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Saturday, 4 April, 2026
होममत-विमतभारत की तेल और गैस से जुड़ी कमज़ोरी डीजल ट्रकों पर टिकी है

भारत की तेल और गैस से जुड़ी कमज़ोरी डीजल ट्रकों पर टिकी है

डीजल से धीरे-धीरे दूर जाने की प्रक्रिया भारत की रिफाइनरी की अर्थव्यवस्था को जटिल बना सकती है क्योंकि 2032 तक पेट्रोल की मांग अपने उच्च स्तर पर पहुंचकर उसके बाद घटने लगेगी.

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भारत के साफ और हरित परिवहन (क्लीन मोबिलिटी) की दिशा में आगे बढ़ने में एक बड़ी चुनौती है डीजल, जो देश के माल ढुलाई सिस्टम को चलाता है. पश्चिम एशिया में रुकावटों का असर अब फिर से वैश्विक सप्लाई चेन पर दिख रहा है, जिससे तेल और गैस बाज़ार पर दबाव बढ़ गया है. भारत के लिए तुरंत का खतरा केवल कीमतें बढ़ना नहीं है. असली चिंता डीजल पर लगातार बनी हुई निर्भरता है, जो माल ढुलाई और बस परिवहन सिस्टम की रीढ़ है. भारत में सड़क परिवहन में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक ईंधन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा डीजल है. अगर भारत ऐसे वैश्विक झटकों से अपना जोखिम कम करना चाहता है, तो सबसे मुश्किल चुनौती दोपहिया और तीनपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाने में नहीं, बल्कि भारी वाहनों को डीजल से हटाने में होगी.

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के हालिया रिसर्च के अनुसार, दोपहिया और तिपहिया वाहन, जो अधिकतर पेट्रोल पर चलते हैं, सबसे तेज़ी से इलेक्ट्रिक होंगे. 2050 तक इन सेगमेंट में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है. इसके बावजूद 2050 तक सड़क परिवहन की कुल ऊर्जा ज़रूरत का केवल लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा ही बिजली से पूरा होगा. इसका कारण साफ है: ट्रक और बसें, जिनका सड़क परिवहन की कुल ऊर्जा मांग और प्रदूषण में आधे से ज्यादा हिस्सा है, 2040 के दशक तक बड़े पैमाने पर डीजल पर निर्भर रहेंगी. भारी वाहनों की ऊंची लागत, फास्ट चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और इस क्षेत्र के लिए समर्पित नीति के समर्थन का अभाव इस बदलाव की गति को और धीमा कर सकता है.

इसका असर केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है. डीजल से दूरी बनाने की सुस्त रफ्तार भारत की रिफाइनरी अर्थव्यवस्था को भी मुश्किल में डाल सकती है, क्योंकि 2032 तक पेट्रोल की मांग अपने चरम पर पहुंच जाएगी और उसके बाद घटने लगेगी. 2030 के बाद इस अंतर के कारण रिफाइनरी के लिए सामने अपने उत्पादों में संतुलन बनाने में कठिनाई आएगी क्योंकि उन्हें एक तरफ पेट्रोल का उत्पादन कम करना होगा, जबकि दूसरी तरफ डीजल की बढ़ती मांग को पूरा करना होगा. जब तक भारी वाहनों के लिए स्पष्ट बदलाव का रास्ता तय नहीं होता है, यह चुनौती बनी रहेगी.

भारी वाहनों को बदलाव के स्पष्ट रास्ते पर लाने के लिए चरणबद्ध योजना की जरूरत होगी. जहां तुरंत इलेक्ट्रिक वाहन संभव नहीं हैं, वहां कम कार्बन वाले ईंधन जैसे कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) कुछ समय के लिए विकल्प बन सकते हैं. लंबे समय में इलेक्ट्रिक और ग्रीन हाइड्रोजन की ओर बढ़ना जरूरी होगा. छोटे कमर्शियल वाहन पहले से ही साफ ईंधन की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती लंबी दूरी तक माल ढुलाई करने वाले भारी ट्रकों में बदलाव करना है.

भविष्य के लिए तीन कदम

इस बदलाव को तेज़ करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए, भारत को तीन नीतिगत प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए:

पहला, लंबी दूरी तक माल ढुलाई में डीजल की मांग कम करने के लिए एलएनजी रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना चाहिए. सीएनजी के विपरीत, एलएनजी की टैंकरों के जरिए ढुलाई की जा सकती है और सीधे रिफ्यूलिंग स्टेशनों तक पहुंचाया जा सकता है, जिससे यह लंबी दूरी के ट्रकों के लिए ज्यादा उपयुक्त हो जाती है. भारत ने 2030 तक 350 एलएनजी स्टेशन विकसित करने और 50,000 एलएनजी ट्रक तैनात करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन प्रगति अभी धीमी है और फिलहाल केवल 29 एलएनजी स्टेशन ही चालू हैं. खासकर तमिलनाडु और केरल जैसे प्रायद्वीपीय राज्यों में, जहां पहले से एलएनजी आयात टर्मिनल मौजूद हैं, रिफ्यूलिंग नेटवर्क को मजबूत करने से एलएनजी ट्रकों को अपनाने की गति तेज हो सकती है और डीजल की मांग बढ़ने की रफ्तार कम हो सकती है, भले ही इससे कम समय में प्रदूषण में कमी का फायदा सीमित हो. गैस की ज्यादा मांग भारत के कम उपयोग हो रहे एलएनजी टर्मिनलों की अर्थव्यवस्था को भी बेहतर बनाएगी और आयात अनुबंधों में विविधता लाने में मदद करेगी, जो आम तौर पर 10 साल से ज्यादा समय के लिए सप्लाई तय करते हैं.

दूसरा, वास्तविक आवाजाही के डेटा का उपयोग करके फ्रेट कॉरिडोर का विद्युतीकरण (इलेक्ट्रिफिकेशन) प्राथमिकता में रखा जाए. भारत ई-वे बिल और फास्टैग लेनदेन के जरिए महत्वपूर्ण डेटा तैयार करता है, जिससे सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले माल ढुलाई मार्गों की पहचान की जा सकती है. उदाहरण के लिए, गोल्डन क्वाड्रिलेटरल नेटवर्क भारत की लगभग 40 प्रतिशत सड़क माल ढुलाई की मांग को संभालता है, इसलिए यहां से कॉरिडोर इलेक्ट्रिफिकेशन की शुरुआत की जा सकती है. CEEW के विश्लेषण के अनुसार, 2050 तक ट्रकों के सिर्फ 7 प्रतिशत बेड़े को इलेक्ट्रिक बनाने के लिए एक लाख से ज्यादा मीडियम और फास्ट चार्जिंग स्टेशनों की जरूरत होगी, जिनमें हाई कैपेसिटी चार्जर (100-350 kW) शामिल होंगे, जो भारी ट्रकों को लगभग 45-90 मिनट में चार्ज कर सकते हैं. चार्जर के अलावा, कॉरिडोर इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए पर्याप्त ग्रिड कनेक्शन, ट्रांसफॉर्मर क्षमता और लॉजिस्टिक्स हब की भी ज़रूरत होगी. सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर निजी कंपनियों को चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन सबसे व्यस्त माल ढुलाई कॉरिडोर को प्राथमिकता देने वाले डेटा-आधारित दृष्टिकोण को अपनाने से इनके उपयोग में सुधार आ सकता है। फिलहाल ऐसा डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है और देशभर में माल ढुलाई का विस्तृत सर्वेक्षण पिछले एक दशक से ज्यादा समय से नहीं किया गया है.

तीसरा, लागत कम करने, आयात पर निर्भरता घटाने और भारत के ईवी (ईवी) भविष्य के लिए सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए आत्मनिर्भर बैटरी वैल्यू चेन तैयार करना जरूरी है. उम्मीद है कि इलेक्ट्रिक बस और ट्रक 2030 के शुरुआती वर्षों में डीजल के बराबर लागत पर आ जाएंगे और 2040 के शुरुआती वर्षों में सीएनजी या एलएनजी के बराबर पहुंच जाएंगे. इस अवसर का लाभ उठाने के लिए घरेलू रिसर्च और डेवलपमेंट में ज्यादा निवेश और एडवांस केमिस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरियों, जिनमें लिथियम-आयन और अगली पीढ़ी की बैटरियां शामिल हैं—के लिए एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम तैयार करना होगा, जो इलेक्ट्रिक वाहनों को ऊर्जा देती हैं. भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत एसीसी बैटरी स्टोरेज के लिए 50 GWh वार्षिक उत्पादन क्षमता का लक्ष्य तय किया गया है. यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन देश में सेल मैन्युफैक्चरिंग अभी शुरुआती चरण में है और बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तेजी से विस्तार करना होगा. केवल परिवहन क्षेत्र की मांग ही 2030 तक 110 GWh प्रति वर्ष से ज्यादा और 2050 तक लगभग 360 GWh प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है.

भारत की क्लीन मोबिलिटी की दिशा में सफलता आखिरकार इस बात पर निर्भर करेगी कि माल ढुलाई क्षेत्र में क्या बदलाव होता है. ट्रकों और बसों को नए ऊर्जा मार्ग पर लाना ही यह तय करेगा कि भारत तेल के झटकों को संभाल पाएगा या उनसे प्रभावित होता रहेगा.

हेमंत मल्या फेलो हैं और दर्शन सिद्धार्थ मोहन काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) में प्रोग्राम एसोसिएट हैं. ये लेखकों के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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