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Saturday, 13 July, 2024
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शांति की आहट- भारत और पाकिस्तान युद्धविराम के असर का मूल्यांकन

नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर युद्धविराम साल भर चला है. इससे नागरिकों को राहत मिली, जबरन विस्थापन कम हुआ, स्कूलों तक पहुंच बढ़ी, और निर्माण और विकास परियोजनाएं दोबारा शुरू हो सकीं.

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25 फरवरी, 2021 को, एक संयुक्त बयान में, भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियान के महानिदेशकों ने “24/25 फरवरी 2021 की आधी रात से सभी समझौतों का कड़ाई से पालन करने और नियंत्रण रेखा और बाकी सभी सेक्टरों में युद्धविराम” लागू करने पर सहमति व्यक्त की. पिछले वर्षों में युद्धविराम उल्लंघन की रिकॉर्ड संख्या के मद्देनज़र सीमा पर “पारस्परिक रूप से लाभप्रद और स्थायी शांति लाने” की दिशा में यह महत्वपूर्ण प्रगति थी. इस लेख में युद्धविराम के फायदे, अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) और नियंत्रण रेखा (एलओसी) के भारतीय हिस्से में सरहदी आबादी पर असर, और आगे के रास्ते पर चर्चा की गई है.

फरवरी 2021 के युद्धविराम की सफलता

भारत के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में पाकिस्तान की तरफ से युद्धविराम के उल्लंघन की 2,140 घटनाएं हुईं, 2019 में 3,479 घटनाएं और 2020 में 5,133 घटनाएं हुईं. 2021 में 30 जून तक सिर्फ 664 ऐसी घटनाएं सामने आईं (देखें चित्र 1). इन 664 घटनाओं में से लगभग सभी संयुक्त बयान के पहले की हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 25 फरवरी 2021 से 30 जून 2021 तक सिर्फ 6 बार युद्धविराम का उल्लंघन हुआ. साल की दूसरी छमाही और 2022 की शुरुआत में अखबारी रिपोर्टों से पता चलता है कि पिछले सालों के मुकाबले युद्धविराम उल्लंघन में कमी आई है.


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सरहदी आबादी पर असर

नागरिकों के लिए, गोलाबारी की घटनाओं का नतीजा अक्सर होता है नुकसान और मौत; जायदाद और मवेशियों की तबाही; कर्फ्यू और आवाजाही, खेती-बारी, और व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिबंध; और स्कूलों, अस्पतालों, और दूसरे संस्थानों तक पहुंच रुकना या खत्म होना.

पिछले सालों में नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों के लिए जान के भारी नुकसान के बावजूद (देखें चित्र 2), कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि 2021 में सीमापार गोलाबारी में एक भी नागरिक की मौत नहीं हुई. युद्धविराम का सकारात्मक प्रभाव सीमा के पास सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर भी पड़ा और यह दिखा विकास के प्रयासों में बढ़ोतरी, कामकाज के दिनों में सुधार, और लगातार डर के माहौल से राहत के रूप में.

जहां इस क्षेत्र के सुरक्षा बलों के लिए यह आम बात थी, जो हर तरह के हालात से निपटने के लिए तैयारी करते हैं और उन्होंने अपनी स्थिति को मज़बूत करते हुए हालातों पर नज़र बनाए रखी, युद्धविराम ने स्थानीय प्रशासन को विकास परियोजनाएं शुरू करने, कम्युनिटी बंकर बनाने, और कोविड-19 के खिलाफ लोगों के टीकाकरण में तेज़ी लाने का मौका दिया. टीकाकरण के लक्ष्यों के मामले में जम्मू और कश्मीर एक मॉडल बनकर उभरा: 12 जनवरी 2022 को, जम्मू और कश्मीर ने 18 साल और उससे ऊपर के निवासियों के लिए दूसरी खुराक का 100 फीसदी कवरेज हासिल कर लिया, सीमा पर बसे कई गांवों ने तो घर-घर टीकाकरण अभियान की वजह से पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य काफी पहले हासिल कर लिया था.

महामारी ने जम्मू के पुंछ और राजौरी ज़िलों पर उतना असर नहीं डाला था जितना इसने कश्मीर घाटी को प्रभावित किया था. इसलिए, हिंसा में कमी का महत्वपूर्ण प्रभाव स्कूलों तक पहुंच पर आया, जिससे दोनों ज़िलों को थोड़ी राहत मिली, क्योंकि सीमापार हिंसा की वजह से अक्सर कई हफ्तों तक यहां स्कूल बंद रहते हैं.

इलाके में निजी निवेश को हतोत्साहित करने और औद्योगिक और पर्यटन गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के अलावा, युद्धविराम उल्लंघन की घटनाएं सार्वजनिक सेवाओं के वितरण और विकास निधि के उपयोग में देरी लाकर प्रशासन की क्षमता पर भी असर डालती हैं. उदाहरण के लिए, फरवरी 2021 के युद्धविराम के पहले, नियंत्रण रेखा पर सड़क और बिजली परियोजनाएं अक्सर देरी का शिकार होती थीं, क्योंकि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा अर्थमूवर्स जैसे वाहनों और मशीनों को निशाना बनाने की वजह से बिजली लाइनों के लिए नए ट्रांसफॉर्मर या कलपुर्जे सरहदी इलाकों में नहीं लाए जा सकते थे, और इनमें अक्सर नागरिक घायल हो जाते थे. युद्धविराम के बाद, पुंछ के पास कांगा गांव में, बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क मरम्मत का काम हुआ. मेंढर तहसील के दतोत गांव में निवासियों को पिछले साल पहली बार बिजली मिली.

एक और उदाहरण में, सरहद से लगे हीरानगर सेक्टर में, अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माहौल ने किसानों को बाइस सीमावर्ती गांवों में फैली हज़ारों एकड़ भूमि पर लौटने के काबिल बनाया, जो लगातार गोलाबारी की वजह से खाली रह गई थीं. कृषि विभाग और सीमा सुरक्षा बल के कर्मचारियों ने भी वापसी को प्रोत्साहित किया, उन्होंने स्थानीय लोगों को नए समझौते के बारे में जागरूक किया, उनके डर को दूर किया और खेती को बढ़ावा देने के लिए सामग्री और उपकरण दिए. ऐसे इलाके के लिए, जो आर्थिक आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है, और उन किसानों के लिए, जो सीमा पार से होने वाली झड़पों की वजह से फसल के नुकसान का खामियाजा- वित्तीय मुआवजे के बिना- भुगतते हैं, युद्धविराम के प्रभाव बेहद सकारात्मक हैं.

यह भी महत्वपूर्ण है कि युद्धविराम के बाद से सीमापार भारी हिंसा के कारण होने वाला जबरन विस्थापन नहीं हुआ है. युद्धविराम के पहले, नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे गांवों की आबादी को अक्सर सुरक्षा बल उनके घरों से दूसरी जगहों पर स्थानांतरित कर देते थे, जिससे उनकी रोज़ की ज़िंदगी तितर-बितर हो जाती थी. उदाहरण के लिए, साल 2016 में सितंबर के अंत और दिसंबर की शुरुआत के बीच, युद्धविराम तोड़ने की लगातार घटनाओं की वजह से 27,449 लोगों को सीमावर्ती इलाकों से दूसरी जगहों पर ले जाया गया था.

सीमापार झड़पों में कमी ने अधिकारियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर रिकॉर्ड तादाद में बंकर बनाने की छूट दी है. 14,460 बंकरों को बनाने की मंजूरी मिली है, जिनमें से करीब 8,500 व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जम्मू, कठुआ और सांबा में और नियंत्रण रेखा पर पुंछ और राजौरी में बन चुके हैं. ये बंकर आम तौर पर सरहद के पांच किलोमीटर के दायरे में आते हैं और अक्सर युद्धविराम तोड़े जाने के दौरान नागरिकों के लिए पनाहगाह होते हैं.

रोज़ के कामकाज दोबारा बेरोकटोक शुरू होने के अलावा, इस अवधि में त्योहारों और शादियों जैसे विशेष अवसरों के जश्न भी फिर से होते देखे गए – जो सामान्य होते हालात की झलक दिखाते हैं. युद्धविराम की वजह से सीमा से लगे सुदूर स्थानों पर भी धार्मिक पर्यटन और साहसिक पर्यटन को बढ़ावा मिला. स्थानीय प्रशासन और केंद्रीय प्रशासन दोनों ने सीमा पर पर्यटन बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है. अपेक्षाकृत शांति से उत्साहित होकर, भारतीय सेना ने हाल ही में उरी सेक्टर में जनता के लिए एक कैफेटेरिया खोला है – इस कदम के बारे में पिछले साल तक सोचना भी मुश्किल था.

जम्मू और कश्मीर औद्योगिक नीति 2021-30 और औद्योगिक भूमि आवंटन नीति के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों (जैसे कुपवाड़ा में केरन और बारामूला में उरी समेत अन्य इलाकों) को निवेश के लिए आकर्षक बनाने की कोशिशें भी की जा रही हैं. खाद्य प्रसंस्करण, दवा, अच्छी गुणवत्ता के कच्चे रेशम, ऊनी कपड़े, शिक्षा, पर्यटन, स्वास्थ्य और सूचना प्रौद्योगिकी में निवेश को बढ़ावा देने के मकसद से केंद्र शासित प्रदेश को 250 ज़ोन में बांटा गया है.

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले दशक के दौरान, युद्धविराम उल्लंघन का लगातार खतरा शांति पर मंडराता रहा है. शांति कभी भी उतने दिनों तक नहीं रही, जितनी लंबी लड़ाई रहती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में व्यापक शांति और सुरक्षा के हालातों में पूरा सुधार हो चुका है, लेकिन युद्धविराम का बारह महीनों तक कायम रहना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है – और नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनीतिक इच्छाशक्ति का एक संकेत भी.

हिंसा की रूप-रेखा

पिछले साल भर के दौरान भारत और पाकिस्तान में अभी भी युद्धविराम के कुछ उल्लंघनों के रिपोर्ट सामने आए हैं. ये सीमित और छिटपुट रहे हैं; अहम बात यह है कि सरकार समर्थित लोगों (सैन्य चौकी से सैन्य चौकी या सैन्य चौकी से नागरिक क्षेत्रों तक) की तरफ से उल्लंघन की घटनाओं में साफ़ तौर पर कमी आई है. पाकिस्तान ने भी भारतीय सैनिकों की तरफ से युद्धविराम उल्लंघन की कम रिपोर्ट्स दी हैं. चाहे भारतीय सेना ने गोलीबारी शुरू की या जवाबी कार्रवाई की, इसमें दोनों तरफ की सरहद पर रहने वाले उन लोगों के लिए खास अंतर नहीं है, जो बदकिस्मती से इस गोलीबारी के शिकार बनते हैं.

भले ही पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की तरफ से युद्धविराम के उल्लंघन में कमी आई हो, आतंकवादियों की घुसपैठ में ऐसी कमी नहीं देखी गई. घुसपैठ की घटनाएं आतंकवादियों की नियंत्रण रेखा या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने की कोशिशें हैं और कभी-कभी पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की तरफ से उन्हें बचाने के लिए गोलीबारी की जाती है. 2021 में, अक्टूबर तक भारत ने घुसपैठ की अट्ठाईस घटनाओं की जानकारी दी थी जबकि साल 2020 में ऐसी इक्यावन घटनाएं हुई थीं. घुसपैठ की कामयाब कोशिश का नतीजा होती है व्यापक तलाशी और सुरक्षा अभियान, जिनमें भारतीय सुरक्षा बलों की मुठभेड़ भी शामिल होती है, और कई मामलों में इस वजह से कर्फ्यू लगाने पड़ते हैं जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर डालते हैं.

आगे का रास्ता

यह समझने के लिए कि आगे क्या गलत हो सकता है, आपको ज़्यादा दूर देखने की ज़रूरत नहीं है. इससे पहले साल 2003 में युद्धविराम घोषित हुआ था और उसके एक साल पहले, 2002 में, पाकिस्तान की तरफ से युद्धविराम उल्लंघन की 8,376 घटनाएं हुई थीं. सीमा पर शांति के लिए 2003 का युद्धविराम महत्वपूर्ण था और अगले तीन सालों तक सीमा-पार से युद्ध संबंधी गतिविधियां बेहद कम या ना के बराबर थीं. हालांकि, 2007 में फिर से उल्लंघन की घटनाएं शुरू हो गईं और आने वाले सालों में बढ़ती रहीं, 2007 में इक्कीस घटनाओं से 2013 में 347 तक.

भविष्य में, पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध निर्भर करेंगे पाकिस्तान के अपने बर्ताव और सीमा-पार आतंकवाद और हिंसा खत्म करने की इसकी नीयत और काबिलियत से. हालांकि, फरवरी 2021 के युद्धविराम की कामयाबी से इस बात की संभावना बनी है कि सीमा पर एक-दूसरे के प्रति भरोसा बढ़ाने वाले कदम, जैसे कि कारोबार, फिर से शुरू किए जा सकें, बशर्ते ऐसा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो. दूसरी तरफ, नियंत्रण रेखा पर लगातार घुसपैठ भारत के सब्र का इम्तहान ले सकता है.

सीमा पर रहने वाले नागरिकों के लिए फरवरी 2011 का युद्धविराम एक सुखद घटना थी जिनकी ख्वाहिश- बंदूकों और मोर्टार के गोलों की गूंज के बिना- सिर्फ एक साधारण जीवन की होती है. इस युद्धविराम से मैत्रीभाव भले और ना बढ़े, फिर भी सीमा पर शांति बनी रहने का स्वागत किया जाएगा.

लेखक के विचार निजी हैं. यह लेख कार्नेगी इंडिया में पहले पब्लिश हो चुका है. उनका ट्विटर हैंडल @suryavalliappan है. 


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