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Tuesday, 28 May, 2024
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गांधी परिवार ने दिखाई अपनी ताकत और शशि थरूर को बताई उनकी सही जगह

एक धमाके के साथ शुरू हुआ कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का मामला ऐसा लगता है कि एक फुसकी के साथ दब गया.

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80 वर्षीय राज्यसभा सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे को 137 साल पुरानी उस कांग्रेस पार्टी के 98वें अध्यक्ष के रूप में चुना गया है, जो आजादी के बाद कई वर्षों तक सरकार में रही थी. लगातार दो आम चुनाव (2014 और 2019) हारने और भारत के राजनीतिक मानचित्र से लगभग बाहर हो जाने की संभावनाओं का सामना करने के बाद, कांग्रेस पार्टी को एक सम्पूर्ण कायापलट की जरूरत थी, न कि केवल एक काम चलाऊ नेतृत्व परिवर्तन की. पार्टी के दिग्गजों के बीच सुलगते असंतोष के परिणामस्वरूप एक समूह – जिसे जी -23 के रूप में जाना जाता था- का गठन हुआ था और इसने 2024 में बीजेपी का सामना करने के लिए पार्टी की छवि में निहायत ही आवश्यक बदलाव और इसमें बड़े पैमाने पर पुनरुद्धार लाने की उम्मीद जगाई थी.

लेकिन कांग्रेस पार्टी में एक धमाके के साथ जो मामला शुरू हुआ, ऐसा लगता है कि वह एक फुसकी के साथ दब गया है.

जी-23: सामूहिक रूप से कमजोर एक समूह

कांग्रेस का ‘प्रथम परिवार’ कभी भी जी-23 के बारे में चिंतित नहीं था, यह एक जिंजर ग्रुप (किसी पार्टी के भीतर का एक अत्यधिक सक्रिय गुट जो किसी विशेष मुद्दे पर कड़ी कार्रवाई के लिए दबाव डालता है) था, जिसने पार्टी के विद्रोहियों का प्रतिनिधित्व किया और इसके शीर्ष नेतृत्व में बदलाव की मांग की. ऐसा इसलिए था क्योंकि जी-23 में से कोई भी बिल्ली के गले में घंटी बांधना नहीं चाहता था और न ही उनमें से कोई एक दूसरे का समर्थन करने के लिए तैयार था. वे ऐसे दिग्गज नेताओं का एक समूह था जो व्यक्तिगत रूप से विद्रोही, लेकिन सामूहिक रूप से डरपोक थे. गांधी परिवार की त्रिमूर्ति इस बात को पहले दिन से ही जानती थी. उनके लिए सबसे अच्छा विकल्प था जी-23 को आंतरिक चुनाव के जरिए ललकारना जो उन्होंने किया भी. इस तरह खड़गे तो जीत गए, लेकिन कांग्रेस हार गई.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक छत्रछाया संगठन के रूप में रही कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद एक राजनीतिक दल में बदल गई. स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मूल्यों की राजनीति के लिए लड़ने वाले नेतृत्व की इसकी पहली पीढ़ी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के 16 साल के कार्यकाल और लाल बहादुर शास्त्री के थोड़े समय के कार्यकाल के बाद गुमनामी में खो गई. स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों और प्रतिबद्धताओं की जगह सुविधा, भ्रष्टाचार और समझौते की राजनीति ने ले ली. इंदिरा गांधी ने अपने भ्रष्ट शासन का बचाव करते हुए एक बार कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तो एक वैश्विक घटना है’.

पार्टी का अस्तित्व बचाए रखना और सत्ता में बने रहना ही कांग्रेस का प्राथमिक उद्देश्य बन गया. इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए दो चीजें इसका मूल तत्त्व बन गईं: एक व्यवहार्य प्रशासनिक व्यवस्था बनाना और पार्टी को ‘गांधी-नेहरू’ परिवार के कब्जे में रखना. इसने राजीव गांधी के लिए बिना किसी योग्यता या राजनीतिक कौशल के भी शीर्ष स्थान पर पहुंचना सुनिश्चित किया. कांग्रेस के लिए असल मुसीबत राजीव गांधी की दुखद हत्या के तुरंत बाद शुरू हो गई थी.

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यह कोई राज की बात नहीं है कि पार्टी के वर्तमान शीर्ष नेतृत्व का (महात्मा) गांधी के साथ कोई’ ‘जैविक संबंध’ नहीं है और इसकी उस कांग्रेस के साथ बहुत कम या लगभग न के बराबर समानता है, जिसका नेतृत्व कभी जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता संग्राम के अन्य दिग्गज सेनानियों ने किया था.

सोनिया गांधी के पार्टी संभालने के बाद उभरे प्रशासनिक और राजनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र ने सरकार बनाने के लिए खंडित जनादेश पाना सुनिश्चित किया, लेकिन सत्ता की तख़्त पर प्रथम परिवार के सदस्य के रहे बिना. पहले, पी.वी. नरसिम्हा राव थे और फिर मनमोहन सिंह आए जिन्होंने परिवार के ‘स्वामित्व वाली और उनके ही द्वारा संचालित’ पार्टी के सख्त देख-रेख और नियंत्रण में इसकी सरकार का नेतृत्व किया. प्रधानमंत्री के रूप में गांधी परिवार के किसी सदस्य को बिठाने के सभी प्रयास असफल रहे या शायद जानबूझकर विफल कर दिए गए.


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मोदी के बाद की कांग्रेस

इन हालात में, 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम ने ‘परिवार’ और पार्टी पर उसके नियंत्रण को गहरा आघात पहुंचाया. बीजेपी के करिश्माई नेतृत्व की अच्छी तरह से तैयार की गई और इससे भी अच्छी तरह से निष्पादित राजनीतिक रणनीति, और इन सबसे बढ़कर, भ्रष्टाचार मुक्त शासन ने और आदर्शवाद और प्रतिबद्धता के शुरुआती दिनों की यादों को ताजा करते हुए एक नई शुरुआत का संकेत दिया. वर्षों के प्रशासनिक, प्रणालीगत और नौकरशाही के मकड़जालों को झाड़-पोंछ के फेंक दिया गया. ‘चलता है’ के रवैये को ‘उदाहरण के साथ नेतृत्व’ से बदल दिया गया, जहां प्रधान मंत्री, पार्टी और आम लोग सभी एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में थे.

नरेंद्र मोदी सरकार ने राजनीतिक खेल के नियम फिर से लिख दिए था. परिवार के स्वामित्व वाली कांग्रेस के लिए इस नैरेटिव से लड़ना तो दूर इसे समझाना भी असंभव था. पार्टी के भीतर दरारें पैदा होना तो तय ही था क्योंकि कई नेता न केवल चुनाव हार गए थे बल्कि उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता भी खो दी थी. उनमें से कुछ ने हवा के रुख पर ध्यान दिया और जल्दी से भाजपा के पाले में कूद गए लेकिन कई पुराने दिग्गजों ने पार्टी की पराजय और इसके भटकाव के लिए स्पष्टीकरण मांगा साथ ही इसके तौर-तरीकों में बड़े पैमाने पर सुधार की मांग की. हालांकि, शुरू में, परिवार ने इस बदलाव का कड़ा विरोध किया, मगर जल्द ही उसे ‘गैर-पारिवारिक’ नेतृत्व की मांगों को समायोजित करने और विवेकपूर्ण ढंग से विद्रोह को शांत करने की आवश्यकता का एहसास हो गया.

दो बातें स्पष्ट रूप से सामने आईं, पहला यह कि ‘परिवार’ अब आधिकारिक तौर पर शीर्ष पद पर बना नहीं रह सकता है, और दूसरी यह कि शीर्ष पद एक ऐसे व्यक्ति के पास होना चाहिए जो हमेशा परिवार के अधीन ही रहेगा. ऐसे व्यक्ति का पार्टी में कोई अनुयायी नहीं होना चाहिए, पार्टी के भीतर या बाहर कोई जन समर्थन वाला आधार नहीं होना चाहिए और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि उसे कभी भी अपने महत्व या बुद्धिमत्ता का दावा नहीं करना चाहिए. और इसलिए, खड़गे को पसंद किया गया और थरूर को खारिज.

थरूर के सामने उपलब्ध विकल्प महत्वहीन और बेमायने हैं क्योंकि पार्टी के ‘प्रथम परिवार’ ने अपनी ताकत और थरूर उनकी जगह दिखा दी है. जी-23 का हवा में विलीन हो जाना अब बस समय की बात है. लेकिन दुखद बात यह है कि राजनीतिक परिदृश्य एक ऐसे मजबूत विपक्ष से रहित है जो सरकार को उसके सभी अच्छे कार्यक्रमों में समर्थन दे और भूल-चूक तथा गलतियों के लिए इसकी जमकर धुलाई भी करे. कांग्रेस द्वारा पैदा किये गए शून्य पर अब क्षेत्रीय संगठनों और राजनेताओं का रूप धरे ‘नीम-हकीमों’ की भीड़ का कब्जा हो जाएगा. हमें ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की आवश्यकता नहीं है, हमें जरुरत है तो ‘गांधी-नेहरू परिवार मुक्त कांग्रेस’ की. मगर अभी यह एक दूर की कौड़ी लगती है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेखक ‘आर्गेनाइजर’ के पूर्व संपादक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @seshadrichari है. विचार निजी है)


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