Wednesday, 25 May, 2022
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चीन के पैंगोंग त्सो ब्रिज का मसला डर कर या विवाद बढ़ाकर हल नहीं किया जा सकता

भारत को दीर्घकालिक सैन्य क्षमता विकसित करने की जरूरत है. लेकिन सार्वजनिक तौर पर 56 इंच के सीने वाली छवि बना चुके मोदी के लिए ऐसी नीति विकसित करना और इस पर आम सहमति बनाना कोई आसान बात नहीं है.

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लेह से यारकंद और काशगर तक ख्यात सिल्क रोड कारवां के रास्ते पर बढ़ते हुए 1962 की गर्मियों में भारतीय सेना के एक छोटे से गश्ती दल ने पूर्व दिशा की ओर मार्च किया. कटाजिला में प्राचीन शिविर-मैदानों पर चढ़कर कुग्रांग त्सांगपो नदी पार करने और फिर 5,500 मीटर से अधिक लंबे चांग्लुंग ला दर्रे से गुजरने के बाद यह टुकड़ी एक ऐसी जगह पहुंची जिसके बारे में शायद ही किसी ने सुना हो. यह जगह थी गलवान घाटी, जिसका नाम कश्मीर से चुराए घोड़ों को तुर्कमेनिस्तान पहुंचाने के लिए चोरी-छिपे इसी जंगली रास्ते का इस्तेमाल करने वाले चोरों के कबीले के सरदार के बेटे के नाम पर पड़ा था.

भारतीय जासूस प्रमुख भोला नाथ मुलिक ने इससे एक साल पहले ही एक टॉप-सीक्रेट पत्र में घाटी की अहमियत को बताते हुए लिखा था, ‘यदि चीनियों ने गलवान घाटी में मोर्चा संभाल लिया तो उनके लिए स्कार्दू, गिलगित आदि तक पहुंचना आसान हो जाएगा और हमारे लिए मुर्गो, दौलत बेग ओल्डी, पानामिक आदि के रास्ते बंद हो जाएंगे.’

स्थिति बिगड़ने की आशंका को देखते हुए सैनिकों को गलवान भेज दिया गया और उसका नतीजा सामने है. अब, जबकि नई दिल्ली को 1962 की जंग के बाद से अपनी पूर्वी सीमा पर सबसे बड़े संकट से जूझना पड़ रहा है, उसके लिए उस घटना से मिले सबक याद रखने की जरूरत है.

चीन का संदेश स्पष्ट, भारत का नहीं

पिछले हफ्ते खबर आई कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पैंगोंग त्सो में एक पुल का निर्माण कर रही है, जो सिरिजाप स्थित उसके बेस को झील के दक्षिणी किनारे से जोड़ेगा. यह पुल पैंगोंग के दक्षिण में अपनी तैनाती मजबूत करने के लिए चीनी सेना द्वारा तय की जाने वाली दूरी को काफी घटा देगा. यह एक ऐसा इलाका है जहां भारतीय सैनिक पहले से ही रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में हैं.

गलवान में परेड करते पीएलए जवानों के प्रोपेगेंडा वीडियो और चीनी सोशल मीडिया पर भारत विरोधी अभियान का पारा बढ़ाने का संदेश साफ है, आने वाले वसंत में एलएसी संकट सुलझाने का चीन का कोई इरादा नहीं है.

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लेकिन इस बारे में ज्यादा कुछ स्पष्ट नहीं है कि नई दिल्ली की प्रतिक्रिया कैसी होगी. 2021 में अधिकांश समय नई दिल्ली ने अनमने ही सही एक के बाद एक समझौते करके मामला कुछ समय टालने की कोशिश की है.

गोगरा क्षेत्र से सैन्य वापसी पर सहमति के तहत भारतीय सैनिक चांगलंग ला स्ट्रीम और कुग्रांग नदी के संगम पर स्थित प्वाइंट 17 पर अपनी स्थायी स्थिति में लौट आए. इसके बदले में पीएलए अपने स्थायी ठिकाने में थोड़ा बदलाव करके एलएसी के उत्तर-पूर्व में करीब दो किलोमीटर की दूरी पर लौट गई. भारत ने प्वाइंट 17 और 17ए के बीच गश्त भी बंद कर दी है.

ग्राफिक्स | दिप्रिंट टीम

पिछले साल, चीन ने फिर से उस सीमा पर दावा जताया था जिस पर 1959 में तत्कालीन विदेश मंत्री चाऊ एनलाई की तरफ से दावा किया गया था. सीमा मुद्दे पर सरकारी विशेषज्ञों द्वारा 1960 में की गई चर्चा के दौरान चीन ने दावा किया था कि सीमा ‘कुग्रांग त्संगपो नदी और उसकी सहायक नदी चांगलंग की धारा को बांटती हुई है.’ सीमा के बारे में चीन के वार्ताकारों का स्पष्ट दावा था कि यह चांगलंग को 78°53′ पूर्व देशांतर और उत्तर में 34°22′ अक्षांश पर काटती है, दूसरे शब्दों में कहें तो यह प्वाइंट 17ए के दक्षिण में है.

प्वाइंट 17ए तक गश्त नहीं करने संबंधी गोगरा समझौते का मतलब है कि भारत व्यावहारिक तौर पर चीन के नए दावे को मान्यता देता है कि एलएसी प्वाइंट 17ए के दक्षिण में 78°53′ पूर्व और 34°22′ उत्तर में स्थित है, जबकि इस क्षेत्र में पीएलए कभी नहीं रही है.

ग्राफिक्स | दिप्रिंट टीम

पैंगोंग में भी भारत को ऐसी ही छूट देनी पड़ी है. नई दिल्ली ने पैंगोंग के उत्तरी तट निकली हाथों की अंगुलियों जैसी कगारों में से फिंगर 4 और 8 के बीच गश्त नहीं करने पर सहमति जताई है. 1960 की चर्चा में चीन ने एलएसी को फिंगर 7 और 8 के साथ माना था. दूसरे शब्दों में कहें तो फरवरी 2021 में फिंगर 3 और फिंगर 8 के बीच जिस क्षेत्र को विसैन्यीकृत किया गया है वो दरअसल वह इलाका है जिसे चीन ने औपचारिक वार्ता में एलएसी पर भारतीय पक्ष के तौर पर स्वीकार किया था.

इसी तरह, देपसांग मैदानों में किसी भी सैन्य वापसी में संभवतः प्वाइंट 10 से प्वाइंट 13 तक की आर्क पर गश्त छोड़ने का निराशाजनक निर्णय शामिल होगा, जिसके बदले में चीन उन ठिकानों से अपने सैनिक हटा रहा है, जिन्होंने बर्त्से में भारतीय पोस्ट के पूर्व में निर्माण किया था—वैसे देखा जाए तो यह एलएसी पर फिजिकल दावे का अधिकार छोड़ने जैसा होगा.

ग्राफिक्स | दिप्रिंट टीम

भारत के लिए एलओसी जैसी स्थिति बन रही

यह सब दिल्ली के लिए बुरी खबर है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि बेहद ताकतवर होने का दावा किसी तरह उपयोगी भी होगा या नहीं. पीएलए ने दशकों पहले ही अपना आधुनिकीकरण कर लिया था; वहीं, भारतीय सेना में सुधार के तमाम प्रयास ठप और नाकाम हो चुके हैं. दोनों के सैन्य खर्च करने में भी बहुत बड़ा अंतर है—भारत के 47 बिलियन डॉलर के खर्च के मुकाबले चीन अपनी सेना पर 178 बिलियन डॉलर खर्च के लिए प्रतिबद्ध है. इसके अलावा, चीन ने तिब्बत में ढांचागत निर्माण में भारी मात्रा में निवेश किया है. अकेले 2019 में इसने वहां सड़कों, रेलवे लाइन और फाइबर-ऑप्टिक लाइनों पर लगभग 9.9 बिलियन डॉलर खर्च किए.

लॉजिस्टिक एक्सपर्ट का अनुमान है कि मौजूदा रेल और सड़कों के नेटवर्क के जरिये पीएलए की 76वीं और 77वीं कंबाइंड आर्म्स ग्रुप आर्मी एक सप्ताह के भीतर तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में सात डिवीजन के बराबर टुकड़ी भेज सकती है और एक महीने में यह आंकड़ा 32 पर पहुंचाने में सक्षम है. पीएलए के पास किसी भी मौसम में एलएसी के 31 प्रमुख दर्रों तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की सुविधा भी है.

ऐसे में सबसे खराब परिदृश्य तो यही होगा कि अपने क्षेत्र की हर एक सेंटीमीटर भूमि को दुश्मन के कब्जे में जाने से बचाने के लिए नई दिल्ली नियंत्रण रेखा जैसी किसी प्रतिबद्धता के फेर में पड़े. हर एक ब्रिज, सड़क या बटालियन के मामले में पीएलए की बराबरी करने के बजाय बेहतर यही होगा कि थोड़े-बहुत क्षेत्र की कीमत पर भी दीर्घकालिक सैन्य क्षमता के विकास और आधुनिकीकरण पर ध्यान दिया जाए.

बी.एन. मुलिक की आत्मा भी शायद इसी पक्ष में होगी. जुलाई 1962 की शुरुआत में पीएलए के एक गश्ती दल ने गलवान में गोरखा सैनिकों को देखा और उनकी घेरेबंदी कर ली. अक्टूबर में पीएलए की पूरी बटालियन के आगे बढ़ने के दौरान गोरखा सैनिकों की जगह लेने के लिए एमआई-4 हेलीकॉप्टरों पर 5 जाट की एक कंपनी भेजी गई, यही वह समय था जब जंग शुरू हो गई थी.

हालांकि, ऐसी नीति बनाने के लिए जरूरी होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता को अपनी दुविधाओं से स्पष्ट तौर पर अवगत कराएं और अगले कदम के तौर पर आम सहमति कायम करें, लेकिन यह ऐसे नेता के लिए कोई आसान बात नहीं होगी जिसने अपनी सार्वजनिक छवि 56 इंच के सीने वाली बनाई है.

(लेखक का ट्विटर हैंडल @praveenswami है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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