scorecardresearch
Saturday, 31 January, 2026
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टस्विस रिपोर्ट: अब ऑपरेशन सिंदूर बहस को खत्म कर देना चाहिए. यह जानना भी अहम है कि लड़ाई कब रोकनी है

स्विस रिपोर्ट: अब ऑपरेशन सिंदूर बहस को खत्म कर देना चाहिए. यह जानना भी अहम है कि लड़ाई कब रोकनी है

किसी भी युद्ध को जीतने तो क्या, शुरू करने की कुंजी यह होती है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट हो. यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है. यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला.

Text Size:

ऑपरेशन सिंदूर के 88वें घंटे पर भारत ने युद्धविराम की पाकिस्तानी गुजारिश को स्वीकार करने में हड़बड़ी की या बुद्धिमानी की? क्या भारत को लड़ाई जारी रखनी चाहिए थी, और कब तक?

इस तरह के सवाल पिछले सप्ताह तब उभरे जब इस ऑपरेशन पर स्विट्ज़रलैंड की एक संस्था ‘सेंटर फॉर मिलिट्री हिस्ट्री ऐंड पर्सपेक्टिव स्टडीज़’ (CHPM) के लिए उच्च अधिकार संपन्न एक समूह की विस्तृत रिपोर्ट जारी हुई. इस रिपोर्ट में जो निष्कर्ष दिए गए हैं, प्रायः उन सबका भारत में स्वागत किया गया है.

इसकी आप उम्मीद भी करते, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस रिपोर्ट ने यह बताया है कि भारत को इस ऑपरेशन में हवाई सुरक्षा में पाकिस्तान के दावों के मुक़ाबले आधा ही नुकसान उठाना पड़ा. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक युद्धविराम हुआ तब तक भारतीय वायुसेना (IAF) “दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम्स को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा चुकी थी और संघर्ष का समापन पाकिस्तानी वायुसेना (पीएएफ) के प्रमुख अड्डों पर लगातार कई जबरदस्त हमले करके किया. इस तरह, हवाई हमले में अपनी साफ बढ़त हासिल करके भारत ने पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए गुजारिश करने पर मजबूर कर दिया.”

एक मामले में निष्कर्ष देते हुए रिपोर्ट ने कहा है कि “… यह संकेत करने वाले पर्याप्त तथ्य उभरते हैं कि 10 मई 2025 की सुबह तक भारतीय वायुसेना पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना वर्चस्व हासिल करने में सफल हो चुकी थी. इसने उसे दुश्मन के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लंबी दूरी से अपनी मर्जी के मुताबिक हमले करते रहने की स्थिति में ला दिया था…”

अनुमान लगाने के लिए कुछ भी बाकी न छोड़ते हुए रिपोर्ट ने अंत में यह भी कहा है कि इसी के साथ PAF “उस ऑपरेशन को दोहराने की अपनी वह ताकत गंवा चुकी थी जिस ताकत के साथ उसने 7 मई 2025 के अपने ऑपरेशन को सफल बनाया था, क्योंकि वह अग्रिम मोर्चे पर अपने हवाई निगरानी रडार गंवा चुकी थी और उसके ‘अवाक्स’ तथा स्टैंडऑफ वेपन डेलीवरी प्लेटफॉर्मों को S-400 सिस्टम्स से खतरा पैदा हो गया था…”

रिपोर्ट के निष्कर्ष पश्चिमी ‘थिंक टैंकों’ की ओर से आई रिपोर्टों के मुक़ाबले ज्यादा निष्पक्ष और स्पष्ट लगते हैं, क्योंकि वे 6/7 मई की रात पाकिस्तान के जवाबी हमलों की सफलताओं और भारत को हुए नुक़सान के साथ इसके तुरंत बाद IAF द्वारा फिर से वर्चस्व हासिल कर लेने को रेखांकित करते हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि 6/7 मई की रात PAF बहावलपुर या मुरीदके पर भारत के हमलों में बाधा डालने या रोकने में सफल नहीं रही थी. ऐसे में दो सवाल तुरंत उभरते हैं.

एक सवाल तो संदेहवादियों की ओर से उभरता है जो पूछते हैं कि भारतीय हवाई हमले अगर इतने ही जबरदस्त थे तो क्या आप यह कह सकते हैं के IAF ने हवाई क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम कर लिया था जबकि वह अपने ही हवाई क्षेत्र में काफी अंदर से हमले कर रही थी? यह सवाल कुछ घटिया किस्म का और कुछ लोग (इस लेखक समेत) इसे पुरातनपंथी भी कह सकते हैं, क्योंकि आह ज़्यादातर युद्ध और खासकर हवाई युद्ध लंबी दूरी से लड़े जा रहे हैं और आपको दुश्मन के हवाई क्षेत्र के अंदर तो क्या उसके करीब भी जाने की जरूरत नहीं होती. इसलिए यह सवाल अपेक्षाकृत पहेलीनुमा है.

दूसरा और बड़ा सवाल वह है जिसे हमने पहले ही उठाया था कि क्या भारत ने युद्धविराम काफी पहले ही कबूल कर लिया? कई लोग और कई गंभीर किस्म के लोग युद्धविराम को हड़बड़ी में लिया गया फैसला बताते हैं और अफसोस जाहिर करते हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने का जो मौका बड़ी मेहनत से मिला था उसे गंवा दिया गया. इसके जवाब में यह सवाल उठाया जा सकता है कि भारत अपनी जीत को किस तरह परिभाषित करता, और वह जीत कब होती? क्या पीएएफ के संपूर्ण विनाश के साथ होती? या 1971 में ढाका जो हुआ था वैसा कुछ हुआ होता तब जीत मानी जाती? 10 मई की शाम से भारत कहता रहा है कि उसके लक्ष्य पूरे हो गए थे, युद्ध में वर्चस्व उसे हासिल हो गया था और युद्ध कब रोकना है यह उसके हाथ में था. अब इस पर बहस हो सकती है कि युद्धविराम का फैसला बुद्धिमानी भरा था या नहीं या यह मसलों को लटकाए रखने की ठेठ भारतीय आदत का नतीजा था.

यह सवाल सभी युद्ध के साथ जुड़ा बुनियादी सवाल है. किसी भी युद्ध को उसे शुरू करने वाले पक्ष के लक्ष्यों से ही खास तौर से परिभाषित किया जाना चाहिए. यह सवाल अटल बिहारी वाजपेयी ने भी तब उठाया था जब जनवरी 2002 में ऑपरेशन पराक्रम के तहत सीमाओं पर सेना की तैनाती अपने चरम पर थी  और देश का मिजाज पूरी तरह गरम था और वह आर-पार की लड़ाई की मांग कर रहा था. वाजपेयी ने खुद ऐसी धमकी दी थी. लेकिन उस जनवरी के शुरू में, जब वे सत्ता में थे तब मुझे इंटरव्यू देते हुए उन्होंने चिंतन करते हुए कहा आता कि जब उस लड़ाई का इतिहास लिखा जाएगा तब उसे क्या नाम दिया जाएगा.

किसी भी युद्ध को जीतने तो क्या, शुरू करने की कुंजी यह होती है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट हो. यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है. यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला. लक्ष्यों की स्पष्टता न होने के कारण भारत ऑपरेशन पराक्रम में उलझकर रह गया था; सेना को पूरी तरह तैनात कर दिया गया था और वह दस महीने तक डटी रही. अंततः, बिना कुछ किए, थक कर वह छावनियों में लौट गई. क्या भारत ने तब एक मौका गंवा दिया था? यह लंबी बहस का मुद्दा है.

संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले के बाद सेना की तैनाती के शुरुआती सप्ताहों में जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने टीवी पर एक ऐसा नाटकीय भाषण दिया जिससे ऐसा लगा मानो उन्होंने हथियार ही डाल दिया हो. उन्होंने वादा किया कि अब आगे कभी पाकिस्तानी कब्जे वाले किसी क्षेत्र से आतंकवाद फैलाने नहीं दिया जाएगा, और यह भी कहा कि भारत ने जिन 20 भगोड़ों की सूची दी है उनमें से एक को भी पाकिस्तान ने शरण नहीं दी है; कि अगर हमने उन्हें ढूंढ लिया तो उन्हें तुरंत वापस भेज देंगे.

क्या तब वाजपेयी सरकार को उस मौके का लाभ उठाते हुए अपनी जीत का ऐलान करके सेना की तैनाती रोक देनी चाहिए थी? मैं कहूंगा कि सरकार ने वह मौका गंवा दिया. मोर्चे पर दस महीने तक डटे रहने की बेमानी तकलीफ झेलनी पड़ी, गोला-बारूद और बारूदी सुरंगों के कारण भारत और पाकिस्तान के भी करीब आठ-आठ सौ लोगों को जान गंवानी पड़ी. और वाजपेयी-मुशर्रफ वार्ता तथा इस्लामाबाद घोषणा (6 जनवरी 2004) के रूप में जो अंतिम नतीजा हासिल हुआ वह 12 जनवरी के मुशर्रफ के भाषण में किए गए कबूलनामे से कतई बेहतर नहीं था.

आजाद भारत के इतिहास में ऐसे फैसले तीन बार हो चुके हैं, दो बार हमारी ओर से और एक बार प्रतिद्वंद्वी की ओर से. 1999 और 1971 में भारत ने स्पष्ट लक्ष्य तय किए थे— क्रमशः, करगिल में पाकिस्तानी कब्जे वाले पूरे क्षेत्र को मुक्त कराना, और बांग्लादेश को आजाद कराना. 1999 में लड़ाई को एलओसी से आगे बढ़ाने का खासकर सेना की ओर से जो दबाव था उसके आगे वाजपेयी झुके नहीं. 1971 में, पाकिस्तान ने ने पूरब में आत्मसमर्पण कर दिया तो इंदिरा गांधी ने पश्चिमी सेक्टर में तुरंत युद्धविराम की पेशकश कर दी थी. कुछ हलक़ों में यह शाश्वत बहस और अफसोस जारी है कि इंदिरा गांधी ने पश्चिमी सेक्टर में ‘काम’ तमाम नहीं किया. लेकिन इंदिरा गांधी के सामने लक्ष्य स्पष्ट थे और उन्होंने मात्र 13 दिन की लड़ाई के बाद अपनी जीत का ऐलान कर दिया.

तीसरा ऐसा फैसला हमारी कीमत पर किया गया. 1962 में, चीन ने युद्धविराम की एकतरफा घोषणा कर दी थी, और कुछ एनक्लेवों को छोड़ पूर्वी सेक्टर तथा लद्दाख में वे जहां से आगे बढ़े थे वहीं लौट गए. नेहरू और भारत को एक सबक सिखाने का उनका लक्ष्य पूरा हो गया था. वे कभी खत्म न होने वाले युद्ध में नहीं उलझना चाहते थे, खासकर इसलिए कि अपने घर के अंदर ही उन्हें कई संकटों से निबटना था.

मेरे ख्याल से 1962 और 1971 के बीच 1965 की लड़ाई भी हुई, जो बड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण खत्म हुई थी। इस दबाव का दोनों में से किसी पक्ष ने प्रतिरोध नहीं किया. लक्ष्य केवल पाकिस्तान ने तय किया था, कश्मीर को हड़पने का. उसने लड़ाई शुरू की और वह हार गया. भारत ने अपना बचाव पूरी तरह किया. दोनों ने युद्धविराम स्वीकार करके बुद्धिमानी की.

अंत में, हम इतिहास में मुड़कर देख सकते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेना के जनरल जॉर्ज एस. पैटन ने बयान दिया था कि मित्र देशों को “कम्युनिस्टों” को हराने के लिए सोवियत संघ में घुसकर लड़ाई लड़नी चाहिए थी ताकि वे हमेशा के लिए एक खतरा न बने रहें. वैसे, खुद उन्होंने यह बयान उतना नाटकीय रूप से नहीं दिया था जितना उन पर बनी फिल्म दिखाया गया है, लेकिन दस्तावेज़ बताते है कि उन्होंने 7-8 मई 1945 को अंडर-सेक्रेटरी ऑफ वार रॉबर्ट पैटर्सन से किस तरह अपील की थी. अपनी डायरी में 18 मई को उन्होंने लिखा कि वे रूसियों को “बड़ी आसानी से” से हरा सकते थे. 20 मई को उन्होंने अपनी पत्नी को भी यही बात लिखी थी. यह सब अभिलेखागार में दर्ज है.

युद्ध ऐसा गंभीर मामला है जिसे फौजी जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा ज सकता— इस पुरानी सूक्ति पर यकीन करने के कई कारण हैं. इसमें जनरलों के साथ सोशल मीडिया वाले रणनीतिज्ञों को भी जोड़ लेना चाहिए. यह फैसला राजनेताओं पर छोड़ देना चाहिए, जो व्यापक तस्वीर पर नजर रखते हैं. 1945 में अमेरिका के, 1962 में चीन के, 1971 तथा 1999 में भारत को भी ऐसा ही फैसला करना था. ऑपरेशन सिंदूर का लक्ष्य सीमित था— IAF और भारतीय सेना को जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तय्यबा के नौ अड्डों को नष्ट करना था. यह हो जाने के बाद 7 मई को युद्धविराम की पेशकश की गई. चूंकि पाकिस्तान ने लड़ाई जारी रखी इसलिए उनके वायुसेना अड्डों पर हमले किए गए, इनकी तस्वीरें हासिल की गईं, और इसके बाद जीत के साथ युद्ध बंद करने का समय आ गया. युद्ध कब शुरू करना है यह जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह जानना है कि उसे कब और किस तरह बंद करना है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: धुरंधर बेबाक सिनेमा के ‘सॉफ्ट पावर’ की मिसाल है, जो पाकिस्तान को सीधे निशाने पर लेती है


share & View comments