पिछले साल इस कॉलम के दो लेखों के ‘थैंक यू ट्रंप’-नुमा आसान किस्म के शीर्षक रहे. इसकी वजह यह थी कि ट्रंप की धौंस और धमकियों ने आराम करने वाले भारत को हिला दिया था और उसे अपनी अर्थव्यवस्था, डिफेंस में निवेश पर ध्यान देने; व्यापार के प्रति सोच में जो लापरवाही थी उसे खत्म करने और ‘एफटीए’ (मुक्त बाज़ार समझौते) को अपनाने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन हालात आज ज्यादा मुश्किल हो गए हैं.
अगर मैंने ‘थैंक यू ट्रंप’ कहा था, तो आज उनके साथ मुझे नेतन्याहू और बेशक ईरान की भी किसी हस्ती का नाम जोड़ना पड़ेगा, लेकिन ईरान की किस हस्ती को ‘थैंक यू’ कहूं? जिन्हें कह सकता था वे, आयतुल्ला अली खामेनेई से लेकर अली लारिजानी तक अब नहीं रहे और हम नहीं जानते कि मोजतबा खामेनेई कहां किस हालत में हैं और सच कहें तो इस बड़े लोगों के समूह में किसी और का नाम जोड़ने से पहले आप दो बार सोचेंगे, क्योंकि हत्याओं के इस दौर में कल क्या होगा, यह कौन बता सकता है?
लेकिन सवाल यह है कि इस जंग को शुरू करने के लिए भारत में हम लोग इन तीन लड़ाकों (एक के खिलाफ दो) को शुक्रिया क्यों कहें? कोई भी युद्ध कहीं भी हो, बुरा है, खासकर वह युद्ध तो और भी बुरा है जो हमारे इलाके के इतना पास हो और हमारी एनर्जी की सप्लाई को दबा रहा हो. खाड़ी के देशों में 90 लाख से लेकर 1 करोड़ भारतीय कामगार काम कर रहे हैं, बड़े स्तर पर आपसी निवेश हुआ है और तीन दशकों से रणनीतिक साझेदारी बनती रही है. ऐसे में, क्या हमें इस युद्ध के जिम्मेदार लोगों को शुक्रिया कहने के बजाय उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए, खासकर उन लोगों की जिन्होंने 28 फरवरी से जंग की शुरुआत की?
दरअसल, तस्वीर काफी मुश्किल है. इसे एक तरह से देश में चल रही पक्षपात वाली बहस के नज़रिए से देखा जा सकता है. भाजपा/मोदी सरकार के समर्थक हमें यह समझाना चाहेंगे कि यह युद्ध यह दिखाता है कि फिर से सक्रिय हुआ भारत अब परिपक्व हो गया है; कि मोदी सरकार ने अपने कदम बहुत समझदारी से उठाए हैं. उसने अरब देशों से अपनी दोस्ती मजबूत करने के साथ-साथ ईरान के साथ भी संतुलन बनाए रखा है, जबकि ईरान को खत्म कर रहे अपने औपचारिक रणनीतिक पार्टनरों अमेरिका और इज़रायल की वह चुपचाप तारीफ भी करती रही है. यहां यह बता दें कि मध्य-पूर्व में अब भारत के सात औपचारिक रणनीतिक पार्टनर हैं: यूएई, सऊदी अरब, इजिप्ट, कतर, ओमान, कुवैत और बेशक इज़रायल. ये सारे लड़ाके अब एक साथ हो गए हैं, इसलिए भारत के लिए विकल्प आसान-सा है और, ईरान क्या भारत का साथ छोड़ने का फैसला कर सकता है? यही वजह है कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से गुज़र कर आगे बढ़ रहे हर टैंकर को अपनी चाल की सफलता बताकर ताली बजाई जा रही है.
आलोचक लोग कहेंगे कि ईरान पर हमले की नहीं, तो कम-से-कम इस युद्ध की निंदा न करके हमने अपनी रणनीतिक आज़ादी खो दी है; कि इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना जाना-पहचाना यह सिद्धांत दोहराना भूल गए कि ‘यह युद्ध का युग नहीं है’; कि भारत अमेरिका और इज़रायल पर इतना निर्भर हो गया है कि उसने अपनी निष्पक्षता छोड़ दी है; कि भारत अपने ‘पुराने और भरोसेमंद दोस्त’ ईरान के प्रति इतना एहसान भूलने वाला कैसे हो सकता है? भारत ऑपरेशन सिंदूर को लेकर ट्रंप के दावों का और टैरिफ के मामले में हुई बेइज्जती का जवाब तक नहीं दे पाया. इज़रायल के प्रति भारत जो ज्यादा प्रतिबद्धता दिखा रहा है उसके लिए भाजपा की मुस्लिम विरोधी राजनीति को जिम्मेदार बताया जा रहा है.
वैसे, इज़रायल वाला मामला उलझा हुआ है. भाजपा को मुस्लिम समर्थक तो नहीं माना जाता है, लेकिन सच यह है कि ज्यादातर मुस्लिम दुनिया ईरान विरोधी खेमे में है. खाड़ी के अरब देश मुस्लिम नहीं तो क्या हैं? ‘गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल, जीसीसी’ (खाड़ी सहयोग परिषद) के सदस्य देशों पर ईरानी हमले की निंदा का जो संयुक्त प्रस्ताव 18 फरवरी को रियाद में जारी हुआ उसमें तुर्किये, अजरबैजान और पाकिस्तान भी शामिल थे. इन देशों की कुल मुस्लिम आबादी ईरान की मुस्लिम आबादी से पांच गुना ज्यादा है. इसलिए अगर आप मोदी सरकार के कदम को यहूदी बनाम मुसलमान वाले नज़रिए से देखेंगे तो इस पर यही कहा जा सकता है—धत तेरे की!
मोदी सरकार के समर्थक यही कहेंगे कि जरा देखिए कि इस उथल-पुथल में भारत कितनी मजबूत स्थिति में है, जबकि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ किए गए सुरक्षा वादों और ‘भाई जैसे’ ईरान के प्रति समर्थन दिखाने की उलझन में फंसा है. ये समर्थक कहेंगे कि जरा होर्मुज़ को पार कर रहे टैंकरों को देखिए, कोच्चि में सुरक्षित खड़े ईरानी नौसेना के जहाज को देखिए और यह भी देखिए कि खाड़ी देशों के नेताओं के साथ ही नहीं बल्कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से भी मोदी की फोन पर कितनी बातचीत हो रही है. यह तब है जबकि भारत और इज़रायल ने कोई बड़ा रक्षा समझौता नहीं किया है और हां यह भी देखिए कि एक महीने से ट्रंप ने हमारे खिलाफ कोई कड़ी बात नहीं कही है. जी हां, भारत अपने ‘विराट विश्वगुरु’ रूप में सामने आ रहा है!
वैसे, इसे हम दो और आसान मगर एक-दूसरे के उलट नज़रियों में भी समझ सकते हैं. एक पक्ष ऊपर कही गई बातों को देखकर सोचता है कि मोदी के समय में भारत अपनी हैसियत से ज्यादा करने की कोशिश कर रहा है. दूसरा पक्ष सोचता है कि गांधी और नेहरू के मूल्यों से भारत को जो पारंपरिक ताकत मिली थी उसे मोदी ने कमज़ोर किया है. जरा देखिए कि पहले हमें कितनी गंभीरता से लिया जाता था. अपनी रणनीतिक आज़ादी के साथ ही वह सब खो दिया गया है. इसलिए भारत अपनी हैसियत से कम हासिल कर रहा है.
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दोनों पक्ष गलत हैं और भ्रम में हैं. आज़ादी के बाद के कांग्रेस दौर में और अब मोदी के दौर में भी भारत अपनी हैसियत के हिसाब से ही हासिल करता रहा है, लेकिन उसे अपनी ताकत और प्रभाव को लेकर हमेशा एक बड़ा भ्रम रहा है—पहले अपनी नैतिक, दार्शनिक और वैचारिक ताकत को लेकर; और अब अपनी रणनीतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक ताकत को लेकर.
हर दौर में, अपनी वैश्विक ताकत का ज़रूरत से ज्यादा एहसास एक नेता के आसपास ही बना. पहले नेहरू और इंदिरा गांधी के आसपास और अब मोदी के आसपास. भारत को विश्वगुरु मानने के विचार की भाजपा और आरएसएस की प्रेस में बराबर आलोचना होती रही है.
नेहरू और इंदिरा के समय में भी यही भावना हावी थी. पूरी दुनिया को उपदेश देना हमारा राष्ट्रीय शौक रहा है. यह शौक तब भी था जब हमारी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 92 डॉलर थी (1962 में) और अब भी है जब यह 3,000 डॉलर के करीब है. दोनों पक्ष अलग-अलग तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन ‘विश्वगुरु’ होने का एहसास भारत में दोनों तरफ मौजूद है, बिलकुल धर्मनिरपेक्षता वाली कल्पना जैसा.
आत्म-छवि किसी भी देश की ताकत का मुख्य हिस्सा होती है, लेकिन कई दूसरे पहलू भी अहम होते हैं. पहले हम आर्थिक रूप से कमज़ोर थे, सैन्य खतरों के दबाव में थे, सोवियत संघ के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े थे (जिससे रणनीतिक आज़ादी कम हुई) और लंबे समय तक हमें खाद्य सहायता की ज़रूरत पड़ी. अगर हम 1956 में हंगरी पर, 1968 में चेकोस्लोवाकिया पर और 1978 में कंबोडिया पर सोवियत हमले पर चुप रहे, तो इससे साफ दिखता है कि हमारे पास कितनी रणनीतिक आज़ादी थी. फिर भी हम 1971 में रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर के सामने मजबूती से खड़े हो सके थे. इससे पता चलता है कि सोवियत संघ के साथ समझौते और हरित क्रांति के कारण हमने कितनी रणनीतिक ताकत हासिल कर ली थी. फिर भी, हम अपनी हैसियत के हिसाब से ही काम कर रहे थे.
आज जब हमारी प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 3,000 डॉलर है (मध्यम आय से भी कम स्तर पर) और हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, तब हम अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी कर सकते हैं और साथ ही रूस के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रख सकते हैं; चीन, यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा के साथ संबंधों में संतुलन रख सकते हैं; और कई मध्यम ताकत वाले देश भारत के साथ संबंध बढ़ाने में फायदा देख रहे हैं. इज़रायल हमारा एक बड़ा रणनीतिक पार्टनर है और अरब देश करीबी दोस्त हैं. भारत ‘आइ2यू2’ (इंडिया, इज़रायल, यूएई, यूएसए) समूह के दो ‘आई’ में से एक है और इसके साथ ही उसने ईरान के साथ कम-से-कम नागरिक स्तर के संबंध बनाए रखे हैं.
दुनिया भर में कई तरह की निर्भरताओं के साथ, किसी मध्यम ताकत वाले देश की यही पुरानी सीमाएं होती हैं. रक्षा के मामले में उसे अमेरिका, रूस, इज़रायल और फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ता है; ऊर्जा के लिए रूस पर; सस्ती इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चीन पर; खाद और दालों के लिए कई देशों पर; रोज़गार के लिए खाड़ी देशों और अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता है. इन निर्भरताओं को देखते हुए, भारत की नई ताकत को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह कम होना चाहिए. यही वजह है कि भारत रूस को यूक्रेन पर खुलकर कुछ नहीं कह सकता, अमेरिका-इज़रायल गठजोड़ को ईरान पर नहीं टोक सकता और ईरान से यह सवाल नहीं पूछ सकता कि वह अलग-अलग देशों में उग्रवादी/आतंकवादी समूहों को समर्थन क्यों देता है? यही वजह है कि भारत को एलएसी पर चीन की परेशान करने वाली गतिविधियों को भी सहना पड़ता है.
सभी देशों की तरह भारत भी अपनी ताकत और मौके के हिसाब से फैसले करता है. इसी दायरे में भारत अपने विकल्प चुन रहा है और अपनी हैसियत के मुताबिक कोशिश कर रहा है. संकट का यह दौर अगर हमें रक्षा उत्पादन, ऊर्जा की खोज और खाद में सुधार की तरफ ले जा रहा है, तब भी हम फिर से कहेंगे: ‘थैंक यू ट्रंप, नेतन्याहू, और कोई अनजान ईरानी हस्ती!’
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