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Saturday, 3 January, 2026
होममत-विमतभारत का सबसे नतीजाखेज दशक और पत्रकारिता की 'ड्रीम टीम' के साथ उसकी खबरनवीसी का मजा

भारत का सबसे नतीजाखेज दशक और पत्रकारिता की ‘ड्रीम टीम’ के साथ उसकी खबरनवीसी का मजा

आप कहेंगे कि 1985-95 का दशक तो कब का बीत चुका लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि उस दशक में जो मसले उभरे वे आज भी हमारे लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्शों पर हावी हैं.

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समाचार पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ के 50 वर्ष पूरे होने जा रहे थे. उसने मुझे 1985-95 के दशक के बारे में लिखने का अनुरोध किया. उस दशक में मैं उससे जुड़ा रहा था. यह लेख मेरी उस सीरीज़ ‘फर्स्ट पर्सन सेकंड ड्राफ्ट’ का ताजा संस्करण है, जो गाहे-ब-गाहे मैं लिखता रहता हूं.

एक युवा और विकासशील गणतंत्र का हर दशक स्वाभाविक है कि सबसे नतीजाखेज होने का दावा कर सकता है. इस लिहाज से भी 1985-95 के दशक में शायद ऐसी सबसे ज्यादा खबरें बनीं जो आज भी हमारे लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्शों पर हावी हैं.

देश के लिए और करीब के पड़ोस के लिए महत्वपूर्ण रहीं इन खबरों को याद कीजिए: शिखर पर पहुंचने के बाद कांग्रेस पार्टी का पतन, गठबंधनों की शुरुआत, बोफोर्स घोटाला, मंडल बनाम मंदिर की टक्कर, पंजाब और कश्मीर में अलगाववाद, श्रीलंका और मालदीव में भारत के सैन्य हस्तक्षेप, पाकिस्तान के साथ युद्ध के कगार पर पहुंचना (ब्रासटैक्स, 1987, और 1990 में पाकिस्तान का ‘परमाणु ब्लैकमेल’), सुमदोरोंग चू में चीन से आमना-सामना (1986-87) और इसके बाद तंग श्याओपिंग से सुलह, ज़िया-उल-हक़ और राजीव गांधी की हत्या, इस्लामवादी (इस्लामी नहीं) जिहाद का वैश्वीकरण और उसका कश्मीर में विस्तार, और भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण. हालांकि यह दशक लोकसभ में कॉंग्रेस को मिली 414 सीटों की चट्टानी स्थिरता के साथ शुरू हुआ लेकिन इस दशक ने चार प्रधानमंत्री देखे. मात्र 10 साल के लिए यह संख्या क्या ज्यादा नहीं है?

खबरें और भी हैं. आर्थिक सुधारों के कारण विश्वभर में पैर फैला रहे भारत के दांव और उसका दर्जा ऊंचा हुआ, और जिस तरह ‘इंडिया टुडे’ देश और दुनिया में हो रहे बदलावों को सबसे विस्तृत और विश्वसनीय रूप से दर्ज करने वाली पत्रिका के रूप में उभरी, उसके अग्रगामी जज्बे ने उसके पाठकों को दुनिया में दूर-दूर तक पहुंचाया — अफगान युद्ध और त्यानअनमान चौक से लेकर सोवियत संघ के विघटन, और कुवैत पर सद्दाम हुसैन के कब्जे के कारण हुए प्रथम खाड़ी युद्ध तक. शीतयुद्ध खत्म हुआ और रंगभेद भी, भारत और इजरायल दोस्त बने. हमारी पत्रिका ओलिंपिक से लेकर एशियाई खेलों और विदेश में हो रहे प्रमुख क्रिकेट सीरीजों तक की आंखों देखी खबरें देने के लिए अपनी टीम भेजने वाली पहली पत्रिका बनी.

अच्छी खबर हो या बुरी, पीढ़ीगत बदलाव हों या शाश्वत विमर्श हों, सभी मामलों में दूसरे दशकों को इस दशक की बराबरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. सिक्के का एक पहलू यह है कि आजादी के बाद से भारत की जो-जो आशंकाएं थीं वे सब इस दशक में सच साबित हुईं, चाहे वह राजनीतिक अस्थिरता को लेकर हो या सांप्रदायिक और जातीय विभाजनों, स्थिरता देने वाले एक परिवार के कमजोर पड़ने, परमाण्विक और आतंकवादी खतरों, सामाजिक उथलपुथल आदि को लेकर हो, या भरोसेमंद मित्र देश (सोवियत संघ) को खोने को लेकर. सिक्के का दूसरा पहलू का ताल्लुक इस बात से है कि भारत ने इन सबका सामना कैसे किया— गठबंधनों पर भरोसा करना सीख कर, अपनी अर्थव्यवस्था को सुधार कर, खुद को नए रणनीतिक संदर्भ के साथ पेश करके और अपने मानव संसाधन के अपनी ताकत बनाकर. भारत और ज्यादा ताकतवर, आत्मविश्वासी बना और दुनिया में उसने अपनी धाक बढ़ाई.

उन वर्षों में ‘इंडिया टुडे’ ने इन बदलावों की नब्ज पर उंगली रखी और अक्सर वह सबसे आगे रही. उस दौर का पहला टिकाऊ बदलाव था— कंप्यूटरों को राजीव गांधी द्वारा बढ़ावा देना. भारतीय न्यूज़रूम में पहला कंप्यूटर एपल का बॉक्सनुमा डेस्कटॉप था, जो 1985 में आया. जगह की कमी से जूझते न्यूज़रूम में इन्हें अलग कमरा देना पड़ता था.

उंगलियों में दर्द पैदा करने वाले टाइपराइटरों से मुक्ति और फ्लॉपी डिस्क के भरोसे ने कीबोर्ड के लिए आकर्षण बढ़ाया. संपादन आदि का ज़्यादातर काम करने वाले दिलीप बॉब ने जल्दी ही एक डेस्कटॉप अपने लिए हासिल कर लिया या इसका कम-से-कम दिखावा किया, और उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ में ‘प्रोसेस’ आधारित सहायता की चमत्कारी धुरी रहीं शर्ले जोशुआ से एक छोटी-सी तख्ती बनवा ली जिस पर लिखा था— ‘दिस इज़ दि एपल ऑफ माई आई’, और इसे अपने डेस्कटॉप पर लगा दिया था. लेकिन बुरे तत्व उस सीमारेखा का प्रायः और पूरी लापरवाही से उल्लंघन करते रहते थे. चूंकि हम अपने जीवन में आए मोड़ों को याद रखते हैं, इन डेस्कटॉपों में से एक पर मैंने अपनी पहली जो रिपोर्ट टाइप की वह 1985 में मंडल रिपोर्ट पर उठे विवाद को लेकर थी. वह विवाद चार दशक बाद आज भी जारी है.

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और उसके बाद दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के कारण कई राज्यों में संप्रदायिक दंगे हुए. सबसे खूनी दंगे बॉम्बे और उसके आसपास के भीड़ भरे स्लमनुमा छोटे शहरों में हुए. इसके बाद प्रमुख व्यापारिक इमारतों और पड़ोसों को निशाना बनाकर सीरियल बम विस्फोट किए गए. भारत को सीरियल बम विस्फोटों का यह पहला अनुभव नहीं था, देश की राजधानी  पंजाब संकट और सिखों के संहार के बाद ऐसे कुछ विस्फोटों से गुजर चुकी थी. लेकिन बॉम्बे में जिस बड़े पैमाने पर विस्फोट हुए वैसे नहीं हुए थे, और उनके तार जितने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान से जुड़े नजर आए वैसा पहले नहीं हुआ था. तीन शब्दों के संक्षिप्त नाम वाले आतंक, आईएसआई ने अपनी मौजूदगी जताई, और तब से यह हमें परेशान करता रहा है. माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम शारजाह के क्रिकेट स्टेडियम में नाटकीय रूप से प्रकट होकर भारत के लिए ‘विलन नंबर वन’ बन गया, और बना हुआ है.

राजीव गांधी ने 1985 में मंडल रिपोर्ट को सहजता से अमान्य करके पिछड़ों के उभार की चिनगारी सुलगा दी. इसके बाद कई ऐसी गलतियां की गईं जिन्होंने सांप्रदायिकता को उभार दिया, मसलन शाहबानो मामले में अदालत के फैसले को पलटना, सलमान रश्दी की किताब ‘द सटेनिक वर्सेस’ पर प्रतिबंध लगाना, अयोध्या में मंदिर के ताले खुलवाना. इसके बाद से हमारी राजनीति दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच टकराव में बदल गई है. आप धर्म से बनी एकता को जाति की तलवार से कैसे बांट सकते हैं या जाति ने जिसे बांट रखा है उसे धर्म के नाम पर कैसे जोड़ सकते हैं, इसी का खेल चल रहा है. इस खेल में जो भी जीतता है, भारत पर वही राज करता है. मंडल खेमे को 1989 से 2014 तक 25 साल राज करने का मौका मिला, जब तक कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में आकर इस समीकरण को उलट नहीं दिया. अब यह मंदिर (हिंदुत्व) वालों का दौर है, और ऐसा नहीं लगता कि इसकी उम्र 25 साल से कम होगी. मसला अभी भी मंदिर बनाम मंडल का ही है. अभी-अभी यह बिहार में जाहिर हो चुका है, और 2027 में उत्तर प्रदेश में भी यही रहने वाला है.  इस दशक ने राष्ट्रीय राजनीति को जिस तरह परिभाषित किया है वह अब तक के इतिहास में सबसे टिकाऊ रहा है. यह बात राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है. आर्थिक सुधारों से आए उछाल के 35 साल बाद जबकि हम अपनी सफलताओं का जश्न मना रहे हैं तब भी अर्थव्यवस्था को और खोलने के सवाल पर आशंकाएं और संदेह कायम हैं.

एक संस्था के रूप में ‘इंडिया टुडे’ की ताकत और खूबसूरती इस बात के कारण है कि यह एक निष्पक्ष, अवसरों से भरी योग्यता आधारित व्यवस्था के रूप में उभरी. इसने कोई समझौता नहीं किया, और कभी-कभी बहुत क्रूर भी रही. लेकिन आपके अंदर अगर भूख, लगन, प्रतिभा है और आपकी चमड़ी मोटी है तो आपको आगे बढ़ने से कुछ नहीं, कोई नहीं रोक सकता.

पूर्वोत्तर राज्यों की खबरें देने के बाद 1983 में जब मैं इस पत्रिका में आया था तब मुझे चेताया गया था कि यह एक ‘फाइव स्टार न्यूज़रूम’ है जहां हिंदी मीडियम टाइप के साधारण किस्म के लोगों की कड़ी परीक्षा ली जाति है और खारिज कर दिया जाता है. लेकिन ‘इंडिया टुडे’ में बदलाव भी आया. पत्रिका के लिए मेरी पहली कवर स्टोरी सुनील गावसकर पर थी, जिन्होंने डॉनल्ड ब्रैडमैन की बराबरी करते हुए अपनी 29वीं सेंचुरी बना ली थी. इससे पहले मैंने खेलों पर इतनी बड़ी रिपोर्ट नहीं लिखी थी. बात इतनी थी कि अरुण पुरी और सुमन दुबे (उस समय मैनेजिंग एडिटर) को लगा कि मैं इस खबर को लेकर काफी उत्तेजित हूं. टी.एन. नाइनन कहते हैं कि उस दौर में ‘इंडिया टुडे’ का न्यूज़रूम में भारतीय पत्रकारिता की स्वप्निल टीम मौजूद थी. इसका सबूत आपको गूगल पर मिल जाएगा. उस दशक में पत्रिका के ‘मास्टहेड’ पर नजर डालिए, और अंदाजा लगाएं कि आज हम कहां पहुंचे हैं.

विशुद्ध योग्यता को प्राथमिकता इसकी कुंजी तो थी ही, ‘इंडिया टुडे’ एक अवधारणा को भी आगे बढ़ा रही थी,  ‘रिपोर्टर-संपादक’ वाली अवधारणा को. सिर्फ इतना नहीं था कि रिपोर्टर को संपादक बनाना है. ‘इंडिया टुडे’में सब कुछ इतना सीधा-सा नहीं था. इसका अर्थ यह था कि संपादक बनने के बाद भी आपको रिपोर्टिंग जारी रखनी है, बेशक आपको संपादक की तमाम जिम्मेदारियां तो निभानी ही थी.

हमें कई काम करना कैसे सिखाया जाता था, इसका एक उदाहरण देखिए. उस दशक में ‘इंडिया टुडे’ ने हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम और गुजराती में भी अपने पांच संस्करण शुरू किए, जिन्हें देखने की भी ज़िम्मेदारी मुझे 1991 में दी गई, जबकि मैं लिखने के अलावा दूसरे काम भी कर रहा था. कभी-कभी हम बिलकुल थक जाते थे और हमें उम्मीद होती थी कि अरुण इसे कबूल करेंगे. लेकिन नहीं, वे ऐसा नहीं करते थे. रश्दी की किताब के खिलाफ फतवे पर 18 पेज की कवर स्टोरी की दो रातों तक जागकर एंकरिंग करने के, जिसमें दुनिया भर से एक फुटबॉल टीम के बराबर की टीम लगी हुई थी, बाद संतुष्ट होकर मैं अपनी मेज पर दोनों पैर पसारकर बैठा ही था कि अरुण सामने से गुजरे. न्यूज को-ऑर्डिनेटर संध्या मूलचंदानी ने अरुण से सहमति की उम्मीद के साथ यह कहा कि उसे इतनी कड़ी मेहनत मत न करने को कहो, अरुण, वह मर जाएगा, लेकिन अरुण ने सिर्फ यह जवाब दिया कि ‘कड़ी मेहनत करने से कोई मर नहीं जाता’, और आगे बढ़ गए.

अंत में, यहां मैं उन तीन सबसे अहम सबक का जिक्र करना चाहूंगा, जिन्हें मैंने आज तक याद रखा है :

  1. किसी भी खबर का दूसरा पहलू भी जरूर होता है. जब तक आप उस पहलू की जांच नहीं कर लेते तब तक कोई खबर छपने लायक नहीं होती. इससे कोई समझौता नहीं हो सकता. और तब अगर कोई यह कहे कि रिपोर्ट में उसके साथ नाइंसाफी हुई है तो एक संपादक के नाते आपको स्वाभाविक रूप से दूसरे पक्ष के साथ होना चाहिए, जब तक कि आपके तथ्यों की जांच नहीं हो जाती.
  2. जो भी चीज मुफ्त में या आसानी से मिल रही हो उसमें जरूर कोई खोट होगी. उसे सीधे इनकार कर दीजिए या उसका खुलासा करके उसकी जांच कीजिए.
  3. तीसरे, कार्यस्थल पर पहचान को लेकर सजग मत रहिए. लिंग, स्थान, जाति, धर्म, आदि किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं, बदला नहीं, शोषण नहीं, पक्षपात नहीं. योग्यता पर चलने वाले इस आश्चर्यजनक न्यूज़रूम में अवसरों की कमी नहीं होती. इस लिहाज से ‘इंडिया टुडे’ संस्थागत रूप से भविष्यदर्शी रही है. वह आर्थिक सुधारों और वृद्धि के कारण प्रतियोगी समानता की जो नयी मध्यवर्गीय चेतना बनी है उससे भी आगे रही है.

मैं 1983 में ‘इंडिया टुडे’ में आया और दशक पूरा होते-होते 1995 में वहां से विदा हुआ. इस लेख के शुरू में मैंने इतिहास को परिभाषित करने वाली जिन करीब दर्जनभर खबरों का जिक्र किया उनमें से मैं केवल एक—आर्थिक सुधार—को छोड़ बाकी सबकी खबर दी, अब मैं यही कहूंगा कि उस दशक में ज़िंदगी अच्छी गुजरी, खासकर अरस्तूवादी नजरिए से.

(फर्स्ट पर्सन सेकंड ड्राफ्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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