Friday, 30 September, 2022
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टचीन पर मोदी ने कैसे 'नेहरू जैसी' आधी गलती की और सेना में निवेश को नज़रअंदाज किया

चीन पर मोदी ने कैसे ‘नेहरू जैसी’ आधी गलती की और सेना में निवेश को नज़रअंदाज किया

मोदी यह मान बैठे कि चीन अपने आर्थिक हितों को दांव पर लगाकर हमारे लिए सैन्य चुनौती बनने की कोशिश नहीं करेगा, इसलिए प्रतिरक्षा पर खर्चे फिलहाल टाले जा सकते हैं. मोदी यहीं पर नेहरू की भूल के मुकाबले आधी भूल कर बैठे. 

Text Size:

पूर्वी लद्दाख पर चिंताजनक नज़र रखते हुए एक कठोर सच्चाई कह डालना जरूरी है. वह यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले पांच वर्षों में वैसी ही रणनीतिक भूल की जैसी भूल जवाहरलाल नेहरू ने की थी. इसके बाद हम यह भी बताएंगे कि मोदी की भूल नेहरू की 1955-62 वाली भूल की तुलना में आधी क्यों है.

हम एक सोची-समझी धारणा बनाकर चल रहे हैं कि 2014 में मोदी जब पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए तब उन्हें पूरा आत्मविश्वास था कि उनके दौर में कोई युद्ध नहीं होगा. वैसे भी, देशों के बीच बड़ी लड़ाइयों का युग बीत चुका है. हमें मालूम नहीं है कि उनकी आंतरिक मंडली के किसी शख्स ने उन्हें अमेरिकी स्तंभकार टॉम फ्रीडमैन के ‘गोल्डेन आर्चेज’ वाले इस तर्क से परिचित कराया था या नहीं कि जिन दो देशों ने जब से अपने यहां मैकडोनल्ड रेस्तरां हासिल कर लिया तब से वे आपसे में लड़े नहीं. मुद्दा यह है कि एक बार जब आप वैश्विक व्यवस्था के हिस्से बन जाते हैं और देशों के हित अगर एक-दूसरे की बॉन्ड कीमतों से जुड़ जाते हैं तब उनमें लड़ाई नहीं होती.

यह अति सरलीकरण जैसा लगता है इसलिए इस पर विस्तार से बात करें. जब देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के अहम भागीदार बन जाते हैं, जैसा कि भारत और चीन बन चुके हैं, तब सशस्त्र युद्ध के सैन्य से ज्यादा आर्थिक कुपरिणाम होते हैं. एक-दूसरे के इस नये और निश्चित विनाश की आशंका के कारण बड़े देशों के बीच एक नयी स्थिरता कायम हुई. इसके बारे में डॉ. मनमोहन सिंह ने वरिष्ठ संपादकों के साथ एक दुर्लभ बैठक में हम लोगों को बताया था. मैंने उनसे पूछा था कि चीन जब अपने बढ़ते मुद्रा भंडार के बूते अमेरिकी बॉन्डों की भारी खरीद कर रहा है और अमेरिकी घाटे की भरपाई कर रहा है, तब क्या अमेरिका कमजोर नहीं पड़ेगा? अगर चीन ने अमेरिकी बॉन्डों को खारिज करने का फैसला कर लिया तब क्या होगा?

डॉ. मनमोहन सिंह ने एक प्रोफेसर की तरह मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि चीन ने अगर ऐसा किया तो डॉलर धराशायी हो जाएगा और युवान उतना ही मजबूत हो जाएगा. यह चीन के निर्यातों को बर्बाद कर देगा. इसलिए यह नया रणनीतिक संतुलन बना.


यह भी पढ़ें: किन पांच वजहों से पैदा हुआ है दुनियाभर में इस्लाम पर संकट


चूंकि कोई युद्ध नहीं होने वाला है इसलिए रक्षा बजट के लिए ज्यादा पैसे देने की जरूरत नहीं है. और भारत की सेना के भारी आधुनिकीकरण को टाला जा सकता है. यही वजह है कि मोदी के छह साल में जीडीपी में रक्षा बजट का प्रतिशत बढ़ने की बजाए घटा है, बावजूद इसके उस पर दोहरी मार पड़ी है. चुनावी वादे के अनुसार ‘एक रैंक, एक पेंशन’ (ओआरओपी) लागू करने से पेंशन पर खर्च बढ़ा है और इससे भी ज्यादा यह कि मोदी के पहले दो वर्षों के बाद जीडीपी में बढ़त की रफ्तार घटते-घटते अब गिरावट दर्शाने लगी है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

चूंकि हमें मोदी के साथ बैठकर उनके विचारों को समझने की इजाजत नहीं है इसलिए हम केवल उपयुक्त अंदाजा ही लगा सकते हैं कि मई 2014 में उन्होंने यह तय कर लिया था कि पाकिस्तान कश्मीर को हमसे जबरन छीन नहीं सकता.
जिस तरह पाकिस्तान सैन्य शक्ति में भारत की बराबरी नहीं कर सकता, उसी तरह भारत इस मामले में चीन की बराबरी निकट भविष्य में तो नहीं कर सकता. लेकिन भारत पर चीन का आर्थिक दांव भारी व्यापार सरप्लस के कारण ऊंचा और भारी इक्विटी निवेश के कारण गहरा होता गया है. 2017 की गर्मियों तक, जब तक उसने डोकलाम में उलटफेर नहीं किया था तब तक ऐसा ही लगता था कि वह अपना ही खेल खराब करने की मूर्खता नहीं करेगा.

शुरू में मोदी ने पाकिस्तान और चीन, दोनों की तरफ हाथ बढ़ाया. 25 दिसंबर 2015 को बीच यात्रा में रुककर नवाज़ शरीफ से मिलने का अचानक फैसला उनका अपना था, जिसने विदेश मंत्रालय को आश्चर्य में डाल दिया था. उन्हें एहसास था कि मनमोहन सिंह पाकिस्तान में अपने पुश्तैनी गांव की यात्रा इसलिए नहीं कर पाए कि जोखिम से बचने की अपने अधिकारियों की सलाह को वे खारिज नहीं कर पाए.

लेकिन मोदी मनमोहन सिंह नहीं हैं, वे अपनी बात मनवाने का अधिकार रखते हैं और मनमर्जी जहां चाहें वहां जा सकते हैं. लेकिन जल्दी ही उन्हें उसी तरह गलती का एहसास करना पड़ा जिस तरह इंदिरा गांधी के बाद से उनके नौ पूर्ववर्तियों को करना पड़ा था कि पाकिस्तान में असली सत्ता निर्वाचित नेता के हाथ में नहीं बल्कि किसी और के हाथ में होती है.

इसके बाद मोदी ने एक रणनीतिक सुधार किया और पाकिस्तान को शाश्वत शत्रु के खांचे में डाल दिया. यह घरेलू राजनीति के लिए तो बहुत मुफीद साबित हुआ ही, उनके कट्टर समर्थकों और उनके मूल आधार आरएसएस के लिए भी पसंदीदा फैसला रहा. वे बड़े इत्मीनान से यह मान कर चल सकते थे कि पाकिस्तान हमारे लिए कोई सैन्य चुनौती नहीं बन सकता.

दूसरी तरफ, वह घरेलू राजनीति के लिए एक हथियार जरूर बन सकता है. इसलिए उसका इसी तरह इस्तेमाल क्यों न किया जाए. उरी प्रकरण, पुलवामा-बालाकोट इस बात के सबूत थे कि यह राजनीतिक चाल कारगर है. पाकिस्तान मुद्दे ने उन्हें उत्तर प्रदेश (2017) और राष्ट्रीय चुनाव (2019) में अपने पक्ष में लहर पैदा करने में खूब मदद की.


यह भी पढ़ें: ट्रंप भले ही हार जाएं लेकिन अमेरिका में ट्रंपवाद का उभार हो चुका है, यह प्रदर्शन से ज्यादा पॉपुलिज्म पर निर्भर है


चीन के मामले में उन्होंने दूसरा रवैया अपनाया. उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपने प्रदेश गुजरात में आमंत्रित किया, उन्हें यह याद दिलाकर चीन के साथ अपने सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संबंधों की दुहाई दी कि प्राचीन काल में चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भारत में पहला कदम उनके अपने गांव वडनगर के पास समुद्रतट पर रखा था. और संयोग यह भी है कि ह्वेन सांग शी जिनपिंग के शहर श्यान में रह चुके थे. मोदी ने तब यह हिसाब लगाया था कि व्यक्तिगत समीकरण, गहरी दोस्ती, व्यापार और निवेश से होने वाले लाभों का आकर्षण चीनी खतरे को खत्म कर सकता है या उसे कहीं गहराई में दफन तो कर ही सकता है.

लेकिन चीनी सेना ‘पीएलए’ ने लद्दाख के चूमर में एलएसी का उल्लंघन करके साबित कर दिया कि चीन अपनी आदत से बाज नहीं आएगा. लेकिन इधर यह भी अनुमान लगाया गया कि यह शायद शी की मंजूरी के बिना पीएलए के जनरलों की करतूत है. भारत के रणनीतिकार पाकिस्तान से मिले अनुभवों से इतने जले हुए हैं कि उनका यह अनुमान लगाना काफी मुमकिन भी है. लेकिन यह भ्रम जल्दी ही टूट गया, जब चूमर में दुस्साहस करने वाले जनरलों को सज़ा की जगह तरक्की दे दी गई.

इसके बावजूद एक के बाद एक शिखर वार्ताएं चलीं. डोकलाम एक चेतावनी तो थी, मगर वुहान ने फिर इस धारणा को मजबूत किया कि चीन से सीधा सैन्य खतरा नहीं होने वाला है. पाकिस्तान के साथ तो उसकी अपनी कमजोरियां हैं ही. इसलिए सेना पर खर्चों को अभी टाला जा सकता है. लेकिन शायद कोई नयी चिंता उभरी, जिसने रफाल हासिल करने की प्रक्रिया में तेजी ला दी. इसके बावजूद, हासिल किए जाने वाले उन विमानों की संख्या 36 कर दी गई जबकि भारतीय वायुसेना ने न्यूनतम 65 विमानों की मांग की थी और यह मांग भी इसी विश्वास और व्यक्तिगत किस्म की कूटनीति— के बूते की गई थी कि युद्ध की कोई आशंका नहीं है. या अटल बिहारी वाजपेयी की इस कविता की भावना में बहकर की गई कि ‘जंग न हम होने देंगे’. लेकिन यह भारी रणनीतिक भूल थी.

बालाकोट हमला और इसके बाद की झड़पों ने पहली चेतावनी दे दी थी कि भारत ने अपनी बढ़त अपने हाथ से निकल जाने दी है. उदाहरण के लिए, पाकिस्तानी वायुसेना ने भारतीय वायुसेना के मुकाबले ज्यादा दूर तक मार करने वाली ‘बीवीआर’ मिसाइलें हासिल कर ली और हवा में पूर्व चेतावनी देने वाले ‘एईडब्ल्यू’ उपकरणों के मामले में भी भारत की जरूरत से ज्यादा बराबरी कर ली है. ये तो सिर्फ पाकिस्तान के संदर्भ की बातें हैं. हालांकि सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में कुछ तेजी आई लेकिन यह चीन पर मुख्य ध्यान देते हुए नहीं किया जा रहा था. यह तेजी भी 20 अप्रैल से पहले नहीं आई थी, जब तक कि चीनी सेना ने पहले हाथापाई, फिर हिंसा और फिर बड़े पैमाने पर फौजी घुसपैठ करके झटका नहीं दिया. चीन ने ऐसा क्यों किया? उसने अभी ही ऐसा क्यों किया? क्या कश्मीर में फेरबदल और अक्साई चीन फिर से हासिल करने के भारतीय दावों ने ही उसे उकसाया?

यहां पर आकर हम अपने मूल मुद्दे को उठाते हैं कि मोदी ने वैसी ही रणनीतिक भूल की जैसी भूल जवाहरलाल नेहरू ने की थी. मोदी ने यह मान लिया कि अभी युद्ध नहीं होने वाला और चीन अपने आर्थिक हितों को खतरे में डाल कर भारत के लिए खतरा बनने की कोशिश नहीं करेगा. लेकिन हमने इसे नेहरू की भूल के मुकाबले आधी भूल क्यों कहा?
इसलिए कि यह मान लेना ठीक तो है कि कोई पारंपरिक युद्ध लगभग असंभव है. इसलिए मोदी आधे सही माने जा सकते हैं. लेकिन शांति की गारंटी जिन वजहों से मानी जा रही है वह सही नहीं है. भारत को यूपीए राज में एक दशक तक अनिश्चय में झूलते रहने के बाद रक्षा पर खर्चों को बढ़ाना पड़ा. हमारे इस कठिन क्षेत्र में शांति की शर्त यह है कि पाकिस्तान को दंड देने की ताकत बनाए रखी जाए और चीन को चेतावनी देने के तेवर बनाए रखे जाएं. लेकिन सेना पर निवेश में कटौती के कारण ये दोनों रणनीतियां कमजोर पड़ीं.

चीन तो हमेशा नज़र गड़ाए ही रहा है. वाजपेयी-ब्रजेश मिश्र की दबाव की कूटनीति के सिद्धांत को याद कीजिए. इसमें पाकिस्तान पर भारत के निर्णायक और दंडात्मक फौजी वर्चस्व की नीति भी जुड़ी थी. उनका यह भी कहना था कि दबाव की कूटनीति तभी कारगर हो सकती है जब युद्ध का खतरा इतना वास्तविक हो कि हम उसे सच्चा मान लें.

संभव है कि इसी वजह से चीन हमारे साथ लद्दाख में यह सब कर रहा है. वह दबाव की कूटनीति के लिए अपनी सैन्य बढ़त का लाभ उठा रहा है. भारतीय सेना ने कैलाश क्षेत्र में जो साहसिक जवाब दिया उसने दिखा दिया है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है. लेकिन हाल के रक्षा समझौते के बाद जब हम अमेरिका से जाड़ों के लिए जरूरी पोशाकों की आपात खरीद करते हैं, तब हम अहम रूप से गलत आकलन करते हुए फिर एक भारी भूल कर रहे होते हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मोदी-शाह के अश्वमेध यज्ञ में NDA बलि चढ़ाने वाले घोड़े की तरह है जिसके सहारे वो भारतीय राजनीति की नई परिभाषा लिख रहे हैं


 

share & View comments