Sunday, 26 June, 2022
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मोदी सरकार की हैरत में डालने वाली आदत ही ‘अग्निपथ’ जैसे जरूरी सुधार के लिए बनी चुनौती

मोदी सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि वह चुनावी बहुमत की सीमाओं को स्वीकार करने से कतराती है, जिस वजह से भूमि कानून, कृषि कानून का कबाड़ा हो गया, श्रम संबंधी नियम लागू न हो पाए

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मोदी सरकार की ‘अग्निपथ’ योजना के विरोध का सोशल और मुख्यधारा की मीडिया पर नेतृत्व सेवानिवृत्त सैनिकों का समुदाय और भारत में बेरोजगार युवाओं की खतरनाक रूप से बढ़ती आबादी कर रही है, खासकर हिंदी पट्टी की. हालांकि यह सामान्य समझ से परे है, लेकिन हमें यह भी गौर करना होगा कि ये युवा इस ‘अग्निपथ’ योजना की ‘प्रॉब्लम’ की गुत्थी को अनुभवी सैनिकों से ज्यादा बेहतर तरीके से समझते हैं.

सेवानिवृत्त सैनिकों में से अधिकतर तो इसलिए नाराज हैं कि उन्हें इस योजना की कई गलत बातों में एक यह भी लगती है कि मोदी सरकार सेना को रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए इस्तेमाल कर रही है.

लेकिन युवा इस योजना के बारे में इससे उल्टी बात सोच रहे हैं. वे इसे सेना में रोजगार पैदा करने के नहीं बल्कि रोजगार खत्म करने के उपाय के रूप में देख रहे हैं. यह कैसे? हम यहां यही बताने जा रहे हैं. और हम आगे यह भी बताएंगे कि इस योजना से उनकी नाराजगी की जो मुख्य वजह है वह किस तरह इस योजना को अच्छा स्वरूप देती है.

पहली बात यह है कि बेरोजगार युवा सिर्फ इसलिए इसे बेहतर तरीके से नहीं समझ रहे कि वे अपनी राजनीति को दशकों तक वर्दी धारण कर चुके सम्मानित, शुभेक्षु वरिष्ठों के मुक़ाबले बेहतर जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे राजनीति में आकंठ डूबे और ध्रुवीकृत क्षेत्र से आते हैं. और वे यह भी जानते हैं कि रोजगार बाज़ार किस कदर निराशाजनक है. वे देख रहे हैं कि वे जहां रहते हैं वहां अवसर शून्य हैं और दूर के जिन स्थानों में अवसरों की बाढ़ है वहां के रोजगारों के लिए उनके पास हुनर नहीं है. रेलवे हो या राज्य सरकारें, या पुलिस, तमाम सरकारी नौकरियों में रोजगार की आजीवन सुरक्षा और बेहतर वेतन की गारंटी है. सेना की नौकरी काफी हद तक सबसे अच्छी है.


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इन युवाओं को इस आधार पर मत आंकिए के वे ‘लफंगों जैसे दिखते हैं’, ट्रेनें जलाते हैं, पुलिस से उलझते हैं. वे भी उतने ही नेक हैं और हमारी सहानुभूति के उतने ही हकदार हैं जितने वे लाखों सुशिक्षित युवा हैं, जो यूपीएससी की गिनती की नौकरियों के लिए मेहनत करते रहते हैं और फलते-फूलते ‘कॉम्पटीशन एकेडमी’ उद्योग में साल-दर-साल पैसे झोंकते रहते हैं.

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साधन और शिक्षा से कमजोर, सिर्फ मैट्रिक पास युवाओं के लिए सेना में भर्ती की रैली वही महत्व रखती है, जो महत्व यूपीएससी उन युवाओं के लिए रखती है जिनकी तस्वीरें अखबारों के पहले पन्ने पर यूएनअकादमी, बाइजूज़, विज़न आइएएस आदि आदि के विज्ञापनों के साथ छपती हैं. इन युवाओं की तरह वे भी सेना में भर्ती की तैयारी करते हैं. वे किस तरह तैयारी करते हैं, इसकी रिपोर्ट ‘दिप्रिंट’ की रिपोर्टर ज्योति यादव ने हिंदी पट्टी के एक गांव से भेजी है.

कम साधन वाले इन युवाओं को लग रहा है कि ‘अग्निपथ’ योजना उनसे उनका यूपीएससी छीन रही है. इसे इस तरह से देखिए. मान लीजिए कि यूपीएससी की परीक्षाएं कोविड की वजह से दो साल नहीं हुईं जबकि लाखों युवा उम्मीद के साथ इसकी तैयारी करते रहे. इसके बाद आप यह घोषणा कर दें कि इन अखिल भारतीय सेवाओं में केवल चार साल के लिए नियुक्ति की जाएगी और नियुक्त लोगों में से 25 फीसदी को ही पूरे सेवाकाल के लिए रखा जाएगा.

इसके अलावा, तुलना में समानता लाने के लिए आप सिविल सेवाओं के लिए अधिकतम उम्र सीमा भी कम कर देते हैं ताकि इनमें युवा खून का संचार हो. अब दो साल से तैयारी कर रहे युवाओं की बदकिस्मती है कि वे इतने उम्रदराज हो गए कि इन सेवाओं के काबिल नहीं रह गए. जाहिर है, इसी वजह से सरकार ने ‘अग्निपथ’ योजना में पहला संशोधन किया है और ‘सिर्फ एक बार’ के लिए अधिकतम उम्र सीमा 21 से बढ़ाकर 23 साल कर दी है. यूपीएससी के मामले में ऐसी छेड़छाड़ की गई होती तो शायद उन क्षेत्रों में इससे बड़ा उपद्रव भड़क जाता. और आप जानते ही हैं कि तब हमारे मध्य-/उच्च मध्य-/उच्च वर्गों का जनमत उनके पक्ष में उमड़ पड़ता. और विरोध प्रदर्शन शायद 1990 के मंडल विरोधी आंदोलन, आत्मदाह आदि से भी बड़ा और गंभीर हो जाता. और तब, टीवी चैनलों के प्राइम टाइम और सोशल मीडिया (जिसे मोदी सरकार हम जैसों से ज्यादा गंभीरता से लेती है) उस पर जो ‘डिबेट’ चलते उनके सुर आज के उनके सुर से कहीं ज्यादा तीखे होते.

न तो मैं ‘अग्निपथ’ विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन कर रहा हूं; और न इस योजना को लेकर उभरी चिंताओं को बिना सोचे-समझे, कुलीनों की तरह खारिज कर रहा हूं. भारत के लिए ये दुखद, खतरनाक चेतावनी है कि जनसंख्या के आज के स्वरूप का जो लाभकारी पहलू है वह एक त्रासदी के रूप में बर्बाद हो रहा है, क्योंकि करोड़ों युवा सरकारी नौकरी को खुदा की नेमत के रूप में देखते हैं.

कोई भी सरकार इतनी नौकरियां नहीं पैदा कर सकती. सेना में तो निश्चित ही नहीं, जिसका बजट और जिसकी बैलेंसशीट पहले ही उसके ‘एचआर’ महकमे के लिए एक आपदा जैसी होती है. ‘अग्निपथ’ योजना में चाहे जितनी खामियां हों, हमारी सेना को आमूलचूल सुधार की जरूरत है. लेकिन हमें इन नाराज युवाओं की चिंताओं को भी समझने की जरूरत है.
सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैनिकों ने इस योजना को सेनाओं की कीमत पर रोजगार पैदा करने की तरकीब के तौर पर देखकर बुनियादी भूल की है. मामला उल्टा है. भारत ने पिछले दो साल से भर्ती की कोई रैली नहीं की है इसलिए करीब 1.3 लाख का ‘बकाया’ जमा हो गया है. यह कोविड से पहले सेना की ताकत की करीब 10 फीसदी की कटौती है.

गणित यह है. चूंकि हर साल करीब 45,000 ‘अग्निवीर’ भर्ती किए जाएंगे (पूर्ण सेवाकाल के लिए भर्ती की रैलियों में 60,000 तक की भर्ती हुआ करती थी), और उनमें से केवल एक चौथाई को चार साल बाद ही सेवा में रखा जाएगा, इसलिए यह ‘बकाया’ बढ़ता ही जाएगा. मामूली हिसाब से ही साफ हो जाएगा कि हर साल 50 से 60 हजार के बीच सैनिक सेवानिवृत्त हो रहे हैं तो इस दर से वर्ष 2030 तक सेना में कोविड से पहले की संख्या के मुक़ाबले 25 फीसदी कम सैनिक रह जाएंगे.

यह जानबूझकर की जाने वाली कटौती है और इसका जो अपेक्षित नतीजा निकलेगा वह दुनिया भर में जो चल रहा है उसके अनुरूप ही होगा. अमेरिकी सेना ने अपने सैनिकों की संख्या में भारी कटौती की है और आगे भी कर रही है, और इससे बचे डॉलर को दूर से मार करने वाले हथियारों और मशीनों से की जाने वाली खुफियागीरी पर खर्च कर रही है. ‘अग्निपथ’ को परिष्कृत, नया रूप और नाम देकर फिर पेश किया जा सकता है. ऐसा ही कुछ करने की जरूरत है.

रोजगार पैदा करने के निरर्थक तमाशों के विपरीत, ‘टूअर ऑफ ड्यूटी’ योजना रोजगार, वेतन तथा पेंशन बिलों में कटौती करती है. इस तरह बचे पैसे से ड्रोन, मिसाइल, लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपें, इलेक्ट्रॉनिक साजोसामान खरीदे जा सकते हैं, भविष्य की लड़ाइयों में मौतों में कमी लाई जा सकती है. संसाधन की कमी से जूझती सेना को सही असॉल्ट राइफल हासिल हो सकती है.

प्रतिष्ठित पूर्व सेना कमांडर ले.जनरल एच.एस. पनाग ने अपने लेख में कहा है कि ‘अग्निपथ’ जैसी योजना के पीछे का विचार अच्छा है, जरूरी है और यह सुधारों के बाद कारगर हो सकता है. लेकिन यह मोदी सरकार को एक बार फिर सख्ती से याद दिलाता है कि चुनावों में अपनी लोकप्रियता और वर्चस्व दिखाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे सदमे और हैरत में डालने वाले फैसले थोपने का अधिकार मिल गया है, चाहे वे फैसले कितने भी नेक क्यों न हों. वापस लिये गए कृषि कानूनों, भूमि कानूनों और रोक दिए गए श्रम नियमों के मामलों में उसे यह सबक तो मिल ही चुका है.

किसी भी बड़े बदलाव के लिए लोगों को समझाना-बुझाना पड़ता है, जनमत तैयार करना पड़ता है. औचक बदलावों पर लोग शासक दल के सांसदों और कुछ मंत्रियों तथा दर्जन भर मुख्यमंत्रियों के विपरीत, लाखों की संख्या में गुमनामी की ओट लेकर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं. चाहे मामला रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण का हो, या उद्यमशीलता की नयी शक्तियों को बढ़ावा देने के लिए श्रम और कृषि सुधारों का, या सेना के आधुनिकीकरण का, सभी मामले में आपको अपने विचारों पर लोगों से सहमति लेने के लिए धैर्य से काम लेना पड़ता है. असहमत लोगों को राष्ट्र विरोधी या शैतान बताकर खारिज कर देने की जगह लोगों के बीच और संसद में जोरदार विचार-विमर्श की मंजूरी दीजिए. जिस लोकतंत्र ने आपको असाधारण चुनावी ताकत दी है उसी में इस तरह की सामान्य, जरूरी कवायद की जाती है.
अंत में, हमें इन विरोध प्रदर्शनों के भूगोल और राजनीति, या कहें भू-राजनीति वाले पहलू पर भी गौर करना चाहिए. तो, पहले बात भूगोल की.


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जिन करीब 45 जगहों पर उपद्रव हुए उनमें से ज़्यादातर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, दक्षिण हरियाणा, और राजस्थान की हैं. इन्हें हम भारत के उन क्षेत्रों में शुमार मान सकते हैं जो कम पारिश्रमिक पर काम करने वाले कामगारों का निर्यात करते हैं. उदाहरण के लिए, पता कर लीजिए कि आपके पड़ोस में बेहद कम वेतन पर सिक्युरिटी गार्ड की ड्यूटी दो-दो शिफ्टों में कर रहा शख्स कहां से आया है.

गनीमत है कि यह चिंगारी अब तक दक्षिण में सिकंदराबाद को छोड़कर और कहीं नहीं पहुंची है. दुआ कीजिए कि यही स्थिति बनी रहे. हिंदी पट्टी के विपरीत, विंध्य के पार के राज्यों में जन्मदर, शिक्षा के स्तर, निवेश और रोजगार निर्माण के मामले काफी हद तक व्यवस्थित कर लिये गए हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि वहां के लोग कम देशभक्त हैं.

और अब राजनीति की बात. किसानों के आंदोलन का केंद्र पंजाब था. यह एक ऐसा राज्य है जो मोदी के करिश्मे से लगभग अप्रभावित रहा है, जिसका प्रमाण 2014 के बाद वहां हुए चुनावों के नतीजे देते हैं. आज जो गुस्सा फूटा है वह पूरी तरह उन्हीं राज्यों में दिख रहा है जहां भाजपा/एनडीए की सरकार है, जिन्हें मोदी-भाजपा का मूल आधार माना जाता है. इसलिए यह मान कर चला जा सकता है कि इन नाराज युवाओं में बहुमत मोदी के वफादार वोटरों का ही है.

सो, सबक यह है कि चुनावी लोकप्रियता के इतर भी लोकतंत्र में बहुत कुछ है. आपको अपने समर्थकों से निरंतर संवाद बनाए रखना होता है, खासकर उन आमूल बदलावों के बारे में जिनसे वे डरते हों उनके बारे में बताना होता है कि वे उनके लिए किस तरह लाभदायी हैं. लोगों के अंदर ऐसा कुछ होता है जो उनके ऊपर अचानक थोपे गए बदलावों के प्रति स्वतः परहेज और डर पैदा कर देता है.

पिछले आठ सालों में मोदी सरकार की सबसे बड़ी खामी यह रही है कि वह चुनावी बहुमत की सीमाओं को स्वीकार करने से परहेज करती रही है. इस वजह से भूमि कानून और कृषि सुधार कानून बर्बाद हो गए, और श्रम संबंधी नियम अटक गए. अब अगर सेना के आकार को कम करने और उसके आधुनिकीकरण की कोशिशें भी पटरी से उतर जाती हैं तो यह एक त्रासदी ही होगी.


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