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Tuesday, 3 March, 2026
होममत-विमतआने वाले नेपाल चुनावों पर चीन की लंबी छाया—रेड लाइन्स और क्षेत्रीय टकराव

आने वाले नेपाल चुनावों पर चीन की लंबी छाया—रेड लाइन्स और क्षेत्रीय टकराव

नेपाल में Gen-Z मूवमेंट के बाद से चीन थोड़ा शांत रहा है क्योंकि बीजिंग की अपनी रेड लाइन्स हैं, खासकर 1989 के तियानआनमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट्स के बाद, जो लोकतंत्र के समर्थन में एक बड़ा आंदोलन था.

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नेपाल गुरुवार को होने वाले आम चुनावों के साथ चुनावी राजनीति के एक अहम दौर में प्रवेश कर रहा है. पिछले साल सितंबर में Gen Z के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के बाद कराए जा रहे ये अचानक चुनाव देश में राजनीतिक स्थिरता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं. इससे ऐसी सरकार बनने की उम्मीद है जो संस्थाओं में सुधार करे, नौकरियां पैदा करे, प्रशासन में पारदर्शिता लाए और भ्रष्टाचार से लड़े.

क्या ये चुनाव बदलाव लाएंगे—अस्थिरता के चक्र को खत्म करेंगे या फिर यह एक और खोया हुआ मौका साबित होगा, जहां राजनीतिक नेताओं और पार्टियों के बीच सत्ता की लड़ाई लोकतंत्र और अस्थिरता को साथ-साथ चलाती रहेगी, यह तो अब चुनाव के नतीजे तय करेंगे.

हालांकि, देश की जनता चुनावों से बड़े बदलाव की उम्मीद कर रही है, लेकिन नेपाल का उत्तरी पड़ोसी चीन भी हालात पर करीबी नज़र रखे हुए है. अगर पुराने नेता हटते हैं और नई महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी देश की कमान संभालती है, तो क्या बीजिंग को पंचशील—यानी साथ-साथ रहने के पांच सिद्धांत, पर आधारित वही रणनीतिक तालमेल मिलता रहेगा, जिसने नेपाल-चीन संबंधों को सात दशकों तक परिभाषित किया है? या फिर नेपाल की चीन नीति में बदलाव आएगा?

Gen-Z आंदोलन के बाद बीजिंग की सक्रियता

नेपाल में Gen-Z मूवमेंट के बाद से चीन कुछ शांत रहा है. चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से तुरंत जो प्रतिक्रिया आई, वह नेपाल में रह रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा को लेकर थी और उनसे सतर्क रहने को कहा गया. Gen-Z आंदोलन का नाम लिए बिना चीन ने यह भी उम्मीद जताई कि “नेपाल के विभिन्न वर्ग घरेलू मुद्दों को सही तरीके से संभालेंगे और जल्द सामाजिक व्यवस्था और राष्ट्रीय स्थिरता बहाल करेंगे.”

यह चीन की ओर से बहुत संतुलित और सावधानी भरी प्रतिक्रिया थी, क्योंकि बीजिंग की अपनी रेड लाइन्स हैं, खासकर 1989 के तियानआनमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट, के बाद जो लोकतंत्र के समर्थन में एक बड़ा आंदोलन था. इसके अलावा, आधिकारिक बयान या मीडिया रिपोर्ट में Gen Z के नेतृत्व वाले आंदोलन को स्वीकार करना चीन के युवाओं के बीच भी चर्चा का विषय बन सकता था. आखिर नेपाल में जो हुआ, वह सिर्फ नेपाल तक सीमित घटना नहीं थी, बल्कि एशिया के कई देशों—जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस में भी ऐसा देखने को मिला है.

इसी समय, चीन की नेपाल नीति का एक हिस्सा यह भी रहा है कि वह भारत के खिलाफ जनभावना को समझे, जहां कुछ लोग नई दिल्ली को ‘बड़े भाई’ या ‘हावी रहने वाला’ देश मानते हैं. इसलिए नेपाल के राजनीतिक मामलों पर तटस्थ रुख अपनाना चीन के लिए फायदेमंद है. इससे वह खुद को एक विकास सहयोगी और दोस्त देश के रूप में पेश करता है और नेपाल में अपनी मौजूदगी मजबूत करता है. इसी कारण, चीन ने अपने बयानों में ‘Gen-Z’ शब्द से बचते हुए भी आने वाले चुनावों के लिए करीब 40 लाख डॉलर की नकद अनुदान सहायता देने की पेशकश की है.

बताया गया है कि यह अनुदान केवल चार कामों के लिए इस्तेमाल होगा: “चुनाव के अस्थायी पुलिस बल की तैनाती, उनकी वर्दी, उनके लिए जरूरी व्यवस्था और सशस्त्र पुलिस बल द्वारा चुनाव की निगरानी और देखरेख की गतिविधियां.” धनराशि के साथ एक नोट भी दिया गया है, जिसमें लिखा है, “कृपया सुनिश्चित करें कि यह राशि केवल ऊपर बताए गए कामों के लिए ही इस्तेमाल हो” यानी सीधे यह चेतावनी दी गई है कि इसे राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल न किया जाए.

चीन क्या उम्मीद करेगा?

नेपाल के साथ औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के बाद से, चीन की नेपाल नीति ज़्यादातर तिब्बत केंद्रित रही है, जिसमें सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी चिंता रही है. तिब्बत से सीमा साझा करने वाला और अपने यहां बड़ी संख्या में तिब्बती निर्वासितों को रहने देने वाला देश होने के कारण, बीजिंग ने काठमांडू से हमेशा यह भरोसा चाहा है कि नेपाल की ज़मीन का इस्तेमाल गैर-राज्य तत्व तिब्बत में अस्थिरता फैलाने के लिए न करें. नेपाल में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, पूर्ण राजशाही, पंचायती व्यवस्था, संवैधानिक राजशाही या लोकतंत्र, के बावजूद 1955 से चीन की नेपाल नीति में तिब्बत सबसे अहम मुद्दा रहा है.

चीन की चिंताओं पर अलग-अलग समय में सभी नेपाली सरकारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. इससे चीन के प्रति नेपाल की विदेश नीति में एक समान रुख दिखाई देता है. बीजिंग भी यह सुनिश्चित करता है कि नेपाल हर आधिकारिक बयान में ऐसे वादे को दोहराए.

उदाहरण के तौर पर, 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान हुए तिब्बत आंदोलन के समय, चीन ने पहले लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड को नेपाल में तिब्बती निर्वासितों द्वारा किए गए ‘फ्री तिब्बत’ प्रदर्शन को रोकने के लिए राजी कर लिया था. ये प्रदर्शन तिब्बत में इसी तरह की मांग उठाने वालों के समर्थन में किए गए थे.

नेपाल में तिब्बतियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की आलोचना ह्यूमन राइट्स वॉच सहित कई बड़ी वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं ने की थी. दिलचस्प बात यह है कि 2008 के बाद से खुले तौर पर तिब्बत के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन काफी कम हो गए, जो नेपाली सरकार के सावधानी भरे रुख को दिखाता है.

दूसरी बात यह है कि चीन नेपाल में ऐसा मजबूत प्रभाव बनाना चाहता है, जो भारत की पारंपरिक मौजूदगी को चुनौती दे सके. वह नेपाल को दक्षिण एशिया के बड़े क्षेत्र तक पहुंच का रास्ता बनाना चाहता है, जिसके लिए वह नेपाल में संपर्क और बुनियादी ढांचा विकसित करना चाहता है. 2017 में नेपाल के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पर हस्ताक्षर को बीजिंग की कूटनीतिक सफलता माना गया. इसके जरिए चीन तिब्बत और नेपाल के बीच रेल और सड़क संपर्क बनाना चाहता है. कुल मिलाकर, चाहे राजशाही हो या राजनीतिक दल, लगभग सभी ने चीन की सुरक्षा चिंताओं को स्वीकार किया है.

लेकिन यह चुनाव एक चेतावनी के साथ आया है: अगर आने वाले चुनावों में युवा बड़ी संख्या में जीतते हैं, तो क्या वे तिब्बत को लेकर चीन की रेड लाइन्स का सम्मान करेंगे?

हालांकि, निर्वाचित हुई सरकारें आमतौर पर विदेश नीति के स्थापित नियमों के खिलाफ नहीं जातीं, लेकिन नई नेतृत्व टीम बदलाव लाती है और रुख में परिवर्तन भी होता है. फिर भी, चीन के लिए युवा हमेशा स्थिर साझेदारी का भरोसेमंद आधार नहीं माने जाते. इसकी वजह यह हो सकती है कि युवा अक्सर तिब्बत के मुद्दे पर खुलकर बोलते रहे हैं और तिब्बत समर्थक प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरते रहे हैं.

पिछले दो दशकों में बीजिंग ने नेपाली युवाओं से जुड़ने के लिए उन्हें चीन में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्तियां दी हैं, ताकि आपसी सद्भाव बढ़े. चीन यह भी दिखाता है कि वह विकास और सहायता के जरिए नेपाल के साथ सहयोग चाहता है और काठमांडू के राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देता. इसमें कोई शक नहीं कि चीन नेपाल से बिना किसी समझौते के आश्वासन और सहयोग चाहता है.

इसी वजह से बीजिंग की रेड लाइन्स का असर चुनावों में भी दिखा है. Gen-Z आंदोलन के प्रमुख युवा नेताओं में से एक, जिन्हें शुरुआत में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने महिलाओं के अनुपातिक प्रतिनिधित्व कोटे के तहत उम्मीदवार बनाने की पेशकश की थी, उनका नाम कथित तौर पर ‘फ्री तिब्बत’ आंदोलन से जुड़ाव के आरोप में अंतिम सूची से हटा दिया गया. इंस्टाग्राम पोस्ट में उन्होंने इस एकतरफा फैसले पर दुख जताया और तिब्बत या “फ्री तिब्बत” आंदोलन से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया.

उन्होंने लिखा, “सभी को नमस्कार, मैंने अनुपातिक प्रतिनिधित्व सूची से अपना नाम वापस नहीं लिया है और न ही मुझे हटाने में मेरी कोई भूमिका थी, अगर यह खबर सही है. मैंने बार-बार कहा है कि मैं तिब्बती नहीं हूं. मेरा ‘फ्री तिब्बत’ आंदोलन से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं है. मेरा कोई तिब्बती बॉयफ्रेंड नहीं है. जो भी यह कह रहा है कि उसके पास मेरे या मेरी किसी भी गतिविधि से जुड़े सबूत हैं, कृपया अपने सबूत और प्रमाण दिखाएं!! मैं आरोप लगाने वालों को चुनौती देती हूं कि अपने सबूत सार्वजनिक करें.”

Gen-Z उम्मीदवार का नाम हटाने पर आरएसपी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन चुनावों से पहले किसी उम्मीदवार का नाम कथित रूप से हटाया जाना नेपाल की चुनावी प्रक्रिया में भू-राजनीतिक संवेदनशीलताओं की भूमिका को दिखाता है. संभव है कि आरएसपी ने चीन की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए सावधानी भरा कदम उठाया हो, लेकिन यह नेपाल के लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं हो सकता, क्योंकि एक मजबूत लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों और मुद्दों को जगह दी जाती है.

लेकिन फिर भी, एक भू-आबद्ध देश होने के कारण और नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूएमएल (CPN-UML) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी जैसे पारंपरिक दलों के खिलाफ चुनावी लड़ाई में बड़ी ताकत बनने की कोशिश कर रही पार्टी के लिए, अनचाही सुर्खियों से बचने के लिए सावधानी से कदम उठाना शायद सबसे सुरक्षित विकल्प हो सकता है.

बीजिंग की उम्मीद

चुनाव अब बिल्कुल करीब हैं, ऐसे में बीजिंग चाहेगा कि नेपाल की चीन नीति पहले की तरह जारी रहे और उसे और मजबूत किया जाए. वह खास तौर पर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसे प्रोजेक्ट्स में नई जान डालना चाहेगा, जो अब तक ज़मीन पर पूरी तरह शुरू नहीं हो पाए हैं. चीन ने हाल ही में काठमांडू में अपना नया दूत भेजा है, जो इससे पहले बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के एशियाई मामलों के विभाग में उप-निदेशक थे. उनकी बड़ी जिम्मेदारी नई सरकार के साथ तालमेल बनाना और रिश्तों को नई शुरुआत देना होगी.

वहीं, अगर मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा करें तो चुनावी नतीजे आरएसपी के पक्ष में जा सकते हैं. आरएसपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बलेंद्र शाह, जिन्हें बालेन के नाम से जाना जाता है, झापा-5 सीट पर पूर्व प्रधानमंत्री और सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली से आगे बताए जा रहे हैं. रिपोर्ट्स यह भी कहती हैं कि पूरे नेपाल में आरएसपी का चुनाव प्रचार मजबूत दिख रहा है और उसने Gen-Z आंदोलन से खुले सुधार और युवा केंद्रित विकास के मुद्दों को जमीन पर आगे बढ़ाया है.

अगर आरएसपी सत्ता में आती है, तो चीन को नेपाल के साथ नए सिरे से रिश्ते बनाने होंगे, खासकर यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसकी सुरक्षा से जुड़ी रेड लाइन्स को नई सरकार भी महत्व दे. बालेन को अक्सर एक लोकप्रिय लेकिन राष्ट्रीय स्तर के अनुभव की कमी वाले नेता के रूप में देखा जाता है. काठमांडू के मेयर के तौर पर उनका पिछला अनुभव शायद राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी के लिए पर्याप्त न माना जाए. लेकिन अगर वह शीर्ष पद पर चुने जाते हैं, तो उनकी विदेश नीति से जुड़ी राय को गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि वही नई विदेश नीति को दिशा दे सकती है. इसका एक उदाहरण देखिए:

पिछले साल नवंबर में बालेन के एक्स (पहले ट्विटर) अकाउंट पर किया गया एक कथित ‘आपत्तिजनक’ ट्वीट, जिसे बाद में हटा दिया गया, काफी चर्चा में रहा. नेपाल के पड़ोसी देशों को दूर का देश बताते हुए उन्होंने कथित तौर पर लिखा था, “Go to hell, आप सब मिलकर भी कुछ नहीं कर सकते.” इस पोस्ट की आलोचना हुई और उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए मीडिया में बहस छिड़ गई.

साथ ही, घरेलू और विदेश मामलों में बालेन का जनभावना पर आधारित रुख तुरंत चुनौतियों का सामना कर सकता है. उनका राष्ट्रवादी अंदाज और हल्का-सा सत्ता-विरोधी बयान चीन के नेपाल में मजबूत आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को असहज कर सकता है. इससे काठमांडू बीजिंग की क्षेत्रीय योजनाओं के लिए एक नया तनाव बिंदु बन सकता है, और ऐसी स्थिति में भारत सहित अन्य देशों के साथ भी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं.

आगे बढ़ते हुए, यह चुनाव राजशाही विरोध की भावना से प्रेरित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर बदलाव की मांग से जुड़ा है. जनता की उम्मीदों को पूरा करना ही सरकार की प्रशासनिक सफलता तय करेगा. साथ ही, दूरदर्शी विदेश नीति देश के विकास को और आगे बढ़ा सकती है, लेकिन अब सब कुछ आने वाले नेतृत्व पर निर्भर करेगा.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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