scorecardresearch
Friday, 13 March, 2026
होममत-विमतभारतीय मुसलमानों को ‘ग्लोबल उम्माह’ के बारे में भ्रम छोड़ना चाहिए

भारतीय मुसलमानों को ‘ग्लोबल उम्माह’ के बारे में भ्रम छोड़ना चाहिए

गाज़ा और ईरान की हाल की घटनाओं ने ‘ग्लोबल इस्लाम’ के विचार की खोखलापन को उजागर कर दिया है.

Text Size:

मुस्लिम एकता एक सपना है और एक डर भी. जितनी यह कई मुसलमानों के लिए चाहत है, उतनी ही गैर-मुसलमानों के लिए डर का कारण भी है. इसे इसलिए नहीं चाहा जाता कि यह पूरी दुनिया में भाईचारा लाएगी, बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसी संयुक्त सेना की कल्पना करती है जो कुफ्र के खिलाफ लड़े. गैर-मुसलमान भी इसी कारण से इससे डरते हैं.

इसलिए जब भी कोई मुस्लिम देश किसी गैर-मुस्लिम देश से युद्ध करता है, तो कई आम मुसलमान उम्मीद करते हैं कि बाकी सभी मुस्लिम देश भी उस लड़ाई में कूद पड़ेंगे. जब ऐसा नहीं होता, तो मुस्लिम पक्ष में निराशा दिखाई देती है और दूसरी तरफ राहत की सांस ली जाती है.

इसके बाद यह कहा जाने लगता है कि मुस्लिम एकता सिर्फ एक कल्पना है और शुक्र है कि कभी कोई संयुक्त उम्माह सेना नहीं बनेगी जो किसी सामान्य भू-राजनीतिक संघर्ष को विनाशकारी युद्ध में बदल दे.

मुस्लिम विचारक, खासकर भारत में, मुसलमानों को यह सोचने के लिए तैयार करते रहे हैं कि मुस्लिम देशों के यथार्थवादी राजनीतिक फैसले इस्लामी आदर्शों के साथ विश्वासघात हैं. हालांकि, ऐसी एकता कभी वास्तव में नहीं बनती, फिर भी इस आदर्श को छोड़ा नहीं जाता और उम्मीद बनाए रखी जाती है.

हर एकता के पीछे एक विरोधी भी होता है, जिसके खिलाफ वह बनाई जाती है. साफ है कि मुस्लिम एकता का विचार टकराव वाला है और इसमें युद्ध की मानसिकता झलकती है.

धार्मिक दृष्टि से इस्लामी एकता पर सबसे मशहूर हदीस असल में इसके उलट की बात करती है. पैगंबर के बारे में कहा जाता है: “यहूदी 71 फिरकों में बंट गए, ईसाई 72 फिरकों में बंट गए. मेरी उम्मत 73 फिरकों में बंटेगी; उनमें से एक को छोड़कर बाकी सब आग में होंगे.”

और इस्लाम की शुरुआत से ही ऐसा होता आया है. पैगंबर की मृत्यु के बाद ही मुस्लिम समुदाय दो हिस्सों में बंट गया, जब अली के समर्थकों ने अबू बक्र को खलीफा बनाए जाने का विरोध किया.

राजनीतिक नेतृत्व के उत्तराधिकार का सवाल धीरे-धीरे धार्मिक विचारधाराओं में बदल गया और इतिहास में कई नए फिरकों के बनने का कारण बना. धर्म में हर विवाद धार्मिक बन जाता है; कुछ भी सिर्फ राजनीतिक नहीं रहता.

ऑक्सफोर्ड के इतिहासकार फैसल देवजी ने ‘Against Muslim unity’ नामक लेख में लिखा है कि इस्लाम को एकजुट करने का विचार हाल का आविष्कार है और यह अच्छा नहीं है.

उनके अनुसार, “काल्पनिक ‘मुस्लिम एकता’ की बात करना मुसलमानों को उन राष्ट्र-राज्यों की राजनीतिक दुनिया से दूर कर देता है जिनमें वे रहते हैं. इस नजरिये से मुस्लिम उग्रवाद भी राजनीति से दूरी का परिणाम है, न कि उसका कारण.”

देवजी का कहना है कि मुस्लिम समाजों का अपने राष्ट्रीय संस्कृतियों से अलग हो जाना और अपने ही राष्ट्र-राज्यों से दूरी बना लेना उग्रवाद को बढ़ाता है.

यह प्रक्रिया भारत में सबसे साफ दिखाई देती है.

मुस्लिम एकता एक राजनीतिक हथियार के रूप में

पूरी दुनिया के मुसलमानों की एकता का आदर्श—पैन-इस्लामवाद—19वीं सदी के अंत में तब उभरा जब मुस्लिम सत्ता कमज़ोर होती जा रही थी.

जब मुगल शासन था, तब भारतीय मुसलमानों ने उस्मानी खलीफात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन मुगल शासन खत्म होने के बाद और खासकर 1862 में बहादुर शाह ज़फर की रंगून में मृत्यु के बाद, उन्होंने तुर्की के खलीफा के प्रति निष्ठा जतानी शुरू कर दी, जबकि वे ब्रिटिश शासन के अधीन रह रहे थे.

उनका सिर ब्रिटिश शासन के आगे झुका हुआ था, लेकिन दिल तुर्किए के खलीफा के साथ था. इस सिर और दिल के विभाजन में वे यह भूल गए कि उनका पूरा अस्तित्व—शरीर और आत्मा भारत में है. यही विभाजन आगे जमीन पर और भी कई विभाजनों का कारण बना.

इस्लाम के क्लासिकल दौर में, जब 1095 से 1291 तक यरूशलम को लेकर क्रूसेड्स चल रहे थे, तब मुस्लिम दुनिया में एक नहीं बल्कि तीन खलीफात थे—बगदाद में अब्बासी, काहिरा में फातिमी और स्पेन में अल्मोराविद व अल्मोहाद.

इनमें से किसी ने भी इस संघर्ष को इतना महत्वपूर्ण नहीं माना कि वे एकजुट होकर पवित्र स्थल की रक्षा करें.

इस्लाम के ऐतिहासिक विवरण अधिकतर फिरकापरस्ती के युद्धों से भरे हुए हैं, जहां विश्वासघात और टकराव आम रहे. इस्लाम के शक्ति के दौर में एकता की बात कम सुनाई देती है; यह विचार बाद के समय में ज्यादा उभरा.

अपनी किताब The Struggle Within Islam (1989) में विद्वान-राजनेता रफीक ज़कारिया ने इस्लामी इतिहास का अध्ययन करते हुए कहा कि इस्लाम में हमेशा एक आंतरिक संघर्ष रहा है—धर्म के आदर्शवाद और व्यवहारिक राजनीति के बीच.

वे कहते हैं कि एक संयुक्त उम्माह का विचार आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन इतिहास में वास्तविकता राजनीतिक विभाजन और आंतरिक तनाव से भरी रही है.

ज़कारिया का एक प्रमुख तर्क यह है कि पश्चिमी पर्यवेक्षक और कई मुसलमान अक्सर मुस्लिम दुनिया को एक समान इकाई मान लेते हैं, जबकि वास्तव में राष्ट्रवाद और जातीय पहचान (फारसी, अरब, तुर्क आदि) ने राजनीतिक निर्णयों को ज्यादा प्रभावित किया है.

इसके अलावा सुन्नी और शिया के बीच बुनियादी विभाजन और कई उप-फिरकों ने ऐसे आंतरिक सीमाएं बना दीं जिन्हें केवल धार्मिक भावना से पाटना संभव नहीं था.

जकारिया यह भी कहते हैं कि “इस्लामी एकता” का नारा अक्सर आध्यात्मिक कारणों से नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति को मजबूत करने या बाहरी खतरों का सामना करने के लिए दिया जाता रहा है.

जब धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक एकता लागू करने के लिए किया जाता है, तो इससे बौद्धिक विविधता दब जाती है और “दूसरे” लोगों—गैर-मुसलमानों या अलग विचार वाले मुसलमानों के साथ टकराव बढ़ जाता है.

ज़कारिया के विचारों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस्लामी एकता का आह्वान, जो इस्लामवाद का मुख्य सिद्धांत है—असल में युद्ध का आह्वान बन जाता है.

यह भक्ति का रास्ता नहीं बल्कि शक्ति पाने का बहाना बन जाता है. इसका उद्देश्य समुदाय का आध्यात्मिक या आर्थिक उत्थान नहीं बल्कि एक वैचारिक समूह के हाथों में सत्ता को मजबूत करना होता है.

“गलबा-ए-इस्लाम” यानी इस्लामी प्रभुत्व की यह कोशिश कई बार स्त्री-विरोध, श्रेष्ठतावाद और हिंसा को बढ़ावा देती है. इसे जिहाद कहा जाता है, जो आम लोगों के निजी और शांत धार्मिक जीवन से अलग है.

इस्लामी एकता कभी शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए नहीं हो सकती—यह अपने स्वभाव में टकराव वाला विचार है. बाहर की दुनिया में यह देशों को युद्ध की ओर ले जाता है और अंदर समाज में दमन पैदा करता है.

“इस्लामी गणराज्य” इसका उदाहरण हैं—सबसे पहले ईरान और पाकिस्तान.

‘ग्लोबल इस्लाम’ का अरब केंद्र

पैन-इस्लामवाद, जो 19वीं सदी के आखिर में एक प्रतिक्रिया के रूप में शुरू हुआ था और 20वीं सदी के बीच तक राजनीतिक इस्लाम (इस्लामवाद) की सक्रिय विचारधारा बन गया, आने वाले दशकों में पूरी दुनिया में फैल गया. यह धीरे-धीरे इस्लामी प्रभुत्व और शरीयत लागू करने की पूरी विचारधारा बन गया.

इसे सऊदी अरब की वहाबी सरकार की भारी फंडिंग और ईरानी क्रांति की सफलता से भी बढ़ावा मिला, जबकि इनके बीच अंदरूनी फिरकापरस्ती की दुश्मनी भी थी. विद्वानों ने इस घटना को “ग्लोबल इस्लाम” नाम दिया है.

इतिहासकार नील ग्रीन के अनुसार, “ग्लोबल इस्लाम शब्द उन इस्लाम के रूपों के लिए इस्तेमाल होता है जिन्हें मुस्लिम धार्मिक कार्यकर्ताओं, संगठनों और देशों ने आधुनिक वैश्वीकरण के दौर में भौगोलिक, राजनीतिक और भाषा की सीमाओं के पार फैलाया. इसके विपरीत, ‘वर्ल्ड इस्लाम’ उन पुराने रूपों को कहा जाता है जो आधुनिक वैश्वीकरण से पहले लगभग एक हजार साल में अलग-अलग स्थानीय और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए.”

इस परिभाषा को देखते हुए, ऊपर बताए गए फैसल देवजी के एक महत्वपूर्ण विचार को याद करना ज़रूरी है: “ग्लोबल इस्लाम” तब पैदा होता है जब मुसलमान अपने स्थानीय “राष्ट्रीय संस्कृतियों” से कट जाते हैं और उसकी जगह एक समान, लड़ाकू पहचान अपना लेते हैं.

ग्लोबल इस्लाम दिखने में अंतरराष्ट्रीय है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. यह सांस्कृतिक जड़ों से कटे होने की एक विचारधारा है—लेकिन सिर्फ गैर-अरब मुसलमानों के लिए.

इस्लाम का अपना एक राष्ट्रवाद भी है: वह अरब है.

20वीं सदी के अरब राष्ट्रवादियों—पैन-अरबवाद के दोनों रूप, नासेरवादी और बाथवादी, ने इस्लाम को सिर्फ धर्म नहीं माना, बल्कि अरब राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विचारधारा का आधार माना. उन्होंने इस्लाम को अरबों की “प्रतिभा” और उनकी ऐतिहासिक महानता का माध्यम बताया. मिशेल अफ्लाक (1910-89), जो बाथ पार्टी के सह-संस्थापक थे, खुद ईसाई होने के बावजूद इस्लाम को अरबवाद की “आत्मा” और पैगंबर मुहम्मद को सबसे बड़े अरब नायक मानते थे.

अपनी किताब The Great Theft: Wrestling Islam from the Extremists (2005) में इस्लामी विद्वान खालिद अबू अल फदल बताते हैं कि इस्लाम और अरब राष्ट्रवाद के मेल ने किस तरह वहाबियत जैसी कठोर विचारधारा को जन्म दिया.

अरब संस्कृति और इस्लाम की गहरी एकता ने 7वीं सदी की अरब जनजातीय परंपराओं को हमेशा के लिए स्थायी शरीयत कानूनों में बदल दिया. वहाबियत का “शुद्ध इस्लाम” पर जोर वास्तव में 7वीं सदी की अरब जनजातीय संस्कृति को पवित्र बना देना है. इस्लाम अरब संस्कृति का ही उत्पाद है. दोनों इतने गहराई से जुड़े हुए हैं कि एक को दूसरे से अलग करना मुश्किल है. इसलिए जब कोई गैर-अरब मुसलमान “सच्चा मुसलमान” बनने की कोशिश करता है, तो वह अरबों की नकल करता है और अंत में सांस्कृतिक रूप से नकली बन जाता है.

अपने यात्रा-वृत्तांत Among the Believers (1981) और Beyond Belief (1998) में नोबेल पुरस्कार विजेता वी. एस. नायपॉल ने गैर-अरब मुस्लिम देशों में धर्म, पहचान और इतिहास के इस जटिल संबंध को समझाने की कोशिश की है. वे कहते हैं कि धर्म बदलने वाले समाजों में एक तरह की “मनोवैज्ञानिक बेचैनी” पैदा हो जाती है, जहां लोगों को अपने नए धर्म और अपनी पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बीच तालमेल बैठाने में कठिनाई होती है.

भारतीय मुसलमानों की दुविधा

यह संघर्ष सबसे साफ भारत के मुसलमानों में दिखाई देता है.

समुदाय के भीतर सबसे विवादित बहस—देवबंदी आंदोलन, बरेलवी आंदोलन और सलाफी आंदोलन-वहाबी विचारधाराओं के बीच—इस बात को लेकर है कि इस्लामी धार्मिक जीवन में “भारतीयता” कितनी होनी चाहिए. जितना कम कोई व्यक्ति भारतीय दिखाई देता है, उतना ही ज्यादा वह “इस्लामी” माना जाता है.

जैसा कि नायपॉल ने कहा था: “धर्म परिवर्तन करने वाले को अपनी हर चीज से दूर होना पड़ता है. इससे समाज में बहुत बड़ी बेचैनी पैदा होती है…और यह कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती.” शायद अगर इस्लाम भारत में एक बाहरी तत्व की तरह न रहता, तो धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमान अलग समुदाय के रूप में न बनते और इतिहास की दिशा अलग होती. आज की स्थिति में शुद्धतावाद और सांस्कृतिक मेल-मिलाप के बीच की लड़ाई में पहला पक्ष ज्यादा मजबूत दिखाई देता है.

हालांकि, अपनी नई किताब Waning Crescent: The Rise and Fall of Global Islam (2025) में फैसल देवजी यह भविष्यवाणी करते हैं कि “ग्लोबल इस्लाम” अब इतिहास का विषय बनता जा रहा है. वे लिखते हैं कि 19वीं सदी में इस्लाम को एक ऐसी सभ्यता के रूप में देखा गया जिसका वैश्विक स्तर पर उत्थान और पतन हुआ. 20वीं सदी में मुस्लिम उदारवादियों और इस्लामवादियों ने इसे साम्यवाद की तरह एक विचारधारा के रूप में समझा. लेकिन अब इस्लामवाद—यानी धर्म का बहुत ज्यादा राजनीतिक रूप—अपना दौर पूरा कर चुका है और उसकी जगह स्थानीय राजनीति और मानवीय मुद्दे ले रहे हैं.

देवजी लिखते हैं: “हाल के वर्षों में मुस्लिम समाज की बड़ी राजनीतिक आंदोलनों में इस्लाम को मुख्य मुद्दा नहीं बनाया गया. 2010 के अरब विद्रोह से लेकर भारत में 2020 के नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन तक, और 2009 के ईरान के ग्रीन आंदोलन से लेकर 2022 में ईरान में महिलाओं के आंदोलन तक—किसी ने भी मुस्लिम उदारवाद, इस्लामवाद या उग्रवाद को रास्ता नहीं चुना.”

वे यह भी कहते हैं कि इन घटनाओं में इस्लाम मुख्य मुद्दा नहीं रहा, यहां तक कि गाजा युद्ध के विरोध में भी मुस्लिम दुनिया में प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही.

भारत में शाहीन बाग प्रोटेस्ट के दौरान भी शुरुआत में इस्लामी नारे लगे—“तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह”—लेकिन जल्द ही आंदोलन ने रणनीतिक रूप से संविधान की भाषा को अपनाया.

उम्माह का भ्रम

गाज़ा और ईरान में हाल की घटनाओं और उन पर आई प्रतिक्रियाओं ने “ग्लोबल इस्लाम” के विचार और उसके प्रतीक “ग्लोबल उम्मा” की खोखलापन को उजागर कर दिया है.

अपने विज़न 2030 के तहत सऊदी अरबिया ने लगभग वैश्विक धार्मिक विचारधारा के निर्यातक की अपनी भूमिका से पीछे हटना शुरू कर दिया है. “सऊदी-फर्स्ट” राष्ट्रवाद और आर्थिक आधुनिकीकरण को पैन-इस्लामिक नेतृत्व से ऊपर रखते हुए रियाद ने संकेत दे दिया है कि वह अब वैश्विक इस्लामी आंदोलनों का “बैंक” नहीं रहना चाहता.

ईरान का मॉडल—जो वैचारिक, क्रांतिकारी और टकराव वाला है—अब एक चेतावनी भरी मिसाल बन गया है.

एक ऐसी वैश्विक उम्मा, जो किसी साझा दुश्मन के खिलाफ एकजुट होकर लड़ सके (और किसके खिलाफ?), दरअसल राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा द्वारा बनाया गया एक भ्रम ही रहा है.

अब समय आ गया है कि मुसलमान उस एकता के बारे में कल्पनाएँ करना बंद करें, जो न तो उनके पास कभी थी और न ही शायद कभी हो सकती है. जब कोई बाहरी दुश्मन नहीं होता, तो वे अक्सर फिरकापरस्ती के आधार पर आपस में ही लड़ने लगते हैं.

अब समय है कि मुसलमान अपने-अपने राष्ट्रीय और स्थानीय मूलों की ओर लौटें और खुद को अरब जैसा बनाने की कोशिश करने के बजाय इस्लाम को स्थानीय संस्कृतियों के अनुसार ढालें.

खासकर भारतीय मुसलमानों को “ग्लोबल उम्मा” के बारे में भ्रम पालना बंद करना चाहिए. अगर अरब या ईरानियों के लिए उनकी भावनाएं उतनी ही मजबूत हैं, लेकिन दूसरी तरफ से वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो भारतीय मुसलमानों की आत्म-समझ में कहीं न कहीं एक गहरी समस्या है.

इब्न खल्दून भारती इस्लाम के स्टूडेंट हैं और इस्लामी इतिहास को भारतीय नज़रिए से देखते हैं. उनका एक्स हैंडल @IbnKhaldunIndic है. उनसे ibn.khaldun.bharati@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

संपादक की टिप्पणी: हम लेखक को अच्छी तरह जानते हैं और केवल उन्हीं मामलों में छद्म नाम (पेन नेम) की अनुमति देते हैं जब ऐसा करना उचित हो.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: इस सच से रूबरू हो जाएं भारतीय मुसलमान: मुस्लिम मुल्कों को उनकी कोई परवाह नहीं


 

share & View comments