पाकिस्तान के बारे में सुन-सुनकर, पढ़-पढ़कर क्या आप भी थक, परेशान, ऊब, खीझ गए हैं? मैं तो यही कहूंगा कि ऐसा मत कीजिए. बेशक आप खीझ तो सकते हैं, लेकिन ऊबिए मत. पाकिस्तान का इरादा हमें खिझाना तो है ही, और ऐसा करने में वह सफल भी हुआ है, जिसकी शुरुआत 16 फरवरी से हुई जब आसिम मुनीर ने पाकिस्तान की विचारधारा की अपनी व्याख्या प्रस्तुत करने वाला भाषण दिया था.
इस भाषण में उन्होंने अपने उसी विचार को आगे बढ़ाया था, बल्कि उसे एक-दो डिग्री और ऊपर ही चढ़ाया था जिसे उन्होंने टंपा, फ्लॉरिडा में दिए अपने कुख्यात भाषण में पेश किया था. इस भाषण को उस आयोजन में शरीक हुए एक श्रोता ने लीक कर दिया था. वे भारत को चिढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन आप उनके इरादों को कामयाब न होने दें और गुस्से में कोई गलत चाल न चल दें. उनसे बोर होकर या थककर हम रणनीतिक निष्क्रियता में फंस जाएंगे, जो कि खतरनाक साबित होगा.
मुनीर कोई आम शख्स नहीं हैं. उन्हें गंभीरता से लेने के लिए आपको उन्हें पसंद करना जरूरी नहीं है. वास्तव में, आप उन्हें जितना ज्यादा नापसंद करेंगे उतना ही आपको उनकी बातों और कदमों पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें शक की नजर से देखना होगा और उनके बारे में गंभीर विश्लेषण करना होगा. उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि एक फौजी तानाशाह के रूप में वे बड़बोलेपन के प्रति अपने पहले के नेताओं से कहीं ज्यादा घातक रूप से आकर्षित हैं और अपने इरादे का खुलासा कर देते हैं.
उनसे पहले, फील्ड मार्शल मोहम्मद अय्यूब खान, जनरल याह्या खान, जनरल ज़िया-उल-हक़, और जनरल परवेज़ मुशर्रफ, सबने पहले तो भारत के साथ अमन और बातचीत की वकालत की और आखिर में कुल्हाड़ी उठा ली या आम तौर पर शांतिप्रिय और गैर-आक्रामक रहे. मुनीर ने शुरू में ही अपने इरादे साफ कर दिए हैं. हमें उनकी बातों को ध्यान से सुनना और गहराई से विश्लेषण करना चाहिए. वह पाकिस्तान को एक डंपर ट्रक और भारत को एक तेज़ रफ्तार वाली चमकदार मर्सिडीज़ के रूप में क्यों दिखा रहे हैं? जैसे यह डंपर ट्रक भारत को टक्कर मार रहा हो. इसका मतलब क्या है?
भारत में इसका तुरंत यह मतलब बताया गया कि यह आत्म-दया से ग्रस्त, अपने मुल्क को कमतर मानने वाले तथा भारत से ईर्ष्या करने वाले पाकिस्तानी मानव बम की शेख़ी के सिवा कुछ नहीं है. यह तो सच है कि वे भारत से ईर्ष्या करते हैं. और यह सिर्फ ईर्ष्या नहीं है बल्कि भारत से काफी पीछे छूट जाने से उपजी गहरी डाह तथा गुस्से का इजहार है. इस पर गौर कीजिए. जरा कल्पना कीजिए कि कल को आपने अगर अपनी सीमाओं को खोल दिया तब किस ओर से ज्यादा लोग, बल्कि साफ कहें तो ज्यादा मुसलमान सीमा की दूसरी तरफ जाएंगे?
मुसलमानों को भारत में प्रायः इसलिए गलत समझा गया है क्योंकि हम मुनीर से बहुत नाराज हैं और उनसे चिढ़ते हैं. वे पाकिस्तान को जब डंपर ट्रक जैसा बताते हैं तब इससे यह मतलब नहीं निकाला जाता कि हमारा क्या नुकसान हो सकता है बल्कि यह निकाला जाता है कि यह ट्रक खुद को कम नुकसान पहुंचाए बिना ज्यादा कीमती, नाजुक और तेज रफ्तार गाड़ी को कितना ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. 16 फरवरी को मुनीर ने जो भाषण दिया था वह याद है? उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान को सख्त मुल्क बनना होगा. उनकी कल्पना का डंपर ट्रक वही है.
शुरू में मैंने इसे ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले ड़ूबेंगे’ वाली मानसिकता मानने की भूल की थी, जो कि इस उपमहादेश में आम है—खास तौर से कबीलों, जातियों, धर्मों के बीच खूनखराबे के इसके इतिहास के कारण. लेकिन मुझे ज्यादा साफ नजरिया तब हासिल हुआ जब मैंने पाकिस्तान के अहंकारी गृह मंत्री, वहां के क्रिकेट शहंशाह और मुनीर के ‘सांचो पांज़ा’ या ’हनुमान’ माने जाने वाले मोहसीन नक़वी ने इसी कल्पना का एक और रूप दिखाया था.
उन्होंने कहा कि सऊदी अरब के विदेश मंत्री आदिल अल-जुबैर भारत से लौटते हुए इस्लामाबाद में रुके तो वे उन्हें मुनीर से मुलाक़ात कराने ले गए. उन्होंने जब मुनीर को बताया कि भारत ज्यादा बड़ा हमला करने की सोच रहा है, तब मुनीर ने उनसे कहा कि पाकिस्तान का जवाब मर्सिडीज गाड़ी को टक्कर मारने वाले डंपर ट्रक के जैसा होगा. एक टीवी इंटरव्यू में नक़वी ने इस वाकये का काफी मजा लेते हुए जिक्र किया. उनका लहजा और उनके अलफाज यही संकेत देते हैं कि मुनीर और उनके साथी इसे आत्म-निंदा का नहीं बल्कि अपनी ताकत का बयान मानते हैं.
दोनों देशों के बीच का फासला बढ़ता ही गया है और यह जिस रफ्तार से बढ़ रहा है वह मुनीर को खतरे की घंटी जैसी लगती है. इस फासले को वे पाकिस्तान की तरक्की की रफ्तार बढ़ाकर जल्दी पाट नहीं सकते. उनके जीवनकाल में और उनके सचमुच के लंबे कार्यकाल में खोदकर निकाले गए तमाम खनिजों से हासिल खरबों रुपयों के बावजूद भी नहीं. इसलिए वे यही कर सकते हैं कि भारतीय मर्सिडीज की रफ्तार में अड़ंगा डालें. और गंभीर बात यह है कि वे इस प्रोजेक्ट पर अमल करने में जुट गए हैं. अगर इरादा भारत को भटकाने और उसकी रफ्तार कम करने का है, उसके रणनीतिक माहौल को खराब करो. और इस मामले में उन्होंने हमें सोच-विचार करने का कुछ मसाला से दिया है.
अगर हम इसे इस तरह देखें तो यह काफी सरल नजर आता है, लेकिन उनके डंपर ट्रक ने जिस पहली मर्सिडीज को नुकसान पहुंचाया है उसका नाम है भारत-अमेरिका संबंध, जिसे दोनों देशों के आला नेता पिछले 25 वर्षों से 21वीं सदी का सबसे उल्लेखनीय संबंध बताते रहे हैं.
हम डॉनल्ड ट्रंप और उनके झटकों, पीटर नावारो, और स्टीवेन मिलर पर चाहे जितनी तोहमत लगाएं, रिश्ते में खटास के बीज पाकिस्तान यानी मुनीर ने ही डाले. मुनीर ने श्रेय लूटने की ट्रंप की भूख का तुरंत फायदा उठाया, उन्हें नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने की सिफ़ारिश कर डाली, और क्रिप्टो निवेश, साझीदारी, खनन (2000 मेगावाट बिजली के आवंटन के साथ), और भविष्य में तेल तथा अहम खनिजों में हिस्सेदारी की भी पेशकश की. क्रिप्टो के लिए अहम खनिजों की कंपनी के मालिक, ट्रंप के विशेष दूत तथा प्रमुख सलाहकार स्टीव विटकॉफ के बेटे ज़ैक को पहलगाम कांड के बाद चार दिनों के अंदर ही पाकिस्तान में सम्मानित किया गया. जाहिर है, पहलगाम कांड की साजिश बहुत पहले ही तैयार की गई थी.
2011 में अबोटाबाद कांड के बाद अमेरिका के साथ ‘खास’ रिश्ता टूट गया था. तब से पाकिस्तानी हुकूमत अमेरिका की नजर में भारत की बढ़ती अहमियत को लेकर परेशान होती रही है. पाकिस्तान के लिए चीन चाहे जितना भी अहम क्यों न हो, उसका पूरा शासक वर्ग और नयी पीढ़ी अमेरिका परस्त है. मुनीर ने बहुत पहले ही समझ लिया था कि भारत-अमेरिका दोस्ती में नया अड़ंगा लगाना जरूरी है.
काबुल में अब्बे गेट पर 26 अगस्त 2021 को हुई जिस बमबारी में 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे उसे अंजाम देने वाले से करने वाले आतंकवादी मोहम्मद सैफुल्ला को मुनीर ने उसी दिन एफबीआइ को सौंप दिया था जिस दिन ट्रंप पहली बार अमेरिकी काँग्रेस को संबोधित करने वाले थे. यह बताता है कि मुनीर का सोच कितना शातिर है. शैतान को उसका श्रेय दिया ही जाना चाहिए. इस पेशकश ने अमेरिका के साथ उनके और पाकिस्तान के बीच जमी बर्फ को पिघला दिया. ट्रंप ने अपने उस भाषण में केवल एक देश पाकिस्तान का नाम लिया और उसके प्रति आभार जाहिर करते हुए उसकी तारीफ की. डंपर ट्रक ने जो पहली टक्कर मारी वह कामयाब रही.
पाकिस्तान में कुछ लोग, जो मुनीर के इर्द-गिर्द सिमटा समूह ही हो सकता है, इतने तेज तो थे ही कि क्रिप्टो में अपने लिए एक मौका देख लेते. भारत में हमारा वित्तीय, मौद्रिक और राजनीतिक तंत्र स्थापित राष्ट्रीय मुद्रा को चुनौती देने वाले किसी भी विचार से खुद को प्रायः दूर ही रखता रहा है. ट्रंप इसे न केवल चुनौती दे रहे थे बल्कि इसे ‘टेक-ऑटोनोमी’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आधार बनाने की कोशिश कर रहे थे. भारत को इसका कोई मतलब नहीं समझ में आया. पाकिस्तानियों ने न केवल इसे पहचाना, बल्कि क्रिप्टो जमात में अपने एक युवा प्रतिनिधि के रूप में एक सहयोगी को ढूंढ लिया जो युवा विटकोफ के उस व्यवसाय का साझीदार है जिसमें ट्रंप जूनियर की बड़ी हिस्सेदारी है. यह उन बड़ी तथा दुखद विडंबनाओं में शामिल है जिसने तेजरफ्तार, फैशनेबल मर्सिडीज को चुंधिया दिया.
यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि भारत को ट्रंप सरकार के साथ भ्रष्ट लेन-देन वाला रिश्ता बना लेना चाहिए था. न ही कोई यह देख सकता है कि पाकिस्तान ट्रंप से किया अपना कोई वादा पूरा कर रहा है. वे क्रिप्टो वाले सौदों के लिए क्या कुछ दे सकते हैं इसकी कठोर सीमाएं हैं. चीन किसी महत्वपूर्ण खनिज या तेल की खोज पर ‘स्क्वाटिंग’ अधिकार का दावा पेश कर सकता है. और भारत तथा अमेरिका भी किसी समय पुरानी गर्मजोशी नहीं, तो कुछ जुड़ाव का दावा कर सकता है. लेकिन मुनीर और उनके लोग इतने तेज थे कि उन्होंने ट्रंप की कमजोरी को पहली ही भांप कर उनके साथ खेलना शुरू कर दिया, चापलूसी करने लगे, आसान जीत दिलाने लगे और पारिवारिक धन का भी खेल किया. अमेरिका को इस सबकी पेशकश करने से पहले भारत का कोई भी नेता सौ बार सोचेगा. यहां तक कि किसी आतंकवादी को भी निर्धारित प्रक्रिया का दिखावा मात्र करते हुए इतनी आसानी से नहीं सौंप देगा.
भारत आखिर एक चमकदार, तेजरफ्तार, स्वाभिमानी मर्सिडीज है. मुनीर के नजरिए से, उनके डंपर ट्रक के रास्ते में यहां-वहां कुछ ठोकर लग सकते हैं लेकिन वे इसे ड्राइव करके इसे और खुद को मौत के मुंह तक नहीं ले जाने वाले हैं. वे इसे एक सामरिक और रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं.
अगर हम अपने गुस्से को थोड़ी देर के लिए शांत करके ठंडे मन से सोचें पाएंगे कि मुनीर ने हमारे सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक रिश्ते को चोट पहुंचाकर हमारे लिए काफी अशांति पैदा की है, हमें अपने ‘फौलादी दोस्त’ चीन के करीब जाने को मजबूर कर दिया है, और अगली बार किसी बड़े आतंकवादी हमले के जवाब में फौजी कार्रवाई करने को प्रतिबद्ध कर दिया है. बड़ा हमला किस कहेंगे यह फैसला हमें करना है, लेकिन जनता हर हमले को बड़ा मानने की मांग करेगी. हमें ये तीन बातें जरूर ध्यान में रखनी होंगी :
- ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी वे निश्चित ही बाज नहीं आने वाले हैं, बावजूद इसके कि उनके हवाई अड्डे ध्वस्त किए जा चुके हैं. अमेरिका के रुख में आए बदलाव को अपने लाभ के रूप में गिनते हैं और अपने बैलेंस शीट के उतने भाग को मुनाफे के रूप में देखते हैं. उनका सोच चाहे कितना भी टेढ़ा-मेढ़ा क्यों न हो, वे जोश में हैं. कितने जोश में हैं, यह अपने मुल्क के दूसरे सबसे ऊंचे वीरता पुरस्कार (हमारे ‘महावीर चक्र’ जैसे) से खुद को नवाजे जाने के उनके फैसले से साफ है. कोई सेना अध्यक्ष यह पुरस्कार ग्रहण करे, इसे एक मज़ाक के रूप में ही देखा जाएगा. लेकिन मुनीर मानते हैं कि ट्रंप नोबल पुरस्कार पर अपना जितना हक़ मानते हैं उससे भी ज्यादा वे इस वीरता पुरस्कार के हकदार हैं. वैसे, किसी पाकिस्तानी फौजी तानाशाह से आप इसी बुद्धिमानी की अपेक्षा करते रहे हैं.
- अपनी अगली उकसाऊ कारवाई का तरीका और समय वे ही तय कर सकते हैं. उन्होंने डंपर ट्रक वाली जो उपमा चुनी है उससे साफ है कि वे मानते हैं कि उनका तो कोई नुकसान नहीं होने वाला है, भारत का कहीं ज्यादा नुकसान होगा.
- उन्हें समझ में आ गया है कि भारत की घरेलू सियासत में पाकिस्तान किस तरह एक केंद्रीय मुद्दा बन चुका है. याद कीजिए कि पाकिस्तानी डीजी-आईएसपीआर भारत के अल्पसंख्यकों, खासकर सिखों के प्रति किस तरह बार-बार हमदर्दी जाहिर कर रहा था. उसका महकमा सिखों को ध्यान में रखकर किस तरह बारीक प्रचार करता रहा है. जल्दी ही हम विस्तार से उन वेबसाइटों और यूट्यूब प्रोडक्शन का ब्योरा देंगे जिनमें देश के बंटवारे का संशोधनवादी इतिहास प्रस्तुत किया गया है जिनमें मुसलमानों और सिखों को प्रताड़ित के रूप में पेश किया गया है, और बेशक आप यह समझ सकते हैं अत्याचार कौन कर रहा था.
- भारत एक दिन के लिए भी संतुष्ट होकर बैठ नहीं सकता. दो दशकों से हम जो मान बैठे हैं कि हमने पाकिस्तान को काफी पीछे छोड़ दिया है, उस मान्यता को टालने की जरूरत के बारे में हम सोच नहीं सकते. यह हमारे जीवन में वापस लौट आया है. याद रहे, हमने ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित किया है, कभी बंद नहीं किया. अगले मुक़ाबले के लिए तैयारी उसी तरह जारी रहनी चाहिए मानो यह ऑपरेशन जारी है. आगे चुनौतियां कूटनीति, आर्थिक, और घरेलू तथा सैन्य मोर्चों पर पेश आएंगी. हम मर्सिडीज वाली शान, रफ्तार, और चुस्ती से आगे बढ़ें. अगर डंपर ट्रक फिर भी पीछा करता है तब उससे निबटने के लिए और सख्त तरीके अपनाने पड़ेंगे.
इन्हीं सब वजहों से हम पाकिस्तान की ओर से आंखें मूंद कर न तो हम आत्म-संतुष्ट होकर बैठ सकते हैं, न बोर हो सकते हैं, और न खीझ सकते हैं. हम इनका मुक़ाबला किस तरह करते हैं, यह हमारी भावी पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित करेगा.
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