वाराणसी में जलमार्ग के उद्घाटन के एक दिन पहले प्रधानमंत्री द्वारा ट्वीट की गई तस्वीर.
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भारत के पहले राष्ट्रीय जलमार्ग की सफलता के आंकड़े आकार ले रहे हैं. 12 नवंबर को प्रधानमंत्री ने वाराणसी में मल्टीमॉडल टर्मिनल का शुभारंभ करते हुए पहले कार्गो जहाज़ की अगवानी की. इसके बाद करीब तीन हफ्ते बीत गए और एक भी जहाज़ वाराणसी नहीं पहुंचा. उद्घाटन के दिन पहुंचाया गया कार्गों इस जलमार्ग में चलने वाला एकमात्र जहाज़ है.

गंगा में गाद की अनदेखी कितनी मंहगी पड़ रही है. इसकी बानगी देखिए. पिछले हफ्ते यानी 27 नवंबर को कोलकाता से मुंगेर जा रहा जहाज़ भागलपुर में फंस गया और ऐसा फंसा कि उसे किसी तरह निकालकर वापस कोलकाता भेजा गया. यह पर्यटक जहाज़ था और इसमें विदेशी पर्यटक बैठे हुए थे. जो गंगा धारा पर बह कर भारत देखना चाहते थे.

जहाज़ इसलिए फंसा क्योंकि गंगा में गाद भर गई है, यह गाद उसी जगह है जहां से सरकारी चैनल निकलता है. प्रधानमंत्री के अनुसार यह चैनल 45 मीटर चौड़ा है ताकि बड़े आकार के जहाज़ आसानी से आवाजाही कर सकें. लेकिन इसके लंबाई, चौड़ाई और गहराई की पोल इस छोटे से पर्यटक जहाज़ ने खोल दी.


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बड़े जहाज़ की बात करना तो हमारा भोलापन है लेकिन छोटे और मझौले जहाज़ के परिचालन के लिए 4 मीटर गहराई की ज़रूरत होती है. गहराई तो छोड़िए अभी हालात यह है कि गाद तट के बराबरी पर जमा है. इसीलिए जब जहाज़ भागलपुर पहुंचा तो बरारी घाट में फंसा. इसके बाद जहाज़ को पीछे खींच कर दूसरी तरफ नवगछिया से निकालने की कोशिश की गई. लेकिन नवगछिया में पुल के नीचे से जहाज़ नहीं निकल पाया.

यह बात जाननी चाहिए कि इस पुल की ऊंचाई इतनी है कि जहाज़ आसानी से निकल सकें लेकिन गाद भरने के कारण नदी ही ऊपर उठ गई. आखिरकार जहाज़ को वापस कोलकाता रवाना किया गया.

वैसे चैनल को मूर्त रूप देने के लिए ड्रेजिंग जारी है लेकिन वास्तविकता यह है कि गंगा जैसी लगातार गाद पैदा करने वाली नदी में स्थाई चैनल संभव नहीं है. और लगातार की जाने वाली ड्रेजिंग की लागत करोड़ों रुपये है.

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ड्रेजिंग की लागत उस गणित में शामिल नहीं की गई है जिसमें यह दावा किया गया कि वाटर ट्रांसपोर्ट बेहद सस्ता पड़ता है. यह ठीक वैसा ही है जैसा कि दिल्ली मेट्रो की लागत में दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ द्वारा दी जा रही सुरक्षा लागत को शामिल नहीं किया जाता. बात सिर्फ लागत की ही नहीं है. इसका पर्यावरणीय पक्ष बेहद घातक है. हालांकि सत्ता के लिए यह चिंता का विषय नहीं है. यही कारण है कि उत्तराखंड में चल रही चारधाम परियोजना को छोटे–छोटे टुकड़े में बांट कर पर्यावरणीय मंज़ूरी से मुक्त कर लिया गया.


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तो हुआ यूं कि वाराणसी में एक कछुआ सेंचुरी थी. चूंकि कछुओं का यह घर जलमार्ग के आड़े आ रहा था इसलिए इस सेंचुरी को ही डिनोटिफाई कर दिया गया. अब सवाल यह है कि डॉल्फिन सेंचुरी में ड्रेजिंग कैसे होगी? सुल्तानगंज से कहलगांव के बीच पचास किलोमीटर का गंगा क्षेत्र विक्रमशिला डॉल्फिन अभ्यारण्य कहलाता है.

ड्रेजिंग से सबसे ज़्यादा खतरा डॉल्फिन को ही है क्योंकि यह प्राणी बेहद संवेदनशील होता है और कई बार नाव आदि से टकराकर ही बुरी तरह घायल हो जाता है. दूसरा इसकी आंखों में झिल्ली होती है जिसकी वजह से डाल्फिन को धुंधला नज़र आता है. यही कारण है कि वह किसी भी मानवीय हस्तक्षेप का आसान शिकार होती है. अब यदि जलमार्ग को चलाना है तो लगातार ड्रेजिंग करनी पड़ेगी और डॉल्फिन सेंचुरी को खोदना पड़ेगा.

लेकिन सरकार अपने उद्देश्य को लेकर कटिबद्ध है इसके लिए यदि डॉल्फिन सेंचुरी को भी डिनोटिफाइ करना पड़ा तो किया जाएगा. वैसे भी डॉल्फिन नाममात्र की ही बची है उसके लिए इतनी बड़ी सेंचुरी का औचित्य विकास की परिभाषा से मेल नहीं खाता. जलमार्ग के निर्माण से डॉल्फिन वैसे ही गायब हो जाएगी जैसे फरक्का के निर्माण के बाद हिल्सा गायब हो गई.

इस बेहद सस्ते पड़ने वाले जलमार्ग को सुचारु चलाने के लिए कई जगह बांध बनाने होंगे. गंगा मंत्रालय की प्रारंभिक योजना में ग्यारह बैराज बनाए जाने का प्रस्ताव है. इतिहास से सबक न लेने योजनाकार दो बड़े उदाहरणों को दरकिनार कर देते हैं. 1962 में कोसी बैराज बना, जिसका मुख्य उद्देश्य नदी के प्रकोप पर काबू पाना था. इसके बाद 1975 में बना फरक्का बैराज. कोलकाता बंदरगाह को बचाए रखने एवं महानगर को पानी पिलाने के लिए इस बैराज को बनाया गया था.

ये दोनों ही बैराज अपने उद्देश्य में बूरी तरह नाकाम साबित हुए. कोसी आज भी बिहार का शोक बनी हुई है और फरक्का बढ़ती हुई गाद के कारण खत्म हो रहा है. फरक्का में इतनी गाद जमा हो गई है कि इसकी डिसिल्टिंग भी दूरूह श्रेणी में आ गई है.

हालात यह है कि गाद का दबाव कभी भी फरक्का में किसी बड़े हादसे का सबब बन सकता है. बिहार सरकार ने फरक्का बनने का भी विरोध किया था और नये जलमार्ग के लिए बनने वाले बांधों का भी विरोध कर रही है. क्योंकि इन बांधों का सर्वाधिक खामियाज़ा बिहार की जनता को ही भुगतना होगा. इन बांधों में जमा होने वाली गाद से भंयकर बाढ़ का खतरा पैदा होगा.


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अनुमान है कि बिहार के 36 बड़े कस्बे भविष्य में होने वाले जलभराव का शिकार होंगे. अब यदि यही मॉडल देशभर की नदियों में लागू हो तो तस्वीर कैसी होगी. कोसी ने तो 2008 में ही बता दिया था कि उसे बांधा नहीं जा सकता. 1952 में कोसी का तटबंध 60 किलोमीटर था आज तकरीबन 3500 किलोमीटर है. लेकिन कोसी में बाढ़ यथावत जारी है.

कंक्रीट की संरचना नदी के व्यवहार से मेल नहीं खाती और किसी भी सरकार को यह बात समझ नहीं आती. दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी में कंक्रीट ने ऐसा कहर ढाया कि अब इसे दोबारा खोदने का निर्देश हाईकोर्ट को जारी करना पड़ा.

नासिक में गोदावरी के क्षेत्र में कई सारे कुंड थे यानी जहां से ज़मीन के नीचे से पानी निकलता है. राज्य सरकार ने घाट को खूबसूरत बनाने के चक्कर में नदी घाट के साथ उसके तल को भी कंक्रीट कर दिया. भारी विरोध और लंबी लड़ाई के बाद कोर्ट ने तल से कांक्रीट हटाने का आदेश दिया.

राष्ट्रीय जल परिवहन परियोजना में कुल 111 नदियों को प्रयोग में लाकर परिवहन क्षमता का विकास करने की बात है. जिसका लक्ष्य 14,500 किमी तक नौगम्य जलमार्ग का लक्ष्य रखा गया है और इसकी लागत करीब 700 अरब आंकी गई है. इस प्रोजेक्ट में कुल छह राष्ट्रीय जलमार्ग का निर्माण होना है.

बेशक मुगलकाल में गंगा पर बड़े जहाज़ चला करते थे लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि उस समय गंगा को बांधा नहीं गया था और इसीलिए वह अपनी गाद को खुद मैनेज कर लेती थी. बहरहाल इस तथ्य का कोई मतलब नहीं है. क्योंकि जब सरकारें सक्षम होती हैं तो गाद पर जहाज़ चलते हैं.

(अभय मिश्रा लेखक और पत्रकार हैं.)


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