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Wednesday, 28 February, 2024
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भारत का दोस्त कौन, दुश्मन कौन? मोदी सरकार अपनी बनाई अमेरिका-चीन-रूस-पाकिस्तान की जलेबी में उलझी

मोदी सरकार एक ओर पश्चिम विरोधी और रूस समर्थक जनमत के निर्माण को प्रोत्साहित करती रही है, तो दूसरी ओर अपनी रणनीति इसके बिलकुल उलटी दिशा में निर्धारित करती रही है. ऐसे विरोधाभास चल नहीं सकते

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दुनिया में आज भारत के सहयोगी, मित्र, या दुश्मन/प्रतिद्वंद्वी देश कौन-कौन हैं?

यह तो साफ है कि पाकिस्तान और चीन प्रतिद्वंद्वी हैं. लेकिन बात जब सहयोगियों या मित्रों की आती है तब मुश्किल हो जाती है. तब हम प्रतिद्वंद्वियों के मित्रों, और मित्रों के प्रतिद्वंद्वियों को लेकर सचमुच उलझन में पड़ जाते हैं. और ऐसा तब भी होता है जब बात एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी की आती है जो हमारे उस मित्र का काफी करीबी दोस्त है, जो हमारे एक सहयोगी का कट्टर दुश्मन और हमारे एक दुश्मन का सबसे अहम दोस्त है. जी हां, यह भारी घालमेल है, लेकिन मैं इसे सुलझाने की कोशिश करता हूं.

शुरुआत चीन-रूस-अमेरिका-चीन-पाकिस्तान के समीकरण से करते हैं. इस बात के काफी सबूत सबको मालूम हैं कि रूस, यूक्रेन के बहाने पश्चिमी देशों से अपनी लड़ाई में चीन की मदद के बिना चंद सप्ताह भी नहीं टिक सकता. व्यापार को लेकर चीनी कस्टम विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में चीन की अर्थव्यवस्था सुस्त रही और उसका कुल व्यापार घटा, लेकिन इन दोनों देशों के बीच व्यापार खूब बढ़ा.

इसमें रूस से किए गए निर्यातों का बड़ा योगदान रहा. खासकर अपनी पीठ खुद थपथपाने वाले भारत में यह धारणा काफी फैली हुई है कि हम रूस से जो तेल खरीद रहे हैं वह उसकी अर्थव्यवस्था, और युद्ध के प्रयासों की मदद कर रही है. लेकिन असलियत यह है कि रूसी अर्थव्यवस्था में चीन का योगदान इससे कई गुना बड़ा है. और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

इसके अलावा आधुनिक सैन्य साज़ो-सामान की सप्लाई हमेशा एक करीबी संभावना रही है. इसलिए भारत का सबसे पुराना दोस्त आर्थिक, राजनीतिक, और अंततः सैन्य मामलों में केवल उस एक देश पर वास्तव में निर्भर है, जो लंबे समय से हमारा सबसे जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी है और जिसके 60,000 सैनिक हमसे लड़ाई के लिए कमर कसे तैनात हैं. जाहिर है, यह हमारे जटिल समीकरण के पहले हिस्से को सुलझाता है कि आपका प्रतिद्वंद्वी आपके दोस्त का सबसे करीबी दोस्त है.

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अब दूसरी पहेली को समझें. यह प्रतिद्वंद्वी (चीन) उस देश के सबसे बुरे दुश्मन (रूस) का सबसे अच्छा दोस्त है जिस देश को आज आप अपना सबसे ज़रूरी रणनीतिक सहयोगी मान रहे हैं. यह मैं भारत के प्रधानमंत्रियों और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के कई संयुक्त बयानों के आधार पर कह रहा हूं. इसके अलावा, वही प्रतिद्वंद्वी आपके सबसे करीब के सिरदर्द पाकिस्तान का संरक्षक, दोस्त और मालिक, पहले नंबर का कर्जदाता और सुरक्षा की गारंटी देने वाला मुल्क है.


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अगर इसे सरल बनाना कठिन है, तो मान लीजिए कि यह उस दुनिया की जटिलताओं को रेखांकित करता हैं जिसमें हम जी रहे हैं. सैन्य जरूरतों के लिए रूस पर हमारी निर्भरता गहरी है और लगता है कि अभी कम-से-कम पांच साल तक तो यही स्थिति रहने वाली है. हमारे 95 फीसदी टैंकों, 70 फीसदी लड़ाकू विमानों, और नौसेना के ध्वज-पोत तथा उड़ान भरने वाले एसेट्स को रातों-रात कोई नहीं बदल सकता.

जैसा कि फौजी लोग कहते हैं, एलएसी के ऊपर अगर बलून आ गया तब आपके मुताबिक रूस क्या रुख अपनाएगा? वैसी स्थिति में रूस अगर 1962 की तरह तटस्थ या उदासीन भी रहा तो गनीमत मानिएगा. 1962 में तो सोवियत संघ कहीं ताकतवर महाशक्ति था, चीन का वैचारिक बड़ा भाई था. आज समीकरण उलट गया है. युद्ध में फंसा पुतिन का रूस चीन के एक दरबारी वाली हैसियत में है.

इसलिए पिछले दिनों नयी दिल्ली में संपन्न हुए ‘रायसीना डायलॉग’ में रणनीति के जानकारों से भरे हॉल में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लाव्रोव को अपने भारतीय मेज़बानों पर अपनी ऊंची मुद्रा जताते हुए देखना दिलचस्प था. यह कुछ-कुछ ‘स्लीपिंग विद एनिमी’ फिल्म के उस दृश्य जैसा था जिसमें मार्टिन बर्नी (जिसका किरदार पैट्रिक बेर्गेन ने निभाया है) लॉरा बर्नी (जिसका किरदार जूलिया रॉबर्ट ने निभाया है) से कहता है कि “हम सब कई बातें भूल जाते हैं. याद इसलिए दिलाई जाती है.” लाव्रोव ने अपने ज़्यादातर खुशामदी श्रोताओं को याद दिलाया कि भारत और रूस के बीच जो संधि है उसमें दोनों देश कहते हैं कि उनके बीच एक “विशेष एवं विशेषाधिकार संपन्न रणनीतिक साझीदारी” है. उन्होंने तंज़ कसते हुए सवाल किया कि बताइए, ऐसी संधि किस दूसरे देश के साथ है?

मुझे यकीन है कि दूसरे लोग ज्यादा स्मार्ट हैं लेकिन मुझे तो पता करना पड़ा कि वे किस संधि की बात कर रहे थे. ऐसा लगता है, वे उस संधि की बात कर रहे थे जिस पर 1993 में पी.वी. नरसिंह राव और बोरिस येल्तसिन ने दस्तखत किए थे. इस संधि ने 1971 की भारत-रूस शांति, मैत्री एवं सहयोग संधि की जगह ली थी. चूंकि शीतयुद्ध खत्म हो गया था और सोवियत संघ लुप्त हो गया था, भारत को इस बात की जरूरत महसूस हो रही थी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद उसके उत्तराधिकारी देश से विशेष संबंध जारी रखा जाए. मूल संधि के अहम अनुच्छेद 9 में जिस आपसी सुरक्षा गारंटी की बात की गई थी उसे इस नयी संधि में जाहिर है, छोड़ दिया गया.

नयी दिल्ली में हुए उस जमावड़े में लाव्रोव को इसकी याद दिलाने की गुस्ताखी शायद ही कोई करता. या यह याद दिलाने की कि पिछले 25 साल से भारत अमेरिका के साथ जो कई संयुक्त बयान या समझौते जारी करता रहा है उनमें वह एक मात्र जिस महाशक्ति को अपना जरूरी रणनीतिक सहयोगी बताता रहा है वह अमेरिका है.

उसी, 1990 वाले दशक में लाव्रोव की पूर्ववर्ती येवजेनी प्रीमाकोव ने रूस-भारत-चीन के बीच त्रिराष्ट्रीय सहयोग समझौते की बात की थी. लाव्रोव ने हमें याद दिलाया कि वह एक उपयोगी मंच हो सकता है जिस पर भारत और चीन बिना किसी द्विपक्षीय हिचक या दबाव के अपने विवादों का निबटारा कर सकते हैं. रूस एक ईमानदार, खामोश मध्यस्थ रह सकता है. यह कुछ याद दिलाने वाली बात थी.

लाव्रोव कई दिलचस्प दावे करके भी निकल गए, जिनमें से कुछ ऐसे थे जो भारतीय रणनीतिक विमर्शों में प्रायः किए जाते रहे हैं. उदाहरण के लिए, ‘ग्लोबल साउथ’ (अविकसित देशों का समूह, जो विकसित देशों के प्रायः दक्षिण में है) का मामला. एक बार फिर, तथ्यों की जांच से कुछ बातें साफ हो जातीं. मसलन, तथाकथित ‘ग्लोबल साउथ’, जिसके बारे में भारतीय नेता और टीकाकार हाल में काफी चर्चा करते रहे हैं, के वोटिंग रेकॉर्ड.

संयुक्त राष्ट्र में पिछली बार केवल सात देशों ने उस प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया जिसमें रूस से यूक्रेन पर हमला बंद करने और वहां से बाहर निकलने के लिए कहा गया था. ये सात देश वही थे जिन पर प्रायः शक किया जाता है—सीरिया, बेलारूस, निकारागुआ, उत्तरी कोरिया, एरिट्रिया, माली, और सातवां बेशक रूस. भारत समेत 32 देशों ने वोटिंग में भाग नहीं लिया. 141 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया. सो, ग्लोबल साउथ की हालत यह है.

सो, हम फिर से भारत के जलेबीनुमा, गड्डमड्ड रणनीतिक जगत के सामने आ खड़े होते हैं— रूस एक ऐसा दोस्त है जिसे अलग नहीं किया जा सकता और जो चीन पर निर्भर है; स्थायी प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के लिए भी ताकत और पैसे के लिए दूसरा कोई स्रोत नहीं है; और अमेरिका एक जरूरी रणनीतिक सहयोगी है.

पाकिस्तान की हताशा दूसरी तरह की है. खाड़ी के अरब मुल्कों को उस पर भरोसा नहीं है और वह पश्चिम से भी कट गया है, हालांकि ब्रिटेन अमेरिका में उसकी दाल गलाने के लिए काफी ज़ोर लगा रहा है. अगर पाकिस्तान यूक्रेन को जरूरी टैंक और रॉकेट गोले बेच रहा है तो यह केवल उसका अपना काम नहीं है, भले ही उसे बदले में डॉलर या गेहूं की जरूरत क्यों न हो. यह अपने पुराने अपराधों के लिए अमेरिका से माफी की अर्जी है.

भारत को ऐसी ही जटिल रणनीतिक दुनिया से निबटना है. ग्लोबल साउथ, समान दूरी, रणनीतिक स्वायत्तता जैसे मुहावरों के पीछे अगर रणनीतिक मामले से जुड़ा व्यापारिक मकसद सध रहा है तो ठीक है. हालांकि जी-20 में हितों की टकराहट हावी है लेकिन ‘नाटो’ की एक टीम ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मामले में ज्यादा सहयोग की संभावना टटोलने के लिए भारत की एक टीम से मुलाक़ात की.

‘क्वाड’ के ताजा बयान में यूक्रेन पर एक पैरा दर्ज है जिसमें रूस से (नाम लिये बिना) साफ कहा गया है कि वह यूक्रेन की संप्रभुता, भौगोलिक अखंडता और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के नियमों का सम्मान करते हुए अपना आक्रमण बंद करे. इसमें यह भी कहा गया है कि ‘परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी अमान्य’ है.

इस बीच, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री जिना राइमोंदो भारत आईं, और वे केवल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से उनके घर पर होली खेलने के लिए नहीं आईं. उनके एजेंडे में सेमीकंडक्टरों के मामले में साझीदारी भी शामिल है. यह अत्याधुनिक तकनीक के मामलों को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के वाशिंगटन दौरे के दौरान हुई प्रगति के आगे का कदम है.

मोदी सरकार अब अपने ही बनाए गहरे विरोधाभासों से रू-ब-रू है. एक ओर वह पश्चिम विरोधी और रूस समर्थक जनमत के निर्माण को प्रोत्साहित करती रही है, तो अपनी रणनीति इसके बिलकुल उलटी दिशा में निर्धारित करती रही है. यह मोदी के लिए अस्वाभाविक है, क्योंकि वे प्रायः अपनी नीतियों और जनमत को साथ लेकर चलने में यकीन रखते हैं. इसलिए, जल्दी ही एक-न-एक मामले में दिशा-सुधार करना पड़ सकता है. मेरे ख्याल से यह सुधार जनमत के मामले में किया जा सकता है. वर्तमान विरोधाभास चल नहीं सकते.

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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