Monday, 17 January, 2022
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जीत की मिठास के बावजूद, मोदी-शाह बीजेपी के लिए बिहार में एक समस्या है, और वो हैं नीतीश कुमार

नरेंद्र मोदी को जो चीज़ सबसे ज़्यादा खलेगी, वो है किसी ऐसे नेता को गठबंधन की कमान सौंपना, जो थका हुआ लगता हो, और पूरी तरह नियंत्रण में न हो.

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इधर बीजेपी-जेडी(यू) गठजोड़ बिहार में सरकार बनाने को तैयार है, उधर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने एक विकट स्थिति खड़ी हो गई है- नीतीश कुमार का क्या करें?

बिहार जनादेश- भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 74 सीटें जीती हैं, जो 2015 में सिर्फ 53 थीं, जबकि जनता दल (युनाइटेड) की सीटें 71 से घटकर 43 हो गई हैं- पदस्थ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा, नरेंद्र मोदी के लिए है. कुछ भी हो, नीतीश की छवि और लोकप्रियता दोनों को धक्का लगा है, एक ऐसा फेक्टर जिसने संभवत: बीजेपी को पीछे खींचा है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) 125 सीटें लेकर, बहुमत के 122 के आंकड़े से आगे निकल चुका है, जबकि आरजेडी-कांग्रेस-वाम महागठबंधन 110 पर रुका दिख रहा है.

बिहार में, बीजेपी अब सीनियर सहयोगी के तौर पर उभरकर सामने आई है, और उसकी पीठ पर अब नीतीश कुमार के रूप में, एक थका हुआ नेता सवार है. अब ये कुछ ही समय की बात है, जब पार्टी अपना हक़ जमाएगी और सूबे की कमान अपने हाथ में ले लेगी. नीतीश-हटाओ अभियान के भारी प्रचार के बीच, नीतीश कुमार को गद्दी पर बिठाना, लोगों के गले नहीं उतरेगा. लेकिन इससे जल्दी ही ऐसी स्थिति ज़रूर पैदा हो जाएगी, जिसमें नीतीश को किनारे कर दिया जाएगा.

नीतीश कुमार, जो मुख्यमंत्री के रूप में तीन कार्यकाल पूरे कर चुके हैं, मौजूदा कार्यकाल में अपनी परछाईं मात्र नज़र आते हैं- सुशासन बाबू की अपनी पिछली आकर्षक छवि से कहीं दूर, दिशाहीन और ढुलमुल. मंगलवार को जेडी(यू) प्रमुख से बात करने के बाद, हालांकि अमित शाह ने इस बात को दोहराया कि नीतीश सीएम बने रहेंगे, लेकिन नतीजों ने उनके और नरेंद्र मोदी के सामने एक दुविधा ज़रूर खड़ी कर दी है.

मोदी-शाह की जोड़ी भले ही फिलहाल के लिए, समझौते के अपने रुख़ पर क़ायम रहें, लेकिन क्या वो नीतीश कुमार को उनका पांच साल का कार्यकाल पूरा करने देंगे? नीतीश को बिहार सरकार का चेहरा बनाए रखना, निश्चित रूप से 2025 के विधान सभा चुनावों में, और संभवतया 2024 के लोकसभा चुनावों में भी, बीजेपी के लिए बोझ बन जाएगा.

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जीत की मिठास के बावजूद, मोदी-शाह बीजेपी के लिए बिहार में एक समस्या है, और वो है नीतीश कुमार.


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नीतीश का घटता प्रभाव

2005 के बाद से बिहार में नीतीश का उदय, एक राजनीतिक कल्पना सी नज़र आती है. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बरसों के शासन के बाद, जिसे ‘जंगलराज’ और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता है, जेडी(यू) प्रमुख हवा के ताज़ा झोंके की तरह सामने आए- जो अपने साथ विकास की राजनीति लेकर आए. ढांचागत विकास से लेकर साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियों के नज़ारे तक, नीतीश के शासन में बिहार में एक स्पष्ट बदलाव दिखा.

बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन और महत्वाकांक्षी विकास का पर्याय बन गए. लेकिन, उनका मौजूदा कार्यकाल बिल्कुल अलग रहा है. वो अब पहले जैसे नीतीश नहीं हैं- अब वो बिगड़ती क़ानून व्यवस्था की स्थिति, ख़राब शासन, और शराब बंदी जैसे बिना सोचे-समझे फैसलों को लेकर आलोचनाओं में फंसे हुए हैं. उनकी ख़ुद की सियासी बेवफाई ने भी, उन्हें काफी नुक़सान पहुंचाया है.

बीजेपी के साथ नीतीश की अल्टा-पल्टी, धर्मनिर्पेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, उनका बार बार ख़ेमे बदलना, और किसी स्पष्ट राजनीतिक, वैचारिक या सामाजिक सोच न होने ने, अपने पिछले रूप के मुकाबले उनकी शख़्सियत को, कहीं अधिक हल्का और छोटा कर दिया है. जेडी(यू) मुखिया का ‘ख़ामोश’ महिला वोट बैंक भले ही बरक़रार हो, लेकिन उनकी कम संख्या, उनके घटे हुए क़द और कमज़ोर पड़ गई सियासी ताक़त को ज़रूर दर्शा रही है.

बीजेपी के लिए, जो अभी भी मोदी की लोकप्रियता पर सवार है, नीतीश जितना फायदा पहुंचा रहे हैं, उतना ही घाटे का सौदा भी साबित हो रहे हैं. एनडीए को इस चुनाव में नीतीश विरोधी लहर पर पर्दा डालना था, और बीजेपी के ‘सबसे बड़े चेहरे’ नरेंद्र मोदी को, प्रोजेक्ट करने की रणनीति से बचना था. ये रणनीति काम कर गई और बीजेपी को काफी फायदा मिला है. वो सबसे बड़ी पार्टी बनने से सिर्फ एक सीट कम रह गई, जो ऐसे प्रांत में एक बड़ी बात है, जहां आरजेडी और जेडी(यू) जैसी दो क्षेत्रीय पार्टियां अंदर तक जड़ें जमाए हैं.

मोदी-शाह की दुविधा

मोदी और शाह को जो चीज़ शायद सबसे ज़्यादा सुख देती है, वो है चुनावी जीत. और बिहार की जीत, जहां वो 2015 में हार गई थी और जिसे पीएम की शर्मिंदगी के तौर पर देखा गया था, विशेषतौर से स्वादिष्ट है. लेकिन मोदी-शाह जोड़ी की प्रवृत्ति है, कि ईवीएम का आख़िरी बटन दबने से पहले ही, वो अगले चुनावों की चिंता करने लगते हैं.

वो जानते हैं कि अगर नीतीश इन चुनावों में कमज़ोर कड़ी थे, तो अगले चुनावों में यक़ीनन बोझ बन जाएंगे. बीजेपी 110 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जो जेडी(यू) से पांच कम थीं, और फिर भी उसने अपने सहयोगी के मुक़ाबले 31 सीटें ज़्यादा जीतीं. कहना मुश्किल है कि अगर वो नीतीश के साथ न होती, तो बीजेपी कैसा प्रदर्शन करती, लेकिन बीजेपी के प्रदर्शन में जो उछाल आया है, उससे साफ ज़ाहिर है कि मोदी का नाम काम कर गया, और शायद उनकी लोकप्रियता पूरा चुनाव अकेले दम पर जीतने के लिए काफी हो सकती थी. जेडी(यू) के नुक़सान का बीजेपी को फायदा मिला है, और इसी के साथ बीजेपी ने तय कर दिया है, कि बिहार में इस समय कौन पार्टी ज़्यादा प्रभावशाली, ज़्यादा लोकप्रिय, और चुनाव के लिए ज़्यादा तैयार है.

मोदी अब अपने दूसरे कार्यकाल में हैं, और उनका ये कार्यकाल प्रशंसापूर्ण तो बिल्कुल नहीं रहा है. लेकिन मोदी की चमक और उनकी छवि- एक ऐसे नेता की जो ईमानदारी, सुशासन के लिए खड़ा है, और जो कामदार की आवाज़ है- फीकी नहीं पड़ रही है. नरेंद्र मोदी को जो चीज़ सबसे ज़्यादा खलेगी, वो है किसी ऐसे नेता को गठबंधन की कमान सौंपना, जो थका हुआ लगता हो, पूरी तरह नियंत्रण में न हो, और जिसकी लोकप्रियता में भी भारी गिरावट आई हो. लोग अकसर मोदी को वोट देते हैं, और बदले में उनके साथ सिर्फ अनुचित व्यवहार होता है. बीजेपी जानती है कि उन्हें एक आज़माए-परखे लेकिन ठुकराए हुए नीतीश कुमार देने से, अगले चुनाव में उसके मतदाता उसे माफ नहीं करेंगे.

नीतीश कुमार ऐलान कर चुके हैं कि ये उनका आख़िरी चुनाव है, लेकिन मोदी-शाह की निगाहें, देश और अधिक से अधिक राज्यों पर, कम से कम अगले कई सालों तक राज करने पर लगी हैं. नीतीश का पांच साल का कार्यकाल, बीजेपी पर एक बोझ बन सकता है, और 2015 के विधानसभा चुनावों में, ख़ासकर युवा तेजस्वी यादव के फिर से उभरने से, उसकी उम्मीदों पर असर डाल सकता है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह अच्छी तरह जानते हैं, कि वो इस बोझ को न तो ढो सकते हैं, और न ही ढोना चाहेंगे. इसलिए अब इस जोड़ी की समस्या और मिशन यही होगा, कि नीतीश से कब और कैसे छुटकारा पाया जाए.

(यहां प्रस्तुत विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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