Friday, 30 September, 2022
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टजैसे जैसे UP गर्त में जा रहा, योगी के सितारें बुलंद हो रहे हैं- इतने कि वो मोदी से लाइमलाइट की होड़ में है

जैसे जैसे UP गर्त में जा रहा, योगी के सितारें बुलंद हो रहे हैं- इतने कि वो मोदी से लाइमलाइट की होड़ में है

योगी के राज में उत्तर प्रदेश की हालत शायद ही बेहतर हुई है लेकिन उनका अपनी राजनीतिक हैसियत इतनी जरूर बढ़ गई है कि मोदी को उस पर ध्यान देना पड़ रहा है.

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राष्ट्रीय सुर्खियों में अगर नरेंद्र मोदी से कोई होड़ ले रहा है तो वह कोई और नहीं बल्कि उनकी पार्टी के ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. जरा उस दिन की सुर्खियों पर गौर कीजिए, जिस दिन प्रधानमंत्री ने ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ के वार्षिक अधिवेशन में, जिसका इस साल वर्चुअल आयोजन किया गया, बड़े जतन से तैयार किया गया अपना भाषण दिया. क्या आपने ध्यान दिया कि इस भाषण की कितनी चर्चा हुई? राष्ट्रीय मानस के ‘प्राइम रियल एस्टेट’ पर बेशक किसानों का आंदोलन छाया रहा. इसमें करेले पर नीम जैसा चढ़ा छह वरिष्ठ संपादकों और एक प्रमुख राजनेता के खिलाफ योगी की पुलिस द्वारा दायर देशद्रोह और साजिश की एफआईआर.

इसके अगले दिन भी यह खबर मीडिया के उस हलके पर हावी रही जिसको लेकर मोदी-शाह की भाजपा बहुत सजग रहती है, यानी सोशल मीडिया. अधिकतर राजनीतिक खबरों का रुझान उत्तर प्रदेश से जुड़ा था. और, इसकी नकल की भी कोशिशें हुईं. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान योगी के हर काम की शर्तियां नकल करते हैं, सो वहां भी उन्हीं पत्रकारों के उन्हीं ट्वीटों पर एफआईआर दायर की गई. बड़ी कृपा यह की गई कि उसमें आईपीसी की धारा 124 (देशद्रोह) शामिल नहीं की गई.

आज के उत्तराखंड में 1972 में जन्मे अजय मोहन बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ मार्च 2017 में अप्रत्याशित रूप से मुख्यमंत्री बन गए थे. अब पांच सप्ताह बाद, सत्ता में उनके चार साल पूरे हो जाएंगे. वे अप्रत्याशित मुख्यमंत्री इसलिए थे कि तब तक कोई भी उन्हें मोदी-शाह की भाजपा के ताज के सबसे कीमती हीरे की दौड़ में शामिल नहीं देख रहा था. उसके पुराने-नये कई दावेदार थे. वास्तव में, योगी को कई तरह से बाहरी व्यक्ति माना जा रहा था. उन्हें राज्य के एक क्षेत्र के भी महज एक इलाके का नेता माना जाता था. घनी आबादी वाले पूर्वी यूपी या पूर्वांचल के गोरखपुर और उसके इर्द-गिर्द के जिले को इस तरह भी देखा जा सकता है. वे न तो मूलतः भाजपा के हैं और न आरएसएस के. उनके ‘साधु’ वंश का अलग ही पंथ है, गोरखनाथ मठ जो हिंदू महासभा से जुड़ा है, और उसकी अपनी हिंदू युवा वाहिनी है. भारतीय राजनीति के मानकों के लिहाज से तब योगी युवा ही थे, 45 वर्ष के.


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मोदी और शाह को लुटिएन की दिल्ली और उसके पंडितों को ‘सरप्राइज़’ देने में काफी मजा आता है और सभी अटकलों को गलत साबित करके वे बहुत गर्व महसूस करते हैं. सो, उन्होंने योगी को चुना था. उसके बाद बीते चार साल में वे सुर्खियों पर सुर्खियां बनाते रहे हैं— हाथरस से लेकर बदायूं तक, बिजनौर से लेकर बुलंदशहर और कन्नौज, साक्षी महाराज, कुलदीप सेंगर, विकास दुबे और अब नयी दिल्ली से लिखे गए ट्वीट पर निंदनीय एफआईआर तक. अब, खासकर तब जबकि राज्य में चुनाव सालभर में ही होने हैं, मोदी-शाह सोच रहे होंगे कि उन्होंने सही चुनाव किया था या नहीं.

बात को आगे बढ़ाने के लिए हमें तीन पुराने संदर्भों को देखना होगा. पहला और सबसे ताजा संदर्भ ‘दप्रिंट’ के राजनीतिक संपादक डी.के. सिंह के लेख का है जिसमें उन्होंने लिखा था कि किस तरह योगी भाजपाई मुख्यमंत्रियों और तमाम नेताओं के लिए एक आदर्श बन गए हैं. दूसरा लेख मेरा है.

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2018 के इस लेख में मैंने लिखा था कि मोदी की सबसे बड़ी भूल नोटबंदी नहीं बल्कि योगी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाना है. मैंने तब लिखा था कि योगी एक ही काम करना जानते हैं, वह है ध्रुवीकरण. वे यही करेंगे. लेकिन ऐसा करके वे प्रदेश पर अपनी पकड़ खो देंगे और तब 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी को इस राज्य में फिर से सूपड़ा साफ करना मुश्किल हो जाएगा. राजनीतिक विश्लेषक नेताओं को उनकी भूलों की याद दिलाने से परहेज किया करते हैं लेकिन मैंने लिखा था, जबकि योगी यूपी में सत्ता में थे, कि मोदी को राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 50 सीटें जीतने में भी मुश्किल होगी. वे 60 सीटें जीत पाए थे.

और तीसरा संदर्भ ‘राइटिंग्स ऑन द वाल’ सीरीज में मेरे एक लेख का है, जो मैंने 2017 के यूपी चुनाव के दौरान वहां का दौरा करते हुए गोरखपुर से लिखा था. एनडीटीवी के प्रणय रॉय, दोरब सुपारीवाला और मैंने योगी के मठ में उनसे बातचीत की थी. मैंने योगी से पूछा था कि क्या यूपी को छोटे-छोटे राज्यों में नहीं बांट देना चाहिए? उन्होंने इस पर बहुत आपत्ति नहीं जाहिर की थी. क्या उन छोटे राज्यों में एक, पश्चिम यूपी को काट कर हरित प्रदेश नहीं बना देना चाहिए? उनका जवाब था कि नहीं, उसे अलग नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो जाएगा. हमें इसकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं है. 23 करोड़ की आबादी वाले राज्य में, जिसमें 20 फीसदी आबादी मुसलमानों की है, यह पश्चिम यूपी ही है जहां अल्पसंख्यकों की आबादी सबसे ज्यादा है. क्या पूर्वी यूपी या पूर्वांचल को अलग राज्य नहीं बना देना चाहिए? इस सवाल पर मुझे लगा कि योगी की आंखों में चमक आ गई थी. मैंने लिखा था कि वे उस छोटे-से राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना देखते हैं.

आप देख सकते हैं, मेरी दोनों बातें गलत साबित हुईं. गोरखपुर में इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद मोदी ने इस राज्य को फिर जीत लिया और योगी इस पूरे राज्य के मुख्यमंत्री बने. लेकिन मैं अगर गलत साबित हुआ, तो डी.के. सिंह सही साबित हो रहे हैं. योगी दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्रियों और भविष्य को लेकर महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए ‘रोल मॉडल’ साबित हो रहे हैं. यह कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे किसी के आदर्श बनें. लेकिन आज भाजपा के ताकतवर नेताओं की सूची देखें तो पहले की तरह आज 1,2,3 की गिनती में मोदी, शाह, मोहन भागवत को रखना आसान नहीं है. अब आपको इनके बीच योगी को कहीं बिठाना पड़ेगा, शायद भागवत के ठीक पहले.

आज ठोस सियासी हकीकत यह है कि योगी आज जो करते हैं उसे भाजपा में दूसरे लोग अगले दिन दोहराते हैं. और अकेले वे ही हैं जो सुर्खियां बटोरने में मोदी से होड़ ले सकते हैं. किसी भी राज्य के किसी भी भाजपा नेता से पूछ लीजिए कि आज उनके तीन ऐसे नेता कौन हैं जो भीड़ जुटा सकते हैं, और किसे पार्टी के तमाम लोग चाहते हैं? बेशक मोदी का नाम पहले लिया जाएगा, मगर दूसरे नंबर पर योगी ही हैं. यह एक क्षेपक है मगर भावी का संकेतक भी है कि तीसरे नंबर पर नये उभरते नेता तेजस्वी सूर्य हैं. एक बार फिर याद दिला दें कि यहां बात भाजपा की राजनीति की हो रही है.

हालांकि योगी यूपी की गद्दी के प्रमुख दावेदारों में कभी नहीं थे, मगर उनकी ताजपोशी ने पार्टी में उत्साह जैसा पैदा कर दिया था. इसकी कुछ वजह यह धारणा थी कि यह जाति की पहचान से जुड़ी पार्टियों की हार थी और राज्य को एक ऐसा नेता मिला था जो परिवार-मुक्त था और राज्य को दशकों की गिरावट से उबारेगा. सुर्खियां ही आपको बताएंगी कि राज्य में कानून का शासन काफी ‘बेहतर’ है.

इसी तरह, यह भी उम्मीद की जा रही थी कि वे प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी सुधारेंगे. ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में यूपी में गतिरोध कुछ टूटा था, उसकी जीएसडीपी 2015-16 में 8.85 फीसदी और 2016-17 में 10.87 फीसदी की दर से बढ़ी थी. योगी ने मार्च 2017 में कमान संभाली थी, एक नया वित्त वर्ष शुरू होने के ठीक पहले. इसके बाद लगातार तीन साल तक वृद्धि दर में गिरावट जारी रही—2017-18 में यह 7.24 फीसदी, 2018-19 में 5.33 फीसदी और 2018-19 में 4.38 फीसदी पर पहुंच गई. यानी उनके तीन साल में प्रदेश की वृद्धि दर में 50 फीसदी की गिरावट हो गई. यह साल तो महामारी का ही रहा, इसलिए इसकी बात न ही करें.

इन सबके बावजूद योगी को भाजपा का भविष्य बताया जा रहा है. उन्हें एकमात्र ऐसा भाजपा नेता बताया जा रहा है, जो अपने बूते काम कर सकता है. ध्रुवीकरण करने के मामले में पार्टी में बेशक उनके जैसा नेता कोई नहीं है. अगर मोदी-शाह कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना देखते थे, तो योगी मुस्लिम-मुक्त उत्तर प्रदेश के अपने सपने को साकार करने में जुटे हैं, यानी पांच करोड़ भारतीयों को पूरी तरह हाशिये पर धकेलने में.

उनका व्यक्तित्व, उनकी ताकत, उनकी राजनीति की दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती. उन्होंने अपने प्रदेश के लिए कुछ खास नहीं किया है, मगर मोदी और शाह को 2022 में फिर से यूपी को और 2024 में फिर से भारत को जीतना है तो उन्हें योगी की जरूरत पड़ेगी. यह भाजपा की राजनीति में मोदी के रहते योगी-आदित्यनाथ-केंद्रित बदलाव का संकेत दे रहा है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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2 टिप्पणी

  1. कई बार लगता है तुम इतनी घटिया पत्रकारिता करते हो की तुमको पत्रकार किसने बनाया लेकिन फिर सोचता ही रहने दो यह देश की विडंबना है कि तुम जैसे पत्रकार देश का विभाजन करते है तुम है हिन्दू मुस्लिम करते हो ताकि तुम्हारी रोजी रोटी चलती रहे।।।तुम हिन्दू मुस्लिम नहीं करोगे तो तुम खाओगे कैसे ।।।।तो अपना काम करो ओर लोगो को लड़ाई करो ।।।

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