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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की फाइल फोटो । पीटीआई
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आइये, इस लेख की शुरुआत 2019 के आम चुनावों के बारे में एक पक्की भविष्यवाणी से करते हैं : चूंकि बहुजन समाज पार्टी(बीएसपी) और समाजवादी पार्टी(एसपी) के बीच गठबंधन हो चुका है सो अगले चार महीनों में लोग पान की गुमटी, ढाबा, ताश-मंडली, ड्राइंग-रूम और टीवी स्टूडियों में अपने कामकाज के लाखों घंटे इस गुत्थी को सुलझाने में बितायेंगे कि यूपी में चुनाव के नतीजों का ऊंट किस करवट बैठने जा रहा है.

और, चूंकि अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारण मुझे भी इस सवाल का सामना सैकड़ों दफे करना है सो अपना जवाब मैं यहां लिख रहा हूं: यह कोई भविष्यवाणी नहीं बल्कि एक बुलावा है कि हम खूब युक्ति भिड़ाकर सोचें और देखें कि नजर आ रही सच्चाई से मेल खाते क्या संभावित नतीजे सामने आ सकते हैं.

तो सफर की शुरुआत 2014 से करते हैं. यूपी से आये लोकसभा चुनाव के नतीजों पर आम नागरिक, पत्रकार और चुनाव-सर्वेक्षक- हर कोई अचंभित था. सूबे में भाजपा की झोली में कुल 71 सीटें पके हुए आम की तरह टपकी थीं. भाजपा के सहयोगी अपना दल को मिलीं दो सीटों को जोड़ दें तो संयुक्त जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) के सीटों का कांटा 80 में से 73 सीटों की हैरतंअंगेज ऊंचाई पर जा पहुंचा था. राम-जन्मभूमि आंदोलन यानि अपनी चरम लोकप्रियता के दौर में भाजपा सीटों के मामले में जिस मुकाम तक पहुंची थी, उसे भी पार्टी ने 2014 में पीछे छोड़ दिया. नतीजे हैरतअंगेज रहे तो उसकी वजह ये थी कि छिटके वोट और घूमंतू वोट दोनों ही 2014 में भाजपा के खेमे की तरफ खिसक गये थे. भाजपा और उसके साथी दलों को 43 फीसदी वोट मिले थे- जो पार्टी के पिछले चुनावी इतिहास के एतबार से अधिकतम है.

साल 2014 के आम चुनाव के परिणाम:विपक्ष विभाजित और बीजेपी की आंधी

पार्टी बीजेपी एसपी बीएसपी अपना दल कांग्रेस
सीट 71 5 0 2 2

 

विपक्षी खेमे में वोट हद दर्जे तक बंटकर पड़े: समाजवादी पार्टी को 22 फीसद वोट मिले, बीएसपी को 20 प्रतिशत जबकि कांग्रेस को छह फीसद वोट से संतोष करना पड़ा. ये दल हर सीट पर एक-दूसरे के मुकाबिल खड़े थे और तकरीबन हर जगह उन्हें मुंह की खानी पड़ी. साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भी कहानी इसी टेक पर दोहरायी. भाजपा का वोट-शेयर कमोबेश अपनी ऊंचाई पर कायम रहा और पार्टी को चौतरफा चुनावी जीत हासिल हुई.

समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन इस बार इक्ट्ठे इन दो दलों को उतने भी वोट ना मिले जितने कि लोकसभा के चुनावों के वक्त अलग-अलग रहकर चुनावी लड़ाई लड़ने पर मिले थे. बीएसपी के वोटशेयर में जरूर कुछ बढोत्तरी हुई लेकिन वोट का ये इजाफा सीटों के इजाफे में तब्दील ना हो सका.

सबक बिल्कुल साफ दिख रहा था कि एसपी और बीएसपी अगर एक-दूसरे के खिलाफ रहकर चुनावी लड़ाई लड़ेंगे तो फिर भाजपा के सामने उनकी एक ना चलेगी. बुआ और भतीजा के एक साथ होने की यही वजह है.


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आइए, अपने गुणा-भाग की शुरुआत करते हुए पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के वोट को आपस में जोड़ देते हैं. ये बात अब साफ हो गई है कि अखिलेश यादव तथा मायावती कांग्रेस को उनकी दो खानदानी सीटों के अलावा और कहीं साथ नहीं लेने वाले. तो फिर, यहां हम अपने गणित से कांग्रेस को बाहर ही रखते हैं. चंद मिनटों के लिए मान लीजिए कि अपना दल के वोट भी भाजपा के पाले में ही रहते हैं, भले ही नेतृत्व की बागडोर किसी के हाथ रहे.

ऐसे में भाजपा के पास 43 प्रतिशत वोट होंगे और एसपी+बीएसपी के पास 43 प्रतिशत और, सीटों की तस्वीर कुछ यों नजर आयेगी:

संभावना1: एसपी-बीएसपी का सामान्य गठबंधन, वोट स्विंग नहीं

पार्टी भाजपा एसपी+बीएसपी कांग्रेस अन्य
सीट 37 41 2 0

 

आप देख सकते हैं कि बीएसपी और एसपी के वोटों को सीधे-सीधे जोड़ दें तो तराजू की डंडी एकदम से एकतरफ झुक जाती है और भाजपा को अपनी तकरीबन आधी सीटें गंवानी पड़ रही हैं. वोट कम मिलने के बावजूद एसपी-बीएसपी इक्ट्ठे रहकर भाजपा से ज्यादा सीट जीतने की स्थिति में हैं.

लेकिन गठबंधन दो जमा दो बराबर चार सरीखा सीधा-सरल मामला नहीं. गठबंधन में कुछ जुड़ता है तो कुछ घटता भी है. व्यवहार की जमीन पर जो जटिलतायें हैं उनके बरक्स हम जानते हैं कि एसपी और बीएसपी के सारे वोट इक्ट्ठे एक ठौर नहीं पड़ेंगे. बीएसपी का भरोसा अपने सबसे निष्ठावान मतदाताओं पर होगा जिन्हें वो कमोबेश पूरी तरह से किसी की भी झोली में डाल सकती है. लेकिन एसपी के वोट जरुरी नहीं कि बीएसपी की तरफ एकमुश्त मुड़ ही जायें.

तो, ऐसी सूरत में चलिए मान लेते हैं कि बीएसपी के लगभग 90 फीसद वोट एसपी की तरफ जायेंगे जबकि एसपी के 70 फीसद वोट बीएसपी का रुख करेंगे. हम थोड़ी देर को यह भी मान लेते हैं कि शेष वोट बाकी दलों में बंट जायेंगे.

अब तनिक इस बात को भी जेहन में रखें कि गठबंधन का कांग्रेस पर क्या असर होगा. साफ दिख रहा है कि कांग्रेस के मौजूदा वोट का ज्यादातर हिस्सा एसपी-बीएसपी गठबंधन की तरफ मुड़ जायेगा और उसके कुछ वोट भाजपा का रुख करेंगे. देश की सबसे पुरानी पार्टी बस यही आस लगा सकती है कि उसके मौजूदा वोट का आधा इस बार उसकी झोली में बचेगा.

इसका एक जाहिर सा मतलब निकलता है कि एसपी+बीएसपी का सीधा-सरल गणित अपने वजन में तनिक हल्का पड़ेगा और बीजेपी 46 सीटों के साथ दौड़ में आगे निकल जायेगी.

संभावना 2: एसपी-बीएसपी गठबंधन का मिलाजुला असर, वोट स्विंग नहीं

पार्टी भाजपा एसपी+बीएसपी कांग्रेस अन्य
सीट 46 31 2 1

 

आइये, अब आखिरी संभावना पर विचार करते हैं. अबतक के गणित में हम मानकर चल रहे थे कि भाजपा का वोटशेयर कमोबेश 2014 के आंकड़े पर बरकरार रहेगा. लेकिन हर कोई जानता है कि इस बार ऐसा नहीं होने वाला.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 में लोकप्रियता के जिस मुकाम पर थे या फिर 2017 में ही जितने लोकप्रिय थे, आज उतने तो कत्तई नहीं. शुरुआती तौर पर नोटबंदी को लेकर लोगों में कुछ आकर्षण था लेकिन अब इस मामले में घड़ी का पेंडुलम एकदम उल्टी दिशा में डोल गया है. किसानों को एक के बाद एक संकटों का सामना करना पड़ा है: सूखा, नोटबंदी, उपज की कीमतों में गिरावट और अब बेखूंटे के मवेशियों की मुश्किल. लोगों का रुझान जानने के गरज से किये गये सर्वेक्षणों में निकलकर आया है कि योगी सरकार की लोकप्रियता में भारी कमी आयी है. उत्तरप्रदेश में कानून-व्यवस्था एक मजाक में तब्दील हो चली है. कर्जमाफी का वादा अब गले की फांस बन रहा है. गन्ना किसान आस लगाये बैठे हैं कि किसी तरह उन्हें अपने बकाये की रकम हासिल हो और आलू उपजाने वाले किसान बेचैन हैं कि कम से कम लागत तो वसूल हो.

सो, लाख टके का सवाल यही है कि भाजपा के खिलाफ वोट-स्विंग कितना होगा ?

नीचे की तालिका में कुल जमा तीन स्थितियां बतायी गई हैं. अगर भाजपा किसी तरह वोटों के मोर्चे पर हो रहे नुकसान को 3 प्रतिशत पर रोक लेती है तो उसे 36 सीटें मिलेंगी यानि पिछली बार के मुकाबले आधी सीटें ही इस बार उसकी झोली में आयेंगी. दूसरी संभावना है कि भाजपा के खिलाफ वोट स्विंग ठीक-ठाक यानि 6 प्रतिशत का हो.

ध्यान रहे कि दूर छिटक चले 6 फीसद वोट के बावजूद भाजपा का वोटशेयर हाल के चुनावों में उसे हासिल वोटशेयर से ज्यादा ही रहने वाला है. लेकिन, गठबंधन का असर इतना जबर्दस्त है कि उसके हिस्से में बस 23 सीटें आती दिख रही हैं यानि 2014 में हासिल सीटों की तुलना में 50 कम.

लेकिन वोट-स्विंग 9 प्रतिशत का रहता है तो क्या होगा ? खिलाफ में नौ फीसद के वोट-स्विंग के बावजूद भाजपा के पास वोटशेयर तो अच्छा खासा रहेगा लेकिन सीटों के मामले में पार्टी एकदम से धड़ाम हो जायेगी. अगर वोट-स्विंग 9 प्रतिशत का रहता है तो पार्टी एकबारगी 12 सीटों पर सिमट जायेगी जबकि एसपी-बीएसपी की झोली में 65 सीटें होंगी.

संभावना 3: भाजपा के खिलाफ वोट स्विंग और गठबंधन का मिला-जुला असर

पार्टी बीजेपी एसपी+बीएसपी कांग्रेस अन्य
तस्वीर 1:

बीजेपी के खिलाफ वोटस्विंग 3% रहे तो

36 42 2 1
तस्वीर 2:

बीजेपी के खिलाफ वोटस्विंग 6% रहे तो

23 54 2 1
तस्वीर 3:

बीजेपी के खिलाफ वोटस्विंग 9% रहे तो

12 65 2 1

ऊपर जिन संभावनाओं का जिक्र किया गया है उनमें से किस संभावना के साकार होने के आसार सबसे ज्यादा है ? सच बात यही है कि हम ये बात ठीक-ठीक नहीं जानते. हम बस उस रुझान भर को जानते हैं जो एक साल के वक्फे में गोरखपुर, फूलपुर तथा कैराना की सीटों पर हुये उप-चुनाव से निकलकर सामने आये हैं.

इन तीनों सीटों पर जीत एसपी-बीएसपी-आरएलडी के गठबंधन की हुई और बीजेपी हार गई. लेकिन बात सिर्फ विपक्षी पार्टियों की एकता भर की नहीं थी. इन तीनों सीटों पर बीजेपी ने अपने वोट भी गंवाये. उप-चुनाव वाली तीन सीटों पर बीजेपी को 2014 की तुलना में औसतन 8.7 फीसद कम वोट मिले. अगर रुझान यही रहता है तो ज्यादा आसार इसी के हैं कि ऊपर बतायी गई संभावनाओं में से तीसरी तस्वीर के रंग खिलें.

यहां फिर से दर्ज करता चलूं कि मैंने यहां कोई भविष्यवाणी नहीं की है. यह बस एक खुरदरा खाका भर है. कई किन्तु-परंतु इसके साथ लगे-बंधे हैं. क्या एसपी-बीएसपी गठबंधन मतदाताओं में कोई वास्तविक उम्मीद जगा पायेगा ? क्या बीजेपी सांप्रदायिक गोलबंदी करने में सफल हो पायेगी ?


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टिकट के बंटवारे और चुनाव-प्रचार के वक्त क्या गुल खिलेगा ? और, गठबंधन में शामिल छुटभैय्या पार्टियों- अपना दल और राष्ट्रीय लोकदल- का क्या असर होगा ?

इस छोटे से गुणा-भाग से बस एक बात पक्के पर तौर पर निकलकर सामने आती है: अगर एसपी-बीएसपी गठबंधन आगे जमीन पर टिका रहा तो फिर बीजेपी को यूपी में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, यहां तक कि पार्टी सीटों के मामले में आसमान से एकदम जमीन पर आ सकती है.

लेख की शुरुआत एक भविष्यवाणी से हुई थी तो लेख का समापन भी एक भविष्यवाणी से ही करना अच्छा होगा: ‘दिल्ली दरबार को रास्ता लखनऊ होकर जाता हैयह कहावत सीटों के मामले में यूपी की बरतरी बताने के लिए दोहरायी जाती है और यह कहावत अगर किसी एक चुनाव में सबसे ज्यादा मायने रखती है तो वो है 2019 का आम चुनाव. मौजूदा लोकसभा में बीजेपी की हर चार में से एक सीट यूपी से है. बीजेपी यूपी में इस बार कितनी सीटें हारती है- इसी से तय होगा कि होने जा रहे आम चुनावों में वो सीटों के मामले में 200 के आंकड़े तक पहुंचती है या फिर उसका सफर 150 सीटों पर ही तमाम हो जाता है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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