यह अनुमान लगा लेना आस्था की एक ऊंची छलांग ही होगी कि यह कॉलम पढ़ने वाले हर पाठक ने आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ और सिद्धार्थ आनंद की 2023 की ‘पठान’ भी देखी ही होगी. ‘पठान’ शायद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों में शुमार है. और ‘धुरंधर’ भी इसी राह पर तेजी से चल पड़ी दिखती है. इसकी दूसरी पारी शुरू होने वाली है. पहले ही घोषणा की जा चुकी है कि इसकी अगली कड़ी 19 मार्च 2026 को रिलीज की जाएगी. बहरहाल, मैं यह मान कर चलता हूं कि हर कोई फिल्में नहीं देखता, लेकिन उक्त दो फिल्मों पर चर्चाओं, बहसों से कई लोग जरूर वाकिफ होंगे.
‘पठान’ को लेकर चर्चाएं फिल्म के उस दृश्य पर केंद्रित रही थीं जिसमें दीपिका पदुकोणे पहली बार भगवा रंग की बिकिनी में नजर आईं और बैकग्राउंड में ‘बेशर्म रंग’ गाना चल रहा था. नाराज दर्शकों ने उनकी बिकिनी के रंग को कहीं और से जोड़ दिया और उस दृश्य को हटाए जाने की मांग की. या क्या उन्हें बिकिनी पर कोई आपत्ति नहीं थी, बस वह किसी और रंग की होनी चाहिए थी? बहरहाल, वह विरोध जल्दी ही ठंडा पड़ गया.
‘धुरंधर’ रिलीज़ होने के करीब दो सप्ताह बाद भी देश भर के सिनेमाघरों में हाउसफुल चल रही है. कई लोग बार-बार इसे देखने के लिए सिनेमाघरों का रुख कर रहे हैं, लेकिन यह फिल्म एक भारी विवाद में घिर गई है. और यह विवाद केवल सोशल मीडिया पर नहीं चल रहा है. मुख्यधारा वाली मीडिया में इसके आलोचकों से लेकर, अखबारों में छापे गंभीर लेख इसे सरकार द्वारा प्रायोजित, भाजपाई प्रोपगंडा, जंगबाजी, इस्लामोफोबिया, या इन सबका मिश्रण बता रहे हैं.
मैं केवल उन दो फिल्मों की बात कर रहा हूं जो सियासत, राष्ट्रवाद, और धर्म को समेटती चलती हैं. ब्योरों का फटाफट जायजा यह अंदाजा दे देगा कि क्यों एक फिल्म को एक फंतासी, मनोरंजक होने के बावजूद कुल मिलाकर साफ-सुथरी फिल्म कहा गया. इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसमें VFX स्टंट था, मनुष्य की अच्छी-बुरी प्रवृत्तियां जेट-पैक पर सवार होकर आसमान में एक-दूसरे का पीछा करती दिखीं. लेकिन आप कोई सवाल मत उठाइए; बुरा न मानो, यह तो आखिर एक फिल्म ही है!
सियासत, राष्ट्रवाद, और धर्म— ध्रुवीकरण वाले इन तीन मुद्दों पर ‘पठान’ कतरा कर निकल जाती है. लेकिन पहले ब्योरों की बात करें:
- सियासत की बात करें तो हालांकि यह फिल्म भारत-पाकिस्तान टकराव के बारे में है लेकिन सियासत से बिलकुल मुक्त है. प्रतिद्वंद्वी खुफिया एजेंसियों के दो अच्छे व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं. या इसका करीब छठा भाग भारतीय है. यहां आप बेशक यह जानते हैं कि मैं ‘व्यक्तियों’ को एक रूपक के तौर पर इस्तेमाल कर रहा हूं, और मैं दीपिका पदुकोणे के बारे में ऐसा कहने की हिम्मत तो नहीं ही कर सकता हूं. संक्षेप में कहें तो इसमें भारत-बनाम-पाकिस्तान वाला मामला नहीं था.
- राष्ट्रवाद को इसमें पूरी तरह दूर रखा गया. केवल इतना ही नहीं था कि ‘भारत-पाकिस्तान पार्टनर’ बन गए थे, बल्कि शाहरुख खान ने जिस पात्र की भूमिका निभाई उसका चरित्र अस्पष्ट रखा गया. उसे अफगानिस्तान के उस गांव के एक परिवार द्वारा परवरिश करते हुए दिखाया गया है जिस पर अमेरिका बम बरसा रहा है. बुरे लोग अमेरिकी हैं (क्या हमेशा ही वे ऐसे नहीं रहे हैं?), और बाकी हर कोई भुक्तभोगी है. भारत एक ऐसे आतंकवादी खतरे का सामना कर रहा है जिसमें उसकी लगभग पूरी आबादी खत्म हो सकती है. इस विनाशकारी खतरे की काट केवल पुतिन के रूस के पास है और वह मॉस्को में किसी भंडार में रखी हुई है. अब, एक पाकिस्तानी और एक भारतीय जासूस मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं. जाहिर है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जासूस शाहरुख खान जैसा दिखता है और दूसरी दीपिका जैसी दिखती है. और भारत को खतरा किसी पाकिस्तानी या मोगांबो अथवा शाकाल के किसी काल्पनिक मुल्क से नहीं है, बल्कि एक भारतीय गद्दार, एक एजेंट की ओर से है जो बदमाश बन गया है. यह थीम किसी मॉडल यूएन (एमयूएन) इलीट तबके की कसौटी पर खरी उतर सकती है.
- धर्म से इतनी दूरी बनाए रखी गई है कि आज तक हम नहीं जान पाए हैं कि ‘पठान’ क्या था, उसका नाम क्या था. फिल्म में कोई भी किसी भी धर्म के बारे में कड़वी बात नहीं कहता, इसकी जरूरत भी नहीं पड़ती. आतंकवादी केवल व्यक्तिगत बदला लेना चाहता है. धर्म, राष्ट्रवाद या विचारधारा से उसे कोई मतलब नहीं है.
‘पठान’ में इन तीनों का जो मिश्रण पेश किया गया है वह उदारवादियों और राष्ट्रवादियों, दोनों के लिए बहाने उपलब्ध कराता है, मुंह छिपाने की जगह मुहैया कराता है. दोनों ही इस फिल्म को एक अच्छी, हल्की-फुल्की, ‘पैसा वसूल’ फिल्म कहकर खारिज कर सकते हैं. ‘धुरंधर’ इसकी ठीक उलटी है. यही वजह है कि इसे बॉलीवुड के अब तक के इतिहास में बनीं सबसे महत्वपूर्ण, बड़ी राजनीतिक फिल्मों में गिना जा रहा है. आइए, ‘धुरंधर’ को भी हम इन तीन मुद्दों की कसौटियों पर कसकर देखें. सियासत के मामले में इसकी स्थायी थीम यह है कि ‘हमेशा पाकिस्तान की ओर से आने वाले’ आतंकवादी खतरे का जवाब देने के मामले में भारत का इतिहास 2014 के पहले और उसके बाद के दो हिस्सों में बंटा है. वास्तव में, इसका एक पात्र सान्याल (अजित डोभाल मानिए) कहता है कि ‘दुनिया में जहां कहीं भी आतंकवाद है उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है’. ‘धुरंधर’ की थीम पूरी तरह से राजनीतिक है. यह मोदी-डोभाल दौर का गुणगान है. और अभी इसकी अगली कड़ी आने वाली है, इसलिए आपने ‘अभी तो कुछ भी नहीं देखा’ है.
राष्ट्रवाद इस फिल्म की सबसे प्रबल प्रेरणा है. यह इतनी प्रबल है कि उम्रक़ैद में बंद या सजाए-मौत का सामना कर रहे अपराधी भी पाकिस्तान में ISI के लिए काम कर रहे गिरोहों को प्रशिक्षण देने, घुसपैठ करने के लिए तैयार दिखते हैं. पाकिस्तान दुश्मन है और भारत भुक्तभोगी है, यह निर्विवाद और स्थायी सच है. फर्क बस इतना आया है कि मोदी के भारत ने भुक्तभोगी न बनने का फैसला कर लिया है. इसे आप चाहें तो स्टेरायड की खुराक खाया राष्ट्रवाद कह सकते हैं.
और तीसरी कसौटी है धर्म. इसमें तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि इस फिल्म में सारे हमलावर मुसलमान हैं, जो अपनी आस्था और उसकी बुनियाद पर बने मुल्क की खातिर काम करते हैं. वे भुक्तभोगियों को कायर मानते हैं, जो हिंदू हैं और मोदी दौर से पहले और भी ज्यादा डरपोक थे. उदाहरण के लिए, एक नेपाल की सीमा पर एक विशाल देश है जहां से जाली नोट वाले माफिया आते हैं, जो ‘एक ही समुदाय’ के हैं. और कोई कार्रवाई की गई तो वह राजनीतिक हस्तक्षेप होगी. इसलिए, एक ताकतवर नेता के उभरने का इंतजार कीजिए. मेरा ख्याल है, यहां पर योगी आदित्यनाथ का जिक्र आता है.
इन तीन प्रमुख मुद्दों पर ये बुनियादी फर्क ‘धुरंधर’ को ‘पठान’ के मुक़ाबले ज्यादा विवादास्पद और ज्यादा ध्रुवीकरण करने वाली फिल्म बनाती है. अगर खान की फिल्म ने रूढ़िवादियों और उदारवादियों, दोनों को मुंह छिपाने की जगह मुहैया कराई, तो ‘धुरंधर’ ऐसी कोई कृपा नहीं करती. राष्ट्रवादी लोग खुश हो सकते हैं, और उदारवादी लोग यह सवाल खड़ा कर सकते हैं कि आखिर हमारे सिनेमा जगत को क्या हो गया है? ‘धुरंधर’ ने आडंबर के चंदोवे को फाड़ डाला है और चाकू को घुमा भी दिया है. यह उनकी फिल्म में दिखाई गई हिंसा के मुक़ाबले कहीं कम पैमाने की हिंसा है.
वैसे, मैं यह जानने को उत्सुक हूं कि ISI को ‘धुरंधर’ देखकर निराशा तो नहीं होगी. जो दुनिया की न केवल सबसे आधुनिक, विनाशक, हिंसक और ताकतवर खुफिया एजेंसियों में गिनी जाती है बल्कि जिसके भंडार में इतने हथियार हैं कि वह एक महीने के अंडर 26/11 जैसे हमले को कहीं भी अंजाम दे सकती है, उस एजेंसी के बारे में यह कहना एक अपमान ही होगा कि उसे हथियारों और गोली-बम आदि के लिए कराची के कुख्यात ल्यारी इलाके के अंडरवर्ल्ड की जरूरत पड़ेगी.
मैं आपको 1993 के बंबई (जब इसका यही नाम था) बम धमाकों की याद दिलाना चाहूंगा. आतंकवाद से मुक़ाबले के अनुभवी पुलिस अधिकारी एम.एन. सिंह हमें याद दिलाते रहते हैं कि बम धमाकों के बाद डाले गए छापों में उन्होंने 71 एके-47 राइफलें बरामद की थी (हां, उनमें वे एक-47 शामिल नहीं हैं जिन्हें संजय दत्त के ‘दोस्त’ कर्सी अदजानिया ने अपने कारखाने में नष्ट करवा दिया था). इनमें 3.5 टन आरडीएक्स भी जोड़ लीजिए, जो मुंबई की सभी गगनचुंबी इमारतों को उड़ा देने के लिए काफी था. और 500 हथगोलों को भी. यह तब था जब पूरी महाराष्ट्र पुलिस के पास एक भी एके-47 नहीं थी. तब, पश्चिमी समुद्रतट पर नावों से भी भारी मात्र में विस्फोटक बरामद किए गए थे. आइएसआइ अगर 1993 में इतना सब भेज सकती थी तो जाहिर है कि 26/11 कांड करने के लिए वह कराची के अंडरवर्ल्ड पर निर्भर नहीं हो सकती थी. उसे भारत में जो अंडरवर्ल्ड है उस पर जरूर भरोसा रहा होगा.
यह ‘धुरंधर’ की राजनीति का सबसे रहस्यपूर्ण पहलू है. IC-814 अपहरण, संसद पर हमला, और 26/11 जैसे कांडों की साजिश मस्जिदों, मुरीदके तथा बहावलपुर के मदरसों में या किसी बलूच नेता के यहां तो क्या, ल्यारी के किसी गैंगस्टर के धार्मिक रूप से दर्दनाशक दारू के ‘अड्डे’ पर नहीं रची जाती. क्या ISI किसी बलूच सरदार पर भरोसा कर सकती है?
अगर धर मुस्लिम विरोधी भावना को भड़काना चाहते थे तो उन्हें केवल यह दिखाना काफी था कि साजिश जैश या लश्कर के मुख्यालय में रची जा रही है, जो धार्मिक स्थल भी हैं. यह तथ्यपूर्ण भी होता. वैसे, ‘धुरंधर’ का रचनात्मक योगदान इस तथ्य में निहित है कि इसने नाम न लेने के आडंबर की धज्जियां उड़ा दी है. भारतीय सिनेमा आगे इससे संकेत ग्रहण कर सकता है. क्या यह प्रोपगंडा है? जेम्स बोंड, जॉन ली करे या टॉम क्लांसी की फिल्मों के प्लॉट भी कुछ इसी तरह के होते थे. ‘धुरंधर’ ने जितनी हलचल भारत में मचाई है उतनी पाकिस्तान में भी मचाई है. मीमों की नयी होड़ में अगर इस फिल्म ने अगर कोई योगदान दिया है तो यह कि इसने कुछ संवादों की शुरुआत कर दी है, और बेशक काफी मनोरंजन भी उपलब्ध कराती है. अपनी बेबाक, हिंसक और रूखी शैली में ‘धुरंधर’ भारतीय ‘सॉफ्ट पावर’ की नई धारा के उभार की मिसाल पेश करती है.
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