Monday, 8 August, 2022
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​हिंदुस्तानी जज डांटते हैं, अमेरिकी जज हैं नमामि गंगे के सही कद्रदान

लाली- लिपिस्टिक कुंभ का श्रेय लेने वाली सरकार नहीं जानती कि यूपी में कितने नाले गंगा में गिरते हैं. गंगा मंत्री गंगा के 90 फीसद साफ होने का दावा करते है,यह नहीं बताते कि आंकड़ा उन्होंने निकाला कैसे.

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अमेरिका के हवाई प्रांत की अदालत में न्यायाधीश है, माइकल डी विल्सन.  न्यायमूर्ति विल्सन ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया द्वारा यहां आयोजित ‘ग्रीन लॉट आख्यान में ‘पर्यावरण न्याय और कानून के नियम: न्यायपालिका और न्यायाधीशों की भूमिका’ पर बात करने दिल्ली आए. यहां आकर उन्होंने कहा कि नमामि गंगे एक बेहतरीन परियोजना है और प्रधानमंत्री मोदी गंगा की चिंता करते हैं.

अमेरिकी मेहमान विल्सन के इस बयान को तकरीबन सभी केसरी पर्यावरण मीडिया ने हाथों हाथ लिया. हाल के दिनों में यह गंगा पर किसी जज (विदेशी ही सही) की यह एकमात्र टिप्पणी है जो इतनी प्रचारित की जा रही है. इसके पहले तो डांट ही सुनने को मिलती थी.


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एक पखवाड़ा भी नहीं बीता जब एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने नमामि गंगे को बुरी तरह फटकारते हुए कहा था गंगा सफाई पर सात हजार करोड़ रूपए खर्च हो गए लेकिन सफाई आज भी गंभीर मुद्दा बना हुआ है. पीठ ने साफ कहा कि 100 करोड़ लोगों की सम्मानित नदी का सरंक्षण नहीं हो पा रहा. जिस काम के लिए गंगा मंत्रालय का गठन किया गया वह अपने मूलभूत काम भी ठीक से नहीं कर रहा.

एनजीटी ने गोमुख और उन्नाव के बीच गंगा नदी की सफाई के लिए केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तराखंड सरकार की ओर से उठाए गए कदमों पर निपटारा रिपोर्ट दाखिल ना कर पाने को लेकर एनएमसीजी को लताड़ा. एनएमसीजी यानी नमामि गंगे की नोडल ऐजेंसी ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया था कि राज्यों की इकाईयों ने उसके साथ सही डाटा शेयर नहीं किया है. यानी आज भी नमामि गंगे को यह सफाई के लिए उठाए गए जमीनी कामों और गिरने वाले नालों की सही जानकारी नहीं है.


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लाली- लिपिस्टिक कुंभ का श्रेय लेने वाली सरकार यह भी नहीं जानती कि यूपी में वास्तव में कितने नाले गंगा में गिरते हैं. केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड और नमामि गंगे के नालों की संख्या मे अच्छा खासा अंतर है. गंगा मंत्री गंगा के नब्बे फीसद साफ होने का दावा अपनी रैलियों में कर रहे है लेकिन यह नहीं बताते कि यह आंकड़ा उन्होने निकाला कैसे. क्योंकि सरकारी ऐजेंसी सीपीसीबी की रिपोर्ट ही यह दावा करती है कि गंगा पानी ज्यादातर जगहों पर नहाने के लायक भी नहीं है. आचमन तो सोचिए भी मत.

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लेकिन पश्चिम से प्रभावित भारतीय समाज के लिए यह मायने रखता है कि किसी अमेरिकी जज ने गंगा सफाई की तारीफ कर दी. इसके आगे भारतीय सुप्रीम कोर्ट, एनजीटी और गंगा से जुड़े दूसरे सवाल सब छोटे पड़ जाते हैं.

(अभय मिश्रा लेखक और पत्रकार हैं.)

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