फ्रांस में पिछले दिनों टैक्स और महंगाई बढ़ने के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स)
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फ्रांस में व्यापक जनविद्रोह शुरू हो गया है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के नेतृत्व में जनविद्रोह की स्थिति की समीक्षा के लिए वरिष्ठ मंत्रियों की बैठक हुई, जिसमें इस बात की संभावना व्यक्त की गई कि अगर यूं ही व्यापक अशांति, आगजनी, तोड़-फोड़ और लूटपाट की घटनाएं जारी रहीं तो देश में आपातकाल लगाया जा सकता है.

सतत क्रांतियों का देश फ्रांस फिर एक बड़े जनविद्रोह का सामना कर रहा है. 17 नवंबर को तीन लाख लोग सड़कों पर उतर आए. बीते 1 दिसंबर को एक लाख 60 हज़ार लोग सड़कों पर उतरे. इस प्रर्दशन के अगुवा लोगों को येलो वेस्ट पुकारा जा रहा है. 3 दिसंबर को सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले येलो वेस्ट को तब और अधिक मज़बूती मिल गई, जब पैरामेडिकल और छात्रों ने इसमें हिस्सेदारी करने का निर्णय लिया.

फ्रांस की राजधानी पेरिस अफरा-तफरी का केंद्र बनी हुई है. पेरिस में अब तक 130 लोग जख्मी हो चुके हैं. अकेले पेरिस में 412 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. 4 दिसंबर के प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रीय असेंबली तक पहुंचने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों द्वारा बाधाएं खड़ी की गई हैं. इसके बावजूद प्रदर्शन निरंतर जारी है. ट्रेड यूनियनों ने भी इसमें शामिल होने का निर्णय लिया है.

विश्लेषकों का कहना है कि मई 1968 के छात्र अंसतोष और विद्रोह के बाद फ्रांस ने इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन का सामना नहीं किया था. फिलहाल प्रदर्शन जारी हैं. इसे व्यापक जनविद्रोह की संज्ञा दी जा रही है. हालांकि व्यापक रोष और प्रदर्शनों के मद्देनज़र ईंधन टैक्स छह महीने के लिए स्थगित कर दिया गया है. फ्रांस के प्रधानमंत्री एडुअर्ड फिलिप ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि कोई ‘गूंगा बहरा’ ही इस जनआक्रोश को देख सुन नहीं सकता.

किन रूपों में अभिव्यक्त हो रहा असंतोष

लोगों के बीच असंतोष और आक्रोश किस कदर है और सरकार और मुट्ठीभर धनाढ्यों के प्रति लोगों में कितना आक्रोश है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब लोग अपने घरों से सड़क पर निकले, तो उन्होंने धनाढ़्य लोगों के घरों पर हमला बोला और तोड़-फोड़ की. उनके घरों की सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षा बलों से लोग भिड़ गए. सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमला बोला गया.

फ्रांस और दुनिया में प्रसिद्ध फ्रांसीसी स्तंभों-प्रतीकों को लोगों ने अपने आक्रोश का निशाना बनाया. बड़े शॉपिंग मॉलों पर लोगों ने धावा बोल दिया. कारोबारी ठिकानों को भी लोगों ने अपने हमले का निशाना बनाया. वाहनों में आग लगा दी. प्रदर्शनकारी ‘हमें जीने दो’ का नारा लगा रहे हैं. करों में कटौती की मांग कर रहे हैं. पेंशन में कटौती के प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं. श्रम कानून में परिवर्तन की मुखालफत कर रहे हैं. इसके साथ ही ‘नव उदारवादी पूंजीवाद मुर्दाबाद’ और ‘मैक्रॉन इस्तीफा दो’ का नारा भी गूंज रहा है.

क्या हैं असंतोष के कारण

असंतोष का सबसे तात्कालिक कारण ईंधन के दामों में बेतहाशा वृद्धि है. फ्रांस में सबसे ज़्यादा डीज़ल से चलने वाले वाहनों का लोग इस्तेमाल करते हैं. पिछले वर्ष की तुलना में अब तक डीज़ल के दाम में 23 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है. फ्रांस में डीज़ल इस समय करीब 121 रुपये प्रति लीटर है. तेल के दामों में वृद्धि का मुख्य कारण यह है कि मैक्रॉन की सरकार ने ईंधन पर कर में भारी वृद्धि की है. डीज़ल पर 7.6 प्रतिशत और पेट्रोल पर 3.9 प्रतिशत टैक्स में वृद्धि की गई है.

ईंधन के दामों में वृद्धि के साथ ही लोगों के असंतोष का एक अन्य सबसे बड़ा कारण जीवन जीने की लागत में वृद्धि और आय का न बढ़ना है. फ्रांस के बड़े श्रमिक तबके और निम्म मध्यम-वर्गीय लोगों का कहना है कि उनके लिए जीना मुश्किल हो रहा है. यही वजह रही कि प्रर्दशनकारी ‘हमें जीने दो’ का नारा लगा रहे थे.

तीसरा सबसे बड़ा कारण बेरोज़गारी है. फ्रांस में बेरोज़गारी करीब 9.5 प्रतिशत है. 18 महीने पहले फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन चुनाव लड़ रहे थे, तो उन्होंने बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन का वादा किया था. लेकिन इन 18 महीनों में बेरोज़गारी में कोई कमी नहीं आई है.

चौथा बड़ा कारण श्रम कानूनों में परिवर्तन की कोशिश है. फ्रांस के श्रम कानून आज भी दुनिया के अधिकांश देशों की तुलना में अधिक श्रमिकों के पक्ष में हैं. जबकि कॉरपोरेट कंपनियां श्रम कानूनों में परिवर्तन की मांग कर रही हैं. राष्ट्रपति मैक्रॉन ने इस संबंध में बार-बार घोषणा की है कि श्रम कानूनों में परिवर्तन आवश्यक है. तभी यहां निवेश बढ़ेगा.

इसके अलावा फ्रांस की सरकार पेंशन कानूनों में भी परिवर्तन करना चाहती है. इस परिवर्तन का अर्थ है कि पेंशन में कटौती और कम से कम लोगों को पेंशन देना. छात्रों की फीस में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है. फ्रांस की सरकार एक तरफ आम लोगों पर टैक्स लगा रही है, वहीं दूसरी ओर उसने संपत्ति कर में कटौती की है, जिसका फायदा ऊपरी धनाढ्य वर्ग को मिला है.

संकट कितना गहरा गया है, इसका अंदाज़ इससे भी लगाया जा सकता है कि अर्जेंटीना में जी-20 की बैठक में इस मुद्दे पर फ्रांस के राष्ट्रपति ने गहरी चिन्ता ज़ाहिर की थी. उन्होंने कहा कि हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

राजनीतिक पार्टियों से मोहभंग

यहां यह भी याद कर लेना ज़रूरी है कि फ्रांस की लंबी क्रांतिकारी परंपरा रही है. फ्रांस का बास्तील का किला दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक बन गया है. 1789 की क्रांति ने सामंतवाद का खात्मा कर दिया, 1871 की सर्वहारा क्रांति ने पूंजीवाद-सामंतवाद का खात्मा कर पेरिस कम्यून की स्थापना की और मज़दूरों-किसानों का पहला राज स्थापित हुआ. उसके बाद निरंतर संघर्ष चलते रहे. 1968 में फ्रांस के छात्रों के विद्रोह ने पूरी दुनिया पर व्यापक और गहरा असर डाला था.

फ्रांस में लोगों का राजनीतिक पार्टियों से मोहभंग तेज़ी से हो रहा है. इसी मोहभंग के चलते लोगों ने 18 महीने पहले ही एक कमोवेश गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति ( बैंकर) मैक्रॉन को अपना राष्ट्रपति चुना था, जिसने लोगों की जीवन स्थिति में सुधार करने और सबको रोज़गार मुहैया कराने का वादा किया था. संसदीय चुनावों में भी लोगों ने परंपरागत पार्टियों को दरकिनार कर मैक्रॉन की नई-नवेली पार्टी को समर्थन दिया था. लेकिन सत्ता में आने के साथ ही मैक्रॉन ने नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियों को और ज़ोर-शोर से लागू करना शुरू कर दिया. जिसका परिणाम व्यापक पैमाने पर असंतोष के रूप में सामने आया है.

इन विरोध-प्रदर्शनों को फ्रांस की आबादी के बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त है. एक सर्वे में 70 प्रतिशत लोगों ने प्रर्दशकारियों का समर्थन किया है. एक अन्य सर्वे में 75 प्रतिशत लोगों ने समर्थन किया, जिसमें 50 प्रतिशत वे लोग हैं, जिन्होंने वर्तमान मैक्रॉन का 18 महीने पहले हुए चुनावों में समर्थन किया था. लोग कह रहे हैं कि सरकार धनी लोगों के लिए काम कर रही है. प्रर्दशनकारी कह रहे हैं, मैक्रॉन हट जाओ, रास्ता साफ करो. क्रांति की भी बातें हो रही हैं.

बहरहाल, फ्रांस में जनता के इस व्यापक विद्रोह से पूरे विश्व में जनपक्षधर लोगों के बीच इस बात की उम्मीद बन रही है कि शायद कहीं पूंजीवाद के किले के ध्वस्त होने की शुरुआत भी शायद फ्रांस (बास्तील) से ही हो.

(लेखक हिंदी साहित्य में पीएचडी हैं और फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं.)


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