इमरान खान की फाइल फोटो । ट्विटर
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इमरान खान पाकिस्तान के लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं ये सबको पता है. लेकिन उनको लेकर अतिउत्साह का स्तर चौंकाता है.

अभी पिछले दिनों चाय का प्याला लिए एक शाम मैंने ड्रामा धारावाहिक देखने के लिए पाकिस्तान का हम टीवी चैनल लगाया. स्क्रीन पर एक उम्रदराज़ मां अपनी बेटी के साथ स्क्रीन पर अवतरित हुईं, और उन्होंने अपनी बाई से उसके बीमार बच्चे का हाल पूछा. जवाब मिला कि उसके बेटे को कैंसर है और परिवार की सारी उम्मीदें ख़त्म हो चुकी हैं. घर की मालकिन और उसकी बेटी ने बाई से चिंता नहीं करने को कहा. बेटी ने बड़े उत्साह के साथ बताया कि “लाहौर में कैंसर मरीज़ों के लिए एक बड़ा अस्पताल है, और वहां पैसे के बिना इलाज किया जाता है.”

मां ने बेटी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह अस्पताल देश में सर्वश्रेष्ठ है और इसे एक मशहूर क्रिकेटर (इमरान ख़ान) ने बनवाया है. आंसूओं को पोंछते हुए बाई ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करती है और ज़िंदगियां बचाने वाले अस्पताल के निर्माता की लंबी उम्र की कामना करती है.

कुछ मिनटों बाद ब्रेक के दौरान एक गीत के रूप में जनता के लिए संदेश प्रसारित किया जाता है: “हम ये डैम बनाएंगे.” घटिया पंक्तियों को अरुचिकर धुन वाले इस गीत के ज़रिए आवाम से दियामर-बाशा बांध के लिए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और मुख्य न्यायाधीश साक़िब निसार के साझा फंड में दान देने की गुज़ारिश की जाती है.

बांध वाले गीत को बार-बार प्रसारित करने वाला दूसरा प्रमुख चैनल देश का एकमात्र सरकारी खेल चैनल पीटीवी स्पोर्ट्स है. खराब कार्यक्रमों के लिए इस चैनल की आलोचना होती रहती है, जबकि इसके प्रसारण का एक बड़ा भाग बांध गीत को प्रदर्शित करने में जाता है. नई सरकार आने के बाद पीटीवी स्पोर्ट्स के प्रबंधन ने प्रसारण समय भरने और प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यह तरीका अपनाया है. इतना भर ही नहीं. पाकिस्तानी टीम का कप्तान रहे और अपने ज़माने के बेहतरीन क्रिकेट ऑलराउंडर इमरान ख़ान को लगातार विभिन्न अवधि के वृतचित्रों के ज़रिए स्क्रीन पर कायम रखा जाता है. खेल जगत की अन्य हस्तियों को पीटीवी स्पोर्ट्स पर आजकल बहुत कम वक़्त मिलता है. इमरान ख़ान को भी इससे पहले इतना कवरेज़ कभी नहीं मिला था.

इन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का बड़ा ही सरल संदेश होता है: नेतृत्व के गुणों के बल पर इमरान ख़ान ने 1992 में एक फिसड्डी पाकिस्तानी
टीम को चमचमाती वर्ल्ड कप ट्रॉफी दिला दी. और एक बार फिर, नेतृत्व करने की अपनी काबिलियत के ज़रिए इमरान ख़ान पिछड़ते पाकिस्तान को नई बुलंदियों पर ले जाएंगे.

इससे पहले, किसी सत्तासीन नेता को इतना कवरेज़ नहीं मिला था, जनरल ज़ियाउल हक़ और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के अधीन सीमित लोकतंत्र के दौरान भी नहीं.

इस साल पाकिस्तान में सबसे सफल रही फिल्म “जवानी फिर नहीं आनी 2” में एक पाकिस्तानी युवक भारतीय उच्चायुक्त की बेटी से इश्क़ कर बैठता है. फिल्म के क्लाइमेक्स वाले दृश्य में परेशान भारतीय पिता को किसी का कॉल आता है, जिसकी आवाज़ इमरान ख़ान जैसी है, और जो खुद को “ख़ान” बताता है. लड़की के बाप पर वह अपनी सलाहों का बाउंसर फेंकता है, और “नए पाकिस्तान” का भी
ज़िक्र करता है.

कुछ दिनों पूर्व, मैं जब लाहौर के व्यस्त मॉल रोड के एक व्यस्त ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी थी, मेरी नज़र बिजली के खंभे पर टंगे एक नए नाटक “तब्दीली आ गई” के बैनर पर पड़ी. नाटक के एक्टर मुझे उतने जाने-पहचाने नहीं लगे, पर नाम ने आकर्षित किया.

सप्ताहांत के दौरान मैं पसंद की सीट सुनिश्चित करने के लिए समय से पूर्व थियेटर पहुंच गई. हॉल भरा हुआ था. परदा उठते ही ढोल बजाते और “हम ये डैम बनाएंगे” गाते देसी गायकों का समूह मंच पर अवतरित हुआ. एक पल के लिए मुझे लगा मानो हम टीवी देख रही हूं. गायक समूह ने दर्शकों से भी सुर में सुर मिलाने और तालियां बजाने का अनुरोध किया.

इसके बाद बाकी एक्टर्स मंच पर आए और नाटक शुरू हुआ. आधे समय तक तीन हास्य कलाकार मंच पर काबिज़ रहे और लगातार ‘तब्दीली’ वाले चुटकुलों की छौंक लगाते रहे – जिनमें बड़ी चतुराई से संकेत दिया जाता कि इमरान ख़ान का शासन और ‘आकर्षक प्रधानमंत्री’ सबसे बढ़िया हैं, और पिछली सरकार हर बुराई की जड़ थी. मैं ब्रेक के दौरान थियेटर से निकल आई. इतनी देर में ही मैं बहुत कुछ सीख
चुकी थी.

जब मैं 11.30 बजे रात को मॉल रोड से गुजर रही थी, कार के एफएम रेडियो को सुनकर मैं झुंझला उठी. यह ख़बरों का सामान्य अपडेट था, जिसमें समाचारवाचक ने उत्साह के साथ बताया: “कप्तान का बड़ा ऐलान, अब मुर्गियां गरीबों की किस्मत बदलेंगी.”

अधिकांश टीवी टॉक शो, जिनमें पूरी शिद्दत से पिछली सरकार को नाकाबिल बताया जाता था, अब इमरान ख़ान सरकार के हास्यास्पद फैसलों – मसलन, पाकिस्तान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिए ख़ान का नया उपाय: अंडे और मुर्गियां – की भी जयजयकार कर रहे हैं. विगत में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या मित्र राष्ट्रों से वित्तीय सहायता मांगने के प्रयासों को भीख मांगना करार देने वाले अशिष्ट टीवी एंकर्स अब इन्हीं स्रोतों से कर्ज लेने के ख़ान के फैसले पर तालियां बजा रहे हैं.

यूट्यूब पर भी अब इसी नई दुनिया का दर्शन होता है जहां ट्रेंडिंग वीडियो अमीर लियाक़त, मथिरा ख़ान या वीना मलिक (विवादों और बोल्ड बयानों के लिए चर्चित) जैसों के नहीं, बल्कि इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पीटीआई से संबद्ध होते हैं.

इसलिए कई बार जब मैं कोक स्टूडियो के म्यूज़िक के लिए वीडियो पर क्लिक करती हूं तो सुझाव के रूप में साइड में नज़र आते वीडियो के टाइटल कुछ इस तरह के होते हैं: ‘चीन में ख़ान का सादा अंदाज़, चीनी वज़ीर का दिल जीत लिया’ या ‘ख़ान की सादगी बताते हुए उनका ड्राइवर रो पड़ा’.

आज जब पाकिस्तान खराब शासन, भ्रष्टाचार, डगमगाती अर्थव्यवस्था और राजनयिक अलगाव जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है, सूचना के कमोबेश सारे तंत्र इमरान ख़ान के जयकारे में व्यस्त हैं. यह प्रक्रिया हालिया चुनाव के पहले से ही शुरू हो गई थी जब इमरान ख़ान को हर मसले का हल करने वाले मसीहा के रूप में पेश किया गया. पर अब वह सत्ता में हैं. ख़ान और उनकी सक्रिय सोशल मीडिया टीम को अहसास होना चाहिए कि हनीमून की अवधि बीत चुकी है. उनके क्रांतिकारी वायदों को पूरा करने का वक़्त आ चुका है.

(लेखिका पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र में पीएचडी अध्येता हैं. वह पंजाब में पीपुल्स पार्टी की महिला शाखा की उप-प्रमुख रह चुकी हैं.)

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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