Thursday, 8 December, 2022
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प्रस्तावित गंगा एक्ट में बांध निर्माण और खनन पर रोक की कोई बात नहीं है

गंगा एक्ट आएगा और पूरे प्रचार के साथ आएगा. लेकिन उसके तथ्यों पर विचार का समय नहीं मिलेगा, क्योंकि देश चुनावी महोत्सव में व्यस्त होगा.

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सरकार इस सत्र में गंगा एक्ट लाने में संकोच कर रही है. शायद इसलिए कि अगले साल होने वाले वर्तमान लोकसभा के अंतिम सत्र में जब गंगा सफाई का सवाल जोर पकड़े, तब गंगा एक्ट उसका जवाब बने. कैसे?

पिछले साढ़े चार साल में गंगा मंत्रालय और उसके मंत्रियों के काम करने का तरीका देखिए. सबसे पहले मंत्री जी मीडिया के सामने कोई वादा कर देते हैं. जैसे ई-बोट, नाले बंद करना, घाट निर्माण, जीरो डिचार्ज, पौधारोपण या फिर गंगा निर्मलता की कोई तारीख दे देना. कुछ महीने बीत जाने पर वे दबाव बढ़ता देख अपने वादे को संकल्प में बदल देते हैं और अधिकारियों के मुंह से एक तारीख निकलवाते हैं कि फलां तारीख तक यह काम हो जाएगा.

अब अधिकारी अपनी पूरी ताकत उस योजना को एक छोटी सी जगह पर शुरू करने (सिर्फ शुरू करने) में लगा देते हैं. यह पूर्व निर्धारित जगह ज्यादातर बनारस का अस्सी घाट होती है. फिर तय समय पर उस जगह में योजना को लागू कर दिया जाता है. इसके बाद गगनभेदी नारा लगाया जाता है गोया यह योजना आपके घर में रखे गंगा जल पर भी लागू हो गई है.

विचार करके देखिए आपको एक भी ऐसी योजना याद नहीं आएगी जो लागू की गई और जिस पर लगातार बात हो रही है. किसी के पास यह जानने की फुर्सत नहीं कि झारखंड में गंगातट पर जो लाखों पौधे रोपे गए थे उनका हुआ क्या? या फिर सोलर पैनल से चलने वाली ई-बोट बंद क्यों हो गई?

ऐसे ही कई सवाल हैं. न्यूनतम प्रवाह नोटिफिकेशन पर बांध कंपनियां अमल क्यों नहीं कर रहीं और कत्लखाने हटाने में सरकार को समस्या क्या है? इन सारे सवालों का जवाब यह है कि जनता को सिर्फ शुभारंभ याद रहता है और सत्ता इस बात को अच्छी तरह जानती है. बस इसीलिए गंगा एक्ट बचा कर रखा गया है ताकि चुनाव के ठीक पहले उसे सामने रखा जाए और जीडी अग्रवाल के साथ-साथ उनकी मांगों और गंगा सफाई पर उठने वाले सवालों को एक झटके में आप्रासंगिक कर दिया जाए.

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वैसे प्रस्तावित एक्ट अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है. जीडी अग्रवाल के अनशन के चलते बने दवाब में आनन-फानन में एक प्रारूप तैयार किया गया था, खुद सरकार ही इसे लेकर असमंजस में थी. अब दूसरे मंत्रालयों से सुझाव मंगाकर इसे अंतिम रूप देने की कोशिश की जा रही है.


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प्रस्तावित गंगा एक्ट में ऐसे कई प्रावधान हैं जो सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन गंगापथ पर व्यावहारिक नहीं हैं. एक्ट में प्रावधान है कि गंगा में साबुन लगाना या कपड़े धोना दंडनीय अपराध है जिसके लिए दो साल तक कैद हो सकती है. इतिहास गवाह है कि इस तरह के प्रावधान कभी लागू नहीं किए जा सके हैं. ये सिर्फ वाहवाही लूटने और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण बनते हैं.

एक्ट में बांध निर्माण पर कोई बात नहीं की गई है यानी यह तय है कि तमाम विरोधों के बाद भी गंगा पर नए बांध बनते रहेंगे. जीडी अग्रवाल की चार प्रमुख मांगों पर भी यह एक्ट मौन है. इसमें ना ही रेत खनन पर रोक की बात है, ना ही गंगा भक्त परिषद निर्माण की. एक्ट में नदी की निर्मलता पर जोर दिया गया है ना कि अविरलता पर. गंगत्व पर तो विचार ही नहीं किया गया. जबकि गंगत्व ही वह मूल गुण है जिस कारण गंगा पर एक्ट लाने की जरूरत महसूस की जा रही है.

गंगत्व को सरकार और वैज्ञानिक साफ तौर पर स्वीकार करते हैं लेकिन इसे एक्ट में शामिल नहीं कर सकते. क्योंकि गंगत्व को पाने या बचाने की कोशिश का मतलब है गंगा के साथ पवित्र व्यवहार सुनिश्चित करना यानी उससे राजस्व के उगाहने का विचार छोड़ना.

जीडी अग्रवाल 2012 के ड्राफ्ट को पास करना चाहते थे जिसे सिविल सोसायटी के सदस्यों ने न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय के साथ मिलकर बनाया था. वैसे एक ड्राफ्ट उमा भारती ने भी बनवाया था, उसे भी गिरधर मालवीय ने ही तैयार किया था, लेकिन वह ड्राफ्ट भी सरकारी फाइलों में कहीं खो गया.

अब अग्रवाल के साथियों ने नया संशोधित ड्राफ्ट पेश किया है. इसे पीजीबी यानी पीपुल्स गंगा बिल कहा जा रहा है. जिसमें पिछले पांच सालों में पैदा हुए बदलाव और जरूरतों को शामिल किया है. उनकी मांग है कि गंगा को उसकी पारिस्थिकी और गंगत्व के लिहाज से चार भागों में बांटा जाना चाहिए.

प्राइमरी कोर जोन में हिमालयी क्षेत्र को रखा जाना चाहिए. दूसरे जोन में गंगा का बाढ़ क्षेत्र और देवप्रयाग से लेकर गंगासागर तक के क्षेत्र को शामिल किया गया है. तीसरा जोन बफर जोन है जिसमें गंगा बेसिन के साथ–साथ पहले और दूसरे जोन को भी शामिल किया गया है. चौथे महत्वपूर्ण जोन निर्मलता बनाए रखने के लिए अविरलता की कोशिशों को स्थान दिया गया है.


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एक्ट में जोर दिया गया है कि एसटीपी से निकला हुआ जल गंगाजल नहीं है, इसलिए गंगत्व का ध्यान दिया जाना जरूरी है. सरकार यदि एक्ट में इस प्रावधान को शामिल कर लेती है तो उसे टिहरी सहित सभी बांधों को हटाना पड़ेगा. वैज्ञानिक रिपोर्ट बताती है कि वैक्टोरियोफेज यानी गंगत्व टिहरी के बाद भागीरथी में मात्र दस फीसद ही बचता है. 2500 किलोमीटर की गंगा में अब नैसर्गिक प्रवाह मात्र 80 किलोमीटर बचा है. इसे बचाने और बढ़ाने के लिए इको सेंसटिव जोन का दायरा बढ़ाना पड़ेगा. जिसका मतलब होता है गंगा पथ के 200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य ना होना.

इस समय इको सेंसेटिव जोन 135 किलोमीटर तक है जो गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक आता है. इस नियम की धज्जियां भी खूब उड़ाई जाती हैं. यहां तक कि उत्तरकाशी शहर के सीवेज को भी भागीरथी में ही छोड़ा जाता है. अब मांग की जा रही है कि गंगा की हर धारा पर एक इको सेंसेटिव जोन स्थापित किया जाए.

गंगा को जोन में बांट कर संरक्षित करने का विचार नया नहीं है. पर्यावरण सरंक्षण कानून 1986 में ये सभी बातें विस्तार से दी गई हैं. लेकिन दूसरे विषयों की तुलना में पर्यावरण के कानून और व्यवहार में जमीन आसमान का फर्क है.

पब्लिक गंगा बिल में दर्शाई गई मांगों को मानना सरकार के लिए मुश्किल है. इसलिए गंगा एक्ट आएगा और पूरे प्रचार के साथ आएगा. लेकिन उसके तथ्यों पर विचार का समय नहीं मिलेगा, क्योंकि देश चुनावी महोत्सव में व्यस्त होगा.

(अभय मिश्रा लेखक और पत्रकार हैं.)

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