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ज्योतिरादित्य सिंधिया और मणिकर्णिका फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में कंगना रनौत.
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मणिकर्णिका फिल्म के माध्यम से 1857 का विद्रोह एक बार फिर चर्चा में है. फिल्म के एक दृश्य में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बनी कंगना रानावत ग्वालियर के सिंधिया राजा बने किरदार के सामने आती हैं. जयाजीराव सिंधिया अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं, तभी लक्ष्मीबाई आती हैं. उन्हें देशद्रोही और कायर कहती हैं. जवाब में जयाजीराव हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाने की मुद्रा में कहते हैं कि मेरे खिलाफ कई तरह की अफवाहें उड़ाई जा रही हैं. कौन कहता है कि मैं अंग्रेजों की तरफ हूं. आप चाहो तो मेरा किला रख लो, जब तक ये दंगे खत्म नहीं होते, मैं लंदन चला जाता हूं. इस पर लक्ष्मीबाई कहती हैं कि मातृभूमि यानी मां. जो अपनी मां का सौदा कर ले, वह मर चुका है और मैं मुर्दों पर तलवार नहीं उठाती, निकल जाओ यहां से. बीजेपी के एक नेता ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की है.

मणिकर्णिका में ये सब यूं ही कुछ घटित नहीं होता. एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर फिल्म के माध्यम से जहां पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाया गया है, वहीं मणिकर्णिका फिल्म के माध्यम से ज्योतिरादित्य सिंधिया को निशाना बनाया गया है. मध्य प्रदेश में 15 साल पुरानी भाजपा की सत्ता उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य को कांग्रेस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है. और यह फिल्म लोगों के जेहन में यह डाल देने की कवायद है कि सिंधिया राज परिवार अंग्रेजों का दलाल और गद्दार रहा है.


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यहां बीजेपी नेता के लिए सिंधिया परिवार का मतलब ज्योतिरादित्य सिंधिया है. बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया या यशोधरा राजे सिंधिया या विश्व हिंदू परिषद की संस्थापकों में से एक विजया राजे सिंधिया नहीं हैं. यह ऐतिहासिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक विवाद है.

आइए, 1857 के विद्रोह की हकीकत की पड़ताल करते हैं. अंग्रेजों का विस्तार हो रहा था. यह कहावत आम हो चली थी कि मुगल शासक बहादुर शाह जफर का शासन दिल्ली के लालकिले से शुरू होकर दिल्ली गेट पर खत्म हो जाता है. बहादुर शाह जफर ही 1857 के विद्रोह के सांकेतिक नेता थे.

अग्रेजों के देश पर कब्जा करने के साथ सत्ता मुगलों के हाथ से निकल रही थी और भारत के जो राजे रजवाड़े मुगलों के साथ थे, धीरे-धीरे अंग्रेजों के साथ आने लगे थे.

इस तरह से 1857 का विद्रोह सैनिकों की बगावत के साथ ही दो गुटों के बीच में लड़ाई भी थी. इसमें एक गुट का नेतृत्व बहादुर शाह जफर कर रहे थे और एक गुट का अंग्रेज. ज़फर के साथ सभी भारतीय हिंदू-मुस्लिम शासक रहे हों, ऐसा नहीं है.

उसी दौरान अंग्रेजों की एक नीति आई थी, जिसे राज हड़प नीति कहा जाता है. इसके तहत सतारा (1858), जैतपुर, संभलपुर और बघाट (1850) उदयपुर (1852), झांसी (1853) और नागपुर (1854) आदि राज्यों पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया. ब्रिटिश रेजीडेंट सर जेम्स आउट्रम की रिपोर्ट के आधार पर अवध का विलय कर हेनरी लारेंस को वहां का रेजीडेंट बना दिया गया. कर्नाटक के नवाब और तंजौर के राजा की उपाधि समाप्त कर दी गई. 1851 में अंतिम पेशवा शासक बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद उसके दत्तक पुत्र नाना साहब (धांधू पंडित) को पेंशन देने से इनकार कर दिया गया. मराठों से सत्ता तो पहले ही छीनी जा चुकी थी. जितने पिटे हुए शासक थे, उन्होंने आपस में मामूली तालमेल बिठाकर विद्रोह किया और ज़फर को अपना नेता घोषित कर दिया.

हड़प, विलय, कब्जे, पराधीनता के बीच जब 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तो एक इतिहासकार के मुताबिक 521, एक अन्य इतिहासकार के मुताबिक 565 रियासतें थीं. (इंडिया आफ्टर गांधी, पृष्ठ 37 पिकाडोर पब्लिकेशन, 2007) स्वतंत्रता के समय 500 से ऊपर रियासतें बची हुई थीं. स्वाभाविक है कि 1857 में रियासतों की संख्या इससे कहीं ज्यादा रही होंगी. ग्वालियर भी इन्हीं रियासतों में से एक था. और वह उन सैकड़ों रियासतों में से एक था, जो मुगल बादशाह के साथ नहीं थे.

यह कहा जाता है कि ग्वालियर ने अंग्रेजों का साथ दिया. यह सत्य है. लेकिन ग्वालियर अलग देश था, झांसी अलग देश था. उस समय तक मुगलों यानी बहादुरशाह ज़फर के अधीन कोई देश नहीं बचा था. लेकिन जब कुछ राजाओं के राज्यों पर अंग्रेजों ने कब्जा शुरू किया तो उन्होंने जबरी ज़फर को अपना नेता बना दिया था, क्योंकि अंग्रेजों के पहले वे राजा मुगल शासक को ही बना दिया करते थे.

झांसी और ग्वालियर के बीच कोई संधि नहीं थी कि अगर कोई झांसी पर हमला करता है तो ग्वालियर के राजा सिंधिया झांसी के शासक का साथ देंगे. झांसी का साम्राज्य कमजोर पड़ने और वहां के शासक के अय्याश होने के कारण अंग्रेजों की नजर पड़ी और उन्होंने झांसी पर कब्जा कर लिया. ऐसे में लक्ष्मीबाई खड़ी हुईं और उन्होंने कहा कि मैं अपनी झांसी किसी को नहीं दूंगी. हालांकि उन्होंने अपने दत्तक पुत्र के लिए राज बचाने की तमाम कोशिशें कीं और अंग्रेजों को इसके लिए पत्र भी लिखा. आखिर ग्वालियर के सिंधिया क्यों अंग्रेजों के खिलाफ जाकर झांसी का साथ देते, जो एक अय्याश, कमजोर राजा के अधीन था और उस विवाद से ग्वालियर का कोई लेना देना नहीं था?

अब सवाल यह उठता है कि 1857 में मुगल बादशाह जफर का साथ न देने वाले 500 से ऊपर रजवाड़ों में सिंधिया राजवंश को ही निशाना क्यों बनाया जाता रहा है? अंग्रेजों का साथ देने वाले गद्दार और मुगलों का साथ देने वाले देशभक्त कैसे हो गए? और फिर सिर्फ सिंधिया नहीं थे, जो 1857 में अंग्रेजों के साथ खड़े थे. पूरे दक्षिण भारत के हर राजा और नवाब, पूरा राजपूताना-गुजरात, पूरा पंजाब-हरियाणा और उनके सैकड़ों राजा अंग्रेजों के साथ थे. उनमें से कई रियासतों के वारिस बीजेपी समेत कई राजनीतिक दलों में हैं. लेकिन अंग्रेजों के मित्र होने का लांक्षन सिर्फ सिंधिया पर क्यों?

इसकी कई वजहें हो सकती हैं. एक बड़ी वजह तो सिंधियाओं का गैर-द्विज मराठा होना और परंपरा से समाज के वंचित तबके के साथ खड़े होना है. मराठा साम्राज्य की स्थापना शिवाजी ने की थी. वर्तमान में मराठों की प्रमुख 4 शाखाएं, सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोंसले हैं. औरंगजेब के शासनकाल में जब किसानों पर कर का बोझ बहुत बढ़ गया तो खेती-बाड़ी का काम करने वाले शिवाजी ने मुगल शासन से विद्रोह कर दिया और मराठा साम्राज्य की स्थापना की. शिवाजी देश के पहले शासक थे, जिन्होंने आदेश दिया था कि सैनिकों को किसानों को लूटना तो दूर की बात है, अगर वे उनसे अपने घोड़ों के लिए चारा भी लेते हैं तो उसका भुगतान किसानों को किया जाए. इसके पहले शासकों ने यह नियम बना रखा था कि विजयी सेना गांव के किसानों, सेठों को लूटती थी और लूट का माल राजा और सिपाहियों में बांटा जाता था. शिवाजी ने सैनिकों का वेतन तय कर दिया और लूट प्रथा पूरी तरह रोक दी. (शिवाजी कौन थे, गोविंद पानसरे, एसएम पब्लिशर्स 2010)

शिवाजी के वंशज शाहूजी महराज ने आधुनिक भारत में सबसे पहले गैर ब्राह्मणों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था. (मंडल कमीशनः राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल, सत्येन्द्र पीएस, लेफ्टवर्ड बुक्स, 2018) शाहूजी महराज के डॉ. भीमराव अंबेडकर से अच्छे संबंध रहे हैं. बड़ौदा का गायकवाड़ राजपरिवार निम्न जातियों के उत्थान के कार्यों के लिए जाना जाता है. गायकवाड़ राजवंश द्वारा निर्धन परिवारों को लिए चलाए जा रहे स्कॉलरशिप के माध्यम से अंबेडकर ने विदेश में पढ़ाई की थी. इन चारों मराठा राजपरिवारों में वैवाहिक संबंध हैं और कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का विवाह भी गायकवाड़ राजपरिवार में हुआ है. ज्योतिरादित्य सिंधिया वैसे भी इस बीच खुद को कुर्मी घोषित कर चुके हैं.

भारत में जिस भी राजपरिवार, जिस भी शासक, जिस भी व्यक्ति ने वंचितों को अधिकार देने की कवायद की है, उसे गालियों से नवाजा गया. उसे देशद्रोही, कुलद्रोही, गद्दार कहा गया. मराठे भी इसी के शिकार नजर आते हैं. मराठे जातीय घृणा के उसी तरह शिकार बने हैं, जैसे स्वतंत्र भारत में वंचितों के लिए सरकारी सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह व अर्जुन सिंह को शिकार बनाया गया है.


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मणिकर्णिका फिल्म में स्वाभिमान, मातृभूमि, देश, दुर्गा, हर-हर महादेव, मंदिर, गाय आदि सब राष्ट्रवादी मसाले हैं, जो केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की नीतियों के मुताबिक हैं. फिल्म की नायिका कंगना दीन-दीन महादेव कहते हुए ग्वालियर किले में प्रवेश करती हैं. इस फिल्म में इतिहास या ऐतिहासिकता नाम की कोई चीज नहीं, बल्कि देश में वंचितों के लिए आवाज बने मराठों के चरित्रहनन की एक कवायद मात्र है. भले ही सिंधिया परिवार की वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे भाजपा में हैं और विजयाराजे भी भाजपा की बड़ी नेता रही हैं, लेकिन सिंधिया वंश का नाम लेते ही ज्योतिरादित्य ही सामने आते हैं.

मणिकर्णिका फिल्म इतिहास से कहीं ज्यादा राजनीति के बारे में है. इसे शुद्ध मनोरंजन तो कतई न समझें.

(लेखिका राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक हैं)


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