Thursday, 7 July, 2022
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2021 के सबक: टीवी न्यूज ने ‘अति’ की हदें पार कीं, कोविड, बंगाल चुनाव, किसान प्रदर्शन

हर मामले में हमने 2021 की घटनाओं को टीवी न्यूज चैनलों के कुटिल चश्मे से देखा, मानो ट्रुमैन का शो देख रहे हों.

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श..श.., टेलीविजन समाचारों के गहरे छुपे रहस्य को जानना चाहते हैं? तो अंदाजा लगाइए, अमूमन दुनिया उलटी-पुलटी दिखती है या कहें कि जैसे तारक मेहता अपने ‘उलटा चश्मा’ से देखता है, सब सोनी पर सबसे ज्यादा चलने वाले भारतीय शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ शो में. 2021 आंखों के लिए तो दिलचस्प था, मगर हमेशा यकीन करने जैसा नहीं था.
हमने घटनाओं को उलटे-पुलटे चश्मे से देखा- मानो घटनाएं या हम द ट्रूमैन शो में दाखिल हों, जहां चीजें वैसी नहीं हैं, जैसी दिखती हैं.

किसान आंदोलन को टीवी समाचारों में ‘आंदोलनजीवी’, ‘खालिस्तानी’ (जी न्यूज), 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के दौरान ‘देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले’ (टाइम्स नाउ) कहकर बदनाम करते देखिए. सीएनएन न्यूज18 तो गुस्से में चीख पड़ा, ‘भारत गणतंत्र दिवस पर शर्मसार हुआ.’

फरवरी और मई के बीच पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव प्रचार के धूम-धड़ाके को याद कीजिए, बीजेपी को तो जीता हुआ ही ऐलान कर दिया गया था.

अप्रैल में जब कोरोना वायरस की तबाही चरम पर थी, टीवी कवरेज बंगाल में प्रधानमंत्री और बीजेपी की चुनावी रैलियों में ‘भगवा सैलाब’ (एबीपी न्यूज), ‘लाखों, उत्सव और जोश से भरे…’ बता रहा था, बिना यह दिखाए कि ये कोविड के लिए सुपरस्प्रेडर का काम कर रहे हैं. फिर, जब मृतकों की गिनती बढ़ने लगी, अस्पतालों के बाहर सड़कें मरीजों से पटने लगीं, अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन और दवाइयों की किल्लत जानलेवा होने लगी तो न्यूज चैनलों ने इसे विस्तार से दिखाया जरूर, मगर राजनैतिक कुप्रबंधन पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया.

लखीमपुर खीरी की घटना की न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग को क्या कहिए जिसमें आठ लोग मारे गए. रिपोर्टिंग में ‘सुनियोजित साजिश’ के प्रमुख अभियुक्त आशीष मिश्रा को संदेह का लाभ देने की कोशिश दिखी. जबकि प्रदर्शनकारियों में से ‘पीटकर मार डालने वालों’ के जवाब मांगे गए जिसमें दो तथाकथित बीजेपी कार्यकर्ता मारे गए?

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आखिर में यह देखिए कि अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को कैसे हमें योगी आदित्यनाथ की शर्तिया जीत के रूप में बेचा गया.

इनमें हर मामले में तस्वीर हमें उलटी-पुलटी दिखी. दिल्ली के टिकरी, सिंघू और गाजीपुर बॉर्डरों पर शांतिपूर्ण बैठे किसानों को न्यूज चैनलों ने न जाने क्या-क्या नाम दिए और उन पर विपक्ष का मोहरा बनने का आरोप लगाया- ‘लेफ्ट-कांग्रेस की जुगलबंदी’ (इंडिया टीवी). सीएनएन न्यूज18 ने तो ‘बाहरी एजेंसियों का हाथ’ खोज लिया-और आपको फरवरी में दिशा रवि ‘टूलकिट’ विवाद की याद है, जिसमें रवि के साथ पर्यावरण एक्टीविस्ट ग्रेटा थनबर्ग को ‘ग्लोबल रिपब्लिक डे साजिश…’ (सीएनएन न्यूज18) का ‘साजिशकर्ता’ बताया गया? रवि ने कथित तौर पर किसानों के प्रदर्शन के लिए निर्दोष से ‘टूलकिट’ में कुछ लाइनें बदल दी थीं, जिसे रिपब्लिक टीवी ने ‘…सरकार को अस्थिर करने और भारत को बदनाम करने की बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश’ का हिस्सा बताया. क्या वाकई?

पूरे साल इन प्रदर्शनों को चैनलों में काफी कवरेज मिला, भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत वर्ष के अप्रत्याशित टीवी स्टार बनकर उभरे मगर कई चैनलों ने किसानों के चरित्र हनन का रुख अपनाया, कृषि कानूनों या हालात से निपटने के मोदी सरकार के तौर-तरीकों की बात करने के बदले किसानों के प्रदर्शन से आने-जाने वालों और स्थानीय लोगों की असुविधाओं को बताया (जो कुछ हद तक सही भी था).

जब प्रधानमंत्री ने नवंबर में कानूनों को वापस ले लिया, हमने देखा कि किसान प्रदर्शन स्थलों से विजयी जुलूसों में वापस जा रहे हैं तो किसी ने उन्हें ‘खालिस्तानी’ या और कुछ नहीं कहा, न्यूज चैनलों ने तो कतई नहीं.


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भारी नाकामी

पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान हर हिंदी-अंग्रेजी न्यूज चैनल ने बीजेपी को विजयी दिखाने के लिए सब कुछ किया. दिसंबर 2020 के बाद से ही तीन बड़ी शख्सियतों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की ‘पोरिबोर्तन’ रैलियों का पूरा लाइव कवरेज किया.

तृणमूल कांग्रेस से बीजेपी की ओर हर दलबदल, पार्टी के हर नए आगंतुक-एक्टर मिथुन चक्रवर्ती-और आखिर में ‘युद्ध का मोर्चा नंदीग्राम’ को टीवी पर वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया, जहां ममता बनर्जी को उनके पूर्व तृणमूल साथी शुभेंदू अधिकारी चुनौती दे रहे थे. एक चैनल प्रियोबंधु टीवी ने तो बीजेपी को अच्छी-खासी जीत दिला दी थी; सीएनएन न्यूज18 ने ‘बीजेपी की बढ़त’ बताई, तो जी न्यूज ने ‘हवा में बदलाव’ की गंध सूंघ ली.

ममता अपने बाएं पैर में प्लास्टर के साथ कुछ सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहीं, मगर टीवी का फोकस तो पूरी तरह बीजेपी और उसकी लोकप्रियता पर बना हुआ था. प्रधानमंत्री की ब्रिगेड परेड ग्राउंड रैली में न्यूजएक्स के रिपोर्टर की चहकती आवाज निकली थी, ‘हजारों-लाखों की भीड़ प्रधानमंत्री मोदी समेत अपने चहेते सितारों को देखने के लिए उमड़ पड़ी है.’

ममता बनर्जी और तृणमूल ने चुनावों में बीजेपी का सफाया कर दिया लेकिन अगर आप सिर्फ टीवी न्यूज कवरेज के सहारे ही रहते तो यह देख हैरान हो जाते. यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे कोई टेलीस्कोप के गलत किनारे से चीजें देखे.

कोविड का कवरेज तो हुआ मगर ज्यादा सवाल नहीं पूछे गए

कोविड महामारी और उसकी भयावह दूसरी लहर का ‘विकराल तांडव’ (इंडिया टुडे) साफ-साफ देखा गया और टीवी न्यूज में विस्तार से, मगर कोई शिकायत नहीं. दिल्ली, सूरत, भोपाल, आगरा, लखनऊ, मुंबई से लेकर चेन्नै, कोच्चि, पटना, रायपुर तक हताशा और मृत्यु की कहानियों की भरमार थी-हर जगह शव ही शव दिखे, कारों की छत पर (एनडीटीवी 2437), थ्री व्हीलर में (मिरर नाऊ), एंबुलेंसों में (न्यूजएक्स), श्मशानों में (रिपब्लिक टीवी, आजतक). चारों तरफ दुख और संताप छाया हुआ था, ऑक्सीजन के लिए ‘उखड़ती सांसों’ और गंगा में बहती लाशों को भी देखा गया-टाइम्स नाऊ पर आया ‘जीवनदायिनी नदी अब हताशा की वाहक बन गई.’

लेकिन मायूसी चाहे जितनी घनी हो, न्यूज चैनलों ने सवाल पूछने से परहेज बरता, केंद्र या राज्य स्तर पर राजनैतिक नेतृत्व को दोषी ठहराने की तो बात ही अलग, उन्हें तैयारी की कमी या चुनाव रैलियों में लाखों की भीड़ जुटाने या हरिद्वार के कुंभ मेले या अस्पतालों या मृतक के परिजनों की खोज-खबर लेने या ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा’ (मिरर नाऊ) पर काबू पाने में नाकामी या हर वक्त मास्क पहनकर मिसाल न पेश करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया-चुनावी रैलियों में नेता बिना मास्क पहने दिखे.

कितने प्राइम टाइम डिबेट कोविड संकट के राजनैतिक (कु)प्रबंधन पर किए गए?

उत्तर प्रदेश में बंगाल का दोहराया जाना

हमें लखीमपुर खीरी पर गौर करने की दरकार नहीं बल्कि उसके बदले कहिए कि 3 अक्टूबर की घटना के बाद पहले हफ्ते में न्यूज चैनलों ने केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा और उनके बेटे आशीष का इंटरव्यू दिखाया, जिसमें कड़े सवाल पूछने के बदले उनकी राय प्रसारित की गई. एसआइटी के मुताबिक, आशीष अब ‘सुनियोजित साजिश’ के सिलसिले में जेल में है.
जहां तक योगी आदित्यनाथ का सवाल है, जून से ही उन्हें प्रधानमंत्री से ज्यादा कवरेज मिला, चाहे वह विज्ञापनों के जरिए हो या ‘इंपैक्ट फीचर’ या उनके भाषण या फिर उत्तर प्रदेश यात्राओं और इंटरव्यू के जरिए हों. उनके साथ टीवी न्यूज में उत्तर प्रदेश की सत्ता में काबिज रहने के लिए बीजेपी का अभियान भी पूरे जोर पर जारी है. जरा सोचिए, राज्य में हर बार प्रधानमंत्री के दौरे को कितनी कवरेज मिलती है.

तो, एक बार फिर यह पश्चिम बंगाल जैसा है.

चुनावी भविष्यवाणियां बीजेपी की आसान जीत बताती हैं और न्यूज चैनल उसे पार्टी, प्रधानमंत्री और योगी के प्रशंसा वाले कवरेज से जोरदार बनाते हैं.

लेकिन 2021 ने हमें कुछ सिखाया है तो यही कि न्यूज चैनलों द्वारा हमारी आंखों के आगे परोसे गए ‘सबूत’ पर कतई यकीन न किया जाए. मीडिया के संदेश के आगे खुद को दयनीय और स्वीकार कर लेने जैसा न बनाइए.

हर किसी को नया साल मुबारक.

(ये विचार निजी हैं)

शैलजा बाजपई दिप्रिंट की रीडर्स एडिटर हैं. कृपया अपने विचार और शिकायत readers.editor@theprint.in पर लिखें

(यह लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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