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Thursday, 8 January, 2026
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शेख हसीना की तानाशाही को शह देने का खामियाजा भुगत रही है जातीय पार्टी

आलोचकों का कहना है कि जातीय पार्टी ने बांग्लादेश की उन चुनावी प्रक्रियाओं और सरकारी सत्ता को वैधता देने में मदद की, जिनकी विश्वसनीयता नहीं थी.

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कभी बांग्लादेश की सबसे मजबूत राजनीतिक पार्टियों में शुमार जातीय पार्टी अब कई लोगों की नज़र में उस राजनीतिक कट्टरता और नैतिक दोमुंहेपन का प्रतीक बन गई है, जिसने 2009 के बाद की राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ असंतोष को भड़काया और जुलाई 2024 के जन आंदोलन की स्थिति पैदा करने में मदद की थी.

बांग्लादेश की बड़ी आबादी इस पार्टी को अब तानाशाही का रास्ता तैयार करने वाली पार्टी के रूप में क्यों देखती है इसे समझने और यह तर्क पेश करने के लिए कि इस पार्टी का अब इस देश में कोई जायज जगह क्यों नहीं है, इसके विकास को हाल के वर्षों में इसके साथ जुड़े विवादों पर गौर करना ज़रूरी है.

जातीय पार्टी की स्थापना एक पूर्व सेना अध्यक्ष हुसैन मुहम्मद एरशाद ने 1986 में की थी. सेना अध्यक्ष पद रहते हुए एरशाद ने तख्तापलट करके सत्ता हथिया ली थी और बाद में अपनी फौजी हुकूमत को गैर-फौजी राजनीतिक शासन में बदल दिया था. शुरुआती वर्षों में यह पार्टी मुख्यतः एरशाद की हुकूमत के राजनीतिक अंग के रूप में काम किया. 1990 में जन उभार के कारण उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया गया फिर भी पार्टी ने बांग्लादेश की कलहग्रस्त राजनीति में अपनी मौजूदगी कायम रखी.

इतने दशकों में यह पार्टी स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा वाली पार्टी से ज्यादा, बदलती राजनीतिक धाराओं में भी अपनी नाव खेने के अपने कौशल के लिए जानी जाने लगी है. 21वीं सदी में ज़्यादातर समय यह बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था में एक जोड़ के रूप में बनी रही और अक्सर बड़ी पार्टियों, खासकर अवामी पार्टी की सहयोगी की भूमिका निभाती रही. 2024 में सत्ता से बाहर किए जाने तक अवामी पार्टी 2009 से बांग्लादेश पर राज करती रही थी.

सत्ता से बाहर किए जाने से पहले के वर्षों में जातीय पार्टी ने अवामी लीग के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ चुनाव लड़ती रही और सत्ताधारी पार्टी के व्यापक गठबंधन को मजबूत बनाने में मदद करती रही. 2018 के आम चुनाव में जातीय पार्टी के उम्मीदवार अवामी लीग वाले गठबंधन के साथ रहे, बावजूद इसके कि चुनाव में धांधली के व्यापक रूप से आरोप लगाए गए. वे संसद में विपक्षी खेमे के रूप में भी और सत्ताधारी गठबंधन की छतरी के नीचे भी बैठे. इस दोरंगी भूमिका के कारण इस पार्टी की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठे.

जातीय पार्टी का ‘अपराध’

आलोचकों का कहना है कि जातीय पार्टी ने अपनी साख खो चुकी चुनावी प्रक्रिया और सरकार को जायज ठहराने की कोशिश की. एक के बाद एक चुनाव में उसकी भागीदारी का मतलब यह था कि अक्सर वह सत्ता पर लगाम कसने का काम नहीं करती देखी गई बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनी रही जिसने अवामी लीग की सत्ता मजबूत की.

यह धारणा 2014, 2018, 2024 के विवादग्रस्त चुनावों के दौरान मजबूत होती गई, जो चुनाव मतदाताओं को धमकाने के आरोपों, प्रमुख विपक्षी दलों के बहिष्कार, और निष्पक्षता तथा पारदर्शिता को लेकर संदेहों के कारण कुप्रभावित हुए थे.

जुलाई 2024 में छात्रों के देशव्यापी आंदोलन ने जब प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया तो जातीय पार्टी ने खुद को अजीब स्थिति में फंसा पाया. कई विरोधियों और प्रेक्षकों के लिए अवामी लीग के साथ इस पार्टी की करीबी ने इसे उस व्यवस्था का हिस्सा बना दिया जिसे उखाड़ना आंदोलन का लक्ष्य था.

उथल-पुथल के बाद, जवाबदेही और ढांचागत सुधारों की मांग कर रहे आंदोलनों ने न सिर्फ अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की बल्कि उन पार्टियों को भी बाहर निकालने की मांग की, जिन्होंने उसके शासन के बने रहने में मदद की थी. आंदोलन के कारण बने ‘जुलाई यूनिटी’ जैसे मंचों ने स्पष्ट मांग की कि सहयोगी दलों को राजनीति करने से रोका जाए और उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाए.

नया राजनीतिक समीकरण आकार लेने लगा तो जवाबी हमले बढ़ गए. अपने विवादास्पद अतीत के बावजूद जमात-ए-इस्लामी ने मुल्क के अंतरिम चीफ एड्वाइजर मुहम्मद यूनुस से पुरानी हुकूमत को मजबूती देने में जातीय पार्टी की भूमिका के कारण उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. यह मांग और तेज़ हो गई जब छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) ने भी इसी तरह का मुद्दा उठाया और जातीय पार्टी पर आरोप लगाया कि उसने ‘फांसीवाद को बढ़ावा’ देकर अपनी लोकतांत्रिक वैधता गंवा दी है.

ताज़ा राजनीतिक घटनाओं ने इस तरह के दबावों को बढ़ा दिया है. बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारीक़ रहमान की वापसी ने मुख्यधारा की राजनीति में फिर जान फूंक दी है और तानाशाही विरोधी भावनाओं को मजबूत किया है.

इसी के साथ, एनसीपी और जमात के बीच बढ़ती नज़दीकी ने विपक्षी खेमे को नया स्वरूप दिया है और पुरानी व्यवस्था से मजबूती से जुड़ी किसी पार्टी के लिए कम गुंजाइश ही छोड़ी है. खालिदा ज़िया की मृत्यु ने राजनीतिक माहौल में और फर्क ला दिया है और जनता वैधता, त्याग और प्रतिरोध के मुद्दे पर गहराई से विचार करने लगी है और दमन में मिलीभगत करती दिखी किसी भी पार्टी के लिए समर्थन जुटना मुश्किल है.

इस नए समीकरण के भीतर जातीय पार्टी की चुनावी संभावनाएं कमज़ोर ही होती दिख रही हैं. इसके दफ्तरों पर हो रहे हमले, इसके नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांगें यही दर्शाती हैं कि इसे कितनी नफरत का सामना करना पड़ रहा है.

इस पार्टी के नेता तानाशाही में मिलीभगत करने के आरोपों का खंडन कर रहे हैं और यह तर्क दे रहे हैं कि मिलकर चुनाव लड़ना दोष को साबित नहीं करता, लेकिन प्रक्रिया आधारित तर्कों की जगह नैतिकता के आग्रह को लेकर जो माहौल बना है उसमें इस तरह के बचाव कमजोर ही साबित हो रहे हैं.

जातीय पार्टी और व्यवस्था का मसला

इन आलोचनाओं को कई बांग्लादेशी व्यवस्था जनित समस्या का एक हिस्सा मानते हैं, कि जिन पार्टियों ने कभी मजबूत शासकों को विश्वसनीयता प्रदान की उन्होंने व्यवस्था केंद्रित राजनीति से प्राप्त संरक्षण के लाभ उठाए, जबकि असहमति की आवाजों को दरकिनार किया जाता रहा.

आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार ने अवामी लीग और उसके सहयोगियों की सभी गतिविधियों पर जिस तरह प्रतिबंध लगाया है और इस सबके कारण जो राजनीतिक माहौल बना है उसमें जातीय पार्टी की गतिविधियों का जारी रहना लोकतंत्र की बहाली के घोषित लक्ष्यों से बेमेल लगता है.

जातीय पार्टी ने इन आरोपों के जवाब में यदाकदा रक्षात्मक रियायतें दी हैं. पार्टी के नेताओं ने इन दावों को खारिज किया है कि तानाशाही वाली योजना में उनकी ‘मिलीभगत’ थी. उनका कहना है कि कई दूसरी पार्टियों ने भी उन चुनावों में भाग लिया था, कि भाग लेना दोषी नहीं बना देता. उनका कहना है कि पार्टी ने चुनावी नियमों का पालन किया, इसलिए जब तक उनके उल्लंघन के आरोप सिद्ध नहीं होते, पार्टी के पंजीकरण को रद्द करना अनुचित होगा. वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने ऐसे भी बयान दिए हैं कि ये आलोचनाएं वैकल्पिक आवाजों को दरकिनार करने की राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं.

वैसे, पार्टी के अंदर कभी-कभी आत्ममंथन की आवाज़ें भी उठती रही हैं, जैसे पार्टी महासचिव की, जिनमें पछतावा ज़ाहिर करते हुए कबूल किया गया है कि पिछले राजनीतिक फैसलों में कुछ भूलें भी हुईं जिनके कारण जनता नाराज हुई होगी. लेकिन इस तरह की बातों से उन राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं, जन आंदोलनों और राजनीतिक संगठनों के विचार नहीं बदले हैं, जो मानते हैं कि पार्टी ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका के साथ समझौता किया.

यह भावना कभी-कभी सीधी कार्रवाई में बदल जाती है. जातीय पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पर हमला किया गया है, इसके नेताओं के खिलाफ यह आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किए गए हैं कि उन्होंने पुरानी व्यवस्था के साथ साठगांठ की. कुछ आलोचकों ने इन नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की भी मांग की है.

अब जातीय पार्टी इन चुनौतियों से पार पाने में सफल होती है या नहीं और भविष्य में चुनावों में किन परिस्थितियों के तहत भाग लेती है यह इस पर निर्भर होगा कि बांग्लादेश मौजूदा ऐतिहासिक दौर में किस तरह आगे बढ़ता है. यह देश जबकि एक अंतरिम सरकार के अधीन 12 फरवरी 2026 को होने जा रहे आम चुनाव में भाग लेने जा रहा है, तब जातीय पार्टी को लेकर जो बहस चल रही है वह इस व्यापक संघर्ष में भी तब्दील हो गई है कि जन उभार के दौर के बाद लोकतांत्रिक गतिविधियों के नियम-कायदे तय करने की ज़िम्मेदारी किसे मिलती है.

(फैसल महमूद नई दिल्ली में बांग्लादेश हाई कमीशन में मिनिस्टर (प्रेस) हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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