निर्मला सीतारामन ने अब तक जो नौ बजट पेश किए हैं उनमें सबसे ताज़ा बजट से यह ज़ाहिर होता है कि इस पर किसी राजनीतिक चिंता का साया नहीं है. इसके बावजूद यह बजट भू-राजनीतिक रूप से चिंताजनक हालात के मद्देनज़र तैयार किया गया दिखता है. इन विरोधाभासों से हम आगे निबटेंगे.
कॉर्पोरेट जगत, निवेशकों, और सत्तातंत्र के हमदर्द अर्थशास्त्रियों की ओर से काफी मांग की जा रही थी और सलाह भी दी जा रही थी कि थोड़ी ढील देने का जोखिम उठाइए, मुद्रास्फीति की बेहद नीची दर का लाभ उठाइए और ‘नॉमिनल ग्रोथ’ (अर्थव्यवस्था के कुल उत्पादन का चालू कीमतों के आधार पर कुल मौद्रिक मूल्य निर्धारण) को आगे बढ़ाइए.
उन सबने कहा कि और ज्यादा नोट छापिए, कुछ परिसंपत्तियों को बेचिए, नाराज़ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को रिझाने के लिए पूंजीगत लाभ पर टैक्स में कटौती कीजिए, लेकिन इससे ज़्यादातर उलटा ही किया गया है. बाज़ारों में तेज़ी लाने की जगह उन्हें ठंडा रखने के लिए ‘सिक्यूरिटीज़ ट्रांजेक्शन टैक्स’ (एसटीटी) में 150 फीसदी तक की वृद्धि कर दी गई है.
यह राजनीति के साथ विचारधारा और दर्शन का भी मामला है. तो पहले राजनीति वाले पहलू को देखें.
इसे हमने राजनीति के लिहाज़ से सबसे कम चिंताजनक बजट इसलिए कहा क्योंकि इसमें कोई दान नहीं किया गया है, टैक्सों में कोई कटौती नहीं की गई है, या मध्यवर्ग को कोई छूट नहीं दी गई है. राज्यों को अगर कोई आवंटन किया जा रहा है तो उसमें थोड़ी कटौती ही की गई है.
किसी सहयोगी पर कृपा नहीं बरसाई गई है और न किसी राज्य को ‘गोद’ लिया गया है. मतदाताओं की ओर से कोई चिंता नहीं है यह इस बात से ज़ाहिर है कि इस बार जिन राज्यों में चुनाव होने जा रहा है उन्हें किसी उपहार की पेशकश नहीं की गई है.
इसे राजनीतिक आत्मविश्वास कहते हैं. सरकार ने 2024 के बाद लगे झटकों को झटक दिया है. वह जानती है कि उसका वोट बैंक मजबूत है. जिन चार बड़े राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं उनमें से एक (असम) को तो वह अपनी जेब में मान कर ही चल रही है, दो राज्यों (तमिलनाडु और केरल) में वह हाशिये पर है, जबकि पश्चिम बंगाल का चुनाव ध्रुवीकरण के हथियार से लड़ा जाएगा. कोलकाता के अमीर अगर बजट से निराश भी हुए तो फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वैसे भी वे भाजपा को ही वोट देंगे.
बजट ने बाज़ारों की नींद तोड़ दी है, बेशक उस तरह नहीं जिस तरह उसके मुरीदों ने उम्मीद की होगी. वायदा एवं विकल्प सौदे (एफ एंड ओ ट्रेडिंग) के मामले में की गई सख्ती और फिर वित्त मंत्रालय के इस बयान को, कि यह अटकलों को रोकने के लिए किया गया है, हम विचारधारा और दर्शन का भी मामला कहते हैं. विचारधारा के मामले में आरएसएस मध्यवर्ग के प्रति पैतृकता और संरक्षण का भाव रखता आया है.
यह वर्ग मेहनती और प्रतिभाशाली तो है, लेकिन बाज़ारों के मामले में बहुत स्मार्ट नहीं है इसलिए इसे सुरक्षा देनी चाहिए, वह भी कभी-कभी अपने आप से. दर्शन की नज़र से, अलगोरिद्म वाली ट्रेडिंग पर प्रश्नचिह्न लगा है, जिसमें गंवाने वाले लाखों सीधे-सादे लोग हैं और जीतने वाले दूर के हेज़ फंड्स वाले हैं जो 200 डॉलर की हर्मीस टाइयां लगाते हैं और अल्गोज़ से खेलते हैं. यह जेम्स स्ट्रीट नाम की ट्रेडिंग फर्म का मामला था.
विदेश के एक हेज़ फंड की भारत में एक कंपनी थी जो कथित रूप से सुबह में छोटी खरीद करके एक शेयर की कीमत चढ़ा दिया करती थी और उसके विदेश स्थित माई-बाप दोपहर में मामले को सुलटा लेते थे. ‘सेबी’ ने इस पर कामचलाऊ रोक लगा दी थी, लेकिन ‘सिस्टम’ की नींद तब टूटी जब उसका मुनाफा 10 अरब डॉलर के आंकड़े को छूने लगा. ज़रा सोचिए, इन अरबों डॉलर में ऐसे कितने लाख लोगों का पैसा शामिल होगा जो अल्प-रोज़गार वाले होंगे, या रिटायर हो चुके लोग होंगे या गृहिणियां भी होंगी.
सरकार को यह पसंद नहीं था, जो अब उसने साफ-साफ कह दिया है, लेकिन उसे ‘एफ एंड ओ ट्रेडिंग’ पर पूरी तरह रोक लगाने के कुछ नुकसान भी नज़र आए, क्योंकि आखिर दुनिया भर में यह तरीका मान्य है और इससे कीमतें भी निश्चित होती हैं. ‘एसटीटी’ में तीन गुना वृद्धि पहिये में फच्चर फंसाना ही है. इससे एफपीआई नाराज़ होते हैं तो मोदी सरकार को फर्क नहीं पड़ता. वह चाहेगी कि एफपीआई भारत में धैर्यवान निवेशकों की तरह वापस लौटें. शुद्ध ट्रेडिंग और निवेश में यह जो फर्क है वह दर्शन का मामला है. इसे हम जेम्स स्ट्रीट संशोधन कह सकते हैं.
लेकिन यह सरकार के पसंदीदा तबके, मध्यवर्ग को चोट पहुंचाएगा. दो वर्षों तक एफपीआई जब नकदी लेकर चलते बने और शुद्ध एफडीआई ऋणात्मक हो गया तब मंडी को घरेलू व्यक्तिगत निवेशकों ने संभाला था. वित्त मंत्री ने बेखौफ होकर ‘एसआईपी’ में निवेश करने वाले लाखों साहसी भारतीय निवेशकों पर गर्व व्यक्त किया है. दिसंबर 2025 तक एफपीआई के मुकाबले इन निवेशकों के कब्ज़े में कहीं ज्यादा एनएसई के शेयर थे, लेकिन अब नये झटके को क्या वे बर्दाश्त करेंगे?
सरकार आत्मविश्वास से भरी, शांत है और लंबी पारी के लिए चुस्त है. चुस्त शब्द जान-बूझकर प्रयोग किया गया है क्योंकि हमारा अगला मुद्दा यह है कि यह बजट भू-राजनीति को लेकर बड़ी चिंता पर भी ध्यान देता है. यह ऐसा ही है जैसे विमान का पायलट विमान को मौसम के कारण लगने वाले झटकों से आगाह करते हुए सीट बेल्ट लगाए रखने का निर्देश देता है.
किसी को नहीं मालूम कि डॉनल्ड ट्रंप का अगला ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट क्या ऐलान कर देगा. ईरान से लड़ाई शुरू हो जाएगी या सुलह हो जाएगी? यूक्रेन को लेकर कोई समझौता होगा या तेवर और तीखे होंगे? आगे टैरिफ की क्या नई दर घोषित कर दी जाएगी? तेल की कीमतें किस दिशा में जाएंगी? चीनी फौजी तंत्र से छंटनी का क्या मतलब निकाला जाए? चुनावों के बाद बांग्लादेश की बागडोर किन हाथों में होगी? आसिम मुनीर कब खुद को असुरक्षित महसूस करने लगेंगे और कब फिर से हमारे गले पर सवार हो जाएंगे?
महज़ एक पारा में पड़ोस से लेकर दुनिया तक की कितनी चिंताएं गिना दी गई हैं. इन सबका पर्याप्त तकाज़ा है कि संभलकर चला जाए, वित्तीय विकल्पों के लिए गुंजाइश बनाकर रखी जाए और नए मुक्त व्यापार समझौतों के कारण जो बाज़ार उपलब्ध होंगे उनका लाभ उठाने के लिए निर्यात के मामले में प्रतिस्पर्द्धी बना जाए.
इस लिहाज़ से जो सबसे स्वागतयोग्य और अपेक्षित बदलाव है वह रक्षा बजट के मामले में आया है. 11 वर्षों से यह जीडीपी के 1.9 प्रतिशत के बराबर की राशि पर स्थिर था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 2 फीसदी कर दिया गया है. मैं बराबर लिखता रहा हूं कि भारत को अपने रक्षा बजट में हर साल जीडीपी के 1 प्रतिशत के 100वें हिस्से (10 बेसिस प्वाइंट) के बराबर तब तक वृद्धि की जाए जब तक यह वृद्धि उसके 2.5 प्रतिशत के बराबर नहीं पहुंच जाए.
यह भी बेहतर है कि 11 वर्षों में पहली बार सेना ने पूरे पूंजीगत बजट—1.8 ट्रिलियन रुपये (संशोधित) 1.86 ट्रिलियन को खर्च किया. इससे पहले वह हर साल बिना खर्च किया पैसा लौटाती रही थी. वित्त वर्ष 2024-25 में उसने 16,000 करोड़ रु. (करीब 2 अरब डॉलर) लौटाए थे. खर्च करने पर लगी बेड़ियों (जिन्हें वर्तमान रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह उपयोग क्षमता की सीमाएं कहते हैं) को तोड़ दिया गया है. यह ऑपरेशन सिंदूर से लगे झटकों से हुआ इलाज है.
यह बजट राजनीतिक आत्मविश्वास से भरी सरकार का उथल-पुथल वाले दौर के मद्देनज़र उठाया गया सुपर सावधानी भरा कदम है. आपको यह ‘बोरिंग’ लगता है? तो क्या हमें यह नहीं कहा गया है कि ‘बोरिंग’ बैंकर सबसे अच्छे होते हैं?
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