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Saturday, 14 February, 2026
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दुनिया का नया खेल: ट्रंप वक्त जुटाने, चीन ताकत बढ़ाने, भारत अपने लिए जगह ढूंढने में जुटा

हर देश अब यह खेल खेलना सीख रहा है. कुछ देश नए सहयोगी ढूंढ रहे हैं या उन देशों की अहमियत समझ रहे हैं, जिनमें पहले उनकी बहुत कम दिलचस्पी थी. इसका सबसे साफ उदाहरण भारत और यूरोप हैं.

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आज की भू-राजनीति में जो खेल चल रहा है, उसे ताकत बढ़ाने और समय हासिल करने का खेल कहा जा सकता है. यह एक बनाम दूसरे का खेल नहीं है. इसमें ऐसा नहीं है कि एक की ताकत बढ़े तो दूसरे की घट जाए, बल्कि ऐसा है कि एक की ताकत बढ़ती है तो दूसरे की उससे भी ज्यादा बढ़ जाती है. आपकी जितनी ताकत है, यानी आपमें फायदा उठाने की जितनी क्षमता है, उतना ही समय आपके हाथ में होता है. थोड़ा भी ताकत रखने वाला देश, चाहे वह छोटा और किनारे पर क्यों न हो, अगर वह एक संप्रभु देश है तो वह भी यह खेल खेल रहा है. अब भारत इस समीकरण में कहां है, यह आगे पता चलेगा.

जरा लेसोथो के बारे में सोचिए. सिर्फ 23 लाख की आबादी वाला यह पहाड़ी देश चारों तरफ से दक्षिण अफ्रीका से घिरा है. बहुत गरीबी से जूझ रहे इस देश में एड्स से पीड़ित लोगों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है और इसकी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय से आधी है, लेकिन इसके पास एक खास औद्योगिक ताकत है. इसे दुनिया का ‘जीन्स केंद्र’ कहा जाता है. यहां सबसे ज्यादा रोज़गार गारमेंट्स उद्योग देता है, जिसमें 50,000 लोग काम करते हैं. यह सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को करता है. उसके निर्यात का मूल्य उसकी जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर है. उसे यह ताकत ‘अफ्रीकन ग्रोथ ऐंड ऑपरचुनिटी एक्ट’ (एजीओए) के तहत अमेरिका में बिना शुल्क के व्यापार करने की सुविधा से मिली.

और 2025 में जब डॉनल्ड ट्रंप आए, तो ‘एजीओए’ को हटा दिया गया. लेसोथो पर 50 फीसदी का ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ लगा दिया गया, जिससे उसकी हालत बहुत खराब हो गई. हालांकि, बाद में टैरिफ घटाकर 15 फीसदी कर दिया गया, लेकिन अब गरीब लेसोथो एशिया के भारत, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे बड़े उत्पादकों से मुकाबला नहीं कर सकता. उसने आधिकारिक रूप से ‘आपदा काल’ घोषित कर दिया है.

हम लेसोथो को ऐसे देशों का उदाहरण मान सकते हैं जिनके पास न ताकत है और न समय. उसकी अर्थव्यवस्था ट्रंप के हटने के लिए तीन हफ्ते तो क्या, तीन साल भी इंतज़ार नहीं कर सकती. इसके बाद अब सबसे ज्यादा ताकत और समय वाले देश को देखें. जी हां, यह देश चीन है. व्यापार में यह विक्रेता (बहुत ज़रूरी खनिज और चुंबक) और खरीदार (सोयाबीन, मक्का) दोनों के रूप में मजबूत स्थिति में है.

सैन्य ताकत के मामले में यह अमेरिका के बराबर पहुंच रहा है, जबकि ट्रंप अमेरिकी सहयोगियों को धमका रहे हैं और चीन के पास वक्त सिर्फ ट्रंप के तीन साल तक का नहीं है. ये साल उसके लिए अवसर जैसे हैं. जब अमेरिका का ध्यान कहीं और है और रणनीतिक दबाव कम है, तो इस दौरान चीन अपनी ताकत इतनी बढ़ा सकता है कि ट्रंप के बाद आने वाला कोई भी नेता उसकी बराबरी नहीं कर पाएगा.

अगर हमारे पैमाने पर लेसोथो सबसे नीचे और चीन सबसे ऊपर है, तो बाकी देशों का क्या? यूरोप के संकट और लेसोथो के संकट को एक साथ तौलना अजीब लग सकता है, लेकिन ऐसा है नहीं. यूरोप को इसका एहसास पिछले शुक्रवार को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में हुआ, जब उसे लगा कि उसकी अपनी ताकत कम है और वह सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है. अब वे सुरक्षा पर खर्च बढ़ाएंगे, लेकिन खुद को सुरक्षित महसूस करने में उन्हें कई साल लगेंगे.

हथियार प्रणालियां, जैसे लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, मिसाइल और 155-मिमी तोप, आप हैमलेज़ या अमेजन से ऑर्डर करके नहीं खरीद सकते. इसके अलावा आपको लड़ने के लिए तैयार नागरिक भी तैयार करने पड़ते हैं. जब पुतिन आपके दरवाजे पर खड़े हों, तब आपके पास वक्त नहीं बचता.

क्या हम चीन को अमेरिका से ऊपर रख सकते हैं? चीन के मुकाबले अमेरिका की ताकत अभी भी ज्यादा है, लेकिन उसके पास समय सिर्फ ट्रंप के तीन साल तक का है. यह दुनिया के निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाज़ार है और इसके पास टैरिफ की ताकत है. इसकी सेना सबसे मजबूत है और उसके सहयोगी पिछले 80 साल से उसके साथ हैं. यूरोप, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान उस पर निर्भर हैं. भारत जैसे उसके रणनीतिक सहयोगियों को भी चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका की जरूरत है.

टेक्नोलॉजी की बड़ी कंपनियां, एआई में आगे रहने की ताकत और दुनिया की रिजर्व करेंसी डॉलर उसके पास है, लेकिन ट्रंप इनमें निवेश करने के बजाय इन्हें खर्च कर रहे हैं. इससे उसकी ताकत घट रही है और समय हाथ से निकल रहा है.

तीन साल बाद वह शायद एक अलग तरह का सुपरपावर होगा. क्या वह चीन से पीछे रह जाएगा? क्या उसके सहयोगी उस पर भरोसा करेंगे? एक नाम याद रखिए—यूक्रेन नहीं, बल्कि ग्रीनलैंड. अमेरिका के सहयोगियों को चिंता होगी कि अगर भविष्य में कोई और ज्यादा अप्रत्याशित नेता आ गया तो क्या होगा.

वैसे, अमेरिका के पास समय सिर्फ तीन साल का ही नहीं, बल्कि अगले चुनाव तक का है, या सिर्फ 10 महीने भी हो सकता है, अगर मध्यावधि चुनाव ने ट्रंप को कमजोर कर दिया. यह एक महत्वपूर्ण बात दिखाता है—लोकतांत्रिक देशों के पास समय की सीमा होती है. अगले एक से पांच साल में इन सभी देशों में चुनाव होंगे.


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इजरायल को बढ़त हासिल है, इसमें कोई शक नहीं. यह बढ़त उसे अपने इतिहास, विचारधारा, ज्ञान, भू-अर्थनीति, सैन्य और खुफिया ताकत से मिली है. यह एशिया और अफ्रीका के किनारे स्थित एक पश्चिमी लोकतंत्र है और अमेरिका, यूरोप और भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी है, लेकिन चुनाव या अदालत के फैसले के बाद बेंजामिन नेतन्याहू को जाना पड़ सकता है. उनके बाद एक अलग तरह का इजरायल सामने आ सकता है. समय की सीमा लोकतंत्र की खासियत है.

लेकिन यह सीमा शी जिनपिंग, व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर लागू नहीं होती. उत्तर कोरिया जैसी पूरी तानाशाही हो या पाकिस्तान जैसी मिश्रित तानाशाही, वहां समय की सीमा नहीं होती. हालांकि, ऐसे देशों में अचानक बदलाव भी हो सकते हैं, लेकिन हम भविष्य नहीं बता सकते.

अब हर देश यह खेल सीख रहा है. कुछ देश नए सहयोगी खोज रहे हैं और कुछ उन देशों को महत्व दे रहे हैं जिन्हें पहले नज़रअंदाज़ करते थे. भारत और यूरोप इसका बड़ा उदाहरण हैं. जब भारत-यूरोप व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होंगे, तब हेडलाइन होनी चाहिए—‘थैंक यू, ट्रंप!’

इस बदली दुनिया ने भारत को ज्यादा खुले और प्रतिस्पर्धी बाज़ार के फायदे देखने के लिए मजबूर किया है. रूस, ईरान, तुर्किये, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी खुद को इस प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहे हैं.

अब सवाल है कि ताकत और समय के पैमाने पर भारत कहां है. सच्चाई यह है कि भारत की ताकत अभी सीमित है. इसका अंदाज़ा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लगा, जब हमारे 32 रणनीतिक सहयोगियों में से बहुत कम हमारे साथ खड़े दिखे.

भारत की सीमित ताकत उसकी अर्थव्यवस्था और बाजार के आकार से जुड़ी है. इसे बढ़ाने का तरीका है—जीडीपी बढ़ाना, आर्थिक सुधार करना और बाज़ार खोलना. चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा तब तक मायने नहीं रखता, जब तक हम दुनिया को यह भरोसा न दिला सकें कि हम अगले दस साल तक हर साल 7.5 फीसदी की दर से बढ़ते रहेंगे. जैसा कि अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने दावोस में कहा, भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में हम अभी भी पीछे रहेंगे. इसलिए भारत की असली ताकत उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.

इसी तरह, भारत की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने के लिए बाज़ार को आयात के लिए खोलना होगा. तभी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान और चीन जैसे देश भारत की वृद्धि में निवेश करेंगे और संबंध मजबूत करेंगे.

भारत के पास समय कितना है? नीतियों की निरंतरता से 2029 के चुनाव तक चिंता की ज़रूरत नहीं है, लेकिन ट्रंप के अगले तीन साल उतार-चढ़ाव भरे होंगे. सबसे बड़ी चुनौती उनकी अप्रत्याशित राजनीतिक प्रतिक्रियाएं होंगी, खासकर जब भारत की संसद चल रही हो.

यह मोदी सरकार के धैर्य और फैसले लेने की क्षमता की परीक्षा होगी, खासकर जब भारत को विश्वगुरु के रूप में पेश किया जा रहा है. अभी इंतज़ार करना होगा और देखना होगा कि सर्जियो गोर अपनी भूमिका कैसे निभाते हैं. इससे यह भी तय होगा कि अमेरिका भारत को पाकिस्तान से अलग नज़र से देखता है या नहीं.

ट्रंप तीन साल और सत्ता में रहेंगे और ये तीन साल उथल-पुथल भरे होंगे.

भारत ने तेज़ी से रणनीति बदली है, पुराने विचार छोड़े हैं, व्यापार समझौते किए हैं, आर्थिक सुधार किए हैं और रक्षा बजट बढ़ाया है. लंबे समय से रुकी खरीद भी शुरू हुई है. इसे ही अपनी ताकत बढ़ाना और अपने लिए समय हासिल करना कहा जाता है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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