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Saturday, 28 March, 2026
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खाड़ी युद्ध ने भारत की कमजोरियां उजागर कीं, अब राष्ट्रीय हित में आत्ममंथन का वक्त है

सरकार कड़वा सच क्यों नहीं बोल सकती, इसे समझना बहुत आसान है. तमाम युद्धों की तरह यह युद्ध भी जब रुक जाएगा तब भी भारत के हित विजेता के साथ भी जुड़े होंगे और हारने वालों के साथ भी.

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इस कॉलम में ‘पाकिस्तान से आज़ादी’ की बात करने के सिर्फ दो महीने बाद मैं फिर से उसी देश पर लिख रहा हूं, इसलिए इसकी वजह बताना ज़रूरी है. इसके दो कारण हैं.

पहला, इस हफ्ते पाकिस्तान का ज़िक्र थोड़ा होगा. जल्द ही हम उस मुद्दे पर आएंगे जो ज्यादा ज़रूरी है और भारत के हित से जुड़ा है. इसके लिए हमें खुद को देखना होगा. इससे फायदा हो सकता है और हम अपनी आलोचना भी कर सकते हैं, अगर हम ऐसा कर पाए. हो सकता है आपको यह सब अच्छा न लगे, और आप चाहें कि हम सिर्फ चेतावनी देने वाली बातें करें. फैसला आपका है.

दूसरा कारण यह है कि लोग इस बात पर शोर मचा रहे हैं कि पाकिस्तान अब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में शामिल है और हम नहीं हैं. ऐसा क्यों? क्या हम महत्वहीन हो गए हैं? क्या हमने अपनी नैतिक ताकत खो दी है?

विपक्ष सरकार पर हमला करेगा, क्योंकि उसका काम ही यही है. दिलचस्प बात यह है कि सरकार भी इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रही है. इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि हम पाकिस्तान जैसे ‘दलाल’ देश नहीं हैं.

सरकार कड़वी सच्चाई क्यों नहीं बोल सकती, इसे समझना आसान है. सच यह है कि भारत इस मामले में पूरी तरह तटस्थ नहीं है. वह अरब-इज़रायल-अमेरिका (वर्णमाला के क्रम में) के साथ है. ईरान के साथ भी भारत के अहम हित जुड़े हैं, इसलिए वह उसके खिलाफ नहीं जा सकता, लेकिन खुलकर उसके साथ भी नहीं खड़ा हो सकता. मामला जटिल है. हर युद्ध की तरह, जब यह युद्ध खत्म होगा, तब भी भारत के हित जीतने वाले और हारने वाले दोनों से जुड़े रहेंगे.

इसी वजह से चीन ने कभी बीच-बचाव की कोशिश नहीं की और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे को उठाया. वे समझदार हैं. वे सिर्फ देख रहे हैं कि उनके प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे को कैसे कमजोर कर रहे हैं. चीन पुरानी भावनाओं में नहीं फंसा है. वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है. जिसको ‘ग्लोबल साउथ’ कहा जाता है (26 अगस्त 2023 के कॉलम में मैंने इस शब्द का गलती से इस्तेमाल किया था), उसमें उसने ‘बीआरआई’ (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) के जरिए लगभग 32 देशों को अपने साथ जोड़ लिया है, उन्हें ऊंचे ब्याज पर कर्ज देकर.


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चीन शांत है. अगर भारत को मध्यस्थता के लिए बुलाया भी जाए या वह सिर्फ संदेश पहुंचाने का काम करे, जैसा अभी पाकिस्तान कर रहा है, तब भी चीन ईर्ष्या में कोई कदम नहीं उठाएगा. उसे यह सब मज़ाक जैसा लगेगा क्योंकि वह जानता है कि भू-राजनीति भावनाओं का खेल नहीं है. यह धैर्य और लंबे समय की योजना का मामला है. ताकत बनाने में समय लगता है और पूरा ध्यान उसी पर देना पड़ता है.

अब पाकिस्तान पर थोड़ी बात. पाकिस्तान ने एक मामले में भारत से शुरुआत में ही बढ़त ले ली—रणनीतिक स्पष्टता में. हालांकि, इतिहास बताता है कि यह अक्सर उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ. उसने अपनी पूरी रणनीतिक ताकत एक ही लक्ष्य पर लगा दी—भारत को कमज़ोर करना, अगर खत्म नहीं कर सके तो.

कम्युनिज्म से लड़ने के लिए वह 1950 के दशक में ही अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गया. नेहरू ने इसे गंभीरता से लिया और फील्ड मार्शल अय्यूब खान से कहा कि हिमालय के उस पार ‘कम्युनिस्ट चीन’ से दोनों देशों को खतरा है. उन्हें उम्मीद थी कि पाकिस्तान भारत का साझेदार बनेगा, लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान चीन के करीब चला गया और सीमा तय करने में लग गया, जिसमें ज्यादातर सीमा कश्मीर के उस हिस्से से गुजरती थी जो उसके कब्ज़े में है.

इसका नतीजा यह हुआ कि 1960 के दशक तक पाकिस्तान अमेरिका और चीन के साथ जुड़ गया, जिसका मकसद सैन्य ताकत से कश्मीर हासिल करना था. इसी सोच से उसने 1965 की लड़ाई लड़ी, लेकिन हार गया. देश के अंदर असंतोष बढ़ गया. आखिरकार अय्यूब को सत्ता छोड़नी पड़ी और जुल्फिकार अली भुट्टो चुनाव हार गए. ‘गलत’ पक्ष (अवामी लीग) ने बहुमत हासिल किया और पाकिस्तान के पहले असली चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया गया.

फिर पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के साथ अपने रिश्तों का इस्तेमाल किया और जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर को गुप्त रूप से चीन ले गया. इससे दुनिया भर में हलचल मच गई, भारत भी चौंक गया. उस समय पाकिस्तानी नेता याहया खान और भुट्टो खुद को बहुत सफल मान रहे थे, लेकिन पांच महीने के भीतर ही देश का आधा हिस्सा अलग हो गया.

असल में उस समय पूर्वी पाकिस्तान आबादी में पश्चिम पाकिस्तान से आगे था. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. कराची में भारत के महावाणिज्यदूत मणिलाल त्रिपाठी ने एक पाकिस्तानी अखबार के संपादक को मज़ाक में चिट्ठी लिखकर कहा कि क्योंकि पाकिस्तान की जनता ने ही पाकिस्तान के विचार को खारिज कर दिया है, इसलिए बचे हुए देश का नाम बदल देना चाहिए: “हम सिंधुदेश नाम सुझाते हैं”. यह उस लेख के जवाब में था जिसमें कहा गया था कि भारत को खुद को इंडिया नहीं कहना चाहिए क्योंकि “बंटवारे के साथ उसका अस्तित्व खत्म हो गया” और उसे सिर्फ भारत कहना चाहिए.

पाकिस्तान ने 1979 में फिर ऐसा ही कदम उठाया और अफगानिस्तान में सोवियत संघ का विरोध करने के लिए अमेरिका के साथ जुड़ गया. इससे उसे फायदा भी मिला, लेकिन लाखों शरणार्थी आए और जिहादी संस्कृति फैल गई. पाकिस्तान या ‘एफ-पाक’ में पनपे जिहादियों ने अमेरिका में ट्विन टावर्स पर हमला किया. इसके बाद 2001 में पाकिस्तान फिर अमेरिका का ‘मजबूत साझेदार’ बना और अगले दशक तक 22 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद पाता रहा, जब तक ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद में नहीं ढूंढ लिया गया और मदद रुक नहीं गई.

इसके बाद उसके पास क्या बचा? जिहादी संस्कृति, जो उसकी अपनी सत्ता के लिए खतरा बनी; गहरे और हिंसक धार्मिक विभाजन; आत्मघाती हमलों का चलन और अब अफगानिस्तान से तालिबान के खिलाफ खुली लड़ाई.

1954 के बाद के इन 70 वर्षों में जिन चार बड़े कदमों ने दुनिया का ध्यान खींचा, उन्होंने पाकिस्तान को और कमजोर और गरीब बना दिया; देश की एकता कमजोर हुई; उसके सबसे लोकप्रिय नेता को जेल में डाल दिया गया और एक कठपुतली जैसा फील्ड मार्शल सत्ता संभाल रहा है. अगर वे सोचते हैं कि वे फिर कोई करिश्मा कर रहे हैं, तो उन्हें मुबारक. पाकिस्तान किसिंजर की उस मशहूर बात को सच साबित करता दिखता है कि अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक हो सकती है, लेकिन उससे दोस्ती घातक हो सकती है.

भारत को अपनी सीमाओं को मजबूत करने और दुश्मनों में डर पैदा करने की ताकत बनानी होगी. यही इस क्षेत्र में शांति की गारंटी हो सकती है.

यह पाकिस्तान के लिए भी बेहतर होगा क्योंकि डर पैदा करने की पारंपरिक ताकत ही उसे खुद को नुकसान पहुंचाने से रोक सकती है. इस पूरे तर्क का सार यह है कि पाकिस्तान का ‘करिश्मा’ रणनीतिक नहीं बल्कि अल्पकालिक है और उन्हें यह नहीं पता कि आगे क्या करना है. बिना राष्ट्रीय ताकत के कोई सामरिक कदम रणनीतिक नहीं बन सकता.

अब हम आत्म-परीक्षण करेंगे और अपनी आलोचना भी करेंगे. सभी रणनीतिक स्वायत्तता की बात करते हैं, लेकिन भू-राजनीति कमजोर दिल वालों के लिए नहीं होती और न उनके लिए जो बड़े देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर हों.

यह नई बात नहीं है. हमेशा से ऐसा रहा है और इसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को कमज़ोर किया है. खाने-पीने की चीज़ों से लेकर हथियार, पूंजी, टेक्नोलॉजी, रोजगार और ईंधन तक भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं रहा है और जब तक हम खुद की कमजोरियों को नहीं पहचानेंगे, तब तक आगे भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाएंगे. नैतिक ताकत और नरम ताकत जैसी बातें कमजोर देशों के लिए होती हैं.

इस युद्ध ने हमारी कई कमजोरियों को सामने लाया है. इनमें से पांच का ज़िक्र किया जा सकता है. पहली कमज़ोरी ऊर्जा है, जिससे खाद और महंगाई जुड़ी हैं. चौथी कमजोरी सैन्य सामान और टेक्नोलॉजी है. दुनिया में युद्ध का माहौल होने पर इनकी मांग बढ़ जाती है, इसलिए यह चुनौती और कठिन हो जाती है. पांचवीं कमजोरी बेरोज़गारी है. लगभग 1 करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं और विदेश से आने वाले पैसे में उनका 40 प्रतिशत योगदान है. करीब 10 लाख भारतीय अमेरिका में काम करते हैं. ऐसे में क्या भारत के पास यह कहने की पूरी स्वतंत्रता है कि इस युद्ध में क्या सही है और क्या गलत?

हर देश को खुद को मजबूत बनाना पड़ता है और रणनीतिक स्वतंत्रता हासिल करनी पड़ती है, जैसा चीन ने किया. इसमें हमारी अलग-अलग सरकारें सफल नहीं रही हैं. अगर भारत को ईरान, वेनेजुएला और रूस से तेल खरीदने के लिए एक महाशक्ति द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का ध्यान रखना पड़ता है, तो यह हमारी कमजोरियों को दिखाता है. अगर हम हर दिन खुद की तारीफ करने के बजाय कुछ समय सोचें, तो हमें ज़रूरी चेतावनी मिल सकती है. अगले दो दशकों में ईमानदारी, सच्चाई स्वीकार करना, हकीकत को समझना और मेहनत ही हमें मजबूत बना सकती है. हमें आपस में प्रतिस्पर्धा करने की ज़रूरत नहीं है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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