Sunday, 3 July, 2022
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मंशा हिंदी थोपने की नहीं है, सरकार को इससे पीछे हाथ नहीं हटाना चाहिए

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा लोगों पर हिंदी लादने का कोई षड़यंत्र नहीं बल्कि भाषा और शिक्षा के संबंधों पर नीति तैयार करने की दिशा में आगे की तरफ उठाया गया एक कदम है.

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हिंदी थोपने को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ और फिर सरकार ने मसले पर अपने कदम पीछे खींचे. बीते कुछ दिनों से चल रहे इस प्रकरण पर गौर करते हुए. मुझे ऐसा लगा मानों मेरे अतीत का एक पन्ना फिर से आंखों के आगे खुल गया हो. सात साल पहले मैंने ऐसा ही विवाद देखा और झेला था. कहा गया कि एनसीईआरटी की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में आपत्तिजनक कार्टून शामिल किये गये हैं. प्रोफेसर सुहास पलिशकर के साथ मैं भी पाठ्यपुस्तक तैयार करने वाली समिति का मुख्य सलाहकार था.

विवाद 2012 की मई में उठा था. एनसीईआरटी की 11वीं क्लास की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में शामिल कार्टून को लेकर संसद में एक छोटी, अधकचरी मगर तीखी बहस हुई. कहा गया कि पाठ्यपुस्तक में शामिल कार्टून में आंबेडकर को हिकारत के भाव से दिखाया गया है. राष्ट्रीय मीडिया में भी मसले पर बड़े तेवर के साथ मीन-मेख निकाला गया. हां, ये बात दूसरी है कि इस कवायद में सबसे ज्यादा चोट पहुंची उन बुनियादी बातों को जिनके मौजूद होने पर हम किसी किताब को ‘पाठ्यपुस्तक’ का नाम देते हैं. मसले पर सियासी पारा चढ़ा तो सरकार ने हाथ खड़े कर लिये. तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने संसद से माफी मांगी और कुछ ‘जी हुजूर’ छाप विद्वानों के सहारे उस तथाकथित ‘आपत्तिजनक’ कार्टून को एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक से हटा दिया. प्रोफेसर पलशीकर और मैंने इसके मुखालफत में इस्तीफा दे दिया. प्रोफेसर पलशीकर पर उनके दफ्तर में हमले हुए.

इस बार भी बहुत कुछ वैसा ही हो रहा है. नई सरकार ने नई शिक्षा नीति का मसौदा (डीएनपीई) जारी किया. यह मसौदा 2018 के दिसंबर में सुपुर्द किया गया था.


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इसके लगभग तत्काल बाद विवाद उठा कि बीजेपी गैर-हिंदीभाषी राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है. आरोप तमिलनाडु की सरजमीं से उभरने के कारण सियासी एतबार से संवेदनशील था. बीजेपी के भावी चुनावी मानचित्र में तमिलनाडु को जीतना शीर्ष प्राथमिकताओं में एक है. इसमें एक बड़ी बाधा है बीजेपी की ‘हिंदी-हिमायती’ छवि.

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मीडिया में मसले पर अभी जो अधकचरी बहस चल रही है, उसमें भी ये बात उठी है. मीडिया की तमाम रिपोर्टों और टिप्पणियों में 484 पन्ने की रिपोर्ट के बस दो अनुच्छेदों पर जोर देते हुए ये मान लिया गया है कि डीएनईपी ने कोई निहायत ही नई बात कह दी है. रिपोर्ट के पैरा 4.5.4(पृष्ठ संख्या 81-83) में अंग्रेजी भाषा के दबदबे की बात कही गई है. जिसे लेकर अंग्रेजी मीडिया में संपादकीय लिखे गये हैं. और मानक त्रिभाषा-फार्मूले की बात रिपोर्ट के पैरा 4.5.9 में है. जिसके आधार पर ‘हिंदी थोपने’ का आरोप लगाया जा रहा है. अगर टिप्पणी करने वाले नई शिक्षा नीति के मसौदे के खंड 4.5 में ‘स्थानीय भाषा/मातृभाषा में शिक्षा ‘बहुभाषिकता और भाषाओं की शक्ति’ शीर्षक से वर्णित पूरे अंश तथा भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर केंद्रित अध्याय 22 को पढ़ते तो स्पष्ट हो जाता कि हिंदी थोपने की जिस बड़ी तैयारी के आरोप लगाये जा रहे हैं. वो सही नहीं है. ऐसा लगता है कि मोदी सरकार की गलती निकालने के उत्साह में विपक्ष के कई नेताओं ने राष्ट्रीय महत्व के एक अत्यंत जीवंत मुद्दे पर अधकचरी राय बना ली है.

आईए, रिपोर्ट पर ईमानदारी का रवैया अपनाते हुए सोच-विचार करें. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में कोई ऐसा दबंगई भरा रवैया नहीं अपनाया गया कि हिन्दी भारत की ‘राष्ट्रभाषा’ है, दरअसल हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो हमारे संविधान में भी नहीं कहा गया. ना ही मसौदे में कोई ऐसी बात लिखी गई है जो हम यह मान लें कि अभी देश में जो भाषा-नीति है. उसमें बदलाव करके हिंदी की हैसियत में इजाफा किया गया है. मसौदे में सीधे-सीधे त्रिभाषा फार्मूले को दोहराया गया है जो कागजी तौर पर ही सही 1968 के प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (पैरा 4(3)(बी)) से आधिकारिक तौर पर देश की भाषा-नीति रही है.

इस फार्मूले में सुझाया गया है कि हर बच्चा तीन भाषाएं सीखेगा: एक क्षेत्रीय भाषा और फिर हिंदी तथा अंग्रेजी. अगर बच्चे की क्षेत्रीय भाषा हिन्दी हुई तो उसे कोई और भारतीय भाषा सीखनी होगी और यह भाषा दक्षिण भारतीय भाषा हुई तो क्या ही बेहतर! यह फार्मूला 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (संशोधन 1992) में भी अपनाया गया और साल 2007 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क में भी. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में मसले पर चली आ रही सहमति को ही दोहराया गया है. दरअसल, मूल शिक्षा नीति में हिंदी को लेकर जैसा जोर है उसकी धार नई शिक्षा नीति के मसौदे में तनिक मंद ही की गई है.

त्रिभाषा फार्मूला अंग्रेजी के बरक्स आधुनिक भारतीय भाषाओं या कह लें भाषाओं (यू.आर.अनंतमूर्ति के शब्द) के सवाल को सुलझाने का एक विवेकपूर्ण तरीका रहा है. इस फार्मूले में प्रादेशिक भाषाओं/क्षेत्रीय भाषाओं की वरीयता को स्वीकार किया गया है, साथ ही फार्मूला भारतीय भाषाओं के बीच एक सेतु के तौर पर काम करने के मामले में हिंदी तथा शेष जगत ज्ञान-विज्ञान से भारत को जोड़ने में अंग्रेजी की उपादेयता को भी स्वीकार करता है. दुख की बात है कि इस फार्मूले पर कभी पूरे दिल से अमल नहीं हुआ.

हिंदी-पट्टी के राज्यों ने फार्मूले के अनुशासन से बच निकलने के रास्ते निकाल लिये. हिंदी-भाषी बच्चों को तमिल या फिर मराठी या बंगाली सरीखी भाषाएं सिखाने की जगह संस्कृत(कई मामलों में उर्दू) सिखाने का कर्मकांड अपनाया गया और इस रास्ते त्रिभाषा फार्मूले की खानापूर्ति कर ली गई. इस तरह त्रिभाषा फार्मूले का जमीनी तौर पर नतीजा ये रहा कि गैर हिंदी-भाषी तो हिन्दी सीखते रहे जबकि हिंदी बोलने वालों ने हिंदी को छोड़कर कोई और आधुनिक भारतीय भाषा नहीं सीखीं. इस असमानता ने द्वेष पैदा किया. तमिलनाडु में क्रमागत रुप से बनने वाली सरकारों ने फार्मूले को भाषायी असमानता की नजीर कहकर खारिज किया. अंग्रेजी-भाषी अभिजन ने भारतीय भाषाओं के बीच पैदा इस झगड़े का बड़ी चतुराई से इस्तेमाल अंग्रेजी भाषा का दबदबा कायम करने तथा अंग्रेजी को शिक्षा प्रदान करने की माध्यम-भाषा के रुप में स्थापित करने में किया.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा लोगों पर हिंदी लादने का कोई षड़यंत्र नहीं बल्कि भाषा और शिक्षा के संबंधों पर नीति तैयार करने की दिशा में आगे की तरफ उठाया गया एक कदम है. इस सिलसिले की पहली बात तो यह कि मसौदे में बहुभाषिकतावाद को भारत सरीखे देश में शिक्षा की बुनियाद माना गया है और इस तरह व्यर्थ की इस बहस को तिलांजलि दे दी गई है कि आखिर भारत की राष्ट्रभाषा क्या होनी चाहिए. मसौदे में इस बात की पहचान की गई है कि बच्चे में कई भाषाओं को सीखने की क्षमता होती है और बहुभाषिकता को तरजीह देने वाली शिक्षा के संज्ञानात्मक फायदे हैं. दूसरी बात, मसौदे में पिछले नीतिगत दस्तावेजों के दर्ज और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान से सम्मत इस प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्रीय विवेक को अंगीकार किया गया है कि बच्चे को उसकी ‘घर की भाषा’ या कह लें मातृभाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए.

ये बात संज्ञानात्मक स्तर पर जारी उस बर्बरता की स्थिति के एकदम उलट है. जहां हम देखते हैं कि शिक्षा के माध्यम के रुप में अंग्रेजी का तेजी से पसारा हो रहा है. जबकि शिक्षा हासिल करने वाला बच्चा, उसके माता-पिता और बड़े हद तक उसके शिक्षक भी अंग्रेजी के मामले में एकदम सिफर हैं. तीसरी बात यह कि मसौदे में भारतीय भाषाओं की इस क्षमता का स्वीकार दिखता है कि उनमें आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जा सकती है, देश का भविष्य बनाया जा सकता है. इससे आधुनिक भारतीय भाषाओं की शिक्षा और इन भाषाओं में ज्ञान के निर्माण के रास्ते खुलते हैं. भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण तथा जीवंतता के लिहाज से जो जरुरी सुझाव आये हैं, उन पर सरकार अमल करती है तो बड़ा अच्छा होगा. चौथी बात यह कि मसौदे में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि अंग्रेजी का दबदबा अगर कायम हुआ है तो इसलिए नहीं कि अंग्रेजी के भीतर कोई अनोखी काबिलियत है बल्कि दबदबे की वजह है अभिजन तबके का अंग्रेजी भाषी होना. भाषा को लेकर अभी जो स्थिति है उसे मैं ‘भाषायी रंगभेद’ का नाम देता आया हूं. जिस बात को कहने की जरुरत है वो बात नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दस्तावेज में बड़े साहस के साथ कही गई है कि अंग्रेजी का दबदबा खत्म होना चाहिए.

इस सिलसिले की आखिरी बात यह कि मसौदे में संस्कृत और तमिल (इस श्रेणी में फारसी को भी शामिल किया गया है) सरीखी शास्त्रीय भाषाओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत पर बल दिया गया है ताकि सांस्कृतिक विरासत को समझ को गहरा बनाने में मदद मिल सके. इसलिए, हमें मसले पर बीजेपी बनाम बीजेपी-विरोध के नजरिए से नहीं सोचना चाहिए. बड़े दिनों के बाद अब जाकर एक मसौदा आया है. जिसमें भाषाओं को लेकर एक अग्रगामी सोच का इजहार किया गया है.


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लेकिन जरा गौर करें कि मसौदे की बेबुनियाद आलोचना को लेकर सरकार की क्या प्रतिक्रिया रही ? जैसे डाक्टर मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार नासमझी भरे आरोपों के जोर के आगे झुक गयी थी वैसे ही सर्वशक्तिशाली मोदी सरकार भी बेबुनियाद राजनीति आशंकाओं के घटाटोप के आगे कदम पीछे खींचते दिख रही है. एक तो सरकार ने पूरी हड़बड़ाहट के साथ अपना दामन बचाने के अंदाज में कहा कि दस्तावेज एक मसौदा भर है. ठीक है, मसौदा है ये बात हमने मान ली. लेकिन सरकार ने फिर यह भी कहा कि वो किसी राज्य पर हिंदी थोपने के प्रयास नहीं करेगी. बेशक यह बात भी समझ में आती है. लेकिन सरकार यहीं नहीं रुकी- अचरज कीजिए कि सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने की समिति के अध्यक्ष डा. कस्तूरीरंगन को मसौदे को संशोधित करने के लिए कहा और ऐसा करते हुए एक पल को भी नहीं सोचा गया कि जिस समिति ने रिपोर्ट तैयार की है कम से कम उससे तो सलाह-मशविरा कर दिया जाय.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब तात्कालिक राजनीतिक जरुरत को तरजीह देते हुए शिक्षा में सुधार के बेहतरीन सुझावों को दरकिनार कर दिया गया. भारतीय राजनीति की पोलपट्टी खोलने वाली मशहूर व्यंग्य-रचना राग-दरबारी में आता है. ‘वर्तमान शिक्षा पद्धति गली में पड़ी हुई वह कुतिया है जिसे कोई भी लात मार सकता है’.

(योगेंद्र यादव राजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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