Thursday, 30 June, 2022
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गेल ओमवेट ने सिर्फ ब्राह्मणवादी नजरिए की घुट्टी पी रहे विश्व समुदाय को जातियों के सच से अवगत कराया

ओमवेट बौद्धिक और सामाजिक मोर्चों पर सक्रिय उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती थीं, जो जाति आधारित उत्पीड़न से लड़ने के लिए विविध विचारधाराओं का उपयोग करती थी, वे बहुजन समाज की भरोसेमंद साथी थीं.

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जब सुबह-सुबह आपको मिले संदेशों और ताजा जानकारियों में एक ही व्यक्ति का जिक्र सब जगह दिखता हो तो पक्का मान लीजिए कि वह व्यक्ति कई लोगों के जीवन और हितों के केंद्र में है. किसी की ऐसी व्यापक स्वीकृति दुर्लभ ही है. लेकिन अमेरिका में जन्मी भारतीय विदुषी, लेखिका, बौद्धिक, शोधकर्ता, एक्टिविस्ट, सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की सूत्रधार गेल ओमवेट ऐसी ही दुर्लभ व्यक्तित्व थीं.

25 अगस्त 2021 को सुबह 10 बजे महाराष्ट्र के सांगली जिले के अपने गांव कासेगांव में 80 वर्ष की उम्र में ओमवेट ने आखिरी सांस ली. 2 अगस्त 1941 को उनका जन्म अमेरिका के मिन्नीपोलिस में हुआ था. कार्लटन कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले में डॉक्टरेट की. वे अमेरिका के उन विद्वानों में पहली थीं, जिन्होंने उत्पीड़ित लोगों के साथ वास्तव में समय बिताया ताकि केवल ब्राह्मणवादी, कुलीनवादी दृष्टिकोण की घुट्टी पी रहे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इन लोगों के इतिहास से अवगत करा सकें.

गेल पहली बार 1963 में भारत आईं और इसके बाद अपने पीएचडी के शोध-निबंध के वास्ते शोध करने के लिए फिर 1970 में आईं. उनका यह शोध-निबंध ‘कल्चरल रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसाइटी : द नॉन-ब्राह्मण मूवमेंट इन वेस्टर्न इंडिया, 1873-1930′ 1973 में दाखिल किया गया और अंततः पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसे भारत में सामाजिक न्याय के आंदोलनों की ओर से जबरदस्त तारीफ मिली.

1960 और ’70 के दशकों में पश्चिम में कई शांति आंदोलन शुरू हुए. जीवन के सच्चे अर्थ की तलाश में एक नयी संस्कृति जन्म ले रही थी, जो आत्मा की खोज के साथ-साथ उसे उपभोक्तावाद और साम्राज्यवाद के जाल से मुक्त करने की कोशिश में समाधानों की तलाश कहीं और कर रही थी. पूरब एक्टिविस्टों की नयी पीढ़ी का केंद्र बन गया था जो युद्ध, परमाणु अस्त्र, जातीय और नस्लीय हिंसा के खिलाफ साम्यवादी संघर्ष जैसे आंदोलन कर रही थी. अमेरिका में कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के परिसर साम्राज्य, उसकी पुलिस और पूंजी की ताकत का मुक़ाबला करने में डट गए थे.

दूसरी संस्कृतियों में पैठने और उनसे सीखने के इस दृष्टिकोण ने मशहूर हिप्पी संस्कृति को जन्म दिया. पश्चिम जब भारत की विभिन्न परंपराओं से सीखने और उसके अतीत के ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को समझने की कोशिश कर रहा था तब कुछ सम्मानित अपवाद ऐसे भी थे जिन्होंने विशेषाधिकार प्राप्त जातियों वाले भारत की जगह असली, आदर्श, और जनता के भारत का अध्ययन करने का फैसला किया.

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भारत आकर बस गईं

देश-विदेश के अपने मित्रों द्वारा प्यार से ‘गेल’ पुकारी जाने वाली ओमवेट ने पीएचडी का शोध-निबंध प्रस्तुत करने के बाद सान दिएगो में अध्यापन शुरू किया. लेकिन अपने घर और अपने प्रिय देश भारत के बीच दूरी उनके लिए समस्या बन रही थी. अंततः, 1978 में उन्होंने भारत में बसने का फैसला किया और शूद्र, मार्क्सवादी, फुले-वादी एक्टिविस्ट डॉ. भारत पाटणकर से शादी कर ली. 1983 में गेल अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़ कर भारतीय नागरिक बन गईं.

1970 से लेकर ’90 के दशकों में गेल का नाम दलितों व कामगारों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हो गया. मैं उनका और एक अन्य अमेरिकी विद्वान इलीनोर जेलियट का नाम सुनते हुए बड़ा हुआ. एक श्वेत महिला फर्राटे से मराठी भाषा में रैलियों, सेमीनारों, सम्मेलनों में बोल रही थीं; अखबारों, पत्रिकाओं में मौलिक लेखन अथवा सार्वजनिक टिप्पणियां करते हुए या शैक्षणिक हलक़ों में आंदोलनों के सैद्धांतिक आधारों का जोरदार विवेचन कर रही थीं. बहुभाषी चिंतक गेल तमाम आंदोलनों के लिए एक आश्वस्ति की प्रतीक थीं, चाहे वह जाति विरोधी आंदोलन रहा हो या कामगारों का संघर्ष हो या पर्यावरण संरक्षण या महिला अधिकारों के लिए आंदोलन हो.

अधिकतर एक्टिविस्टों की तरह मेरे पिता भी उन्हें जानते थे और उनके कामों के प्रशंसक थे. वे दोनों ‘बामसेफ’ (अखिल भारतीय पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ), कामगार आंदोलनों, साहित्य की ताकत और सांस्कृतिक आंदोलनों में दिलचस्पी रखते थे. ‘बामसेफ’ के सम्मेलनों में उन दोनों की मुलाक़ात हुआ करती थी.

शोध, और जाति विरोधी विपुल लेखन

गेल की लिखी पुस्तकों की सूची बहुत लंबी है. जाति विरोधी सामाजिक आंदोलनों, कामगारों तथा किसानों के आंदोलनों, और धर्म जैसे विषयों पर उनका लेखन प्रखर होता था. उन्होंने जाति विरोधी आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चिंतकों, फुले और आंबेडकर पर किताबें लिखने के अलावा कई संकलन भी तैयार किए जिनमें अभिलेखीय अनुसंधान, मानवजाति विज्ञान संबंधी टिप्पणियां और पत्रकारीय रिपोर्ताज, जीवनी परक टिप्पणियां, और बौद्धिक इतिहास शामिल हैं.

भारत के मुख्यधारा के प्रकाशकों ने दलितों पर जो भी प्रकाशित किया है उसमें बड़ा हिस्सा गेल के लेखन का है या उससे निर्देशित कृतियों है. आंबेडकर पर उनकी कृतियां हैं— ‘दलित्स ऐंड द डेमोक्रेटिक रिवोलूशन : डॉ. आंबेडकर ऐंड द दलित मूवमेंट इन कोलोनियल इंडिया’, ‘आंबेडकर : टुवर्ड्स ऐन एनलाइटेंड इंडिया’. ‘बुद्धिज़्म इन इंडिया : चैलेंजिंग ब्राह्मणिज़्म ऐंड कास्ट’ में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान को जाति विरोधी आधार दिया गया है, जिसका स्वर उस ब्राह्मणवादी स्वर के विपरीत था जो बौद्ध धर्म के खुले, उदार और सार्वभौमिक सामाजिक दृष्टिकोण का विरोधी था. भारत के नारी स्वर और महिला आंदोलन में उनका योगदान महत्वपूर्ण है. उनकी पुस्तक ‘वी शैल स्मैश दिस प्रीज़न : इंडियन वुमेन इन स्ट्रगल’ मील का पत्थर है जिसमें उन्होंने महिला आंदोलन के विभिन्न स्वरूपों का मूल्यांकन किया है.

गेल की हाल की सबसे प्रसिद्ध कृति है ‘सीकिंग बेगमपुरा : द सोशल विज़न ऑफ एंटी कास्ट इंटेलेक्चुअल्स’ जिसने यूरोपीय पुनर्जागरण को लेकर हायतौबा मचाने वाले भारतीयों की कुलीन बुतपरस्ती को शब्दशः खारिज कर दिया. इन पारंपरिक रूपकों को परे रखते हुए गेल ने आधुनिकतावादी पुनरुत्थान का श्रेय दलित और शूद्र बौद्धिकों—चोखामेला, जनाबाई, रविदास, कबीर, तुकाराम— को दिया, जो बहुचर्चित यूरोपीय आधुनिकता के दौर से पहले या उस दौरान हुए. उस पाठ ने मुझे भीतर से हिला दिया था. उसे पढ़ते हुए मेरे शरीर में मानो चिनगारी दौड़ रही थी.


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‘हमारी गेल’, एक भरोसेमंद साथी

गेल का लेखन सुगम और पठनीय है. वे किसी भी विषय पर बेबाक और सारगर्भित लेखन करती थीं. उनकी किताबें भारत और उसके अतीत के बारे में जिज्ञासु छात्रों और लोगों के लिए अपरिहार्य हैं. कमी की भरपाई की ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अंग्रेजी में विद्वतापूर्ण लेखन किया. दलितों और शूद्रों के बीच उनके सहयोगियों, कॉमरेडों, आंदोलनों और उनके नेताओं की लंबी सूची प्रमाण है कि गेल कितनी भरोसेमंद साथी थीं. अपने पति के साथ मिलकर उन्होंने श्रमिक मुक्ति दल का गठन किया और सभी पक्षों के विभिन्न आंदोलनों की नियमित मेहमान और सलाहकार रहीं.

दलित आंदोलन को जब भी ब्राह्मणवादियों या विदेशियों से चुनौती मिली, गेल हमेशा उसका जवाब देने और दलित प्रतिकार को सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य देने के लिए आगे आती थीं. दक्षिण अफ्रीका के डरबन में नस्लवाद विरोधी प्रसिद्ध विश्व सम्मेलन में गेल भारत सरकार की भ्रमित आशंकाओं का जवाब देने के लिए मोर्चा संभाले रही थीं.

कई पुरस्कारों, देश-विदेश के संस्थानों से फ़ेलोशिप, प्रोफेसरशिप से सम्मानित गेल ओमवेट भारत में अमेरिका की सबसे प्रभावशाली दूत थीं. पश्चिमी शोधार्थियों के लिए वे इस मामले में एक आदर्श थीं कि अपने शोध को जनता के बीच पहुंचाने के लिए उसे किस तरह लिखा जाना चाहिए और कैसे बौद्धिक स्वरूप देना चाहिए. उन्हें सड़क पर उतरकर आंदोलन का नेतृत्व करते भी देखा जा सकता था और उतनी ही सहजता से कक्षाओं में पढ़ाते या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को सलाह देते भी देखा जा सकता था.

गेल बौद्धिक और सामाजिक मोर्चों पर सक्रिय उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती थीं, जो जाति आधारित उत्पीड़न से लड़ने के लिए विविध विचारधाराओं का उपयोग करती थी. कोई भी एक-दूसरे का सिर फोड़े बिना बुद्ध, फुले, आंबेडकर, शाहु, मार्क्स को अपना सकता है. उन्हें देखकर यह एक मधुर मेल लगता है. आज की पीढ़ी को इस तरह का तालमेल करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है.

गेल अपने पति भारत पाटणकर, बेटी प्राची, दामाद तेज़ू, और नातिन को छोड़ गई हैं. वे हमारी स्मृतियों में हमेशा बनी रहेंगी. समुदाय एक अलहदा, सुदूर विदेश से आईं ‘हमारी गेल’ के अवदान के प्रति सदा कृतज्ञ रहेगा.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(कास्ट मैटर्स के लेखक और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े सूरज येंगड़े इस समय इटली के टस्कनी में हैं. उनका ट्विटर हैंडल @surajyengde. हैं और व्यक्त विचार निजी है.)


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