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Thursday, 18 July, 2024
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पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत, फौज की परेशानी का सबब यही

फौज के लिए उसके लक्ष्य और दांव काफी अहम, अगर इमरान के पक्ष में कोई सहानुभूति पैदा होती है तो उसे उससे निपटना होगा.

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जब मैंने 3 नवंबर 2022 को इमरान खान पर हमले की खबर सुनी तो मुझे पहला ख्याल यही आया कि यह जरूर पाकिस्तानी फौज का किया-धरा होगा. उसके फौरन बाद यह भरोसे की खबर आई कि उन्हें सिर्फ पैर में गोली लगने से हल्के-फुल्के जख्म हुए हैं तो मेरे मन में फौरन आया कि इससे पाकिस्तानी फौज का कुछ लेना-देना नहीं है, क्योंकि उस हरकत में प्रोफेशनल काबिलियत नहीं दिखती है. बाद में ज्यादा ब्यौरे धीरे-धीरे आए तो लगा कि यह हरकत किसी नौसिखिए की है. उसके बाद खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने शहबाज शरीफ और इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) पर आरोप लगाया, जबकि सत्तारूढ़ गठजोड़ में से कुछ ने उस घटना को नाटक बताया.

घटना की कई वीडियो में एक ऑटोमैटिक हथियार से फायरिंग की आवाज सुनी जा सकती है, और कुछ दूसरी वीडियो में पिस्टल लिए एक आदमी पकड़े जाता दिखता है. जाहिर है, फर्जी वीडियो भी वायरल हैं. खास बात यह कि इन वीडियोज में हत्या की कोशिश का मैसेज हैं और मकसद इमरान खान के समर्थकों की भावनाएं भडक़ाना है. और ऐसा ही हुआ भी. जल्दी ही पाकिस्तान के कई हिस्सों में फौज की संपत्तियों पर इमरान के समर्थकों की घेराबंदी के वीडियो वायरल होने लगे.

एक में तो एक शख्स एक टैंक पर चढ़कर उस पर लात मार रहा था, और फोज के लिए नफरत का इजहार कर रहा था. पाकिस्तान में फिलहाल कुछ हद तक मीडिया आजाद है. हैरान न होइए कि ये हालात बदल जाएं. यह एकदम साफ हो गया है कि इमरान खान की हत्या की कोशिश की वारदात से पाकिस्तानी फौज/पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और पीटीआई के बीच जारी टकराव का ही इजहार हुआ है.

विडंबना देखिए, हालांकि पाकिस्तान के लिए असामान्य नहीं है कि फौज ने ही जिस सियासी पार्टी को गद्दी पर बैठाया था, आज वही उसके निशाने पर है. इस बार, इमरान खान के पास जो ताकत है, उसमें कुछ ऐसा खास है, जिसे फौज पारंपरिक राजनीतिक तौर-तरीकों से आसानी से काबू नहीं कर सकती है, जिसमें आतंकी प्रॉक्सी का इस्तेमाल भी शामिल है.

यह इस धारणा से बनी है कि पंजाब, सिंध और खैबर-पख्तूनख्वा में अक्टूबर 2022 के उपचुनावों में जीत हासिल करने के बाद, पीटीआई नेशनल इलेक्शन में भी आसानी से जीत जाएगी, चाहे वे जब हों. इससे भी बढ़कर वह प्रचलित धारणा है कि इमरान खान को पाकिस्तानी फौज के मध्य और निचले रैंकों में मजबूत समर्थन प्राप्त है. गौरतलब है कि उन्हें फौजियों के परिवार वालों के बीच भी लोकप्रिय बताया जाता है. इसलिए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव जल्द से जल्द कराए जाएं और सेना प्रमुख की नियुक्ति बाद में की जाए.


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फौज प्रमुख के लिए खींचतान

चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) जनरल कमर जावेद बाजवा 29 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 11 नवंबर को ही लंदन में नवाज के साथ बातचीत के बाद कहा था कि अगला सीओएएस ‘संवैधानिक’ तौर पर निर्धारित किया जाएगा और सबसे वरिष्ठ अधिकारी अगला सीओएएस होगा. इमरान खान ने फौरन कहा कि चयन योग्यता के आधार पर होना चाहिए और नवाज का फैसला इस पर होगा कि ‘उनके गुनाहों को कौन बचाएगा.’ अगले साल आम चुनाव में जीत की उम्मीद कर रहे इमरान के लिए पसंद लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद होंगे, जो उनके हमदर्द रहे हैं. इसकी संभावना नहीं है क्योंकि फौज इसके लिए राजी नहीं होगी, फिर हमीद वरीयता-क्रम में भी दूसरों से नीचे हैं. टकराव मददगार सीओएएस के लिए है.

इस बीच, फौज से यही उम्मीद की जा सकती है कि वह इमरान खान की सत्ता में वापसी को रोकने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी. ऐसा नहीं है कि फौज पीएमएल (एन) के साथ सहज है – उसने नवाज को लंदन में ही रहने देना पसंद किया है. इसलिए फौज दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों और सीओएएस की नियुक्ति से सब पर असर वरपा करने की जुगाड़ में लगी है. इसके अलावा, कई विकल्प तलाशे जा सकते हैं और उन पर अमल भी किया जा सकता है.

इमरान की लोकप्रियता का राज क्या है?

नवाज शरीफ अब एकमात्र ऐसे नेता हैं जो चुनाव में इमरान खान का मुकाबला कर सकते हैं. उन्हें लाहौर जेल से इलाज के खातिर रिहा कर दिया गया था, जहां वे भ्रष्टाचार के एक मामले में 7 साल की कैद की सजा काट रहे थे. वे कानूनी पचड़ों की वजह से पाकिस्तान नहीं लौट सके हैं, कानूनी तंत्र पर फौज का साया बना हुआ है. हैरानी की बात नहीं होगी कि अगर पीएमएल (एन), फौज और न्यायपालिका की मिलीभगत से कानूनी अड़चनें दूर कर दी जाएं और अगर नवाज लौटते हैं, तो फौज का न्यायपालिका पर कमोबेश असर की वजह से होगा. लेकिन इससे पाकिस्तानी फौज आश्वस्त नहीं हो सकती कि इमरान की सत्ता में वापसी रुक जाएगी.

इमरान की लोकप्रियता इस धारणा पर आधारित है कि वे पीएमएल (एन), पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेताओं और यहां तक कि फौजी हुक्मरानों से अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट हैं. इसलिए, उनके खिलाफ मामलों को उनके समर्थक राजनीतिक प्रतिशोध और साजिश के रूप में देखते हैं, ताकि उन्हें सत्ता से दूर रखा जा सके. इसी वजह से फौज और शरीफ सरकार अगले चुनावों के नतीजों को लेकर चिंतित है. इससे इस संभावना पर नजर जाती है कि इमरान खान रावलपिंडी तक अपने मार्च के ऐलान के साथ अपनी हत्या की बात भाषणों में कहते आए हैं.

नवाज शरीफ की तरह इमरान भी चुनाव लड़ने के अयोग्य हैं. पाकिस्तान के चुनाव आयोग (ईसीपी) ने उन्हें अक्टूबर 2022 में इस वजह से अयोग्य घोषित कर दिया कि उन्होंने राजकीय यात्राओं के दौरान मिले महंगे उपहारों को कनूनन बिक्री की लेकिन ब्यौरे छिपा लिए थे. सरकार और फौज शायद ऐसे ही मसलों में उम्मीद तलाश सकती है. इस तरह इमरान के खिलाफ और कानूनी मामले थोपे जा सकते हैं.

यह तरीका पाकिस्तान में आजमाया और परखा हुआ है और अक्सर इसमें न्यायपालिका की मदद ली जाती है. नवाज भी इसके शिकार हुए थे, और उससे पहले भी कई और हुए हैं. सोशल मीडिया पर इमरान पर सरकारी संपत्ति की हेराफेरी का आरोप लगाने की बातें पहले से ही बढ़ रही हैं. हालांकि, इमरान की अयोग्यता मसला चाहे बना रहे, पीटीआई चुनाव जीत सकती है और फौज चाहे तो इमरान अपनी अयोग्यता की स्थिति खत्म भी करवा सकते हैं.

बड़े सवाल

पीटीआई पूरी तरह एक शख्स आधारित पार्टी है, जो इमरान खान के करिश्मे पर सवार है. यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है. फौज के लक्ष्य और दांव काफी अहम हो सकते हैं. इसे फौज को तय करना होगा. लेकिन इस बार, अगर इमरान को कुछ होता है तो उसकी भारी प्रतिक्रिया होना तय है और उससे फौज को जूझना होगा. अब, इसके अलावा, फौज के सामने चुनौती यह भी है कि इमरान खान के मामले में वह खुद बंटी हुई हो सकती है.

आर्थिक दिक्कतों की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान में आर-पार की लड़ाई का मैदान खुल चुका है. वहां लोकतंत्र और सिविलियन-फौजी रिश्ते हमेशा की तरह दांव पर लगे हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या सिविलियन-फौजी टकराव के इस ताजा दौर के अंत में, सिविल प्रशासन फौज पर कुछ हद तक भारी पड़ेगा या फिर एक और फौजी तख्तापलट होगा या फौज पिछली सीट पर बनी रहेगी. जवाब अभी हवा में है. भारत को देखो और इंतजार करो पर कायम रहना होगा और हालात को समझना होगा.

अनुवाद: हरिमोहन मिश्रा

संपादन: इन्द्रजीत

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) प्रकाश मेनन (रिटायर) तक्षशिला संस्थान में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक; राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. उनका ट्विटर हैंडल @prakashmenon51 है. व्यक्त विचार निजी हैं)


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