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Thursday, 20 June, 2024
होममत-विमतआंखों देखीः खून ही खून, बिखरी लाशें, गोली खाकर आगे बढ़ती भीड़, 40 साल बाद ताजा हुई नेल्ली दंगों की याद

आंखों देखीः खून ही खून, बिखरी लाशें, गोली खाकर आगे बढ़ती भीड़, 40 साल बाद ताजा हुई नेल्ली दंगों की याद

मैं वहां के संकट की खबर देने के लिए ही गया था. उस भयानक पखवाड़े के दौरान, जब इंदिरा गांधी ने असम में जबरन चुनाव कराने का फैसला किया था, आपको संकट की तलाश करने की जरूरत नहीं थी. वह तो आपका हर समय पीछा कर रहा था

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असम में दशकों पहले जो कुछ हुआ था उसके बारे में आज हम क्यों लिख रहे हैं? आज क्यों? वह भी इस नियमित कॉलम में केवल एक लेख में नहीं बल्कि लगातार दो शनिवार को दो लेखों के सीरीज़ में?

खुद के अनुभव/ दूसरे ड्राफ्ट वाली इस कभी-कभार लिखी जाने वाली सीरीज की शुरुआत मैंने 2013 के मध्य में की थी और इसकी प्रेरणा मुझे शूजीत सरकार की शानदार फिल्म ‘मद्रास कैफ़े’ से मिली, जिसमें श्रीलंका में उस आतंकवादी दौर की कहानी कही गई है जिसमें राजीव गांधी की हत्या हुई थी. उस साल भारत के स्वतंत्रता दिवस पर मुझे श्रीलंका इंडिया सोसाइटी का वार्षिक व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था.

उस फिल्म को देखने के बाद मुझे 1984 से 1994 के बीच श्रीलंका संकट को कवर करने के दौरान बीते कई क्षणों, जगहों और कई लोगों से मुलाकतों की दोबारा याद आई जहां मैं गया था. और इस सबका नतीजा लेखों की सीरीज़ के रूप में निकला.

इसके बाद और भी सीरीज़ आईं, पंजाब पर कई लेख आए. उन सबको आप यहां पढ़ सकते हैं. बाद में ये सब कुछ अधिक विस्तार के साथ एक किताब के रूप में आ सकता है. तब तक, मैं इस तरह की अनियमित सीरीज़ आपके सामने प्रस्तुत करता रहूंगा, खासकर तब जबकि ऐसा कुछ होता रहेगा जो उन बड़ी खबरों की याद दिलाता रहेगा जो दशकों तक मैंने फील्ड रिपोर्टर के रूप लिखी थीं. ये खबरें उन घटनाओं की हैं जिनका मैं प्रत्यक्षदर्शी रहा. समय के साथ हुए बदलावों घटना के बाद उसका विश्लेषण करने की सुविधा हमें दूसरा ड्राफ्ट लिखने का मौका देती है. इसीलिए फर्स्ट पर्सन/ दूसरे ड्राफ्ट में लिखी गई यह सीरीज़ पेश है.

इस असम सीरीज़ का विचार करीब दो सप्ताह पहले अचानक तब कौंधा जब मैं नई दिल्ली के लोधी एस्टेट विद्युत शवदाह गृह में कुछ मित्रों-परिचितों के बीच था. वहां हम सब 1966 बैच के असम-मेघालय काडर के प्रतिष्ठित आइएएस अधिकारी विनय कोहली के अंतिम संस्कार पर शोक मना रहे थे. उनके कई साथी और प्रशंसक वहां जमा थे. कई लोगों से मैं कई वर्षों बाद, तो कई लोगों से दशकों बाद मिल रहा था.

वहां मदन पी. बेजबारुआ थे, 1964 बैच के, जो 1980 के दशक में जब मैं असम में था तब राज्य के गृह सचिव थे. ‘युवा’ जीतेश खोसला और अनूप ठाकुर (दोनों 1979 बैच के) अपनी-अपनी पत्नी के साथ वहां थे. असम काडर के ये दोनों अधिकारी भी बेजबरुआ की तरह केंद्र सरकार में सचिव के पद से रिटायर हुए. मैंने उन्हें ‘युवा’ इसलिए कहा क्योंकि उत्तर-पूर्व के उस संकटग्रस्त दौर में जब वे वहां थे तब वे भी मेरी तरह युवा थे. मैं उनसे क्रमशः गोलाघाट और मंगलदाई में सब-डिवीज़नल अफसर के रूप में शायद उनकी पहली पोस्टिंग के दौरान ही मिला था.
बेशक मैं वहां के संकट की खबर देने के लिए ही गया था. उस भयानक पखवाड़े के दौरान, जब इंदिरा गांधी ने असम में जबरन चुनाव कराने का फैसला किया था, आपको संकट की तलाश करने की जरूरत नहीं थी. वह तो आपका हर समय पीछा कर रहा था, चाहे आप सरकारी अधिकारी रहे हों या रिपोर्टर. लोधी शवदाह गृह में उस सुबह कई यादों ने मुझे घेर लिया.

तभी इत्तफाकन मेरे सहकर्मी ‘दिप्रिंट’ में राष्ट्रीय सुरक्षा संपादक प्रवीण स्वामी ने मुझे याद दिलाया कि इस फरवरी का पहला पखवाड़ा असम का सबसे खूनखराबे वाला पखवाड़ा होगा, जबकि मेरे ख्याल से वहां करीब 7,000 लोग मारे गए होंगे. सरकारी अनुमान इससे आधे का था.

इसीलिए, इस सीरीज़ के दो लेखों में से यह पहला लेख आपको प्रस्तुत है. इसमें यह बताया गया है कि उस दौरान चुनाव अभियान में किस तरह हिंसा भड़की थी. अगले शनिवार, 18 फरवरी को जब दूसरा लेख आएगा तब वह नेल्ली जनसंहार की 40वीं बरखी होगी. मैंने उस जनसंहार के चश्मदीद गवाह के रूप में उसका विवरण वीडियो और पॉडकास्ट में दर्ज किया है.

अगले लेख में यह बताऊंगा कि उस दौरान अरुण शौरी के साथ काम कर रहे हम कुछ लोगों ने किस तरह वह अविश्वसनीय खबर दी थी कि उस पखवाड़े अक्षमता, लापरवाही, लीपापोती और मिलीभगत तक की वजह से वह भीषण जनसंहार हुआ था. इनमें से कुछ विवरण 1983-84 की मेरी किताब ‘असम: अ वैली डिवाइडेड’ से लिये गए हैं, जिसका पूरा संस्करण बिक चुका है.

‘आपको सैकड़ों में लाशें गिननी पड़ेगी’

अब जबकि पीछे मुड़कर नजर डाला जा सकता है, तब सबसे ज्यादा उभरकर जो बात सामने आती है वह यह है कि पुलिस उस समय कितनी बेपरवाह, अनमनी, परेशान, असंवेदनशील और अपराध में किस कदर लिप्त थी. तब मुझे नवगांव (अब नगांव) जिले में, जिसमें नेल्ली भी पड़ता है, हिंसा के शुरुआती दौर की याद आती है. नेल्ली कांड से एक सप्ताह पहले एक छोटे अफसर ने हालात के बारे में कहा था, “काश नवगांव का गुब्बारा दर्रांग की तरह पहले ही फट जाता. अब चुनाव के बीच में यह होगा तो आपको सैकड़ों की संख्या में लाशें गिननी पड़ेंगी.” उसके शब्द किस तरह भविष्यवाणी साबित हुए थे!

इसके पहले संकेत इस बातचीत के अगले ही दिन मिलने लगे. गौहाटी के पश्चिम चमरिया में दंगों के कारण मची अफरातफरी के बीच कई लोगों ने नेल्ली से मात्र 15 किलोमीटर दूर, नवगांव जिले के जागीरोड में घट रही घटनाओं की अनदेखी कर दी. ऊपर से सांप्रदायिक दंगा दिखने वाली हिंसा में पांच लोग मारे गए थे. किसी ने तुरंत यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि ये हत्याएं किसने की, क्योंकि चारों तरफ कई लोग मारे जा रहे थे. वास्तव में, यह जनजातीय उन्माद भड़कने का पहला संकेत था, जो पांच दिन बाद नवगांव के पूरे मैदानी इलाके में जंगल में लगी आग की तरह फैलने वाला था.

संकेत देने वाली ऐसी घटनाएं बढ़ती गईं, और मतदान के दिन तनाव इस कदर बढ़ गया कि लगभग पूरे जिले में बड़े पैमाने पर हिंसा अपरिहार्य दिखने लगी. नवगांव वह इलाका है जहां राज्य के सबसे ज्यादा ‘असमी’ बन चुके आदिवासी रहते हैं. कछारियों पर जीत हासिल करने के बाद आहोमों ने इस जनजाति की कुछ शाखाओं को नवगांव में रहने की छूट दे दी थी. कछारियों और आहोमों के गुलाम रहे लालंगों को इस छूट का सबसे ज्यादा लाभ मिला था.
वे ब्रह्मपुत्र घाटी के इस सबसे उपजाऊ इलाके में मनमर्जी से बसे रहे, जब तक कि 20वीं सदी के शुरू में प्रवासी बंगाली मुसलमान वहां आने नहीं शुरू हो गए. जमीन के लिए खींचतान बढ़ी और इसका सबसे ज्यादा नुकसान लालंगों को झेलना पड़ा. इस जनजाति (2011 की जनगणना के मुताबिक आबादी 3.71 लाख) को अपने कब्जे की लगभग पूरी अच्छी जमीन गंवानी पड़ी. उन्हें खदेड़कर ब्रह्मपुत्र की विभिन्न शाखाओं, खासकर कोपिली में और मिकिर पहाड़ियों के जंगल में रहने को मजबूर कर दिया गया.

बाद में, ब्रिटिश प्रशासकों ने ‘लाइन’ प्रथा लागू करके आदिवासियों की जमीन के विभाजन को रोकने की अटपटी कोशिश की. इस ‘लाइन’ प्रथा में, उन जिलों के कई हिस्सों में काल्पनिक ‘लाइन’ खींच दी गई, जिन जिलों में घुसपैठ होती रहती थी. बाहर से आकर बसे बंगालियों को ‘लाइन’ पार करने की मनाही कर दी गई, लेकिन वे ‘लाइन’ के अंदर रह रहे भोलेभाले, पिछड़े आदिवासियों को फुसला ही लेते थे. और लाइन को अंदर धकेलना जारी रहा. नवगांव में हुई हिंसा का सरसरे तौर पर विश्लेषण करने से भी साफ हो जाता है कि आज भी यही ‘लाइन’ है जो इन दो प्रतिद्वंद्वी समूहों को बांटती है. आदिवासियों पर सोचे-समझे हमले आज़ादी से पहले खींची गई इन ‘लाइनों’ के आरपार ही होते हैं.

संकट की गंभीरता के पहले संकेत कोपिली नदी के किनारे के क्षेत्र पर ही उभरे, जो संयोग से नेल्ली के बाहरी हिस्से को भी छूते हैं. आदिवासियों ने कई बेअसर हमले किए जिनके जवाब में मुसलमानों ने 16 फरवरी को बकुलगिरि गांव पर हमला किया. बदले में पादुमणि गांव पर आदिवासियों के हमले में चार लोग मारे गए. इसके बाद घटनाएं तेजी से घटने लगीं और होजई शहर के आसपास तनाव काफी बढ़ गया. यह शहर अगर की लकड़ी के व्यापारियों के लिए जाना जाता है. बर्मा से तस्करी के रास्ते आने वाली अगर की लकड़ी से अगरबत्तियां आदि बनती हैं. संयोग से, असम के असदुद्दीन ओवैसी माने जाने वाले बदरुद्दीन अजमल इसी शहर के हैं और वे अगरबत्तियों के व्यापारी भी हैं.
होजई में तनाव नेल्ली कांड का भी कारण बना, क्योंकि प्रशासन का पूरा ध्यान होजई पर ही केन्द्रित हो गया क्योंकि उसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता था. शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया और एक समय के लिए पुलिस ने जिले के पश्चिमी इलाके की अनदेखी कर दी तो वहां घटनाएं तेज रफ्तार से घटीं.

‘दरबार’ ने कत्लेआम का फैसला किया

अब प्रवासी मुसलमानों ने लालंगों के एक परिवार के पांच लोगों का अपहरण कर लिया. जल्द ही यह अफवाह फैल गई कि उन पांच में से दो लड़कियों का सामूहिक बलात्कार किया गया. इससे भड़के आदिवासियों ने पास के नागबंध गांव पर हमला किया जिसमें 20 प्रवासी मुसलमान मारे गए. लालंग राजाओं ने एक चाय बागान में बैठक की और प्रवासियों के इलाकों पर जोरदार हमला करने का फैसला किया.

इस ‘दरबार’ में क्या कुछ हुआ, इस बारे में कई तरह की बातें कही जाती हैं. कुछ पढ़े-लिखे लालंगों ने मुझे बताया कि उकसाने का काम आसू-एएजीएसपी के कुछ छुटभैये नेताओं ने किया. कहा गया कि ये सब आरएसएस से जुड़े थे, जिसका पास में दक्षिण के कामपुर इलाके पर अच्छा असर था.. वैसे, यह आरोप साबित नहीं हुआ. कहा जाता है कि लालंग सरदारों ने यह फैसला किया कि हर एक मारे गए आदिवासी के बदले में कम-से-कम 700 लोगों की हत्या की जाए.

हिंदू शैव संप्रदाय से जुड़े लालंगों ने नेल्ली कांड से पहले बगावत की एक ही कोशिश की थी, जब 1861 में एक ब्रिटिश अधिकारी की इसलिए हत्या की थी कि वह उन्हें अफीम की खेती करने से रोक रहा था, जो कि उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी.

मुमकिन है कि कुछ तत्व लालंगों के आक्रोश का गलत इस्तेमाल करने में सफल हुए. लेकिन आक्रोश का यह विस्फोट उनकी जमीन पर जबरन कब्जा करने वालों के प्रति संदेह और नफरत के कारण वर्षों से जमा हुए गुस्से की वजह से हुआ. यह समूह नेल्ली के आसपास के चाय बागानों और जंगलों में एकजुट होने लगा था. उन्होंने कुछ कर्बियों और गैर-आदिवासी असमी हिंदुओं के अलावा कुछ नेपालियों को अपने साथ जोड़ लिया था.

बाकी इतिहास तो जाना-पहचाना है; जिसमें नवगांव थाने के कमांडिंग अफसर जहीरुद्दीन का वह वायरलेस संदेश भी शामिल है जिसमें उन्होंने नेल्ली कांड की पूर्व-चेतावनी दी थी और जिसकी अनदेखी कर दी गई थी. इस संदेश के बारे में मैं अगले सप्ताह के लेख में बताऊंगा कि उसे मैंने किस तरह नवगांव थाने में एक शाम हाथ में जलते बल्ब की रोशनी ढूंढ निकाला था.

वैसे, पुलिस के बचाव में कहा जा सकता है कि नेल्ली पर जब हमला हुआ था तब जिले के दर्जनों स्थानों पर ऐसी स्थिति बनी हुई थी और वह पूरे दबाव में थी. सबसे खतरनाक स्थिति राधाहाटी की थी, जिसे असम का चंबल कहा जाता है और जहां ब्रह्मपुत्र में स्थित द्वीपों से कार्रवाई करने वाले डकैतों का राज था.

17 फरवरी की सुबह नवगांव के अधिकारियों को खबर मिली कि डकैतों के नेतृत्व में प्रवासी मुसलमानों का एक बड़ा जत्था धींग शहर पर, जहां असमियों का बहुमत है, जोरदार हमला करने वाला है. यह कोई फर्जी चेतवानी नहीं थी, क्योंकि शहर के बाहर तैनात सीआरपीएफ की चौकी ने जिला मुख्यालय को रेडियो संदेश भेजा कि उन पर ऑटोमेटिक हथियारों से गोलीबारी की जा रही है. सीआरपीएफ की इस टुकड़ी को उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों में बागियों के खिलाफ तैनाती से हाल में ही हटाया गया था और वे सेल्फ-लोडिंग राइफलों से लैस थे. आज़ादी के बाद शायद यह पहली घटना थी जब किसी पुलिस फोर्स ने कानून-व्यवस्था से संबंधित मामले से निबटने के लिए ऑटोमेटिक राइफलों और लाइट मशीनगनों से खुल कर गोलीबारी की होगी.

200 राउंड फायरिंग की गई और हालांकि उन्होंने केवल छह हमलावरों को मारा, लेकिन गोलियों की बौछार ने बाकी हमलावरों का जोश जरूर ठंडा कर दिया होगा. लेकिन बाद में नेल्ली कांड ने ऐसी सभी घटनाओं को फीका कर दिया. हिंसा का तीसरा दौर तब शुरू हुआ जब प्रवासी मुसलमानों ने बदला लेने के लिए 21 फरवरी की रात से 23 फरवरी की रात तक सामागुरी के आसपास के गांवों में जबरदस्त आगजनी की. लेकिन पुलिस हमेशा उनके पीछे पड़ी रही और उसने कई जनसंहारों को ठीक समय पर रोक दिया. जंगलों में परछाइयों का पीछा करने ने पुलिस को इतना थका दिया कि वह बेअसर होती गई.

हिंसा की ताजा लहर

मुसलमानों ने बदले की जो कार्रवाई की वह बुरी तरह नाकाम रही. वास्तव में, एक सप्ताह बाद आमतला के जंगल में हिंसा के नये दौर में उनमें से 60-70 को मार कर चुपचाप दफना दिया गया. जहीरुद्दीन ने उनके कंकाल तीन सप्ताह बाद खोज निकाले. आमतला के पास प्रवासियों को असमी सिखों के रूप में अलग तरह के दुश्मनों का सामना करना पड़ा. नवगांव के आसपास के कई गांवों में बसे असमियों ने सदियों पहले सिख धर्म को अपना लिया था.

हथियारबंद असमी सिखों को सादी वर्दी वाले सीआरपीएफ या बीएसएफ जवान मान लिया जाता था. अभागे प्रवासियों को जब तक इस राज का पता चला तब तक काफी देर हो चुकी थी. वास्तव में, चुनाव अभियान के दौरान नवगांव जिले में पुलिस की गोली से मरने वाले पहले लोगों में एक असमी सिख चन्दन सिंह था, जिसके बारे में पुलिस का दावा था कि वह एक पक्का उग्रवादी था.

पुलिस का ध्यान ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर लगा था क्योंकि संपर्क से कटे जंगली इलाकों में मारकाट और दंगा फूट पड़ा था. सच-झूठ में फर्क करना मुश्किल हो गया था. कभी खबर मिलती कि दर्जन भर लोग मारे गए, जबकि बाद में पता लगता कि वास्तव में 1290 लोग मारे गए थे. कभी खबर मिलती कि 120 लोग मारे गए हैं, जबकि वास्तव में चार लोग भी नहीं मारे गए थे. ऐसा ही था वह पखवाड़ा. गोहपुर, चौलखोवा चपोरी (नदी द्वीप) जैसी जगहों ने उत्तरी तट के सुदूर पूर्व में बसे खोइराबारी से हमारा ध्यान हटा दिया था, जहां दूसरा सबसे बड़ा जनसंहार हुआ था, नेल्ली कांड से पहले.

खोइराबारी के हाईस्कूल में जब उन्मादग्रस्त 10,000 लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई थी तब इस शहर में कछार इलाके से आए एक कमजोर-से पुलिस हवलदार के नेतृत्व में केवल पांच पुलिसवाले ही मौजूद थे. भीड़ ने पहले से तैयार योजना के अनुसार बंगालियों के गांवों को घेरना और तबाह करना शुरू कर दिया था. पुलिसवालों ने अपने विवेक से फैसला करना ही अपनी बहादुरी मान ली थी.

इसके साथ ही असमी भीड़ ने पश्चिम में गोरेश्वर के बंगाली-हिंदू इलाके पर हमला कर दिया था. सरकार ने करीब 100 लोगों के मारे जाने की औपचारिक घोषणा की, और अनौपचारिक तौर पर कबूल किया कि करीब 600 लोग मारे गए. लेकिन, हत्याओं के बाद तैनात किए गए बीएसएफ के जवानों की बात मानें तो 1,000 से कम लोग नहीं मारे गए. एक पुराने जवान ने कहा था, “जैसे बांग्लादेश युद्ध में हुआ था वैसे ही लाशों के ढेर लगे थे. एक गांव के बाहर मैंने खुद 97 लाशें गिनी.” हत्याओं के दो सप्ताह बाद मैंने खेतों में पड़े दर्जनों नरकंकालों के ऊपर गिद्धों को मंडराते देखा.

3 मार्च को जब मैं वहां पहुंचा था तब बचे हुए घायल लोग डर के मारे छिपे हुए थे और पुलिस के आने के बाद भी उन्हें बाहर आने के लिए राजी करना मुश्किल था. चौलखोवा से मिले संदेश की जिस तरह अनदेखी हुई उसी से जाहिर हो जाता है कि उन दिनों राज्य का प्रशासन किस कदर अस्त-व्यस्त था. सिपाझार पुलिस थाने के प्रभारी के पास रिपोर्ट पहुंच चुकी थी कि हमले के लिए किस तरह तैयारी की गई है, लेकिन वह नेशनल हाइवे के आसपास पुलों और सरकारी साजो-सामान की सुरक्षा में इतना व्यस्त था कि वह इस जानकारी पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता था.

‘सीधी गोली मारे जाने के बावजूद भीड़ आगे बढ़ रही थी’

पहले हमलों के पांच दिन बाद जिंदा बचे कुछ लोग किसी तरह चांड़ की जमीन से बाहर निकले और मंगलदाई के पूरब में प्रवासियों की बहुलता वाले धौला और ठेकराबाड़ी गांवों में हत्याओं की खबरें अपने साथ ले गए. इन खबरों के बाद प्रवासी मुसलमानों ने असमी ग्रामीणों पर हमले किए और करीब 70 लोगों को मार डाला. यानी घटनाक्रम इस प्रकार है—चौलखोवा में प्रवासी मुसलमानों की हत्या की जाती है, इसका बदला लेने के लिए धौला आदि गांवों में असमी लोगों को मारा जाता है, इसके बाद मंगलदाई में नदी के पार नेल्ली में भीषण जनसंहार होता है.

अगर दर्रांग और नवगांव ने सबका ध्यान खींचा, तो दूसरे जिले भी हिंसा से अछूते नहीं रहे. ग्वालपाड़ा में कई जातीय झड़पों में कुल 300-400 लोग मारे गए, दूरदराज़ के उत्तरी लखीमपुर जिले में, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था कि वहां क्या हो रहा है, 1000 से ज्यादा लोग मारे गए. ये हत्याएं तब हुईं जब असमी हिंदुओं और मिसींग आदिवासियों की भीड़ ने सदिया के सीमावर्ती इलाके के पूरब में स्थित बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों के कई गांवों पर हमले किए. जिंदा बचे लोगों ने नदी की शरण ली और दूर के द्वीपों में छिप गए लेकिन उन पर भी बाद में हमले हुए.

उस फरवरी के उन्मादी दिनों के माहौल का इससे बेहतर प्रमाण नहीं हो सकता कि हर कोई हर किसी से डर रहा था, डर और नफरत का मेल खतरनाक रूप ले चुका था और इसने 7,000 लोगों की जान ले ली. उन मुठभेड़ों को सांप्रदायिक, या जातिवादी या भाषायी जैसा कोई एक नाम देना मुश्किल है. वे शायद इन सबके मेल का नतीजा थीं.
यह हिंसा तब भी जारी थी जब के.पी.एस. गिल और अपर असम डिवीजन के कमिश्नर वी.एस. जफा हेलिकॉप्टर से मंगलदाई पहुंचे थे. उनकी अगवानी के लिए हेलीपैड तक जाने वाले सब-डिवीज़नल पुलिस अफसर एस. अहमद की आंखों में आंसू भरे थे. उन्होंने उनसे कहा, “क्या आप जानते हैं सर कि उन्होंने हंदीक़ को किस बर्बरता से मार डाला.” और यह कहकर वे फूट पड़े थे. सर्कल इंस्पेक्टर घन कांत हंदीक़ के क्षत-विक्षत, जले हुए शव को जनता के दर्शन के लिए मंगलदाई अस्पताल के अहाते में रखा गया था.

आधे जले हुए एक पुल को पार करने में हमारी मदद कर रहे सीआरपीएफ के एक कमांडेंट ने सटीक आकलन करते हुए कहा था, “25 साल से मैं हिंसक भीड़ों को काबू करके अपनी आजीविका चलाता रहा हूं, लेकिन इस बार की भीड़ अलग ही थी. पहली बार मैंने ऐसी भीड़ देखी जो सीधी गोली दागे जाने के बावजूद आगे बढ़ती आ रही थी. हमने पीछे हटने का फैसला किया क्योंकि हम गोली चलाते रहते तो एक और जालियांवाला कांड हो जाता.”

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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