रूर. दुकान का नाम था ‘बाबा स्कूल ड्रेस’. भीड़ का कहना था कि ‘बाबा’ शब्द से कोटद्वार के मशहूर हनुमान मंदिर सिद्धबली बाबा के साथ “कन्फ्यूजन” हो सकता है. जबकि यह सच है कि ‘बाबा’ नाम वाली और भी दुकानें थीं. साफ था कि समस्या शब्द नहीं था—समस्या यह थी कि ‘बाबा’ शब्द एक मुस्लिम व्यक्ति इस्तेमाल कर रहा था.
70 साल के वकील अहमद को घेरकर डराया जा रहा था और दीपक के लिए इसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं था. जब भीड़ ने दीपक से उसका नाम पूछा, तो उसने जवाब दिया: “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है.”
यह जवाब सुनने के लिए भीड़ तैयार नहीं थी. उन्होंने अपना गुस्सा दीपक पर निकालना शुरू कर दिया, उसके घर के बाहर जमा हो गए, सांप्रदायिक नारे लगाने लगे और उसे चुप कराने की कोशिश करने लगे.
और यहीं से वह सवाल सामने आता है जो हम खुद से शायद ही कभी ईमानदारी से पूछते हैं. हमें बहादुरी की कहानियां पसंद हैं, लेकिन जब समय आएगा, क्या हम दीपक बन पाएंगे?
दीपक के जवाब ने दुकान के नाम या कथित धार्मिक भावनाओं से कहीं गहरी नाराज़गी पैदा की. यह ‘विश्वासघात’ था. कोई ऐसा इंसान, जो सिर्फ धर्म के आधार पर “हमारे साथ” खड़ा होना चाहिए था, वह एक मुस्लिम के साथ कैसे खड़ा हो सकता है? उस पल वह ‘गद्दार’ बन गया.
मैं इस सोच को बहुत अच्छे से समझती हूं; मैंने इसे दूसरी तरफ से देखा है. एक मुस्लिम होने के नाते, मैं जानती हूं कि “समुदाय के हित” की भाषा कितनी जल्दी बहिष्कार का हथियार बन जाती है. ज़रा सी लाइन से बाहर निकलिए, हावी सोच पर सवाल उठाइए, अपने ही समूह के भीतर अन्याय की बात कीजिए और अचानक आप “हम में से” नहीं रहते. आपको बिकाऊ, गद्दार कहा जाता है और यहां तक कहा जाता है कि आप अब मुस्लिम भी नहीं रहे. मैंने सिर्फ इसलिए ऑनलाइन गुस्सा, गालियां, धमकियां और मुझे चुप कराने की कोशिशें झेली हैं क्योंकि मैंने ढर्रे पर चलने से इनकार किया.
दीपक को सिर्फ ज़मीन पर मौजूद भीड़ों ने ही निशाना नहीं बनाया, बल्कि उसकी स्टोरी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई, जहां ज़्यादातर मीडिया कवरेज सकारात्मक थी, वहीं कुछ मीडिया संस्थानों ने उस पर हमला किया—यह साफ तौर पर दिखाने की कोशिश की गई कि वह एक सांप्रदायिक गद्दार है. उन्होंने उसके सोशल मीडिया और कारोबार को खंगाला, लेकिन कुछ भी ठोस नहीं मिला.
इंडिया का विचार
मैं इस तरह के और भी बहुत सारे ‘गद्दार’ देखना चाहूंगी.
क्या ऐसे ‘गद्दारों’ के बिना भारत हो सकता है? क्या हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां अपने छोटे से समूह के प्रति वफादारी ही सबसे बड़ा गुण हो? और क्या इंसान को हर धार्मिक समूह के प्रति वफादार होना चाहिए या सिर्फ ‘सही’ माने जाने वाले समूहों के प्रति? क्या सिर्फ अपनी स्थानीय बिरादरी के प्रति? अपने परिवार के प्रति? सिर्फ खुद के प्रति? ये बंटवारे आखिर कहां जाकर रुकते हैं?
जब मैं अन्याय के खिलाफ बोलती हूं, जब मैं अपने ही समुदाय के भीतर असहमति की आवाज़ बनती हूं, या जब मैं पड़ोसी मुस्लिम-बहुल देशों में हिंदू या ईसाई अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के बारे में लिखती हूं, तब दीपक जैसे लोग मेरी ताकत बनते हैं. ऐसे ही अहमद अल-अहमद भी हैं, जिन्होंने बॉन्डी बीच आतंकी हमले के दौरान अपनी जान जोखिम में डाल दी थी. जगह अलग थी, समय अलग था, लेकिन भावना एक ही थी—पहले पहचान देखे बिना इंसानी जान बचाना.
ये लोग उस विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे मैं दिल से मानती हूं—कि अपनी जाति, समूह या पहचान से ऊपर उठकर भी मजबूती से खड़ा हुआ जा सकता है; कि इंसानियत के लिए एक जैसा धर्म, जाति या पृष्ठभूमि होना ज़रूरी नहीं है. इसके लिए सिर्फ़ इतना चाहिए कि हम दूसरे इंसान के दर्द को देखें और नज़र न फेरें.
और मेरे लिए यही भारत का विचार है. एक ऐसा भारत—भारत—जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास करता है, यानी पूरी दुनिया एक परिवार है. एक ऐसा भारत जो समावेशन पर टिका हो, जहां हर धर्म, भाषा, क्षेत्र और जाति के लोग नागरिक के रूप में बराबर हों. यह लड़ाई किसी एक घटना या एक व्यक्ति की नहीं है; यह उस विचार को बचाने की लड़ाई है.
इसका दूसरा रास्ता वही भारत है, जो हमारे दुश्मन चाहते हैं—एक बंटा हुआ भारत. धर्म तो सिर्फ शुरुआत है. नफरत फैलाने वाले और राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले लोगों के लिए समाज को तोड़ने की अनगिनत दरारें मौजूद हैं.
भारत आज भी भारत है, क्योंकि दीपक जैसे लोग अब भी मौजूद हैं—शांत, साधारण, बिना किसी चर्चा के, लेकिन बेहद साहसी. वे ही असली बहुमत हैं, भले ही उनकी आवाज़ सबसे ऊंची न हो. जब तक ऐसे लोग डटे रहेंगे, नफरत के बजाय इंसानियत को चुनेंगे, समूह के बजाय ज़मीर को प्राथमिकता देंगे, तब तक भारत कायम रहेगा. जिस दिन हम उन्हें खो देंगे, उसी दिन हम वह खो देंगे, जो इस देश को सच में भारत बनाता है.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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