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Thursday, 30 May, 2024
होममत-विमतTMC के विरोध प्रदर्शन से BJP की धमकी तक—बंगाल में राजनीतिक रणनीति कमज़ोर हो रही, मतदाता सब देख रहे हैं

TMC के विरोध प्रदर्शन से BJP की धमकी तक—बंगाल में राजनीतिक रणनीति कमज़ोर हो रही, मतदाता सब देख रहे हैं

टीएमसी की अवास्तविक विरोध की मांगें लोगों को 15 लाख देने का वादा करने की नरेंद्र मोदी की रणनीति की तरह हैं — दोनों ने अपना प्रभाव खो दिया है.

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हर चुनाव के साथ मतदाता समझदार होते जा रहे हैं. इन्हें प्रभावित करने के लिए नेताओं को अब और अधिक मेहनत करने की ज़रूरत है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 10 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में अपनी पहली चुनावी रैली में गलती की, जो चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद राज्य में उनकी पहली चुनावी रैली थी. बालुरघाट निर्वाचन क्षेत्र में अपने भाषण में वे ‘बालुरघाट’ को ‘बेलूरघाट’ कहते रहे.

ज़ुबान का फिसलना ज्यादा हास्यास्पद लग रहा था क्योंकि बालुरघाट उत्तरी बंगाल में है और बेलूर मठ दक्षिण में कोलकाता से कुछ ही दूरी पर है और हर बंगाली के दिल के करीब है. यहीं पर रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है, जिसकी स्थापना रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने की थी. बेलूर का मंदिर एक पवित्र तीर्थ स्थल है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कोलकाता के किसी एक दौरे के दौरान रात भर वहीं रुके थे.

शाह की गलती का फायदा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) उठा रही है. पार्टी ने एक्स पर पोस्ट किया, “बेलूरघाट में आज शाही प्रवासी पक्षी की झलक देखी गई, जो न तो बंगाल के दिल को जानता है और न ही उसकी भाषा को जानता है.”

वही पुरानी रणनीति

टीएमसी खुश थी, लेकिन उसे चुनाव के लिए नई अभियान रणनीतियों के बारे में भी सोचना पड़ेगा. हाल ही में नई दिल्ली में भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के कार्यालय के बाहर पार्टी सांसदों का धरना पिछले साल अक्टूबर में कृषि भवन में अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में हुए धरने जैसा था. दोनों मौकों पर, जब प्रदर्शनकारी टीएमसी नेताओं को बस में भरकर थाने ले जाया गया, तो उनकी प्रतिक्रियाएं लगभग एक जैसी थीं — एक्स और बयान जिनमें कहा गया कि टीएमसी सांसदों का अपहरण कर लिया गया, सांसदों को नई दिल्ली के आसपास घुमाया गया, जगह का पता नहीं. काफी déjà vu.

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जिस तरह से वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के साथ पुलिस ने धक्का-मुक्की की, उसके लिए कोई बहाना नहीं है, न ही पार्टी की सबसे नई सांसद सागरिका घोष के साथ किए गए व्यवहार के लिए कोई बहाना है. डोला सेन को पुलिस द्वारा घसीटते हुए देखना बेहद परेशान करने वाला था क्योंकि वे हाल ही में हुई अपनी पैर की सर्जरी का हवाला देते हुए रुकने के लिए कहतीं रहीं. अपमान अक्षम्य है.

लेकिन अगर आप चाहते हैं कि मांगें आधी भी पूरी हों तो मांगें यथार्थवादी होनी चाहिए. टीएमसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के प्रमुखों को हटाने की मांग के लिए ईसीआई के पास गई, यही बात सांसद सागरिका घोष को टीवी पर जोर-शोर से कहते हुए उद्धृत किया गया. यह अवास्तविक लग रहा था और ऐसा लगा जैसे टीएमसी ने इसे केवल मीडिया का ध्यान खींचने के लिए उठाया था और इसलिए इसे अनसुना कर दिया गया. यहां तक कि राजनीति का एक नौसिखिया पर्यवेक्षक भी इसे समझ सकता था. किसी भी मामले में, जब आप अपनी रणनीति को बार-बार दोहराते हैं, तो वे अपना प्रभाव खो देते हैं.

लोगों को नकदी का वादा करने की मोदी की रणनीति की तरह. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले किया गया उनका 15 लाख रुपये का वादा भारतीयों के दिमाग में आज भी ताज़ा है. विपक्ष ने इसे सुनिश्चित किया है. इसके बावजूद, उन्होंने बंगाल के मतदाताओं को स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे राज्य में कथित भ्रष्टाचार के मामलों में ईडी द्वारा जब्त किए गए 3,000 करोड़ रुपये उन्हें लौटा देंगे. ये वादा इस महीने एक बार नहीं बल्कि दो बार किया गया.

पश्चिम बंगाल में उनके कार्यकर्ता सुवेंदु अधिकारी ने अपनी आस्तीन से पुराना पत्ता निकाला. हाल ही में नंदीग्राम में एक बैठक में उन्होंने भाजपा के सत्ता में आने पर “ममता बनर्जी की पुलिस” द्वारा गिरफ्तार किए गए सभी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कार्यकर्ताओं को 5,000 रुपये की सहायता देने का वादा किया. इस योजना का एक भव्य नाम है: संग्रामी भाटा. टीएमसी के कुणाल घोष चिढ़कर चिल्लाए: आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन.

अभिषेक बनर्जी भी अपनी रणनीति में बदलाव कर सकते हैं. टीएमसी के युवा राष्ट्रीय महासचिव को भाजपा के मुकाबले अपने पसंदीदा शब्द चुनौती के लिए पर्यायवाची शब्द खोजना होगा. वे आए दिन बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं. “मैं बीजेपी को चुनौती देता हूं कि अगर वह एक्स कर सकती है, तो मैं वाई करूंगा” ये उनकी पसंदीदा लाइन है, लेकिन यह थका देने वाला हो गया है, जैसा कि भाजपा द्वारा चुनौती स्वीकार करने पर फांसी पर चढ़ने या राजनीति से इस्तीफा देने का उनका वादा भी थका देने वाला हो गया है.

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 (सीएए) पर टीएमसी और बीजेपी दोनों ही हमला कर रहे हैं. टीएमसी का कहना है कि अगर आप नए कानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं तो गंभीर परिणामों से सावधान रहें. ममता बनर्जी हर चुनावी रैली में यह संदेश घर-घर पहुंचा रही हैं, लेकिन बीजेपी इसके बकवास बताती है और कहती है कि — “टीएमसी डरा रही है, अल्पसंख्यकों को खुश कर रही है. साइन अप करने पर कोई प्रतिकूल दुष्प्रभाव नहीं होगा”. हालांकि, सीएए पर लोगों की प्रतिक्रिया ठंडी रही है. जब पश्चिम बंगाल की बीजेपी इकाई के एक मंत्री अचानक घोषणा करते हैं कि वे सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने जा रहे हैं और फिर अचानक चुप हो जाते हैं, तो और क्या उम्मीद की जा सकती है?


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अमित शाह की चेतावनी

राजनीतिक दलों को सच में सीएए जैसे मुद्दों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. वरना, वह संदेशखाली और भूपतिनगर मामलों में टीएमसी को जो अनुभव हो रहा है उसका सामना कर सकते हैं.

कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, संदेशखाली में छेड़छाड़ और ज़मीन हड़पने की शिकायतों की जांच अब सीबीआई करेगी. भूपतिनगर मामले में पुलिस एनआईए अधिकारियों को गिरफ्तार नहीं कर सकती जिन्होंने छापेमारी की और बम विस्फोट मामले में दो टीएमसी सदस्यों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार किए गए लोगों में से एक की पत्नी ने आरोप लगाया कि एनआईए अधिकारियों ने उनके साथ छेड़छाड़ की. पुलिस ने एनआईए के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन अदालत ने हस्तक्षेप किया. निष्कर्ष: संदेशखाली में अब राज्य पुलिस की कोई भूमिका नहीं होगी. भूपतिनगर मामले में राज्य पुलिस का नियंत्रण कमज़ोर दिख रहा है.

इसमें कोई हैरानी नहीं कि शाह शेखी बघार रहे हैं. 2021 में टीएमसी के खिलाफ अपनी रणनीति का वर्णन करने के लिए उनका पसंदीदा वाक्यांश था “जड़ से उखाड़ के फेंको”. इस बार, उस वाक्यांश को इससे बदला जा सकता है जो उन्होंने बुधवार को बालुरघाट में इस्तेमाल किया था — टीएमसी के खिलाफ नहीं बल्कि “भूपतिनगर के बम निर्माताओं” के खिलाफ. उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी, आपको शर्म आनी चाहिए, आप भूपतिनगर के बम निर्माताओं को बचाना चाहती हैं? लेकिन बंगालवालों चिंता मत करो. हाई कोर्ट ने मामला एनआईए को दे दिया है. सबको उल्टा लटका कर सीधा कर दिया जाएगा.” यह लगभग “जड़ से उखाड़ के फेंको” जैसा ग्राफिक है.

यह चेतावनी टीएमसी की रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए है, लेकिन 2021 के अनुभव को देखते हुए इसकी संभावना नहीं है. इसके बजाय, टीएमसी इस तथ्य पर खुश हो रही है कि शाह ने पश्चिम बंगाल से अपनी उम्मीदों में कमी की है. चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले संबोधित रैलियों में शाह ने राज्य की 42 में से 35 सीटों पर अपनी नज़रें जमाईं. मोदी ने उस उम्मीद को 42 में से 42 तक बढ़ा दिया, लेकिन शाह ने इसे फिर से कम कर दिया. वे अब कह रहे हैं कि भाजपा को 30 सीटें मिलेंगी.

एक्स पर एक यूज़र ने पूछा, “आपका मतलब 43 में से 30 है, ठीक है, अगर आप बेलूरघाट को शामिल करते हैं?”

खैर, शाह ने बालुरघाट को गलत समझा. हो सकता है कि 42 में से 30 सीटों की भविष्यवाणी भी ज़ुबान से फिसल गई हो, लेकिन वोटर देख रहा है. ऐसी गलतियों को माफ किया जा सकता है, लेकिन लोगों की धमकियों को तार-तार कर दिया जाता है? हमारे नेताओं को सावधानी से चलने की ज़रूरत है. मतदाता पहले से कहीं अधिक समझदार हैं. आप उन्हें हर समय मूर्ख नहीं बना सकते.

(लेखिका कोलकाता स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @Monidepa62 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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