Thursday, 11 August, 2022
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बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था में लोक- कल्याणकारी योजनाएं कैसे बनेंगी, इसका जवाब है अभिजीत बनर्जी के पास

अभिजीत बनर्जी और उनके दोस्तों ने अर्थशास्त्र को लोगों से असल जिंदगी में जोड़ने का काम किया है. ये लोग वहां पहुंचते हैं जहां नीतियां जमीन से जुड़ती हैं, लोगों पर असर डालती हैं.

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आपके दोस्त को नोबेल पुरस्कार मिले तो फिर इस मौके पर एक दिन ही सही लेकिन खुशी फूलकर कुप्पा होना का हक तो आपका बनता ही है. अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई और नाम अभिजीत बनर्जी तथा उनके दो साथियों का आया तो जाहिर है, मैं भी दिन भर खुशी में मगन रहा. मेरे हित-मीत और परिवार के लोग भी अच्छे-खासे मूड में हैं. लेकिन, मेरा यह लेख नोबेल पुरस्कार के मंच पर बैठने वाले किसी नवांगतुक के साथ अपने पुराने रिश्तों को याद करते हुए लिखा गया लेख नहीं है. अपने साथ हुई बीती बातों को याद करना और उनकी कथा कहना मेरे जैसे व्यक्ति के बूते की बात नहीं. हां, ये लेख अभिजीत बनर्जी से अपनी ‘दोस्ती’ और उनकी प्रशंसा को आधार बनाकर जरूर लिखा गया है लेकिन सोच ये रही है कि इसकी कुछ बातें पाठकों के मतलब की होंगी.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में हमलोग अलग-अलग विषयों में थे लेकिन हमारा एम.ए का सत्र (1981-83) एक था. उस जमाने में जेएनयू में सेंटर फॉर इकॉनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग का बड़ा ‘जलवा’ था और अभिजीत इसी सेंटर से एम.ए. (इकॉनॉमिक्स) कर रहे थे. मैं तब जेएनयू में पढ़ाई के लिहाज़ से तनिक सादा माने जाने वाले ‘राजनीतिशास्त्र’ में एम.ए. कर रहा था. मैंने पहली बार अभिजीत बनर्जी को लाइब्रेरी के पीछे बने, जैसे-तैसे खड़ा कर लिए गये ढाबा (अब ये जगह मुख्यद्वार में तब्दील हो गई है) पर देखा था: कंधे पर शांतिनिकेतनी झोला (ये झोला जेएनयू वालों के रेडिकल झोला से तनिक अलग होता है) टांगे कमसिनी के दिनों को बमुश्किल पार कर पाया एक चश्माधारी लड़का इतिहास के विद्यार्थियों के साथ बड़े जोश में बहस कर रहा था. बहस में उलझे इस समूह से मैं तनिक दूरी बनाकर खड़ा था, उस समय मैं दिल्ली की अंग्रेजीदां जमात के बीच अपने को तनिक असहज महसूस करता था और अभिजीत की प्रतिभा का एक हौव्वा सा बना हुआ था मेरे ऊपर. उनके बारे में एक हवा ये बनी हुई थी कि वो प्रेसिडेंसी के टॉपर हैं और उन्हें पहले सेमेस्टर में ‘ए प्लस’ (जेएनयू के 9 प्वाइंट वाले स्केल में सबसे ऊंचा स्थान) मिला हुआ है. राजनीति में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी. कैम्पस में सक्रिय किसी भी राजनीतिक संगठनों से उनका जुड़ाव नहीं था लेकिन रात के भोजन के बाद के वक्त में जेएनयू परिसर में जो राजनीतिक सभाएं हुआ करती हैं,उनमें वे मौजूद रहा करते थे.


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उन दो सालों में हमारे बीच एक-दूसरे से दुआ-सलाम हुआ करती थी लेकिन इससे ज्यादा नहीं. हमें एक-दूसरे को नये सिरे से जानने का मौका बीस साल बाद मिला जब वे हावर्ड में मेरे एक व्याख्यान को सुनने आये. वे व्याख्यान के बाद रुके रहे और हमलोगों ने जेएनयू के अपने दिनों के बारे में बातें कीं और इस बात पर कुछ आपस की ठिठोली की कि हमने क्लासरूम के भीतर कितना कम सीखा था. इसी वक्त हमारी दोस्ती हुई. इसके बाद से—शायद 2003 का साल था वो— हम लोग दोस्त बन गये. मैं अमेरिका जाता हूं तो उनसे मुलाकात होती है और वे भी अक्सर ही भारत आते हैं, तो यहां मुझसे भेंट करते हैं. किसी भी अच्छे बंगाली बौद्धिक की भांति वे दुनिया की तमाम चीजें पर साधिकार बोल सकते हैं: साहित्य से लेकर सिनेमा (दरअसल अभिजीत बनर्जी ने एक छोटी सी डॉक्यूमेंटरी फिल्म का निर्देशन किया है) तक और राजनीति से लेकर इतिहास तक सारा कुछ उनकी रुचि के दायरे में शामिल है. मेरा दायरा इससे तनिक कमतर है. वे भोजन-प्रेमी हैं लेकिन ज्यादातर बंगाली पुरुषों के उलट भोजन पकाना भी बेहतर जानते हैं. यों भोजन में मेरी कोई वैसी रुचि नहीं.

एक गड़बड़झाला ये भी है कि हमारी राजनीति एक-दूसरे से मेल नहीं खाती. उन्होंने ‘आप’ सरीखे राजनीतिक प्रयोग में तो बड़ी दिलचस्पी दिखायी थी लेकिन भारत के लोकतांत्रिक समाजवादी परंपरा या फिर स्वराज इंडिया सरीखे प्रयोग में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है. इधर मेरे सहकर्मी और दोस्त इस बात पर हैरान-परेशान रहते हैं कि आखिर मैं अभिजीत बनर्जी के लिखे और किये में क्योंकर रुचि लेता हूं. इस देश की राजनीति की ‘लाल-धारा’ और ‘नील-धारा’ भी अभिजीत बनर्जी को कोई मूलगामी बदलाव के सोच वाला शख्स नहीं मानती. आंदोलन के मेरे कई साथी अभिजीत बनर्जी के सुझाये कुछ नीतिपरक नुस्खों से बड़े खफा रहते हैं, खासकर प्रत्यक्ष नगदी हस्तांतरण और स्कूली बच्चों की शैक्षिक परिलब्धि के आकलन की उनकी बात पर मेरे साथियों की भौंहे कुछ ज्यादा चढ़ी रहती हैं. जो भी हो, मैं अभिजीत बनर्जी से बातें करने और उनसे सीखने में यकीन रखता हूं.

और, मेरे इस यकीन की वजह वो नहीं जो नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति ने बतायी है. अभिजीत बनर्जी की ख्याति तो इस बात के लिए फैली है कि वो किसी भी नीति की कारअमली और कामयाबी के बारे में खूब सारे पुख्ता सबूत जुटाते और अपने शोध-अनुसंधान के सहारे व्यावहारिक समाधान सुझाते हैं. पुख्ता सबूत जुटाने के लिए बड़ी सूझ के साथ प्रयोग करने होते हैं और यह एक पद्धति है- ऐसी सोच के प्रस्तावक के रूप में अभिजीत बनर्जी की धाक है. एस्थर डफलो तथा क्रेमर सरीखे अपने सहयोगियों के साथ अभिजीत बनर्जी ने रैंडम कंट्रोल ट्रायल (आरसीटी) का कुछ ऐसा असरदार इस्तेमाल किया है कि अर्थशास्त्र के भीतर विकासमूलक अर्थशास्त्र कहे जाने वाले अनुशासन की एक दशक के भीतर शक्ल ही बदल गई है जबकि किसी जमाने में आरसीटी चिकित्सा-जगत की ही चीज हुआ करती थी. और, इसी वजह से अभिजीत बनर्जी तथा उनके दो सहकर्मियों को नोबेल पुरस्कार समिति ने चुना है जो कि इतनी कम उम्र में नोबेल पुरस्कार अमूमन नहीं मिला करता. लेकिन जैसा कि एंगस डिटॉन सरीखे अर्थशास्त्रियों का कहना है, आरसीटी सबूत जुटाने की एक विधि के तौर पर ना तो अनिवार्य है और ना ही उसे पर्याप्त कहा जा सकता है. ज्यां द्रेज ने चेताया है कि सिर्फ आरसीटी के आधार पर नीतियां सुझायी जायें तो मामला लुटिया डुबोने वाला भी बन सकता है. प्रणब वर्धन सरीखे अर्थशास्त्री ने भी आगाह किया है कि आरसीटी का जोश भरा चलन नीतियों को गहरे और व्यापक रूप से प्रभावित करने वाले मुद्दों की तरफ से हमारा ध्यान भटकाने वाला भी हो सकता है.

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लेकिन अभिजीत की अर्थशास्त्रीय युक्तियों से मेरा एक किस्म का लगाव है इसलिए कि उसमें सूझ के कुछ बुनियादी किस्म के सूत्र मिल जाते हैं और ये विचार-सूत्र सार्वजनिक नीति के निर्माण में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं. भारत में सार्वजनिक नीतियों के निर्माण पर विचारधाराओं की छाया कुछ ज्यादा ही गहरी है, उसमें सोच का अंदाज एकदम से एक झटके में अंगना-दुअरा बुहार लेने वाला होता है और उम्मीदें भी हद से ज्यादा पाल ली जाती हैं और इसी का नतीजा है कि जब ऐसी किसी सार्वजनिक नीति की आलोचना होती है तो उसमें तिताई एकदम से जीभ जला देने वाली होती है. अभिजीत और उनके सहकर्मियों ने हमें इस अतिचारी रुझान से बचने की जरुरी दवा सुझायी है और इसी कारण मेरे जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता को उनकी बातें ध्यान से सुननी चाहिए.

जो लोग आर्थिक नीति और इसके दायरे में सामाजिक नीतियों का निर्माण करते हैं वे किसी एक मूल स्थापना से शुरू करते हैं और ऐसा करना भी चाहिए लेकिन फिर इस मूल स्थापना से शुरु करने के तुरंत बाद नीति-निर्माण करने वाले सीधे एक लंबी छलांग लेते हुए नीतिगत समाधान सुझाने के मरहले पर चले आते हैं. साध्य और साधन को आपसे में जोड़ने का यह एक विचित्र तरीका है. मिसाल के लिए, जो लोग समानता के मूल्य के हामी हैं वे राजसत्ता पर सेंत-मेंत में विश्वास करके चलते हैं, सरकारी क्षेत्र पर उनका गहरा विश्वास होता है और नियंत्रण तथा नियमन के भी हामी होते हैं जबकि स्वछंदतावादी इस सोच के ठीक उलट सिरे से सोचते हैं. वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही खेमों में सोच के बने-बनाये सांचों के भीतर रखकर नीतियां तैयार की जाती हैं. ऐसे में कोई भी नीति अपनी पूर्ववर्ती नीति का अगला और सुधरा संस्करण भर जान पड़ती है और नया ना होने के कारण बहुत उपयोगी साबित नहीं हो पाती. अभिजीत और उनके सहकर्मियों ने दरअसल लोक-कल्याणकारी राज्य के मूल्यों को बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के औजारों से जोड़ने और दोनों के बीच तालमेल कायम करने की कोशिश की है और हमें याद रखना चाहिए कि हम चाहे लोक-कल्याणकारी राज्य के मूल्यों के कितने भी हिमायती हों दरअसल हमारा रहना बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के भीतर हो रहा है.

अभिजीत बनर्जी और उनके सहकर्मियों ने ऐसा करने के लिए सार्वजनिक नीतियों को लेकर होने वाली बड़ी बहस को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ा है और हर टुकड़े के लिए पुख्ता सबूतों के सहारे समाधान सुझाये हैं. आज वो वक्त रहा ही नहीं कि हम सबके लिए एक सी स्कूली शिक्षा के गुण-दोषों के हिसाब से सोचें और इसका प्रस्ताव करें. दरअसल अब समय कुछ ऐसा आन पड़ा है कि हमें सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति और स्कूल पढ़ाई के मामले में बच्चों की शैक्षिक परिलब्धियों की कमी को दूर करने के सिरे से सोचना होगा. बहस अपने आम या कह लें सर्व-सामान्य ढर्रे से हटकर किन्ही खास समस्याओं पर केंद्रित हो तो ज्यादा सार्थक और उपयोगी हो सकती है. इससे हमारे नीति-निर्माता नीतियों के सबसे कमजोर पहलू पर ध्यान देने को बाध्य होते हैं और यह पहलू है हमारी नीतियों की बनावट का.महिला आरक्षण विधेयक से लेकर शिक्षा का अधिकार कानून तक हम ऐसी बहुत सी नीतियां देख चुके जिनको बनाने के पीछे मंशा तो नेक थी लेकिन नतीजे उम्मीद के उलट आये.


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हमारे नीति-निर्माताओं में ब्यौरों को लेकर एक उपेक्षा भाव होता है लेकिन नीतियों की बनावट पर ध्यान दिया जाये तो इस बीमारी से छुटकारा मिल जायेगा. अभिजीत, उनके सहकर्मियों और छात्रों की सबसे खुश करने वाली बात है कि ये लोग वहां पहुंचते हैं जहां नीतियां जमीन से जुड़ती हैं, लोगों पर असर डालती हैं. ऐसी जगहों पर जाकर मौका-मुआयना के आधार पर वहां के एक-एक ब्यौरे को बारीकी से इक्ट्ठा करते और समझते हैं—उन्हें ये फिक्र नहीं सताती कि ऐसा करते हुए उनकी कमीज की चमक तनिक मंद पड़ जायेगी. दरअसल सार्वजनिक नीतियों का निर्माण भी इस रीति से होना चाहिए. इस अर्थ में देखें तो बंद और आरामदेह कमरों में ज्ञान की महीन कताई करने में मशगूल रहने वाले अर्थशास्त्र जैसे विषय को अभिजीत बनर्जी, एस्थर डफलो और क्रेमर ने असल जिंदगी से जोड़ने का काम किया है. नीति-निर्माण में राजसत्ता की भूमिका को लेकर एक अजब सनक भरा रुझान लोगों में देखने को मिलता है और सार्वजनिक नीतियों के असर को जानने-समझने के लिहाज से जैसी परीक्षण-विधि अभिजीत बनर्जी तथा उनके सहकर्मियों ने तैयार की है वह एक जरुरी दवा साबित हो सकती है. नीतियां मान-मूल्यों से निरपेक्ष ना हों लेकिन साथ ही अपने वांछित लक्ष्य को भी हासिल करें- किसी राजनीति कार्यकर्ता को आर्थिक नीतियों के बाबत इस सिरे से सोचने की जरुरत होती है और अभिजीत बनर्जी तथा उनके सहकर्मियों का काम इस मामले में रहबरी कर सकता है.

अभिजीत बनर्जी को अब नोबेल पुरस्कार मिल चुका है तो क्या हम उम्मीद करें कि वो अपने काम को कुछ कदम और आगे ले जायेंगे ? हमारे अभी के वक्त में जरुरत दरअसल नीति-निर्माण का एक ऐसा ढांचा तैयार करने की है जिसमें नैतिक मान-मूल्य, पर्यावरणीय टिकाऊपन तथा आर्थिक औचित्य आपस में एकसार होकर गुंथे रहें. मैंने अपने एक लेख में इसे इको-नॉर्मिक्स की तलाश जैसा नाम दिया है. हम फिलहाल जिन आर्थिक विचारधाराओं के घेरे में चल रहे हैं उसमें इको-नॉर्मिक्स सरीखा ढांचा मौजूद नहीं. अभिजीत उर्वर मष्तिष्क के स्वामी और उन चंद लोगों में एक हैं जो इस साधारण मगर हमारे वक्त के सबसे जरुरी मसले को हल कर सकते हैं.

(लेखकराजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनका निजी विचार है.)

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