ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक तनाव पूर्वी यूरोप से पश्चिम एशिया तक फैल रहे हैं, दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश करने के खतरे का सामना कर रही है जिसमें संकट लगातार एक-दूसरे को और मजबूत करते जाते हैं. यूक्रेन का युद्ध यूरोप के सुरक्षा माहौल को लगातार नया रूप दे रहा है. गाजा का संघर्ष अब भी अस्थिर बना हुआ है. और अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को लेकर नई अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं.
यूरोप और भारत, जिनका इस क्षेत्र से व्यापार, कूटनीति और रणनीतिक हितों के जरिए गहरा संबंध है, उनके लिए चुनौती सिर्फ इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना नहीं है, बल्कि ऐसा कूटनीतिक रास्ता तैयार करने में मदद करना भी है जो आगे तनाव बढ़ने से रोक सके.
दोनों के लिए दांव बहुत बड़े हैं. यूरोप के लिए, मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति, प्रवासन के प्रवाह और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर पड़ता है. भारत के लिए, यह क्षेत्र लाखों प्रवासियों का घर है और उन समुद्री रास्तों के बीच स्थित है जिनसे उसके व्यापार और ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा गुजरता है.
ऐसी परिस्थितियों में, स्थिरता सिर्फ प्रतिरोधक क्षमता के भरोसे नहीं रह सकती. इसके लिए भरोसेमंद कूटनीतिक पुल भी जरूरी हैं. यहां यूरोप और भारत के बीच सहयोग अहम भूमिका निभा सकता है.
दोनों के पास अलग-अलग खास ताकतें हैं. यूरोप कूटनीतिक पहुंच, संस्थागत गहराई और ईरान के साथ दशकों के जुड़ाव के साथ आता है. भारत रणनीतिक स्वायत्तता, कई भू-राजनीतिक समूहों के साथ मजबूत संबंध, और वैश्विक मंच पर रचनात्मक भूमिका निभाने वाले देश के रूप में बढ़ती विश्वसनीयता लेकर आता है.
साथ मिलकर काम करते हुए, दोनों ऐसा कूटनीतिक माहौल बनाने में मदद कर सकते हैं जो मौजूदा तनाव को बड़े संघर्ष में बदलने से रोकने के लिए जरूरी है.
यूरोप की कूटनीतिक ताकत
यूरोप ने दशकों तक ईरान के साथ कूटनीति, व्यापार और बहुपक्षीय बातचीत के जरिए जुड़ाव बनाए रखा है. जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन, यानी JCPOA , बातचीत के दौरान मिला अनुभव, और तेहरान में यूरोपीय कूटनीतिक मिशनों की लगातार मौजूदगी, ऐसे संवाद के रास्ते उपलब्ध कराती है जो बढ़े हुए तनाव के दौर में भी उपयोगी बने रहते हैं.
यूरोप के अमेरिका के साथ गहरे रणनीतिक संबंध हैं और इज़राइल के साथ मजबूत राजनीतिक रिश्ते भी हैं, ऐसे देश जिनकी ईरान को लेकर सुरक्षा चिंताएं अच्छी तरह समझी जाती हैं. इन रिश्तों में संतुलन बनाए रखते हुए कूटनीतिक रास्ते खुले रखना कभी आसान नहीं रहा, लेकिन इसी ने यूरोप को ऐसे मध्यस्थ के रूप में खास विश्वसनीयता भी दी है जो अलग-अलग नजरियों से बातचीत कर सकता है.
मौजूदा माहौल में, यूरोप की भूमिका तीन क्षेत्रों पर केंद्रित हो सकती है.
पहला, तेहरान के साथ कूटनीतिक संपर्क खुले रखना. टकराव के समय में भी गलत आकलन के खतरे को कम करने के लिए संवाद जरूरी रहता है.
दूसरा, ट्रांस-अटलांटिक साझेदारों के साथ करीबी तालमेल रखना ताकि कूटनीतिक पहलें व्यापक सुरक्षा लक्ष्यों को मजबूत करें, न कि उलटी दिशा में काम करें.
तीसरा, तनाव कम करने को व्यावहारिक प्रोत्साहनों से जोड़ना, चाहे वह परमाणु पारदर्शिता, क्षेत्रीय स्थिरता या आर्थिक सहयोग से जुड़े तंत्र हों.
यूरोप की ताकत नाटकीय हस्तक्षेप से कम और लगातार, संस्थागत कूटनीति में ज्यादा है. भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वही धैर्यपूर्ण तरीका अक्सर बहुत जरूरी बन जाता है.
भारत एक रणनीतिक जोड़ने वाली कड़ी
आज के भू-राजनीतिक माहौल में भारत एक अलग और खास जगह रखता है.
उसके अमेरिका और यूरोप के साथ करीबी रणनीतिक संबंध हैं. इज़राइल के साथ उसका सुरक्षा और तकनीकी सहयोग लगातार गहरा हुआ है. साथ ही, भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते बनाए हुए है और पश्चिम एशिया में सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है.
रिश्तों का यह बड़ा नेटवर्क भारत को जरूरत पड़ने पर अलग-अलग भू-राजनीतिक समूहों के बीच एक पुल की तरह काम करने की क्षमता देता है.
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यह भूमिका लगातार दिखाई है. यूक्रेन संघर्ष के दौरान उसने कई पक्षों के साथ बातचीत बनाए रखी और साथ ही कूटनीति की अहमियत पर जोर दिया. अपनी जी20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने लगातार सहयोग, विकास और सबको साथ लेकर चलने वाली वैश्विक व्यवस्था की जरूरत को सामने रखा.
ईरान से जुड़े तनाव के संदर्भ में भारत कई अर्थपूर्ण तरीकों से योगदान दे सकता है.
वह मुख्य पक्षों के बीच लगातार बातचीत को बढ़ावा दे सकता है और इस सिद्धांत को मजबूत कर सकता है कि टकराव के दौर में भी कूटनीतिक संवाद खुला रहना चाहिए.
वह क्षेत्रीय नजरिया साझा कर सकता है, जो खाड़ी देशों के साथ उसके करीबी जुड़ाव और मध्य पूर्व में फैले बड़े भारतीय प्रवासी समुदाय के अनुभव से बना है.
और वह अरब सागर और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा से जुड़ी पहलों का समर्थन कर सकता है. ये रास्ते सिर्फ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं.
भारत की कूटनीतिक सोच लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि जटिल वैश्विक चुनौतियों का हल कठोर भू-राजनीतिक गुटों में नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाले समाधानों में है. मौजूदा अनिश्चितता के दौर को संभालने में यह नजरिया खास तौर पर बहुत उपयोगी साबित हो सकता है.
एक साझा एजेंडा
सबसे रचनात्मक आगे का रास्ता भारत और यूरोपीय संघ के बीच कूटनीति, आर्थिक मजबूती और समुद्री सुरक्षा पर गहरा तालमेल है. हाल ही में पूरा हुआ भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता इस तरह के सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण आधार देता है. दुनिया के दो सबसे बड़े बाजारों के बीच आर्थिक जुड़ाव को गहरा करके यह समझौता खुलेपन, स्थिरता और लंबे समय की साझेदारी के प्रति साझा प्रतिबद्धता दिखाता है.
लेकिन केवल आर्थिक सहयोग मौजूदा भू-राजनीतिक दौर की अनिश्चितताओं का पूरा जवाब नहीं दे सकता. इसे नई दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच और करीबी रणनीतिक तथा कूटनीतिक तालमेल से लगातार मजबूत करना होगा.
पश्चिम एशिया की घटनाओं पर नियमित रणनीतिक बातचीत दोनों पक्षों को अपने आकलन और नीतिगत प्रतिक्रियाओं में तालमेल बनाने में मदद कर सकती है. हिंद महासागर और अरब सागर में समुद्री क्षेत्र की समझ पर अधिक सहयोग महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों की सुरक्षा को मजबूत कर सकता है. ऊर्जा के विविधीकरण और ऊर्जा परिवर्तन पर बढ़ी हुई बातचीत भी भू-राजनीतिक व्यवधानों से होने वाली कमजोरी को कम कर सकती है.
इन तात्कालिक प्राथमिकताओं से आगे भी भारत और यूरोप का हित उन बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करने में है जो अंतरराष्ट्रीय संकटों को संभालने के लिए अब भी जरूरी हैं. चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो, जी20 हो, या वैश्विक शासन के दूसरे मंच, बड़ी लोकतांत्रिक ताकतों के बीच सहयोग उन नियमों और ढांचों को बचाए रखने में मदद कर सकता है जो स्थिरता को सहारा देते हैं.
आने वाले वर्षों में दुनिया के कम जटिल होने की संभावना नहीं है. रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, जबकि आर्थिक परस्पर निर्भरता अब भी देशों को एक-दूसरे से जोड़े हुए है.
अनिश्चित दौर में एक साझेदारी
ऐसे माहौल में, वे साझेदारियां जिनमें रणनीतिक यथार्थवाद और कूटनीतिक जुड़ाव दोनों शामिल हों, लगातार अधिक मूल्यवान होती जाएंगी.
भारत और यूरोप ऐसी साझेदारी बनाने के लिए खास तौर पर अच्छी स्थिति में हैं. दोनों में से कोई टकराव नहीं चाहता, फिर भी दोनों का उन क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने में गहरा हित है जो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा प्रवाह और आर्थिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.
अगर मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव का दौर हमें कुछ सिखाता है, तो वह यह है कि कोई भी एक ताकत, चाहे वह कितनी भी प्रभावशाली क्यों न हो, अकेले वैश्विक संकटों को संभाल नहीं सकती. इसके बजाय जरूरत जिम्मेदार पक्षों के ऐसे समूहों की है जो संवाद, संयम और मिलकर समाधान निकालने में निवेश करने को तैयार हों.
यही वह जगह है जहां भारत-यूरोप साझेदारी फर्क ला सकती है. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते में दिख रही गहरी होती आर्थिक साझेदारी अब सहयोग को रणनीतिक और कूटनीतिक क्षेत्रों तक बढ़ाने का अवसर देती है.
शांत तरीके से लेकिन स्पष्ट निर्णय के साथ साथ काम करके भारत और यूरोप ऐसा कूटनीतिक स्थान बना सकते हैं जहां वरना टकराव हावी हो सकता था. तेज होती प्रतिद्वंद्विताओं और एक-दूसरे पर चढ़ते संकटों वाली दुनिया में ऐसी साझेदारियां सिर्फ अच्छी नहीं होंगी. वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता के लिए अनिवार्य होंगी.
शिशिर प्रियदर्शी चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं. विचार निजी हैं.
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