पिछले छह दशकों में भारतीय राष्ट्रवाद या राष्ट्रभक्ति का विकास किस तरह हुआ है इसे समझने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि हम यह देखें कि भारतीय सिनेमा और खासकर बॉलीवुड ने अलग-अलग दौर में इसे किस तरह परिभाषित किया.
87 साल की उम्र में ‘भारत’ मनोज कुमार (24 जुलाई 1937 को हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी के नाम से जन्मे) की मृत्यु हमें इस बात पर विचार करने का मौका देती है. देशभक्ति, राष्ट्रवाद, अच्छी नागरिकता, अनुशासित और पवित्र जीवनशैली आदि क्या होती है इन सबको उन्होंने जितना परिभाषित किया उतना किसी दूसरे अभिनेता ने शायद ही किया होगा. अपने पसंदीदा नाम ‘भारत’ के रूप में तरह-तरह के किरदारों को फिल्मी परदे पर जीते हुए वह एक मुकम्मल भारतीय के चरित्र को प्रस्तुत करते रहे. कमल हासन ने तो 1996 में ‘हिंदुस्तानी’ में इस तरह के किरदार को प्रस्तुत किया, लेकिन मनोज कुमार यह सब उनसे तीन दशक पहले ही कर चुके थे. कमल ने इस तरह के आदर्श भारतीय का ज्यादा समकालीन रूप प्रस्तुत किया था, जो अपने ‘राष्ट्रद्रोही’ बेटे के पेट में कटार घोंप देता है.
यह मनोज कुमार के लिए लिखा स्मृतिलेख नहीं है. यह लेख यह बताने की कोशिश करता है कि उन्होंने 1962 में चीन के साथ लड़ाई से लेकर 1975 में इमरजेंसी तक के हमारे सबसे संकटग्रस्त दौर में भारतीयों की दो पीढ़ियों के लिए देशभक्ति को परिभाषित करने में क्या भूमिका निभाई.
यह उन्होंने ‘भारत’ के रूप में त्यागी, वीर, और हमेशा विजयी होने वाले पात्र की भूमिका निभाकर किया — 1967 में ‘उपकार’ में एक आम सैनिक (और हरियाणा के किसान के बेटे) की; 1969 में ‘पूरब और पश्चिम’ में धोखा खाए स्वतंत्रता सेनानी के शानदार बेटे की; 1974 में ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में एक बेरोज़गार इंजीनियर की भूमिकाएं निभाकर. इनमें से हर एक फिल्म ने इंदिरा युग के प्रारंभिक दौर से लेकर तेज़ी से बदलते भारत की तस्वीर पेश की, जिसका सिलसिला इमरजेंसी लगाए जाने के साथ टूट गया और इसके बाद ‘एंग्री यंगमैन’ का युग शुरू हो गया. हम सब जानते हैं कि इसकी मशाल अमिताभ बच्चन ने कैसे थाम ली थी.
मनोज कुमार 1965 की फिल्म ‘शहीद’ में भगत सिंह बने. यह फिल्म हिट हुई और उनका सितारा बुलंद हुआ. कहा जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने यह फिल्म देखी थी और इसके बाद ही मनोज कुमार उनसे मिले थे, तब शास्त्री ने उनसे कहा था कि ‘आप जय जवान, जय किसान की थीम पर फिल्म क्यों नहीं बनाते’ और जल्दी ही, 1967 में उन्होंने ‘उपकार’ बनाई, जिसकी शूटिंग बाहरी पश्चिम दिल्ली और हरियाणा के गांवों में हुई. फिल्म का हीरो ‘भारत’ एक मामूली किसान है, जो एक फौजी जवान के रूप में 1965 की लड़ाई लड़ता है. फिल्म के पोस्टरों में आप ‘भारत’ को धोती-कुर्ता पहने तथा हल उठाए और सैनिक की वर्दी में बंदूक उठाए, खून से सने भी देख सकते हैं.
उनकी फिल्मों के कई गाने कई पीढ़ियों तक लोकप्रिय रहे. जैसे इसी गाने को लीजिए : ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती’. गुलशन बावरा के लिखे इस गाने की एक-एक पंक्ति कितनी प्रभावशाली है. दिल्ली हाइकोर्ट की जज प्रतिभा सिंह ने जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार को ज़मानत देने वाले अपने आदेश में इन पंक्तियों का इस्तेमाल किया. फिल्म में यह गाना ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे की भावना से जुड़कर एक उद्घोष बन जाता है. इसे सुनकर स्वर्ग में बैठे शास्त्री ज़रूर मुस्करा रहे होंगे.
यह भी पढ़ें: एक नया ‘इज़्म’ आ गया है, जो राइट, लेफ़्ट और सेंटर को मात दे रहा है
‘भारत’ नाम के किरदार को मनोज कुमार ने 1969 की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में एक अलग ही कहानी के साथ पेश किया. आज जब ‘इंडिया’ की जगह भारत पर ज़ोर दिया जा रहा है, तब यह फिल्म बनी होती तो न केवल इसे ‘टैक्स फ्री’ किया जाता बल्कि प्रधानमंत्री, उनका पूरा मंत्रिमंडल, सभी मुख्यमंत्री और सरसंघचालक तक इसे देखने आते. ‘उपकार’ से अलग, इस फिल्म की कहानी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द बुनी गई है. धोखा खाए (और कत्ल किए गए) स्वतंत्रता सेनानी का बेटा लंदन पहुंचता है और परिवार के मित्र की जिस बेटी के साथ उसका रिश्ता जुड़ने वाला है वह (सायरा बानो) पश्चिमी रंगढंग में इतनी रंगी है कि सिगरेट-शराब पीती है, भूरे बालों वाला विग पहनती है और वह तो क्या उसके पिता या हिप्पी भाई न तो कभी भारत गए और न इसकी कोई परवाह करते हैं.
उस पीढ़ी के ‘एनआरआई’ भारत के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ते थे, लेकिन ‘भारत’ नाम का हीरो उन्हें समझाने में जुट जाता है. इस कोशिश में वह ‘ज़ीरो जो दिया मेरे भारत ने…’ गाना भी गाता है, जब कोई उस पर ताना कसता है कि भारत ने दुनिया को दिया क्या? ‘भारत’ गाता है कि भारत ने दुनिया को ज़ीरो और दशमलव न दिया होता तो उसे गिनती तक नहीं आती, भारत ने पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी बताई. वह सायरा बानो को अंततः इस तरह सीधे रास्ते पर लाता है कि आज उसे नारी-द्वेषी कहा जाता. वह सायरा को इस हद तक शर्मिंदा कर देता है कि वह ‘भारतीय नारी’ बन जाती है.
इस फिल्म ने उन दो सुपरहिट फिल्मों के बीच भी अपना परचम लहराए रखा, जिन फिल्मों से उस मेगास्टार (राजेश खन्ना) का जन्म हुआ जो कई पीढ़ियों तक छाया रहा. उनकी फिल्म ने ‘एनआरआई’ का मखौल उड़ाया मगर लंदन में वह लगातार 50 हफ्तों तक चली. कोई और हिंदी फिल्म (‘हम आपके हैं कौन’) इस रिकॉर्ड की बराबरी 1994 में ही कर पाई.
1965 के बाद के फौजी माहौल वाले वर्षों के बाद भारत की चिंताएं जीवन, बेरोज़गारी, भूख, घूसखोरी, भ्रष्टाचार जैसे मसलों के इर्दगिर्द केंद्रित हो गईं. इसलिए ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में नए ‘भारत’ ने अवतार लिया. यह उस योग्य इंजीनियर की कहानी कहती है जो इतना ईमानदार है कि नौकरी नहीं खोज पाता और न नौकरी में टिक पाता है, वह अपनी गर्लफ्रेंड ज़ीनत अमान के साथ ‘आकाशवाणी’ पर गाने गाकर (मैं ना भूलूंगा…) किसी तरह गुज़र-बसर करता है और उसकी गर्लफ्रेंड उसे छोड़ अपने बॉस शशि कपूर के साथ चली जाती है.
लेकिन ‘भारत’ संघर्ष करता है और विजयी होता है, हम सबको (खासकर मेरी पीढ़ी वालों को, जो उस समय किशोर थे) वह रास्ता दिखाता है. इस बीच ‘शोर’ में मनोज कुमार ‘भारत’ नहीं बल्कि शंकर बनते हैं. इसकी भी कहानी उसी साहसी, आम पीड़ित भारतीय की है, जो मजदूर हड़ताल में अमीरों से संघर्ष करता है. यहां भी वह ‘एक प्यार का नगमा है…’ जैसे गीत गाता है.
वे भारत के लिए कई तरह से अंधियारे, हताशा भरे साल थे. इंदिरा गांधी का समाजवाद तब मरणासन्न था, इसके साथ, 1973 के बाद कच्चे तेल के झटकों ने रोज़गारों पर कैंची चला दी थी और हमें राशन की दुकानों के आगे लाइन में खड़ा कर दिया था, मुद्रास्फीति की दर को 30 फीसदी की ऊंचाई तक पहुंचा दिया था. बेरोज़गारी उस दौर का प्रमुख मुद्दा था. गुलज़ार ने ‘मेरे अपने’ में इस मुद्दे को पहले ही उठाया था और मनोज कुमार ने भी इसे तुरंत पकड़ा था. वैसे, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ वाला मुहावरा भारतीय नहीं था. इसका आविष्कार शायद ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने किया था और वे ही इसका अक्सर इस्तेमाल करते थे, जो पाकिस्तान के सबसे बड़े सामंतों में शुमार थे और तब खुद को इंदिरा गांधी से भी बड़े समाजवादी के रूप में पेश कर रहे थे.
यह भी पढ़ें: ‘कौवा मंदिर के शिखर पर बैठ जाए तो गरुड़ बन जाएगा?’: भागवत ने सांप्रदायिक विवादों पर BJP को चेताया
इमरजेंसी ने मनोज कुमार की रफ्तार पर रोक लगा दी, लेकिन भारत के रूप में उन्होंने जिस सामाजिक-राजनीतिक हालात से संघर्ष किया उसने ‘एंग्री यंगमैन’ को जन्म दिया. इस तरह, ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘कालिया’, ‘कुली’ जैसी फिल्मों के साथ बच्चन का जलवा मजबूत हुआ. 1980 वाले दशक के मध्य में राजीव गांधी के ‘मेरा भारत महान’ मार्का उत्साही राष्ट्रवाद के साथ भारत ने आशावाद की राह पकड़ी, तो बॉलीवुड की 80 के दशक की देशभक्ति ने कथित ‘समांतर सिनेमा’ को जन्म दिया. इस सिनेमा ने जातिवाद, पितृसत्ता, और दूसरे अन्यायों से संघर्ष छेड़ दिया. इस सिनेमा की ‘आक्रोश’, ‘मिर्च मसाला’, अर्द्धसत्य’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ जैसी फिल्मों को याद कीजिए.
उग्र राष्ट्रवाद ने तमिल सिनेमा के जरिए वापसी की. ‘रोजा’ (1992) की कहानी कश्मीरी आतंकवादियों द्वारा इंडियन ऑइल के अधिकारी के. दोरैस्वामी के अपहरण कांड पर आधारित है. एक युवा फिल्मी किरदार को पेश करने वाले अरविंद स्वामी को राष्ट्रीय ख्याति मिली. इस फिल्म को हिंदी में भी डब किया गया और वह भी मेगा हिट रही. ‘रोजा’ ने दो बंधनों को तोड़ा. एक तो यह कि मुस्लिम पात्र को अब अपने दोस्त, हीरो की खातिर जान तक देने वाले नेक आदमी के रूप में पेश करना ज़रूरी नहीं रह गया. वह अब आतंकवादी भी हो सकता था. नया राष्ट्रवाद पाकिस्तान से जंग जैसा था. मैंने ‘रोजा’ पहले तमिल वाली देखी, ‘इंडिया टुडे’ के तमिल संस्करण की संपादक वासंती के साथ मद्रास के एक सिनेमाघर में. तब, मैंने वासंती से कहा था कि टॉलीवुड ने इस फिल्म के साथ एक बड़े राष्ट्रीय रुझान को जन्म दिया है. ‘रोजा’ ने दिखा दिया कि पाकिस्तान के खिलाफ केवल उत्तर भारत में ही गुस्सा नहीं है.
यह थीम बाद के दशकों में भी हावी रही और आज भी मजबूत हो रही है. इसकी मिसाल है सबसे ताजा फिल्म ‘स्काई फोर्स’, जो 1965 की लड़ाई में भारतीय वायुसेना के एक पायलट की जांबाजी की बंबइया फिल्मी कहानी दिखाती है. उस पायलट की बहादुरी की बहुत चर्चा नहीं हुई है. वैसे, इस बीच सनी देओल का दौर भी आया जिनकी फिल्म में आतंकवादी नजदीक की मस्जिद की अजान सुनकर जागता था और बुरा आदमी (जो प्रायः मुसलमान ही होता था) कभी चैन से नहीं बैठ पाता था. करगिल युद्ध ने अपनी तरह की बेतुकी, बचकानी किस्म की युद्ध फिल्मों को जन्म दिया, जिसकी अति चुनाव से पहले आई ‘उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक’ फिल्म से हुई. वैसे, सनी देओल की ‘बॉर्डर’ (1997) बेशक सबसे उत्प्रेरक फिल्म रही.
मनोज कुमार के ‘भारत’ अगर आज होते तो क्या करते? ‘उपकार’ में तो उन्होंने युद्ध की बुराइयां गिनाई थी, लेकिन आज उन्हें युद्ध जीतना ही होता और मारे गए दुश्मन को गालियां भी देनी पड़तीं. आखिर, दुश्मन मूर्ख, होता है और यह भारत तो तरक्की कर चुका है, ‘विकसित’ हो चुका है.
(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: बीजेपी ने ‘डीप स्टेट’ का आरोप लगा कर भारत-अमेरिका रिश्ते में पेंच फंसाया