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Sunday, 23 June, 2024
होममत-विमतकमजोर उपभोग, मैनुफैक्चरिंग में गिरावट जैसी चिंताओं पर GDP के अनुकूल आंकड़ों ने परदा डाल दिया

कमजोर उपभोग, मैनुफैक्चरिंग में गिरावट जैसी चिंताओं पर GDP के अनुकूल आंकड़ों ने परदा डाल दिया

ताजा तिमाही तक कृषि सेक्टर मैनुफैक्चरिंग से आकार में 25 फीसदी बड़ा हो गया, जो चिंता का कारण होना चाहिए क्योंकि सरकार ने जब ‘मेक इन इंडिया’ को आगे बढ़ाया तब इसका मकसद ठीक उलटा था

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जनवरी-मार्च तिमाही में पूरे वित्त वर्ष 2022-23 में भारत की आर्थिक वृद्धि के आंकड़े सुखद आश्चर्य की तरह सामने आए हैं. उन्होंने सभी भविष्यवाणियों (इस लेखक की भी) से बेहतर रहे हैं. गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रा नीति कमिटी (एमपीसी) ने उम्मीद जताई थी कि जनवरी-मार्च में यह आंकड़ा 4.2 फीसदी का रहेगा. लेकिन यह इससे कहीं ऊंचा 6.1 फीसदी का रहा.

इसलिए पूरे साल के लिए यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर रहा. एमपीसी ने इसका आंकड़ा 6.8 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था. अब वास्तव में जो आंकड़ा सामने आया है वह 7.2 फीसदी का है. मुद्रस्फीति में भी तेजी से गिरावट आई है और वह अब 5 फीसदी से नीचे है, जिसकी उम्मीद एमपीसी ने पूरे 2023-24 में नहीं की थी. वित्तीय घाटा भी जब गिरावट की ओर है और विदेशी एकाउंट बैलेंस सुखद स्थिति में है तब अर्थव्यवस्था भी हर तरह से सुखद मुकाम पर दिख रही है.

इसकी कई वजहें हैं— इस साल यात्री और व्यावसायिक वाहनों के उत्पादन में बढ़िया वृद्धि हुई, हवाई और रेल ट्रैफिक में नाटकीय वृद्धि हुई, कंस्ट्रक्शन से जुड़े इस्पात और सीमेंट जैसे सेक्टरों में भारी वृद्धि हुई, बैंकों क्रेडिट में जान लौटी, और भी बहुत कुछ हुआ. कोविड की वजह से कुछ आंकड़ों का आधार नीचा था. फिर भी, जनवरी-मार्च तिमाही में आर्थिक वृद्धि में अप्रत्याशित उछाल की व्याख्या जरूरी है.

इस मामले में विदेश व्यापार पर नजर डालने की जरूरत है, हालांकि इस तिमाही में सामान और सेवाओं के निर्यातों के डॉलर मूल्य में पिछले साल की इसी अवधि में इस मूल्य के मुक़ाबले केवल 4 फीसदी की वृद्धि हुई. चूंकि यह जीडीपी में वृद्धि की गति से धीमी गति है, तो इसे आर्थिक वृद्धि में तेजी लाने वाला कारक कैसे माना जाएगा? इसका जवाब विदेश व्यापार और जीडीपी के बीच के विशिष्ट रिश्ते में पाया जा सकता है. कुल आर्थिक वृद्धि की गणना जो चीज योगदान देती है (या कटौती करती है) वह आयात या निर्यात में वृद्धि से ज्यादा व्यापार घाटा है. इस तिमाही में निर्यात में 4.1 फीसदी की कमी आई. अर्थव्यवस्था में मांग की कमी और शायद तेल की कीमतों में गिरावट भी इसकी वजह है.

निर्यात में 4.1 फीसदी की वृद्धि और आयात में 4.1 फीसदी की कमी का कुल असर यह है कि व्यापार घाटा 26.3 अरब डॉलर मूल्य से 61 फीसदी कम होकर 10.1 अरब डॉलर मूल्य के बराबर हो गया. यह विचित्र बात लग सकती है कि आयातित माल की मांग में कमी ने वास्तव में जीडीपी के आंकड़े को मजबूती दी लेकिन हिसाब-किताब इसी तरह किया जाता है. किसी प्रेक्षक ने इस विचित्र नतीजे की उम्मीद नहीं की थी.

ध्यान देने वाला दूसरा आंकड़ा मैनुफैक्चरिंग और इसकी सुस्त वृद्धि से संबंधित है. 2022-23 में यह 1.3 फीसदी पर था और यह अर्थव्यवस्था के कृषि (4 फीसदी) समेत दूसरे क्षेत्रों के मुक़ाबले सुस्त है. इससे भी ज्यादा विचित्र बात यह है कि यह असामान्य बात नहीं है. अगर आप पिछले चार वर्षों को एक साथ देखें, तो कृषि ने 19 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जबकि मैनुफैक्चरिंग केवल 13 फीसदी की दर से बढ़ी. यह एक हास्यास्पद ‘विकासशील’ अर्थव्यवस्था है जिसमें मैनुफैक्चरिंग सबसे सुस्त सेक्टर है, कृषि से भी सुस्त.

आप कह सकते हैं कि कोविड ने मैनुफैक्चरिंग को कृषि से ज्यादा झटका लगाया. लेकिन मैनुफैक्चरिंग ने पिछले चार में से तीन साल मामूली या शून्य वृद्धि दर्ज की. हवाई ट्रैफिक में वृद्धि के बावजूद उपभोक्ता सामान के लिए मांग में धीमी वृद्धि क्यों हुई? दुपहिया वाहनों के मुक़ाबले चार पहियों वाले वाहनों की बिक्री में तेज वृद्धि क्यों होनी चाहिए? और कृषि में बढ़िया वृद्धि के बावजूद ग्रामीण मांग सुस्त क्यों है? क्या गरीबों के ऊपर कोविड के बेहिसाब असर और विविधता का कोई मेल है?

कृषि और मैनुफैक्चरिंग (चालू कीमतों के आधार पर) कभी समान आकार के हुआ करते थे लेकिन ताजा तिमाही तक कृषि मैनुफैक्चरिंग से आकार में 25 फीसदी बड़ी हो गई है. यह चिंता का कारण होना चाहिए. सरकार ने जब ‘मेक इन इंडिया’ को आगे बढ़ाया, शुल्कों के मामले में राहत दी और भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार किया तब इसका मकसद ठीक उलटा था. कुछ लोग निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मैनुफैक्चरिंग तब तक अग्रणी सेक्टर नहीं बन सकता जब तक उसे कृषि की तरह इनपुट में सब्सीडी और नकदी भुगतान नहीं दिया जाता. लेकिन इस तरह का मैनुफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत और प्रतिस्पर्द्धी हो सकता है? क्या समाधान एक अलग रास्ते पर मिल सकता है?

(विचार निजी हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड से विशेष प्रबंध द्वारा)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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