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गलत हिंदी लिखे जाने का महज यह नमूना है/ दिप्रिंट
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मार्च 2018 में तिरूपति में सुदर्शन न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ सुरेश चव्हाण के की कार के ऊपर कथित तौर पर पत्थर मारने की घटना हुई थी जिसमें इनकी गाड़ी का शीशा टूट गया था. सुदर्शन न्यूज़ के फेसबुक पेज और खुद सुरेश चव्हाण के फेसबुक पेज पर इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए एक लाइन लिखी गई थी जो बरबस हमारा ध्यान खींच रही थी- ‘गाड़ी के शिषा तुटा’.

सुरेश चव्हाण के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान, अखंड भारत, जनसंख्या नियंत्रण समेत तमाम ऐसे मुद्दों पर अतिसक्रिय और विस्फोटक अंदाज़ में रहते हैं कि कभी-कभी इनके पत्रकार के अलावा प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा समर्थक से इतर अति हिंदूवादी समूहों के सम्राट होने का भान होता है.

बहरहाल, भारतीय अस्मिता के लिए लड़ रहे एक हिंदी पत्रकार द्वारा ‘शिषा तुटा’ लिखा जाना शोध का विषय है. परंतु अगर सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी समूहों द्वारा लिखी जा रही हिंदी का अध्ययन करें तो हमें रोचक जानकारी प्राप्त होती है. एक तरफ जहां प्रधानमंत्री मोदी के आगमन के बाद हिंदी के प्रचार-प्रसार में वृद्धि हुई है वहीं इनके समर्थकों ने हिंदी की वर्तनी बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

‘श’ को ‘स’ या ‘ष’ लिखना इन समर्थकों का मुख्य शगल है. ‘इ’ और ‘ई’ में ये लोग फर्क नहीं करते. विचारों की बाढ़ आई रहती है, देश निर्माण से इतर वक्त ही कहां है जो मात्राओं पर ध्यान दिया जा सके. ‘चक्कर’, ‘चक्क्र’ और ‘चककर’ में कोई फर्क नहीं है इनके लिए. ऐसा नहीं है कि ये लोग बंगाल या तमिलनाडु से आए हैं जिन्हें हिंदी बोलने-लिखने में दिक्कत है. ये लोग यूपी, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों के हैं जिन्होंने अपनी शिक्षा ही हिंदी में ग्रहण की है. यही नहीं, ये लोग हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की अस्मिता के लिए लगातार लड़नेवाले लोग हैं. सोशल मीडिया पर.

स्त्री और पुरुष के संबंध, स्त्री के कपड़े, स्त्री की यौनिकता, देश में भ्रष्टाचार, राफेल मुद्दा, राम मंदिर का मुद्दा, इस्लाम की बुराइयां, प्राचीन वेदों का विज्ञान- ये ऐसे विषय हैं जिन पर ये लोग लगातार लिखते रहते हैं. इसके लिए ये ज़रूरी नहीं होता कि सोशल मीडिया पर इन विषयों पर बात की जा रही हो तभी ये जवाब देंगे. इनका जवाब तैयार रहता है, बस सोशल मीडिया पर कोई उपयुक्त जगह मिलनी चाहिए. राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से इतने जागृत लोग शायद ही किसी देश में मिलेंगे.

मात्राओं को एक विशेष तरीके से विकृत करने पर बहुत ही रोचक और हास्यास्पद तरीके की हिंदी निकल आती है- ‘ऐ तूम किया कर रहे हो? तुम लरकी होक्र भि पेंट पहनति है?’ ‘देष के लीये मोदि जि जां भि दे देगे.’ ध्यान देने की बात है कि ऐसे ज़्यादातर कमेंट नाराज़गी में ही लिखे गये होते हैं. ये प्रतिक्रियावादी कमेंट होते हैं. आप कभी भी इस भाषा में किसी को सामान्य तरीके से बहस करते नहीं पाएंगे. जो सामान्य तरीके से बहस करते हैं, वो सामान्य तरीके से ही लिखते हैं. इस असाधारण लेखन के लिए असाधारण गुस्सा और असाधारण तर्क होना आवश्यक है.

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया के इन योद्धाओं ने ऐसी ही हिंदी सीखी है. हिंदी की वर्तनी उनकी कमज़ोर तो है, पर स्मार्टफोन के ऑटोकरेक्ट ने इस समस्या को और उलझा दिया है. अगर आपको हिंदी वर्तनी सही नहीं आती तो ऑटोकरेक्ट कुछ का कुछ लिख देता है. गूगल हिंदी इनपुट में लिखने के लिए भी आपको हिंदी की वर्तनी सही मालूम होनी ही चाहिए.

ASER रिपोर्ट हमेशा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के बच्चों की पढ़ने और गणित की योग्यता जांचती रहती है. पर हिंदी को लेकर इस रिपोर्ट ने कभी कुछ नहीं कहा है. हो सकता है कि रिपोर्ट बनानेवालों को इसकी असाध्यता के बारे में पता हो. जो भी हो, हिंदी की वकालत करते हुए हम ये भूल जाते हैं कि एक बड़ा तबका ऐसा है जो हिंदी भी सही से नहीं लिख सकता.

हम हिंदी के द्वारा देश को एकता-सूत्र में बांधने की बात तो करते हैं पर हिंदीभाषी राज्यों के लोगों को ही हिंदी सही नहीं सिखा पाए हैं. अगर हिंदी में ही देश में काम होने लगे, अगर हिंदी पूरी तरह से अंग्रेज़ी को रिप्लेस कर दे तो भी ऐसे लोग काम नहीं कर पाएंगे. शुद्ध हिंदी इनके लिए अंग्रेज़ी की ही तरह है. प्रतीत होता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग भाषा से ही अनजान है. अंग्रेज़ी छोड़िए हिंदी भी सही से नहीं पता है.

क्या हम ये कल्पना कर सकते हैं कि विश्वशक्ति बनने का सपना रखने वाला देश ऐसा है जहां के हिंदीभाषी राज्यों के करोड़ों लोग ऐसे हैं जो दुनिया की किसी भी भाषा से वंचित हैं? जबकि हमारा देश ऐसा है जहां पर एक सामान्य इंसान सामान्य पढ़ाई कर तीन-चार भाषाओं का जानकार आसानी से बन सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी को बजट में हिंदी की सही शिक्षा के लिए कुछ राशि आवंटित करनी चाहिए थी. हालांकि खुद प्रधानमंत्री मोदी के हिंदी भाषणों में अनुस्वार की अधिकता पाई जाती है. पर देशहित में ये करना ही पड़ेगा. उनका जीवन तो निकल गया पर आगे आनेवाली पीढ़ियां ‘शिषा तुटा’ कहकर काम नहीं चला सकतीं. किसी भी सरकारी ऑफिस में सिर्फ इस बात के लिए अधिकारी लौटा देंगे कि आपके आवेदन से आपकी समस्या का पता नहीं चलता.


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