Wednesday, 29 June, 2022
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मोदी सरकार का पहला ‘बीजेपी बजट’ क्यों सही दिशा में लिया गया कदम है, ग्रोथ पर दांव लगा रहा है

विडंबना ये है कि इस बजट में नरेंद्र मोदी ने महामारी के कारण मिली मदद से  घड़ी की सुइयां पीछे घुमा दी हैं और ग्रोथ पर दांव लगा रही है.

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इस बार के बजट ने भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में 30 साल के बाद पहली बार बड़ा बदलाव देखा है. यह बदलाव सही दिशा में भी है. यह सही है, वैचारिक तौर पर ही नहीं, विवेकपूर्ण तरीके से भी. इसे ज्यादा राजनीतिक तरीके से कहें तो यह मोदी सरकार का पहला बीजेपी बजट है. अब तक सभी कांग्रेस+ से कांग्रेस+++ वाले थे.

आलोचकों के बीच भारत की सभी समस्याओं के लिए 1991 के सुधारों को दोष देने का फैशन रहा है. दूसरी तरफ, भारत का अभिशाप यह है कि उसके लिए सुधारों के मौके देखना दुर्लभ रहा है. इसलिए जब आपको ऐसा कुछ हासिल होता है तो आप उसे ड्रीम बजट कहते हैं.

1991 के बाद हमारे पास देवेगौड़ा की लेफ्ट समर्थित संयुक्त मोर्चा सरकार के वित्त मंत्री के रूप में पी. चिदंबरम का 1997-98 का बजट है. वैसे इस सरकार की पहली कैबिनेट में गृह और कृषि जैसे प्रमुख विभाग क्रमश: सीपीआई नेता इंद्रजीत गुप्ता और चतुरानन मिश्र के पास थे.

हम शायद यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह के तीन बजटों को सुधारवादी,  ‘इंडिया शाइनिंग’  वाले अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के कार्यकाल के भाग  में गिन सकते हैं. कई रोलबैक, टैरिफ और टैक्सेशन में कटौती, निजीकरण बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखे जाने—सुप्रीम कोर्ट के एक खराब आदेश से लगी रोक—के बावजूद वह एक अच्छा दौर था.


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राव-मनमोहन सिंह के सुधार की गति 18 महीने बाद ही थम गई थी, चिदंबरम का 1997-98 का बजट जरूर एक अपवाद था. और 2004 में वाजपेयी की आश्चर्यजनक हार ने बेवजह ही यूपीए के बेतुके नए फॉर्मूले को बढ़ावा दिया: इनक्लूसिव ग्रोथ. इसके बाद खुद-ब-खुद इस अवधारणा ने जन्म ले लिया कि वाजपेयी के विकास-परक प्रस्तावों से आजिज आकर देश के गरीबों ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया. यह अलग बात है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों का अंतर महज सात ही था.

यूपीए के दूसरे कार्यकाल तक भारत में जो कुछ भी बिगड़ा और गरीबों की स्थिति में जो गिरावट मानी गई, सबके लिए ग्रोथ को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. यही वह समय था जब हमने शिक्षा से लेकर खाद्य और रोजगार तक, अपने अधिकार आधारित कानून पारित किए थे. अफसोस, यूपीए सरकार ज्यादा समय तक नहीं चली अन्यथा सोनिया गांधी और उनकी एनएसी अच्छे मानसून और क्रिकेट में जीत की गारंटी देने वाले कानूनों को भी पारित करा देती.

ये सरकारें कह सकती थीं कि उनके पास बहुमत नहीं था. मोदी को भारत के मतदाताओं ने दोनों बार ऐसा कहने का कोई मौका नहीं दिया. लोकसभा में नए भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक को पारित कराने के साथ उन्होंने पहला बड़ा कदम उठाया. उसके बाद ‘सूट-बूट की सरकार’ को लेकर बवाल मचा और सब ठहर गया. फिर अगले छह वर्षों तक बड़े सुधारों के बारे में सोचा तक नहीं गया. डिमोनेटाइजेशन ने हालात और बिगाड़ दिए.

विडंबना ये है कि इस बजट में नरेंद्र मोदी ने महामारी के कारण मिली मदद से घड़ी की सुइयां पीछे घुमा दी हैं. एक लोकतंत्र में हेल्थ से लेकर डिफेंस, इकोनॉमी, वेलफेयर, और मार्केट तक सब कुछ राजनीति पर निर्भर करता है. एक लोकतंत्र में अर्थव्यवस्था के प्रबंधन से लेकर दशा-दिशा तक सब राजनीति है.

आप अब चुपचाप कोई सुधार नहीं कर सकते हैं. आसान कदम पहले ही लिए जा चुके हैं. इसके विपरीत मोदी सरकार के पहले छह वर्षों में कई पूर्ववर्ती बुरे तौर-तरीको की वापसी देखी गई- नौकरशाही को नए अधिकार देना, संरक्षणवादी आयात नियंत्रण और शुल्क, और सबसे खराब कर की दर को लेकर अनिश्चितता.

बजट की बारीकियां तो इकोनॉमिस्ट और पब्लिक फाइनेंस एक्सपर्ट ही समझते होंगे. मैं तो राजनीतिक नब्ज पकड़ता हूं. मैं इसे भारत की पॉलिटिकल इकोनॉमी में एक मोड़ के तौर पर देखता हूं. इस बजट की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें टैक्सेशन पर कुछ नहीं कहा गया है. सभी टैक्स रेट वैसे ही हैं जैसी पहले थे. यह प्रगति है. और यह राजनीतिक कदम है.

चूंकि कर दरों में वृद्धि से लेकर संपत्ति जब्त करने, पूर्व में नाकाम फैसले फिर लागू करने, अमीरों पर टैक्स लगाने और यहां तक कि अनरियलिस्टिक कैपिटल गेन पर प्रिसम्पटिव टैक्सेशन जैसे सैकड़ों बेतुके विचार हवाओं में तैर रहे थे. निठल्ले चिंतनों में इस पर जोशो-खरोश के साथ मंथन चलता रहा. हालांकि, क्या हम इसकी कल्पना करना चाहेंगे कि अगर बजट में ऐसे प्रस्तावों को लागू किया जाता तो इनका नतीजा आने वाले समय में क्या होता?

मोदी सरकार एक बात को लेकर एकदम कुख्यात रूप से पाक साफ है: वह अर्थशास्त्रियों की नहीं सुनती है. इस मामले में अच्छा है कि वह ऐसा नहीं करती. क्योंकि, बाद में अर्थशास्त्रियों को तो जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता. यह काम तो राजनेताओं का है. पसंद आए या नहीं, लेकिन मोदी सरकार ने एक विशिष्ट राजनीतिक कदम उठाया है.

दशकों, खासकर 1991 के सुधार के बाद के तीन दशकों से तीन भारत ग्रोथ बनाम इनइक्वलिटी की बाइनरी में उलझा है.यह एक निरर्थक बहस है. क्योंकि अगर ग्रोथ के कारण असमानता बढ़ती है, तो ग्रोथ के अभाव में क्या होता है? विकास से अमीर और अमीर बनते है, लेकिन क्या यह गरीब को और गरीब बना देता है, भले ही इसे नीचे तक पहुंचाने में खामियां और भ्रष्टाचार हो? अमीरों को तो तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता जब ग्रोथ में दोहरे अंकों की गिरावट हो रही हो. अब यह ग्लोबल रोना-धोना ही देख लीजिए कि महामारी वाले साल में भी किस तरह अरबपतियों ने अपनी संपत्ति बढ़ा ली जबकि करोड़ों लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी.

इस बजट का राजनीतिक संकेत यही है कि मोदी सरकार ज्यादा रेवेन्यू जुटाने के लिए ग्रोथ पर दांव लगा रही है. इसका समापन मैं वॉल स्ट्रीट में माइकल डगलस द्वारा निभाए गए कैरेक्टर गॉर्डन गेको के शब्दोंके साथ करना चाहता हूं, निश्चित तौर पर कुछ छोटे बदलाव के साथ: देवियों और सज्जनों,बात यह है कि ग्रोथ, बेहतर शब्द के अभाव में, अच्छी है. ग्रोथ सही है, ग्रोथ कारगर है. ग्रोथ स्पष्टता लाती है, सटीक है, और विकासवादी भावना का सार पकड़ती है. मानव जाति के उत्थान के लिए ग्रोथ जरूरी है- इसके विभिन्न रूप हैं; जीवन के लिए ग्रोथ, पैसे के लिए, प्रेम के लिए, ज्ञान के लिए.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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