Thursday, 30 June, 2022
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कांग्रेस, SP, BJP सभी किसान ऋण माफी का वादा कर रहे, पर राज्यों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है

1987 से 2019 के बीच किसान ऋण माफी का वादा करने के बाद राजनीतिक पार्टियां 21 में से सिर्फ चार बार हारी हैं. लेकिन यह एक दुष्चक्र है.

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उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर विधानसभाओं के चुनाव से पहले वादों की बरसात हो रही है. कृषि सुधारों और सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की तमाम बातें अपनी जगह हैं, राजनीतिक दलों के पास लगता है विचारों का अकाल पड़ गया है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने किसानों को अगले पांच साल तक मुफ्त बिजली देने का वादा किया है. सपा ने सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त देने और किसानों को 2025 तक ‘कर्ज मुक्त’ करने यानी उनके कर्ज माफ करने का वादा किया है. कांग्रेस ने किसानों के कर्ज फिर से माफ करने का वादा किया है. पंजाब में एनडीए ने 5 लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने का वादा किया है. आम आदमी पार्टी (आप) ने उत्तराखंड में खेती के लिए मुफ्त बिजली देने का वादा किया है.

किसानों की कर्ज माफी की घोषणा चुनावों की सबसे पसंदीदा घोषणा होती है. पार्टियां कर्ज में फंसे किसानों को बकाया कर्ज का भुगतान करने से छूट देने के वादे करती हैं. इससे किसानों को तो सीधा फायदा नहीं होता लेकिन कर्ज भुगतान से छूट मिलने से उनके हाथ में नकदी ज्यादा बढ़ती है और जब पुराने कर्ज का निबटारा हो जाता है तब वे नया कर्ज लेने के लिए संस्थाओं के पास जा सकते हैं.

इस तरह की कर्ज माफी को समय के साथ राजनीतिक वैधता भी मिल गई है, बेशक प्रकट रूप से. हमारे शोध के मुताबिक, 1987 से 2019 के बीच कृषि कर्ज माफी के वादे या उसके अमल के बाद राजनीतिक दल 21 में से केवल चार चुनाव हारे. सफलता की यह शानदार 80 फीसदी दर चुनावी कामयाबी का मजबूत फॉर्मूला बन गई है. लेकिन कर्ज माफी अगर किसानों की समस्याओं का इतना ही कारगर उपाय है तो फिर कुछ-कुछ साल पर ही इसकी जरूरत क्यों पड़ने लगती है?

भारत में किसानों की कर्ज माफी पर आगामी शोध रिपोर्ट (मार्च 2022) में हमने यह विश्लेषण करने की कोशिश की है कि किसानों की कर्ज माफी के वित्तीय, आर्थिक, सामाजिक और व्यावहारिक पहलुओं का किसानों, राज्यों के बजट, बैंकों, और खासकर उधार की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ता है. इस लेख में हमने राज्यों के बजट के विश्लेषण से मिले सबक को रेखांकित करने की कोशिश की है.

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राज्यों को पैसा कहां से मिलता है

किसानों की कर्ज माफी एक महंगा कार्यक्रम है. 2017 में पंजाब में इसके कारण सरकारी खजाने को 10,000 करोड़ रुपये यानी उस साल राज्य की जीडीपी के 9 प्रतिशत के बराबर की राशि का बोझ पड़ने की उम्मीद थी. उसी साल महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश ने भी कर्ज माफी की योजना लागू की. उनके खजाने पर क्रमशः 34,020 करोड़ और 36,000 करोड़ का बोझ पड़ने वाला था, यानी उस साल उनकी जीडीपी के 12-13 फीसदी के बराबर. इतने बड़े खर्च के लिए राज्य कहां से पैसे जुटाते हैं?

इसके लिए सरकारें आम तौर पर या तो ज्यादा उधार लेती हैं या किसी तरह का टैक्स थोपती हैं या सरकारी विभागों के फंड में हेराफेरी करती हैं.

हमने 2017-18 की पंजाब की ‘कर्जमाफ़ी योजना’, महाराष्ट्र की ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकरी सन्मान योजना’, उत्तर प्रदेश की ‘किसान ऋण मोचन योजना’ का अध्ययन किया. राज्यों के बजट दस्तावेजों में दर्ज आंकड़ों और अन्य चीजों के अध्ययन से हमें निम्नलिखित बातें पता चलीं.

कर्ज माफी की कीमत चूंकि बड़ी है, इसलिए राज्य सरकारें माफ की गई रकम बैंकों को कुछ वर्षों तक किस्तों में चुकाती हैं. उदाहरण के लिए, 2017-18 की योजना में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश ने उसी साल माफी की रकम के क्रमशः 74 और 83 प्रतिशत हिस्से जारी कर दिए थे. लेकिन पंजाब में अगले साल यानी 2018-19 में माफी की रकम का केवल 64 फीसदी हिस्सा जारी किया गया. भुगतान को किस्तों में देकर राज्य सरकारें वित्तीय गुंजाइश बनाने की कोशिश करती हैं.


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माफी के कारण क्या जरूरी खर्चे रोके जाते हैं?

पूंजीगत खर्चे (कैपेक्स) वे होते हैं जिनसे परिसंपत्तियों का निर्माण किया जाता है या देनदारियों को कम किया जाता है. कैपेक्स का संबंध राज्य की भावी आय वृद्धि क्षमता से है. पंजाब और उत्तर प्रदेश में जिस साल कर्ज माफी वाली रकम के अधिकतम हिस्से का भुगतान बैंकों को किया गया उस साल पूंजीगत खर्च कम हुआ. पंजाब में उसकी जीडीपी के हिस्से के रूप में पूंजीगत खर्च का प्रतिशत 1.00 से घटकर 2017-18 में 0.5 हो गया (हालांकि इसमें 2018-19 में सुधार आया, फिर भी यह 2016-17 वाले स्तर से नीचे ही था). उत्तर प्रदेश में यह गिरावट और तेज थी, जहां कैपेक्स अनुपात 2016-17 के 5.7 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 2.8 प्रतिशत हो गया. (फिगर1).

फिगर 1ः जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में कैपिटल आउटले

स्रोतः राज्य बजट दस्तावेज

महाराष्ट्र के मामले में यह गिरावट स्पष्ट नहीं थी.

आवंटन में विभागों के बीच हेराफेरी

हमने अपने अध्ययन में पाया कि सामान्य वर्षों की तुलना में जिस वर्ष माफी की सबसे ज्यादा रकम का भुगतान किया गया उस वर्ष विभिन्न विभागों के बजट आवंटन में बड़ा हेरफेर किया गया. कर्ज माफी के साथ क्रियान्वयन विभागों के लिए आवंटन बेशक कई गुना बढ़ गए. पंजाब में कृषि विभाग के लिए आवंटन में 66 फीसदी की, उत्तर प्रदेश में ‘कृषि तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए आवंटन में 610 प्रतिशत की, महाराष्ट्र में ‘सहकारी विपणन एवं कपड़ा’ विभाग के लिए आवंटन में 887 फीसदी की वृद्धि हो गई.

इसी के साथ, कई प्रमुख विभागों के लिए आवंटन में गिरावट आ गई. सबसे उल्लेखनीय गिरावट इन विभागों के लिए आवंटन में आई— बिजली, जल संसाधन, सार्वजनिक निर्माण, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, शिक्षा, समाज कल्याण, ऊर्जा, सिंचाई, उद्योग एवं श्रम, आदि (विस्तृत ब्योरे के लिए तालिका 1 देखें).

स्रोतः राज्य बजट दस्तावेज. नोटः विभागीय आवंटन के प्रतिशत में गिरावट ब्रेकेट में दिया गया है.

हालांकि विभागों के बजट में कटौती के लिए सिर्फ कृषि कर्ज माफी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इससे यह जाहिर होता है कि कर्ज माफी जैसी खर्चीली योजनाओं के लिए बजट में मनमाना फेरबदल किया जाता है. शिक्षा, बिजली, ऊर्जा, जल संसाधन जैसे प्रमुख विभागों के खर्चों में कटौती करके राज्य सरकारें राज्य के भविष्य के लिए जरूरी निवेश को रोक रही हैं.इसके अलावा, कृषि कर्ज माफी से किसानों की तकलीफ शायद ही दूर होती है.


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दुष्चक्र में फंसे किसान

भारत में खेती कई कारणों से जोखिम का काम है. इसमें उत्पादन चक्र के साथ दूसरे कारण जुड़कर ऐसी स्थिति बना देते हैं कि किसानों के लिए कर्ज न लेना असंभव हो जाता है. लगातार घाटा और घटता मुनाफा उन्हें कर्ज का भुगतान करने में चूकने के लिए मजबूर करता है. यह चूक उन्हें और तकलीफ में डालती है, और कभी-कभी तो उन्हें आत्महत्या तक करने को मजबूर कर देती है. कर्ज माफी उस कर्ज से मुक्ति दिलाती है जो कहीं ज्यादा जटिल मर्ज का नतीजा है या लक्षण है.

इसलिए, उसकी तकलीफ के जिन कारणों— मसलन लगातार फसल खराब होना, पैदावार की लाभकारी कीमत न मिलना, या निजी नुकसान आदि— का उपाय नहीं किया जाता उसके चलते किसान की स्थिति कर्ज माफी के बाद थोड़े समय के लिए भले ठीक हो जाती है लेकिन कुछ ही वर्ष बाद वह फिर कर्ज में फंस जाता है और उसे फिर कर्ज माफी की जरूरत पड़ने लगती है.

इसलिए, कर्ज माफी के जरिए राज्य सरकार न केवल वर्तमान की खातिर राज्य की भावी क्षमताओं का सौदा करती है बल्कि वह वर्तमान को भी पूरी तरह संवार नहीं पाती. कर्ज माफी के कारण देश की उधार संस्कृति, और उधार देने के मामले में बैंकों के उत्साह पर जो बुरा असर पड़ता है वह तो अलग ही मामला है. कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों को ऐसे समाधान ढूंढने चाहिए, जो राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टि से तर्कपूर्ण हों और अंततः किसानों को ताकत दें.

(श्वेता सैनी और सिराज हुसैन ‘आइसीआरआइईआर’ में सीनियर (अतिथि) फ़ेलो हैं, और पुलकित खत्री आर्कस पॉलिसी रिसर्च में कंसल्टेंट हैं)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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