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Wednesday, 18 February, 2026
होममत-विमतसोचिए अगर एपस्टीन फाइल्स में राहुल गांधी या MK स्टालिन का नाम होता, तब BJP और टीवी मीडिया क्या करते?

सोचिए अगर एपस्टीन फाइल्स में राहुल गांधी या MK स्टालिन का नाम होता, तब BJP और टीवी मीडिया क्या करते?

ये सवाल खत्म नहीं होने वाले हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ियां जानेंगी कि किसने कठिन सवाल पूछने से इनकार किया और किसने नहीं.

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एक सिनेरियो की कल्पना कीजिए.

फर्ज कीजिए कि राहुल गांधी, अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी, एमके स्टालिन, या किसी और विपक्षी नेता का नाम जेफरी एपस्टीन की फाइल्स में होता.

जरा सोचिए अगर कोई विपक्षी नेता एक दोषी यौन अपराधी के साथ कई दोस्ताना ईमेल का आदान-प्रदान कर रहा होता.

कल्पना कीजिए कि कितना हंगामा होता. कल्पना कीजिए कि कितनी सनसनी फैलाई जाती.

सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस करती और बदनाम रूप से झुकने वाला मीडिया, मुख्यधारा का “पुराना” मीडिया, तेज़-तर्रार कपड़े पहनने वाले टीवी एंकर और अखबारों के हेडलाइन लिखने वाले 24 घंटे सक्रिय हो जाते.

वे बीजेपी से विपक्ष पर हमला करने की जिम्मेदारी लेकर उसे हर जगह फैलाते, खुशी से उछलते. एंकर चिल्लाते. बड़े-बड़े हेडलाइन ईमेल की सनसनीखेज बातें छापते. तेज़ आवाज़ वाले शो और खुद को बहुत महत्वपूर्ण मानने वाले संपादकीय विपक्ष की कमियों को दिखाते और बार-बार उसके अंत की घोषणा करते.

लेकिन आज क्या हो रहा है, जब यह सामने आया है कि नरेंद्र मोदी के एक मंत्री, हरदीप सिंह पुरी—जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं, ने जेफरी एपस्टीन को ईमेल लिखा था? आज कई भारतीय मीडिया संस्थानों में मुद्दा उठाने और सही सवाल पूछने में हिचकिचाहट और जानबूझकर अनिच्छा दिख रही है.

ईमेल में (जो 2014 में भेजे गए थे, यानी 2008 में एपस्टीन के बाल वेश्यावृत्ति के अपराध में दोषी ठहराए जाने के बाद), पुरी ने जेफरी एपस्टीन को “जेफ”, “माई फ्रेंड” कहा, लोगों के मामले में उनकी “बेहतरीन पसंद” की तारीफ की और लिखा, “मज़े करो, हालांकि, इसके लिए तुम्हें किसी और के प्रोत्साहन की ज़रूरत नहीं है.” पुरी ने एपस्टीन के “अनोखे द्वीप” का भी ज़िक्र किया और अंत में “वार्मली” लिखकर ईमेल खत्म किया.

यह कोई औपचारिक पेशेवर बातचीत नहीं थी, बल्कि पुरी का अंदाज बहुत उत्साहित और खुश करने वाला था. यह माफ करने लायक नहीं है कि पुरी जैसे लंबे समय तक रहे वरिष्ठ राजनयिक ने एक गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति से संबंध रखने में कोई समस्या नहीं देखी, सिर्फ इसलिए कि उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार में प्रभाव मिल सके. कम से कम, यह बहुत खराब फैसले को दिखाता है.

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पुरी आक्रामक और चुनौतीपूर्ण नज़र आए और उन्होंने एपस्टीन के बाल यौन अपराध को कम करके दिखाया और बच्चे के साथ यौन शोषण को “कम उम्र की महिला से संबंध बनाने की कोशिश” कहकर बताया.

सांसदों ने संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह यह मुद्दा उठाया. सांसदों ने सवाल किया कि मोदी सरकार पुरी का साथ क्यों दे रही है, मंत्री से विस्तार से जवाब क्यों नहीं मांगा जा रहा और पुरी पर इस्तीफा देने का दबाव क्यों नहीं है.

पूरी दुनिया में, चाहे यूनाइटेड किंगडम हो या संयुक्त राज्य अमेरिका, अंतरराष्ट्रीय मीडिया एपस्टीन से जुड़े लोगों से जवाबदेही मांग रहा है, जो इस शर्मनाक स्थिति में फंसे हुए हैं.

गायब पहरेदार

लेकिन भारत की कभी बहादुर रही प्रेस की आवाज कहां है, जिसे हमेशा विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए? ऐसा क्यों है कि सिर्फ विपक्ष और विपक्ष के सांसद ही सवाल उठा रहे हैं?

जब मैं 2024 में राज्यसभा में शामिल हुई, तो मैंने दिप्रिंट में एक लेख लिखा था, जिसमें बताया था कि मैं पत्रकारिता छोड़कर विपक्ष में क्यों जा रही हूं: क्योंकि इस समय विपक्ष ही एकमात्र ऐसी ताकत है—बहादुर डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन एक्टिविस्ट को छोड़कर, जो नरेंद्र मोदी सरकार से सवाल पूछ रही है और जवाबदेही मांग रही है.

वह लेख बार-बार सही साबित हो रहा है. आज राजनीतिक विपक्ष को सिर्फ संसद में काम नहीं करना है, बल्कि प्रेस का काम भी करना पड़ रहा है.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के समय से आज की स्थिति का अंतर बहुत साफ है. उन सालों में, भारतीय जनता पार्टी का मनमोहन सिंह पर हर तंज या छोटा हमला भी यही मीडिया ब्रेकिंग न्यूज, प्राइम-टाइम बहस और पहले पेज की बड़ी हेडलाइन बना देता था.

अब वही मीडिया, मोदी को हर बार क्लीन चिट देने में लगा है, बड़े-बड़े विवादों को नज़रअंदाज़ कर रहा है और हर बार बचाव करने वाले वकील की तरह व्यवहार कर रहा है. वही मीडिया, जिसने यूपीए की छोटी-छोटी गलतियों को भी बार-बार राष्ट्रीय घोटाला बना दिया था—अब हर तरह से झुक रहा है. यूपीए के समय हर हफ्ते ‘नीतिगत पक्षाघात’ का शोर होता था. आज सिर्फ डर और चुप्पी है.

नोटबंदी की असफलता, जिससे लाखों लोग परेशान हुए, से लेकर कोविड मौतों की सच्चाई, जिसे सरकारी दावों के पीछे छिपा दिया गया, से लेकर पीएम केयर्स फंड की जानकारी छिपाने तक और बीजेपी शासित राज्यों में घोटालों और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों तक—ज्यादातर टीवी मीडिया ऐसे दिखाता है जैसे ये घोटाले हैं ही नहीं, इन्हें दिखाने से बचता है और मोदी सरकार से सवाल पूछने से पीछे हट जाता है.

पेगासस जासूसी मामले पर, जिसने आम लोगों और आलोचकों की निजता में दखल दिया—कोई कड़े सवाल नहीं पूछे गए. चीन के घुसपैठ के मामले पर, जिसमें भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा हुआ—कोई लगातार गुस्सा नहीं दिखाया गया, कोई गहरी जांच नहीं हुई, और न ही पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की गई.


यह भी पढ़ें: मैं पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में क्यों आई — क्योंकि मीडिया का गला घोंट दिया गया है, विपक्ष का नहीं


जवाबदेही की कोई मांग नहीं

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक चमकदार व्यापार समझौता साइन किया गया. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मंत्री पीयूष गोयल संसद के बाहर जीत का जश्न मनाने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए, लेकिन उन्होंने साफ-साफ मना कर दिया कि इस पर संसद के अंदर कोई बहस नहीं होगी. यह सिर्फ गलती नहीं है; यह संसद के अधिकार का खुला उल्लंघन है और उस संस्था को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करना है जो जनता की ताकत का प्रतिनिधित्व करती है.

असुविधाजनक सवाल? उन्हें बस स्क्रिप्ट से हटा दिया जाता है. टीवी मीडिया शानदार पीआर के असर में बह जाता है—“सभी सौदों की मां”, “सभी बड़े सौदों का पिता”—बिना यह पूछे कि असली शर्तें क्या हैं, क्या समझौते हुए हैं और भारतीय किसानों, मजदूरों या देश की संप्रभुता पर इसका लंबे समय में क्या असर होगा. विपक्ष को संविधान के तहत मिले सवाल पूछने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है. बहस? कौन-सी बहस?

प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते—प्रधानमंत्रियों की यह पुरानी लोकतांत्रिक परंपरा अब भारत में खत्म हो चुकी है. नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया है: कोई बिना तय सवाल-जवाब वाला इंटरव्यू नहीं, कैमरे के सामने कोई जवाबदेही नहीं.

टीवी मीडिया भी मुश्किल से सवाल पूछने की हिम्मत करता है. इसके बजाय, हर दिन का शोर सिर्फ एक लक्ष्य पर रहता है: विपक्ष, विपक्ष, विपक्ष. विपक्ष की विश्वसनीयता पर हमला करो, उनके नेताओं का मजाक बनाओ और हर सरकारी नाकामी या घोटाले के लिए उन्हें दोष दो.

यह स्क्रिप्ट लगातार चलती रहती है और इसकी गूंज बहुत तेज़ होती है.

हर दिन टीवी पर यही दिखाया जाता है कि विपक्ष की बातों को कैसे गलत साबित किया जाए, इस विपक्षी नेता को कैसे बदनाम किया जाए, उस विपक्षी नेता को कैसे शर्मिंदा किया जाए.

जब राजनीति को नया मुद्दा चाहिए होता है, तो टीवी पर हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा गरम रखा जाता है. एक तेज़ और भेदभाव करने वाली आवाज़ को मंच दिया जाता है, बार-बार दिखाया जाता है, जब तक नफरत फैलने न लगे और समाज में दूरी न बढ़ जाए. ध्रुवीकरण कोई गलती नहीं है; यह टीवी मीडिया की रणनीति है. यह ध्यान भटकाने का एक और बड़ा हथियार है.

चुनाव आयोग का काम कैसे हो रहा है, और स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी—इन पर बहुत कम बात होती है. चुनाव आयोग से जवाबदेही की लगातार मांग क्यों नहीं हो रही? वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की गहराई से जांच क्यों नहीं हो रही? क्यों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, विपक्ष की मजबूत और निडर नेता ममता बनर्जी को लोगों की आवाज़ उठाने के लिए दिल्ली आकर विरोध करना पड़ता है?

और निखिल गुप्ता केस का क्या, जिसमें यह गंभीर आरोप है कि एक भारतीय सरकारी अधिकारी अमेरिका की ज़मीन पर खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश में शामिल था? अमेरिकी अदालत के दस्तावेज़ के अनुसार, एक सरकारी अधिकारी ने विदेश में हत्या की मंजूरी दी. यह कोई छोटी साजिश नहीं है; यह एक बड़ा कूटनीतिक मामला है. फिर भी सरकार से लगातार और गहराई से सवाल नहीं पूछे जा रहे. कोई टीवी न्यूज चैनल कठिन सवाल नहीं पूछ रहा. कोई सख्त संपादकीय नहीं लिखे जा रहे, जिसमें पूरी जांच या संसद में जांच की मांग हो.

लेकिन ये सवाल खत्म नहीं होंगे और आने वाली पीढ़ियां जानेंगी कि किसने ये सवाल पूछने से इनकार किया.

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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