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Monday, 10 June, 2024
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पुलवामा जवानों की पत्नियों की नौकरी की मांग बढ़ा सकती है मुश्किलें, दबाव के आगे न झुकें गहलोत

आजीवन राजस्थान रोडवेज का बस पास और अंततः जो सबको अपनी ओर खींचता है वह है- राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सैनिकों की मूर्तियां और उनके नाम पर स्कूलों या कॉलेजों का नाम रखा जाना.

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राजस्थान में अभी चुनावी गहमा-गहमी शुरू भी नहीं हुई है लेकिन 2019 के दुखद पुलवामा हमले पर राजनीतिक ड्रामा शुरू हो गया है. इसे बेतुका करार दिया जा सकता था लेकिन चूंकि इसके मध्य में 14 फरवरी 2019 को कार बम हमले में जान गंवाने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के तीन जवानों की पत्नियां शामिल हैं इसलिए इसे काफी गंभीरता से लिया जा रहा है. इस हमले में मधुबाला मीणा ने अपने पति हेमराज मीणा, मंजू जाट ने अपने पति कांस्टेबल रोहिताश लांबा और सुंदरी देवी ने अपने पति कांस्टेबल जीत राम गुर्जर को खो दिया था. उनके नुकसान की भरपाई कभी नहीं की जा सकती.

जयपुर की सड़कों पर यह ड्रामा बढ़-चढ़कर किया जा रहा था. इस उम्मीद में कि अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार को उनमें से दो को और अधिक सहायता पहुंचानी चाहिए. हमले के दिन, सीआरपीएफ के 40 जवानों ने अपनी जान खो दी थी, जिनमें से पांच जवान राजस्थान के थे. हेड कांस्टेबल नारायण लाल गुर्जर और कांस्टेबल भागीरथ सिंह के परिवारों को कोई अतिरिक्त मांग करते नहीं देखा गया है और न ही उन्होंने किसी मांग को लेकर प्रदर्शन में भाग लिया है. न ही, उस मामले में, अन्य 37 मृत सैनिकों की पत्नियों ने कभी विरोध स्वरूप धरना दिया. तीन में से दो ने एक जैसी मांग रखी है- नौकरी की.

क्या ये लाभ परेशानियों का पिटारा खोलेंगे?

किसी भी परिस्थिति में, नौकरियों का मुद्दा कभी भी चर्चा में शामिल नहीं होना चाहिए क्योंकि यह हमेशा मुआवजे के पैकेज में अनिवार्यत: शामिल होता है. और यह 1999 के कारगिल अभियान के दौरान इस पर चर्चा होनी शुरू हुई जब टेलीविजन ने युद्ध की जानकारियों घर-घर पहुंचानी शुरू कर दीं. धन राशि और सहायता के अलावा राजस्थान में यह क्षतिपूर्ति के पैकेज का हिस्सा है. इसके तहत 25 लाख रुपये नकद और इतनी ही अतिरिक्त राशि दी जाती है यदि मृतक की पत्नी कोई सिंचित जमीन या मध्यम आय वर्ग का शहरी घर नहीं लेना चाहे. डाकघर बचत खाते में माता-पिता के लिए अन्य 5 लाख रुपये और एक बच्चे के लिए नौकरी का प्रावधान है.

इसके अलावा आजीवन राजस्थान रोडवेज का बस पास और अंततः जो सबको अपनी ओर खींचता है वह है- राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सैनिकों की मूर्तियां और उनके नाम पर स्कूलों या कॉलेजों का नाम रखा जाना. मधुबाला मीणा के पति के नाम पर सांगोद में एक कॉलेज का नाम बदल दिया है, इसके अलावा उनके पति की मूर्ति इस कॉलेज में और दूसरी कोटा जिले में स्थित उनके पैतृक गांव में स्थित एक पार्क में लगाई गई है. अब उनकी मांग है कि सांगोद शहर के एक सार्वजनिक चौराहे पर उनके पति की तीसरी मूर्ति स्थापित की जाए, जिसे जिला प्रशासन ने साफतौर पर अस्वीकार कर दिया है. और इसलिए वह सड़कों पर उतरी हैं.

मंजू जाट और सुंदरी देवी दोनों अपने छोटे देवर के लिए नौकरी चाहती हैं. राजस्थान में कानूनी तौर पर नौकरी खाली पत्नी और बच्चे को दी जा सकती है किसी और को नहीं. अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी शहीद की पत्नी या बच्चे के अलावा उसके परिवार से किसी और को नौकरी दी गई हो, और यदि इस बार सरकार दबाव के आगे झुकती है तो से समाज में अन्य लोग भी ऐसी मांग कर सकते हैं जिससे सरकार की परेशानियां काफी बढ़ सकती हैं. इस मांग को राजस्थान के एक वरिष्ठ नेता का समर्थन मिलना मामले को और ज्यादा पेचीदा बना देता है और इससे भी ज्यादा परेशानी की बात यह है कि इसकी क्षतिपूर्ति से इस कानून का गलत तरीके से लाभ लेने के लिए एक नया रास्ता खुल जाएगा.

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दबाव के आगे न झुकें

अक्सर सैनिकों की पत्नी और बच्चे को उनकी कमाई का पूरा लाभ नहीं मिलता. और, भगवान न करे लेकिन अगर सैनिक ड्यूटी के दौरान शहीद हो जाता है, तो कई बार महिला और बच्चों को मुआवज़ा के पूरे लाभ से वंचित कर दिया जाता है. नकदी और मिलने वाले अन्य लाभ से किसी के भी मन में लालच और उभर सकती है. अब उसे ससुराल में ही रहना पड़ता है. और यहीं पर देवर के लिए नौकरी लेने का दबाव उसके ऊपर पड़ता है जो कि उसके बच्चों के हितों के साथ समझौता करने पर उसे बाध्य कर सकता है. 2022 में मैं मंजू जी से तीन बार मिला, लेकिन हमेशा उनके देवर आस-पास ही मंडराते रहे. हर बार, मैंने उनसे अनुरोध किया कि वह अपने बच्चे के बारे में सोचें.

भारत में अधिकांश महिलाओं के लिए विधवापन अत्यंत क्रूर होता है, और जब अन्य कारक उसके द्वारा उठाए गए कदमों को निर्धारित करने लगते हैं तो उसका दुख कई गुना अधिक बढ़ता है. इसलिए, इस मांग को स्वीकार करने से ऐसी महिलाओं पर दबाव बनाए जाने की संभावना बढ़ जाएगी. हालांकि, परिवारों पर जासूसी करना राज का काम नहीं है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऐसी दुखद परिस्थितियों में महिला के शोषण की संभावना वाली खामियों को दूर किया जाए. कुछ सैनिकों की पत्नियां ज्यादा पढ़ी-लिखी होती हैं, इसलिए वे आरक्षित नौकरी नहीं चाहतीं. ऐसे में राज्य उनकी कुछ और मदद कर सकता है. उनकी योग्यता के अनुसार उचित रोजगार के जरिए राज्य सरकार उनका सच्चा सम्मान कर सकती है.

आधिकारिक तौर पर जिन नौकरियों की पेशकश करता है उसे सरकारी भाषा में एल-10, ग्रुप सी और डी कहा जाता है. कभी उन्हें क्लास III और IV कहा जाता था. कई महिलाएं इस तरह की नौकरियां नहीं चाहतीं. उनकी शैक्षिक योग्यता और देश की सेवा में उनके बलिदान को देखते हुए, ऐसी महिलाओं को अधिक कठिनाइयों और परीक्षाओं के तनाव से गुज़रने के बिना लाभ दिया जाना चाहिए. इन नियमों और विनियमों से समझौता करना बेहतर है जो एक वंचित महिला को दबाव में आने और शोषण को बढ़ावा देने के बजाय सशक्त करेगा.

(मानवेंद्र सिंह कांग्रेस नेता, डिफेंस ऐंड सेक्युरिटी अलर्ट के एडिटर-इन-चीफ और राजस्थान में सैनिक कल्याण सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं. उनका ट्विटर हैंडल @ManvendraJasol है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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