Sunday, 3 July, 2022
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राहुलजी, नरम हिंदूवाद की जीत हो सकती है , पर नरम राष्ट्रवाद के साथ नहीं

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राहुल गांधी भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व के खिलाफ अपनी नरम हिन्दू धार्मिकता को खड़ा कर रहे हैं। हालाँकि राष्ट्रवाद के मामले में ऐसा करना खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

राहुल गाँधी को भले ही भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी हो लेकिन उन्होंने भाजपा को अवश्य ही चक्कर में डाल  दिया है। समझदारी की बात करें तो  उनकी कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा को लेकर भाजपा की प्रतिक्रिया ” व्हाट अ  ग्रेट आइडिया, सरजी ” की तर्ज़ पर कुछ होनी चाहिए थी । भोले बाबा आपको सद्बुद्धि दें और हम उम्मीद करते हैं कि  आप अपने प्रतिद्वंदियों के लिए भी प्रार्थना करेंगे।  इससे मसला तो हल हो ही गया होता , शिव के जैसे “चिल्ल्ड आउट ” भगवान को यह पसंद भी आता।

इसके ठीक उलट भाजपा , जिसकी लोकसभा में  कांग्रेस से छह गुनी  ताकत है , न केवल आनन फानन में राहुल की यात्रा की तस्वीरों की सत्यता परख रही है बल्कि वह राहुल के वहां होने पर भी सवाल उठा रही है। एक कुछ ज़्यादा ही खाली बैठे रहनेवाले, ट्विटर प्रेमी मंत्री तो जासूसी में लगे हैं और उनका दावा है कि  राहुल की तस्वीर फोटोशॉप की हुई है क्योंकि आप उनकी छड़ी की परछाई नहीं देख सकते।

यह राजनीति भाजपा के लिहाज़ से उतनी ही नासमझी भरी है जितनी राहुल के लिए समझदारी भरी। भाजपा जवाहरलाल नेहरू को लेकर इस हद तक जुनूनी है कि वे मानते रहेंगे कि नेहरू का अज्ञेयवाद उनकी भावी पीढ़ियों पर भी हावी है।  इंदिरा और राजीव , दोनों दर्शा चुके हैं कि ऐसा नहीं था और उनकी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धता का मतलब यह नहीं था कि वे अपने वंश  के संस्थापक  की तरह नास्तिक थे।

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इंदिरा गाँधी रुद्राक्ष की माला पहनती थीं , नियमित रूप से मंदिर जाती थीं और कई बाबाओं एवं तांत्रिकों को उनका संरक्षण प्राप्त था। वहीँ राजीव गाँधी ने अयोध्या स्थित राम मंदिर स्थल का ताला खोला था , भावी राम मंदिर के शिलान्यास में मदद की थी और रामराज्य के वादे के साथ 1989 में अयोध्या से ही अपने चुनावी कैम्पेन की शुरुआत की थी।

यूपीए के 10 वर्षों के शासन को देखते हुए मोदी-शाह की भाजपा का भ्रम में पड़ना संभव था क्योंकि गठबंधन के केंद्र-वाम कलेवर की बदौलत किसी तरह का धार्मिक प्रदर्शन नहीं रहा था। इसके बावजूद मनमोहन सिंह के उस जानदार भाषण में , जिसने उन्होंने न्यूक्लियर डील की तरफदारी की थी ,उन्होंने गर्व से गुरु गोविन्द सिंह रचित ‘चंडी दी वार’ सुनाई थी जो युद्धक्षेत्र में जाने के दौरान देवी चंडी की शिव अराधना है।

इंदिरा के बाद, कांग्रेस ने कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्षता की नेहरूवादी परिभाषा को त्यागते हुए आक्रामक अल्पसंख्यकवाद एवं नरम धार्मिकता के एक व्यावहारिक मिश्रण को अपनाया, जिसे भाजपा तुष्टिकरण की संज्ञा देती है। राहुल इससे कहीं आगे निकल चुके हैं। वे ‘जनेऊ-धारी’ हैं, जो हममें से कई धार्मिक लोग नहीं हैं , सफ़ेद वस्त्रों में मंदिर जाते हैं , और चुनाव प्रचार के मौसम की शुरुआत के साथ ही शिव के धाम की तीर्थयात्रा पर निकल चुके हैं।

राहुल गांधी का धार्मिकता की ओर झुकाव रणनीतिक तर्क का परीक्षण पास करता है। वे भाजपा के कट्टर हिंदुत्व का जवाब अपने नरम हिंदु धर्म से देना चाहते हैं।

कट्टर – धर्मनिरपेक्ष वामपंथियों में से उनके कई नए समर्थक परेशान हैं लेकिन राहुल समझते हैं कि यह देश जेएनयू के क्रांतिकारी गणराज्य से कहीं आगे तक फैला है और भगवान को दूसरे दल के भरोसे छोड़कर कोई चुनाव नहीं जीत सकता। भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया और सवाल: क्या राहुल हिंदुओं की तरह बैठे या मुसलमानों की तरह , घुटनों पर (हाल ही में); या फिर यह कि क्या उनकी तीर्थयात्रा की तस्वीरें सच्ची हैं , यह दर्शाता है कि भाजपा असहज है। उन्होंने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि एक गाँधी हिंदुत्व पर उनके एकाधिकार को चुनौती देगा।

ठीक उसी तरह, उनकी स्वयं की पार्टी से सम्बन्ध होने के आरोप में गिरफ्तार लोगों को उनके तत्काल और सम्पूर्ण समर्थन से हैरान है। क्या वह अब भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व के खिलाफ अपनी नरम धार्मिकता से लड़ने के साथ साथ भाजपा के आक्रामक राष्ट्रवाद के बदले में एक नरम राष्ट्रवाद को खड़ा करना चाहते हैं? यदि ऐसा है तो कांग्रेस के दृष्टिकोण से ये दो मौलिक बदलाव होंगे जिनमें दूसरा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और जोखिम भरा होगा।

गिरफ्तार लोगों को उनका समर्थन संभवतः सहज एवं प्राकृतिक होने के साथ साथ नासमझी भरा भी था और इस मुद्दे पर किसी भी पार्टी फोरम पर चर्चा नहीं हुई। इन चार में से कम से कम दो लोगों को उनकी ही यूपीए सरकार द्वारा गिरफ्तार या प्रतिबंधित किया गया था। एक ने अभियुक्त के रूप में जेल में छह वर्ष गुज़ारे वहीँ दूसरे ने यूएपीए जैसे गंभीर आतंकवादी आरोपों के तहत सात साल। कोबाड़ गांधी और जीएन साईबाबा , दोनों को उनकी यूपीए ने ही गिरफ्तार किया था और वे अबतक जेल में हैं। दो प्रमुख नक्सलियों, आज़ाद और किशनजी को उनकी ही सरकार की एजेंसियों द्वारा “नियंत्रित हत्याओं” या “ब्लैक ऑपरेशंस ” में मारा गया था।

क्या वे अब इसे बदलना चाहते हैं? क्या उनकी प्रतिक्रिया उस समस्या की और एक नरम रुख का परिचायक है जिसे 2006 में डॉ मनमोहन सिंह ने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में वर्णित किया था? हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह यूपीए -1 के दौरान ही उनकी सरकार को वामपंथी समर्थन मिला था। मनमोहन सिंह तो राजनीतिक और आतंकवादी वामपंथियों के बीच का अंतर समझने में सक्षम थे ही, बंगाल में नक्सलियों द्वारा उत्पीड़ित वाम मोर्चा भी यह समझता था।

राहुल के लिए बदलना मुश्किल है, हालांकि कई व्यक्तियों और समूह, जो सोनिया से अपनी निकटता की वजह से शक्तिशाली थे, ने तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम के कड़े कदमों के खिलाफ प्रदर्शन किया था। यह तब हुआ था जब हमारे सुरक्षाबल कई जगहों पर भारी क्षति उठा चुके थे। 1971 के युद्ध और ऑपरेशन ब्लूस्टार को छोड़ दिया जाए तो एक दिन में इतनी बड़ी जान की क्षति भारतीय सशस्त्र सेनाओ के इतिहास में शायद छतीसगढ़ के चिंतलनार में हुई थी।

जैसे ही उनकी सेनाएं नक्सलियों को पीछे खदेड़ने में सफल होने लगीं, मणिशंकर अय्यर ने इस नीति को “वन आइड” बताया , एक मुख्य नक्सल की पत्नी , जिसे ओडिशा से अगवा किये गए आईएएस अफसर के बदले में छोड़ा गया , वह एनएसी सदस्य एवं कार्यकर्ता हर्ष मंदर के एक एनजीओ की मुख्या निकली। इसके आलावा, देशद्रोह के आरोप में बेल पर चल रहे विनायक सेन को प्लैनिंग कमीशन की एक स्वास्थ्य कमिटी में स्थान भी दिया।


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क्या वह संशय वापस आ रहा है ?

गुजरात के बाद हमने कहा था कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुआई वाली भाजपा आर्थिक प्रदर्शन के आधार पर 2019 चुनावों में जाने का जोखिम नहीं उठाएगी। वे मतदाता को हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई एवं आक्रामक राष्ट्रवाद का परोसेगी। पहली चुनौती का सामना राहुल हिंदु घर्म की अपनी निजी परिभाषा से कर रहे हैं किन्तु दूसरी चुनौती का सामना करने में कांग्रेस का खराब रिकॉर्ड आड़े आ रहा है। तीसरी चुनौती का सामना करने के लिए कांग्रेस का अतीत ही सक्षम है।

भारत ने स्वयं को बचाने के लिए अन्य किसी भी लोकतंत्र से लम्बी और खतरनाक लड़ाई लड़ी है। प्रत्येक विद्रोह को पराजित कर दिया गया है और उसके  नेताओं को जेल में या  राजनीतिक मुख्यधारा में ले आया गया है। विभिन्न वाम कट्टरपंथी आन्दोलनों के बारे में भी यही कहा जा सकता है। भारत एक अक्षमाशील और हार नहीं मानने वाला देश है। सम्प्रभुता खोने की बात तो भूल ही जाइये , भारत ने अपनी सीमा बढ़ाई  ही है, सिक्किम जिसका उदहारण है।  डेढ़ सरकारों को छोड़ दें तो भारत कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्रवाद  के मामले में नरम नहीं पड़ा है।  इनमें से एक (जनता, 1977) और आधी (वी.पी. सिंह, 1989-90) अल्पकालिक सरकारें  थीं । इंदिरा गांधी की 1980 में वापसी दो मुद्दों पर हुई थी- “खिचड़ी सरकार ”  और एक ऐसी  सरकार इतनी कमज़ोर थी कि हमारे  “छोटे पड़ोसी” भी हमें आँखें दिखा रहे है। यह एक भयानक संदेश था।

भारतीय मतदाता ने कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा, बाहरी या आंतरिक, के आलस्यपूर्ण या गड्डमड्ड नज़रिये को स्वीकार नहीं किया है । सशस्त्र नक्सल आंदोलन के पास कुछ वैचारिक रोमांटिक्स और  अपने प्रभुत्व के  कुछ दूरदराज़ के ज़िलों के अलावा  कोई समर्थन नहीं है। उनके प्रति नरम होने के लिए आपको कोई वोट नहीं मिलेगा।

इस तरह के नासमझी भरे नेतृत्व के लिए भारतवासियों के पास धैर्य नहीं है। और जेएनयू में, आप पर्याप्त रूप क्रांतिकारी न होने की वजह से खारिज कर दिए जाएंगे।  नरम हिंदुत्व-नरम राष्ट्रवाद एक आत्मघातक राजनीतिक स्किज़ोफ्रेनिया है। जब तक इसमें  सुधार नहीं किया जाता है, और राहुल गांधी सिर्फ “असफलताओं” की सूची के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर खुलकर सामने नहीं आते हैं, तबतक वे भाजपा की शर्तों पर 2019 का चुनाव लड़ेंगे जिसमें भाजपा की जीत सुनिश्चित है।

Read in English :  Dear Rahul, soft Hinduism can be a winner, but not with soft nationalism

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