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Monday, 22 July, 2024
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377 से सदियों पूर्व हमारे ऋषि-मुनियों ने की थी राम के जिस्म की कामना

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ओड़िया कवि उपेंद्र भंज द्वारा रामायण के पुनर्पाठ को उसी मध्यवर्ग ने सिरे से नकार दिया था जिनकी बदौलत धारा 377 आज भी भारत में कायम है 
धारा 377 पर लम्बे समय से चली आ रही बहस एक नतीजे  की और अग्रसर है।  मज़े की बात यह है कि दक्षिणपंथी भी इस क़ानून के समर्थन में सामने आ रहे हैं.
 इस नयी-नवेली सहिष्णुता के पीछे के कारणों की पड़ताल का एक अच्छा तरीका जाने माने हिन्दू ग्रंथों में पाए जाने वाले ऐसे यौन कृत्यों पर रौशनी  डालना है जिनको 377 की भाषा में अप्राकृतिक या गैर मानक कहेंगे। इसी दिशा में पहला  उदहारण है रामायण, हालाँकि इसे क्वीयर रामायण कहना ज़्यादा सही  होगा, एक ऐसी किताब जिसने हिंदुत्व की विचारधारा को ताकत दी  है.
आधुनिक काल से पूर्व ओड़िया राजा एवं कवि उपेंद्र भंज द्वारा लिखित रामायण के पुनर्पाठ का नाम बैदेहिसा बिलास है. अलंकारों से भरी इस रचना में राम एवं  सीता की ऐसी इच्छाओं का वर्णन है जो कि प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक के भेद से कहीं आगे हैं. अपने समय, सत्रहवीं सदी के अंत या अठारहवीं सदी के शुरुआती सालों में, प्रचलित रही यह रामायण, को उन्नीसवीं सदी के अंत तक उस मध्यमवर्ग द्वारा नकार दिया गया जिनकी बदौलत आज भी धारा 377 देश में कायम है

जब ऋषियों ने की राम की कामना

दण्डकारण्य वृत्तांत (कैंटो 21) में वर्णित है कि जब जंगल में घूम रहे कुछ ब्रह्मचारी ऋषियों की नज़र राम-सीता पर पड़ती है. मज़े की बात यह है कि इन ऋषियों की नज़रें सीता पर न होकर (सामाजिक रूप से राम कि बीवी बनने योग्य थीं) राम पर हैं. यही नहीं, ऋषियों के मन में सीता के प्रति जलन का भाव भी आता है और वे आश्चर्यचकित हैं कि सीता ने आखिर ऐसे कौन से पुण्य किये जो उन्हें राम जैसा पति मिला। ये ऋषि भगवान से स्वयं को महिलाओं में बदल देने की प्रार्थना करते हैं और अपनी छाती पर मिट्टी के घड़े रखकर एवं जटाएं खोलकर महिला होने का अभिनय करते हैं. हालाँकि जल्द ही इन ऋषियों की समझ में आ जाता है की उनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती और वे आग में कूदकर जान दे देते हैं.
थोड़ी दूर पर बैठे राम को यह घटना काफी व्यथित करती है और वे लक्ष्मण एवं सीता को छोड़कर चल पड़ते हैं. यही नहीं, राम इन ऋषियोँ  को वरदान भी देते हैं।  इन ऋषियों को भविष्य  में  (कृष्णावतार के दौरान) रासलीला में हिस्सा लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है . यह केवल राम की अपने भक्तों के प्रति दया भर न होकर ऋषियों की  समलैंगिक  इच्छाओं की स्वीकृति का भी उदहारण है.

राम और सीता की सुहागरात 

राम एवं सीता की सुहागरात के दौरान भी ऐसी एक घटना का ज़िक्र है. यहाँ हम राम को एक नायिका के रूप में देखते हैं जो अपने प्रेमी के इंतज़ार में बैठी है. नायिका-भेद पूर्व-आधुनिक दक्षिण एशियाई साहित्य का एक अंग है जिसका इस्तेमाल मुख्यतः  महिलाओं की भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए होता है।  प्रतीक्षा के पहले चरण में हम राम को वसाकज्ज नायिका(एक ऐसी प्रेमिका जो सेज सजाकर अपने प्रेमी के लिए प्रतीक्षारत है ) के रूप में पाते हैं।  हालाँकि सीता आने में काफी समय लगा देती हैं, और राम व्यथित होकर उत्कंठित नायिका (वियोग पीड़ित ) की तरह व्यव्हार करते हैं। बात यहीं नहीं रूकती. थोड़ी ही देर में राम की हालत और बिगड़ती है और हम उन्हें खंडित नायिका के रूप में अपने प्रेमी पर गुस्सा करते  पाते हैं.
मर्यादापुरुषोत्तम राम को  महिला रूप में प्रदर्शित करते हुए उपेंद्र बिलकुल बेझिझक हैं. इससे यह साबित होता  है कि पूर्व -आधुनिक दक्षिण एशिया में लिंग सम्बन्धी बाइनरी एवं मापदंडों के विरोध की एक पुरानी  परंपरा रही है.
एक दूसरी जगह हम राम को सीता के शरीर के एक अंग – विशेष के बारे में सोचता पाते हैं जहाँ  राम कहते हैं कि  सीता की सुंदरता बनारस के शिवलिंग को भी मात करती है. (20; 16 )

सीता की इच्छाएं

तीसरा वाकया तब का है जब सीता वयस्क जीवन में प्रवेश करती हैं. बात तब की है जब वे पहली बार काम वासना का अनुभव करती हैं. कवि के ही शब्दों में –
                             Basare Jatane Ghodai Chol Kabach Dei
                            Basangi Smara Bhayoru Rati Sebane Snehi ||(3:41)
यहाँ हम कुछ ही भागों का अनुवाद दे पाएंगे क्योंकि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी से  सम्बंधित क़ानून काफी जटिल हैं।  “स्मरा ” का अर्थ कामदेव या काम वासना लगाया जा सकता है।  “भय ” यानि उसी कामदेव या काम वासना का डर। इसी भय को ख़त्म करने हेतु सीता “रति सेवा” भी करती हैं. आसान शब्दों में – सीता अपने डर  को भगाने  के लिए ऐसा क्या करे जिससे रति सेवा की ज़रूरतें भी पूरी हो जाएँ?  यहाँ बताते चलें कि यह घटना तब की है जब सीता नयी नयी  किशोर हुई  थी और राम से मिली तक नहीं थी. किताब के इस भाग में हम पाते हैं कि सीता की इच्छाएं राम से पूर्णतया स्वतन्त्र हैं. नारीवादी नज़रिये से  पुनर्पाठ करने पर हम सीता को उनकी  एक आदर्श, आज्ञाकारी पत्नी की प्रचलित छवि के बिलकुल विपरीत पाते हैं. यह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है, एक ऐसा पुनर्पाठ जिसकी कल्पना भी आधुनिक या पूर्व- आधुनिक साहित्य की ज़द से बाहर है।
यही नहीं, सीता की प्रमुखता का अंदाज़ा किताब के शीर्षक ( बैदेहिसा बिलास यानी सीता के पति का सुख/ आनंद  )  से ही हो जाता है.
ऐसे में एक सवाल यह ज़रूर उठता है कि  पितृसत्ता के नियमों/ निर्देशों  के तहत लिखी गयी इस किताब में नारीवाद के उल्लेख ढूँढना किस हद तक सही है. हालाँकि यह भी सच है कि पितृसत्ता की तमाम बेड़ियों  के बावजूद ऐसी रचनायें लिखी जाती रही हैं रही हैं जिनमें नारीवाद, समलैंगिक प्रेम एवं लैंगिक अस्थिरता (जेंडर फ्लुइडिटी) को जगह मिली है. हाँ यह बात अलग है कि इन क्रांतिकारी धारणाओं को मूल में रखकर धार्मिक प्रतीकों पर सवाल उठाने की हिमाकत कम  ही हुई है.
उपेंद्र की रामायण या यों कह लें  क्वीयर  रामायण आज के समय की मांग है. पर यह कह पाना मुश्किल है की क्या अभी इस सब के लिए हम तैयार हैं.
उजान घोष और अमृता चौधरी, मैक्गिल विश्वविद्यालय और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, मैडिसन में इतिहास और कला इतिहास(क्रमशः) के स्नातक विद्यार्थी हैं. वे इस लेख के अनुवाद पर कार्य कर रहे हैं जिसे अब तक किसी ने नहीं किया. 2017 में मार्गएशिया, एक ओड़िया जर्नल में उन्होंने इस अनुवादित इस कैंटो के खंड को प्रकाशित किया था. उन्होंने इस पाण्डुलिपि को ओडिशा राज्य संग्रहालय से प्राप्त किया.
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